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गाँवों का रोना दिल्ली को गाना लगता है


प्रतियोगिता की दूसरी रचना एक गज़ल है जिसके रचनाकार धमेंद्र कुमार सिंह ’सज्जन’ पिछले कई माहों से यूनिप्रतियोगिता के नियमित हिस्सा रहे हैं। इनकी रचनाएं हर बार ऊँचे पायदानों पर रही हैं और इनकी पिछली रचना फ़रवरी माह मे भी पांचवें स्थान पर आयी थी। एक सुलझे हुए कवि होने के संग ही एक सजग पाठक का दायित्व निभाते हुए धर्मेंद्र जी की कविताओं के केंद्र मे सामाजिक और आर्थिक विसंगतियाँ के सवाल रहते हैं।

पुरस्कृत रचना: गज़ल


चिड़िया की जाँ लेने में इक दाना लगता है
पालन कर के देखो एक जमाना लगता है ॥१॥

अंधों की सरकार बनी तो उनका राजा भी
आँखों वाला होकर सबको काना लगता है ॥२॥

जय-जय के नारों ने अब तक कर्म किये ऐसे
हर जयकारा अब ईश्वर पर ताना लगता है ॥३॥

कुछ भी पूछो, इक सा बतलाते सब नाम-पता
तेरा कूचा मुझको पागलखाना लगता है ॥४॥

दूर बजें जो ढोल सभी को लगते हैं अच्छे
गाँवों का रोना, दिल्ली को गाना लगता है ॥५॥

कल तक झोपड़ियों के दीप बुझाने का मुजरिम
सत्ता पाने पर, अब वो परवाना लगता है ॥६॥

टूटेंगें विश्वास, कली से मत पूछो कैसा
यौवन देवों को देकर मुरझाना लगता है ॥७॥

जाँच समितियों से करवाकर कुछ ना पाओगे
उसके घर में शाम-सबेरे थाना लगता है॥८॥
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पुरस्कार: हिंद-युग्म की ओर से पुस्तकें।

गज़ल: मेरी आंखों मे जरा इंक़लाब रहने दे



किसी जगह के लिए इंतख़ाब रहने दे
मैं एक सवाल हूँ मेरा जवाब रहने दे।


मैं जानता हूँ तू लिबास पसंद है लेकिन
मैं बेनक़ाब सही, बेनक़ाब रहने दे।


मैं बाग़ी नहीं पर उसके समझने के लिए
मेरी आंखों मे जरा इंक़लाब रहने दे।


तमाम उम्र गुनहगार जिया हूँ या रब
मेरे हक़ में मगर एक सवाब रहने दे।


तमाम शहर मेरे ख़्वाब तले सोया है
मत बेदार कर, तू ज़ेर-ए-ख़्वाब रहने दे।



रचनाकार: वसीम अकरम (नवंबर माह के यूनिकवि)

हम तूफानों में फंसी तकदीर हैं



जनवरी प्रतियोगिता की चौदहवीं रचना एक ग़ज़ल है जिसके रचनाकार विवेक कुमार पाठक ’अंजान’ हैं। वर्ष १९६८ में संस्कारधानी जबलपुर (म.प्र.) में जन्मे विवेक कुमार पाठक ने जबलपुर विश्वविद्यालय से वाणिज्य स्नातक एवं हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। वर्ष १९८५ से रक्षा मंत्रालय के एक विभाग आयुध निर्माणी खमरिया से अपनी कर्म यात्रा प्रारंभ की। विभागीय राजभाषा प्रतियोगिताओं से साहित्य यात्रा का आगाज़ हुआ और तब से आज तक अनवरत रूप से जारी है। कई राष्ट्रीय कवि सम्मलेन मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में आयुध निर्माणी भंडार में कार्यरत हैं एवं अंतरजाल के माध्यम से साहित्य आराधना का यह प्रथम प्रयास है। अपनी लेखनी से गीत, गज़ल, नई कविता एवं अकविता सभी विधाओं में सृजन का प्रयास किया है। इनकी हिंद-युग्म पर यह प्रथम प्रकाशित रचना है।

गज़ल

बेबसी की हम नई तस्वीर हैं ,
हम तूफानों में फंसी तकदीर हैं

गुलशनों को फूंकते हैं नौजवां,
मालियों के सूखते अब नीर हैं

बन गया मैं एक दिल टूटा हुआ,
लोग मुझको जोडते हर पीर हैं

एक था घर कई घरों में बंट गया,
बीबियाँ घर की गज़ब शमशीर हैं

रांझे को चीलें उठा के ले गईं ,
काफिरों संग घूमती अब हीर हैं

अब कहाँ मिलते फंसाने प्रीत के,
हर तरफ अब फत्ते ईर  बीर  हैं

हिज्र का भी नसीब होता है



जनवरी माह की चौथे पायदान की रचना सुवर्णा शेखर दीक्षित की है। सुवर्णा का जन्म छिंदवाड़ा मे हुआ। बैंकिंग व्यवसाय से संबद्ध सुवर्णा की हिंद-युग्म पर प्रथम रचना है।



पुरस्कृत रचना: गज़ल

दिल का रिश्ता अजीब होता है
दूर  है जो,  करीब होता है।

तन्हा रातों में चाँद भी तनहा
हिज्र का भी  नसीब होता है।

जानो दिल से जिसे भी चाहोगे
खुलूसे दिल का रक़ीब होता है।

देख लेगा  बिना  बहे  आँसू
माँ का दिल भी अजीब होता है।

शाख़े-गुल आँधियों में टूटेगी
सबका अपना सलीब होता है।

ख्वाब में रोटियाँ ही दिखती हैं
आदमी जब  ग़रीब होता है।

यूँ तो दिखता नहीं है वो ‘इबरत’
फिर भी मेरे क़रीब  होता है।
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पुरस्कार: हिंद-युग्म की ओर से पुस्तकें।

यकीं न हो तो गूगल अर्थ पे जा के देखो तुम


सभी दिखें नाखुश, सबका दिल टूटा लगता है
तमाम दुनिया का इक जैसा किस्सा लगता है

तुम्हीं कहो किसको दूँ अपने हिस्से का पानी
झुलस रहा ये, वो जल बिन मछली-सा लगता है

रिवायती ग़ज़लें चिलमन पे कह तो दूँ लेकिन
नये जमाने का कपड़ों से झगड़ा लगता है

यकीं न हो तो गूगल अर्थ पे जा के देखो तुम
बड़ा शहर भी खेत खिलोनों जैसा लगता है

नहीं किताबें पढ़ के होता जन-धन संचालन
भले भलों को इसमें खास तजुर्बा लगता है

यूनिकवि: नवीन चतुर्वेदी

यूँ ही आँगन में बम नहीं आते



प्रतियोगिता की पाँचवीं रचना भी एक ग़ज़ल है। रचनाकार धर्मेंद्र कुमार सिंह प्रतियोगिता मे नियमित भाग लेते हैं और इनकी रचनाएं भी पाठकों का प्रतिसाद पाती रहती हैं। धर्मेंद्र जी इस बार के हमारे यूनिपाठक भी बने हैं। इनकी पिछली गज़ल दिसंबर माह मे सातवें स्थान पर रही थी।

पुरस्कृत रचना: गज़ल

जो तेरे दर पे हम नहीं आते
तो खुशी ले के गम नहीं आते

बात कुछ तो है तेरी आँखों में
मयकदे वरना कम नहीं आते

कोई बच्चा कहीं कटा होगा
गोश्त यूँ ही नरम नहीं आते

होगा इंसान सा कभी नेता
मुझको ऐसे भरम नहीं आते

आग दिल में नहीं लगी होती
अश्क इतने गरम नहीं आते

कोइ कहीं भूखा सो गया होगा
यूँ ही जलसों में रम नहीं आते

प्रेम में गर यकीं  हमें  होता
इस जहाँ में धरम नहीं आते

कोइ अपना ही बेवफ़ा होगा
यूँ ही आँगन में बम नहीं आते
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पुरस्कार: हिंद-युग्म की ओर से पुस्तकें।

तू दर्दे-दिल को आईना बना लेती तो अच्छा था



प्रतियोगिता की आठवीं रचना भी एक ग़ज़ल है। रचनाकार वसीम अकरम नवंबर माह के यूनिकवि रह चुके हैं।

पुरस्कृत रचना: गज़ल

तू दर्दे-दिल को आईना  बना लेती  तो  अच्छा था
मोहब्बत की कशिश दिल में सजा लेती तो अच्छा था

बचाने के लिए तुम खुद को आवारा-निगाही से
निगाहे-नाज को खंजर बना लेती तो अच्छा था

तेरी पलकों के गोशे में कोई आंसू जो बख्शे तो
उसे तू खून का दरिया बना लेती तो अच्छा था

सुकूं मिलता जवानी की तलातुम-खेज मौजों को
किसी का ख्वाब आंखों में बसा लेती तो अच्छा था

ये चाहत है तेरी मरजी, मुझे  चाहे न चाहे तू
हां, मुझको देखकर तू मुस्कुरा देती तो अच्छा था

तुम्हारा हुस्ने-बेपर्दा  कयामत-खेज है कितना
किसी के इश्क को पर्दा बना लेती तो अच्छा था

तेरी निगहे-करम के तो दिवाने हैं सभी लेकिन
झुका पलकें किसी का दिल चुरा लेती तो अच्छा था

किसी के इश्क में आंखों से जो बरसात होती है
उसी बरसात में तू भी नहा लेती तो अच्छा था

तेरे जाने की आहट से किसी की जां निकलती है
खुदारा तू किसी की जां बचा लेती तो अच्छा था.
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पुरस्कार -   विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

चलो गंगा में फिर मुझको बहा दो ।




उजालों की ये सब बकबक बुझा दो
मुझे लोरी सुना कर माँ सुला दो 

तुम्हे हम धूप सा माने हुए हैं
मेरे मन का ये अँधेरा मिटा दो 

दिया हूँ मैं दुआ के वास्ते तुम,
चलो गंगा में फिर मुझको बहा दो ।

खुशी गम होश बेहोशी सभी हैं,
चलो जीवन से अब जलसा उठा दो ।

ये पानी है तसव्वुर का जो ठहरा,
तुम अपनी याद का कंकर गिरा दो ।

रहे क़ायम रवायत ये दुआ की,
मेरी ऐसी दुआ है, सब दुआ दो ।

तुम्हारी याद की बस्ती में हूँ फिर,
मुसाफिर मान कर पानी पिला दो ।

लो इसकी आंच कम होने लगी है,
ये आतिश एक मसला है, हवा दो ।

यूनिकवि: स्वप्निल आतिश


आज दुनियाँ में क्या नहीं होता



धर्मेंद्र कुमार सिंह पिछले कुछ महीनों से ही हिंद-युग्म पर जुड़े हैं। मगर एक सक्षम कवि और गंभीर पाठक के तौर पर अपनी सार्थक और निरंतर उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। इनकी पिछली रचना नवंबर माह मे शीर्ष दस मे रही थी। दिसंबर माह मे भी इनकी प्रस्त्तुत गज़ल ने सातवाँ स्थान प्राप्त किया है।


पुरस्कृत रचना: गज़ल

प्यार तुझसे हुआ नहीं होता
तो मैं इंसान सा नहीं होता

तेरी यादों की गोंद ना होती
टूटकर मैं जुड़ा नहीं होता

मंदिरों में अगर ख़ुदा मिलता
एक भी मयक़दा नहीं होता

काट दी जाती हैं झुकी डालें
पेड़ यूँ ही बड़ा नहीं होता

ताज को छू के मौलवी तू कह
पत्थरों में ख़ुदा नहीं होता

झूठ ने फेंका है अणु बम जब से
पाँव पर सच खड़ा नहीं होता

शाम की लालिमा में ना फँसता
तो दिवाकर डुबा नहीं होता

लूट लेते हैं फूल को काँटे
आज दुनियाँ में क्या नहीं होता
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पुरस्कार -   विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

आँखों का मन पानी है जी




 इनमे भी  नादानी है  जी
 आँखों का मन पानी है जी

 माज़ी मुझमे  ठहरा है  तो
 मुझमे  एक रवानी है  जी

 मेरे घर  की  दीवारें  तो
 बच्चों की शैतानी है जी
 
 धूप सुखाने  सूरज आया
 पानी  को  हैरानी  है जी

 बच्चों मे  जा बैठा है  वो
 वो भी  एक कहानी है जी

 साहिल पर ही डूब गया जो
 सहरे का  सैलानी है  जी

 'आतिश' आंच हैं सच्ची दुनिया
 बाकी जो है   फानी है  जी



यूनिकवि: स्वप्निल ’आतिश


हम शब्दों के बुनकर हैं


जून 2010 के यूनिकवि रह चुके आलोक उपाध्याय की कलम से हिंद-युग्म के पाठक खूब परिचित हैं। खासकर गज़लों मे महारत रखने वाले आलोक की प्रस्तुत गज़ल नवंबर माह मे सातवें पायदान पर है।

 पुरस्कृत कविता: गज़ल
माना  तुमसे कमतर हैं
कहीं कहीं हम बेहतर हैं

पहचान हमारी खतरे में
हम शब्दों के बुनकर हैं

वो  जज़्बाती अव्वल सा है  
हम तो जन्म से पत्थर हैं

आना कुछ दिन बाद यहाँ
हालात शहर में बदतर हैं

मौत से हम  घबराएं कैसे
जिंदा सब कुछ  सह कर हैं

अबकी साँसे थमी हैं  जाके
यूँ मरे तो उनपे अक्सर हैं

ग़ैर देश में नज़र है तनहा
खुशियाँ  सारी घर पर हैं
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पुरस्कार- विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।


टुकड़ा-टुकड़ा वक़्त चबाती तनहाई


रातों को यह नींद उड़ाती तनहाई
 टुकड़ा टुकड़ा वक़्त चबाती तनहाई
  
यादों की फेहरिस्त बनाती तनहाई
बीते दुःख को फिर सहलाती तनहाई  
  
रात के पहले पहर में आती तनहाई
सुबह का अंतिम पहर मिलाती तनहाई  
  
सन्नाटा रह रह कुत्ते सा भौंक रहा  
शब पर अपने दांत गड़ाती तनहाई  
  
यादों के बादल टप टप टप बरस रहे
अश्कों को आँचल से सुखाती तनहाई  
  
खुद से हँसना  खुद से  रोना बतियाना 
सुन सुन अपने सर को हिलाती तनहाई  
  
जीवन भर का लेखा जोखा पल भर में
रिश्तों की  तारीख  बताती  तनहाई

 सोचों के इस लम्बे सफ़र में रह रह  कर 
करवट करवट  मन बहलाती तनहाई

-प्रेमचंद सहजवाला

उम्र के धूप चढ़ल


 पिछले कुछ माहों मनोज सिंह भावुक की भोजपुरी ग़ज़लें आप यहाँ पढ़ चुके हैं। अक्टूबर माह मे इनकी ग़ज़ल चौथे स्थान पर रही है।

पुरस्कृत रचना: भोजपुरी ग़ज़ल

उम्र के धूप चढ़ल,   धूप  सहाते   नइखे
हमरा हमराही के  इ बात  बुझाते नइखे

मंजिले इश्क में कइसन इ मुकाम आइल बा
हाय ! हमरा से “आई.लव.यू” कहाते नइखे

देह अइसन बा कि ई आँख फिसल जाताटे
रूप अइसन बा कि दरपन में समाते नइखे

जब से देखलें हईँ  हम सोनपरी  के जादू
मन बा खरगोश भइल  जोश अड़ाते नइखे

कइसे सँपरेला  अकेले  उहां प  तहरा  से
आह! उफनत बा नदी, बान्ह बन्हाते नइखे

साथ में तोहरा जे देखलें रहीं सपना ओकर
याद आवत बा बहुत  याद ऊ जाते नइखे

हमरा डर बा कहीं पागल ना हो जाए ‘भावुक’
दर्द उमड़त बा  मगर आँख  लोराते नइखे
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पुरस्कार -  विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

दीपावली हऽ जिन्दगी, हर साँस हऽ दिया


इस बार दशहरा हमने भोजपुरी ग़ज़ल प्रस्तुति के साथ मनाया था। हिंद-युग्म पर आंचलिक साहित्य के दिये की लौ को थोड़ा और बढ़ाते हुए हम इस दीवाली पर भी आपके लिये मनोज भावुक की एक भोजपुरी ग़ज़ल ले कर आये हैं। हर साँस के दीपक की तरह जीवन को प्रकाशित करने की कामना से परिपूर्ण इस रचना के साथ ही सभी सुधि पाठकों सहित हिंद-युग्म परिवार को दीपोत्सव की ढेरों शुभकामनाएँ।


दीपावली हऽ जिन्दगी,  हर साँस हऽ दिया
अर्पित  हरेक  सांस  बा  तहरे बदे  पिया

सूरज त  साथ छोड़  देवे  सांझ  होत ही
हमदर्द बन के मन के मुताबिक  जरे दिया

आघात ना लगित त  लिखाइत ना ई ग़ज़ल
ऐ दोस्त! जख्म देलऽ तू, अब लेलऽ शुक्रिया

भीतर जवन भरल बा, ऊ तऽ दुख हऽ, पीर हऽ
अब के तरे कहीं भला  हम गजल इश्किया

तोहरा हिया में दर्द के सागर बसल बा का ?
कुछुओ  कहेलऽ तू  तऽ ऊ लागेला मर्सिया

कुछ बात एह गजल में समाइल ना, काहे कि
ओकरा मिलल  ना भाव के अनुरूप काफिया

ठंड़ा पड़ल एह  खून के खउले के  देर बा
‘भावुक’ हो एक दिन में सुधर जाई भेडिया



बात पर बात होता बात ओराते नइखे


मनोज सिंह भावुक की एक रचना अभी कुछ दिन पहले ही हमने यहाँ साझा की थी। भोजपुरी साहित्य के ख्यातिप्राप्त रचनाकार भावुक की प्रस्तुत भोजपुरी ग़ज़ल प्रतियोगिता मे पाँचवें स्थान पर रही है, और प्रतियोगिता को आँचलिक रंग दे रही है।

पुरस्कृत ग़ज़ल: बात पर बात होता बात ओराते नइखे

बात पर बात होता बात ओराते नइखे
कवनो दिक्कत के समाधान भेंटाते नइखे

भोर के आस में जे बूढ़ भइल, सोचत बा
मर गइल का बा सुरुज रात ई जाते नइखे

लोग सिखले बा बजावे के सिरिफ ताली का
सामने जुल्म के अब मुठ्ठी बन्हाते नइखे

कान में खोंट भरल बा तबे तऽ केहू के
कवनो अलचार के आवाज़ सुनाते नइखे

ओद काठी बा, हवा तेज बा,किस्मत देखीं
तेल भरले बा, दिया-बाती बराते नइखे

मन के धृतराष्ट्र के आँखिन से सभे देखत बा
भीम असली ह कि लोहा के, चिन्हाते नइखे

बर्फ हऽ, भाप हऽ, पानी हऽ कि कुछुओ ना हऽ
जिन्दगी का हवे, ई राज बुझाते नइखे

दफ्न बा दिल में तजुर्बा त बहुत, ए ‘भावुक’
छंद के बंध में सब काहें समाते नइखे
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पुरस्कार- विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

परिंदे सब तुम्हारे क़ैदखाने के कफ़स में हैं


किसानों को ज़मींदारों का जब ऐलाँ बता देंगे,
वो अपनी जान दे कर आप के कर्ज़े चुका देंगे।

परिंदे सब  तुम्हारे क़ैदखाने के  कफ़स  में हैं,
मगर इक दिन ये तूफाँ बन के ज़िन्दाँ को उड़ा देंगे।

तुम्हारी हर हक़ीक़त राज़ के परदे में पिन्हाँ है,
मगर कुछ सरफिरे आ कर कभी पर्दा उठा देंगे।

गिरफ्तः-लब हैं हम गरचे तुम्हारे खौफ़ से अब तक,
खुलेंगे लब तो इक नग्मा बगावत का भी गा देंगे।

सियासतदान नावाकिफ़ हैं सब इखलाक़ से लेकिन,
कभी नेहरु कभी गाँधी सी  तक़रीरें  सुना  देंगे।

कोई मुजरिम शहर में कल ज़मानत पर नज़र आया,
वो इक आला घराने का था, उस को क्या सज़ा देंगे।

(कफस = पिंजरा, ज़िन्दाँ = जेल, पिन्हाँ = छुपी हुई, गिरफ्तः-लब = बंद ज़बान, गरचे = हालांकि, इखलाक = नैतिकता, तकरीरें = भाषण, आला = ऊंचा)

 बहृ - मफाईलुन मफाईलुन मफाईलुन मफाईलुन

कवि: प्रेमचंद सहजवाला

ज्यों कोई अख़बार ज़िंदगी:गज़ल



पल दो पल की  यार  ज़िदगी,
ज्यों  कोई   अख़बार ज़िंदगी।

ख़ाली  ख़ाली,  तन्हा तन्हा,
जैसे  हो  इतवार   ज़िदगी।
 
थोड़ी  बरखा,  थोड़ी   धूप,
मानो  हुई  कुँवार  ज़िदगी।

उम्र समंदर,  चाहत किश्ती,
सांसों की  पतवार  ज़िदगी।

कभी लहलहाती फसलें पर,
अक्सर  खरपतवार ज़िदगी।

कैसे कटे,  अगरचे  ख़ुद है,
दोधारी  तलवार  ज़िदगी।

खुला आसमां  नेमत रब की,
वरना   कारागार   ज़िदगी।

ओस, बुलबुला, ख़्वाब, हकी़कत,
कुछ भी हो,   है  प्यार  ज़िदगी।

यूनिकवि: महेंद्र वर्मा

सितंबर माह यूनिप्रतियोगिता के परिणाम: महेंद्र वर्मा बने यूनिकवि


   हम सितंबर 2010 की यूनिप्रतियोगिता के परिणाम ले कर उपस्थित हैं। कुछ निर्णायकों की अतिशय व्यस्तता के चलते परिणाम घोषित करने मे 3 दिन का विलम्ब हुआ, जिसके लिये हम क्षमाप्रार्थी हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि सितंबर माह की यूनिकवि प्रतियोगिता हिंद-युग्म के इस मासिक कविता आयोजन का 45वाँ पड़ाव है। हर माह प्रतियोगिता से कई नये प्रतिभागियों का जुड़ना इस आयोजन की बढ़ती लोकप्रियता का प्रमाण है। आशा है कि आगे भी नयी प्रतिभाएँ यूनिप्रतियोगिता के माध्यम से सामने आती रहेगीं और उन्हे पाठकों की गंभीर प्रतिक्रियाओँ का प्रतिसाद मिलता रहेगा।
   यहाँ हम एक बात कहना चाहेंगे कि प्रतियोगिता के नियमों मे स्पष्ट कर देने के बावजूद कई प्रतिभागियों की पूर्वप्रकाशित या ब्लॉग आदि पर प्रकाशित प्रविष्टियाँ भी आ जाती हैं, जिन्हे कि हमें खेद सहित अस्वीकृत करना पड़ता है। अतः हम भावी प्रतिभागियों से अनुरोध करेंगे कि कृपया भविष्य मे पूर्णतः अप्रकाशित व मौलिक रचनाएँ ही प्रतियोगिता के लिये भेजें। साथ ही पिछले माहों मे भेजी जा चुकी किसी रचना को दोबारा प्रतियोगिता के लिये न भेजें।
   इस बार प्रतियोगिता मे कुल 46 प्रविष्टियाँ सम्मिलित थीं। प्रथम चरण के 3 निर्णायकों द्वारा प्रदत्त अंकों के आधार पर कुल 18 कविताएँ द्वितीय चरण के लिये चयनित हुईं। द्वितीय चरण मे 2 निर्णायकों ने उन्हे आँका। दोनों चरणों के कुल प्राप्तांकों के औसत के आधार पर सभी 18 कविताओं का क्रम निर्धारित किया गया। कुल अंकों के आधार पर महेंद्र वर्मा की ग़ज़ल को सितंबर माह की यूनिकविता बनने का गौरव प्राप्त हुआ है। इस बार कुछ अरसे के बाद एक ग़ज़ल यूनिकविता के रूप मे चुन कर आयी है। महेंद्र वर्मा पिछले कुछ माहों से ही यूनिप्रतियोगिता से जुड़े हैं। इनकी एक कविता जुलाई माह मे 13वें स्थान पर रही थी। वैसे तो इनका परिचय हम पाठकों से पहले करा चुके हैं, मगर यहाँ एक बार पुनः सितंबर माह के यूनिकवि का परिचय हम अपने पाठकों से बाँट रहे हैं।

यूनिकवि: महेंद्र वर्मा

जन्म - 30 जून 1955 को छत्तीसगढ़ के दुर्ग ज़िले के गांव बेरा में।
शैक्षणिक योग्यता - बी.एस-सी.,एम.ए.,दर्शनशास्त्र।
व्यवसाय- व्याख्याता
पता - जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान बेमेतरा,जिला दुर्ग, छत्तीसगढ़।
रुचियां - साहित्य, संगीत,विविध कलाएं और अध्ययन-लेखन।
साहित्यिक उपलब्धियां- बचपन से ही साहित्य पढ़ने लिखने का शौक। विविध विधाओं मे रचनाएं जैसे, आलेख, निबंध, गजलें, बाल कविताएं आदि के रूप में पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। नवभारत,अमृत संदेश, सापेक्ष,सुरति योग आदि पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। आकाशवाणी रायपुर से ग़ज़लें एवं वार्ताएं प्रसारित। अंतर्जाल की पत्रिका रचनाकार में ग़ज़लें प्रकाशित, सृजनगाथा एवं आखर कलश में ग़ज़लें प्रकाशनार्थ स्वीकृत। छत्तीसगढ़ की विद्यालयीन पाठ्य पुस्तक में एक गीत सम्मिलित। निष्ठा साहित्य समिति, बेमेतरा द्वारा प्रकाशित कविता संग्रह ‘‘निनाद‘‘ का संपादन। ‘सुरति योग‘ आध्यात्मिक पत्रिका के चार विशेषांकों का संपादन। विगत 25 वर्षों से वार्षिक स्मारिका शिक्षक दिवस का सम्पादन।

यूनिकविता: ग़ज़ल

आपकी दीवानगी बिल्कुल लगे मेरी तरह,
ये अचानक आप  कैसे हो गए मेरी तरह।

इक अकेला मैं नहीं कुछ और भी हैं शहर में,
जेब में  रक्खे हुए दो चेहरे,  मेरी  तरह।

भीड़ से पूछा किसी ने, किस तरह हो आदमी,
हो गई मुश्किल, कि सारे कह उठे मेरी तरह।

लोग, जो सब जानने का कर रहे दावा मगर,
दरहक़ीकत वे नहीं कुछ जानते  मेरी तरह।

किसलिए यूँ  आह के  पैबंद  टांके जा रहे,
क्या जिगर मे छेद हैं अहसास के मेरी तरह।

खुदपरस्ती  के अंधेरे में भला कैसे  जिएँ,
देख  जैसे जल रहे हैं ये दिये  मेरी तरह।

मजहबी धागे  उलझते जा रहे थे, और वे,
नोक से तलवार की सुलझा रहे मेरी तरह।

पुरस्कार और सम्मान-   विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता तथा हिन्द-युग्म की ओर से प्रशस्ति-पत्र। प्रशस्ति-पत्र वार्षिक समारोह में प्रतिष्ठित साहित्यकारों की उपस्थिति मे प्रदान किया जायेगा। समयांतर में कविता प्रकाशित होने की सम्भावना।

इनके अतिरिक्त हम जिन अन्य 9 कवियों को समयांतर पत्रिका की वार्षिक सदस्यता देंगे तथा उनकी कविता यहाँ प्रकाशित की जायेगी उनके क्रमशः नाम हैं-


आरसी चौहान
आशीष पंत
जितेंद्र जौहर
मनोज सिंह ’भावुक’
जया पाठक
ज्योत्स्ना पांडे
धर्मेंद्र कुमार  सिंह सज्जन
कौशल किशोर
शील निगम


हम शीर्ष 10 के अतिरिक्त भी बहुत सी उल्लेखनीय कविताओं का प्रकाशन करते हैं। इस बार हम निम्नलिखित
4 अन्य कवियों की कविताएँ भी एक-एक करके प्रकाशित करेंगे-


मनुपर्णा भटनागर
डॉ अनिल चड्डा
प्रियंका चित्रांशी
आलोक गौड़


उपर्युक्त सभी कवियों से अनुरोध है कि कृपया वे अपनी रचनाएँ 31 अक्टूबर 2010 तक अन्यत्र न तो प्रकाशित करें और न ही करवायें।

  हम उन कवियों का भी धन्यवाद करना चाहेंगे, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर इसे सफल बनाया। और यह गुजारिश भी करेंगे कि परिणामों को सकारात्मक लेते हुए प्रतियोगिता में बारम्बार भाग लें। शीर्ष 18 कवियों के नाम अलग रंग से लिखित है।

अनिल कुलश्रेष्ठ
संतोष कुमार सिंह
कैलाश जोशी
वसीम अकरम
देवी नागरानी
राम डेंजारे
शेखर तिवारी
राजीव श्रीवास्तव
पवन तिवारी
योगेंद्र वर्मा व्योम
सोहन चौहान
संजीवन मयंक
रिम्पा परवीन
प्रवीण आर्य
सुरेंद्र अग्निहोत्री
अनिरुद्ध यादव
राकेश पुरी रिक्की
नूरैन अंसारी
अश्विनी राय
सनी कुमार
बोधिसत्व कस्तुरिया
नीरज पाल
जोमयिर जिनि
मुकुल उपाध्याय
अजय दुरेजा
प्रकाश यादव निर्भीक
श्याम गुप्ता
मंजरी शुक्ला
ऋषभ कुमार
अशोक शर्मा
अरविंद कुरील सागर
तोशा दुबे

नोट- हम यूनिपाठक/यूनिपाठिका का सम्मान वार्षिक पाठक सम्मान के तौर पर सुरक्षित रख रहे हैं। वार्षिक सम्मानों की घोषणा दिसम्बर 2010 में की जायेगी और उसी महीने हिन्द-युग्म वार्षिकोत्सव 2010 में उन्हें सम्मानित किया जायेगा।

वो कहते हैं, मस्ज़िद में खुदा ही नहीं होता



अगस्त यूनिप्रतियोगिता की
बारहवीं रचना धर्मेंद्र मन्नू की है। यह भी हिंद-युग्म के नये हस्ताक्षरों मे हैं। 14 अगस्त 1975 को आरा (बिहार) मे जन्मे धर्मेंद्र विज्ञान से स्नातक हैं। कम उम्र से नाटकों मे काम करने का शौक लगा तब से थियेटर विधा से जुड़े हैं। इनकी कुछ समीक्षाएं, लेख, लघुकथाएं आदि कुछ पत्र-पत्रिकाओं मे प्रकाशित हो चुकी हैं। अभी मुम्बई मे यात्री नाट्य संस्था से जुड़े हैं और फिल्म आदि मे अभिनय की रुचि भी रखते हैं।  


कविता: गज़ल
 
मैं जानता  हूँ दर्दे-जिगर ठीक नही  है।
पर क्या करूँ मैं, मेरी उमर ठीक नही है।
 
वो कहते हैं, मस्ज़िद में खुदा ही नहीं होता
विश्वास है, झुक जाती कमर ठीक नही  है।

जब भी किसी की उँगली उठी, खूँ उबल पडा
मैं मानता हूँ  ज़िक्रे-समर  ठीक  नही   है।

जी चाहता है उनको मैं ग़जल में ढाल दूँ
पर क्या कहूँ मैं, मेरी बहर ठीक  नही है।

ऐसा है रास्ता, कोई मंज़िल नही जिसकी
सब कहते हैं कि ऐसा सफ़र ठीक नही  है।

इस मुल्क में हम कब से गंवारों में खड़े हैं: ग़ज़ल






दीवाने तेरे हुस्न के मारों में खड़े हैं
तपते हुए पैरों से शरारों में खड़े हैं

चल-चल के कदम रुकते हैं अचरज में अचानक
कुछ  सूखे शजर  कैसे बहारों में खड़े  हैं

सहरा में किसे  होती  नहीं अब्र की चाहत 
यह सोच के प्यासों की कतारों में खड़े हैं  

तारों से फरोज़ां किये दुल्हन तेरी चूनर 
हम डोली उठाए हैं, कहारों में खड़े हैं

मज़हब के सबब आप की है हम से अदावत
जैसे कि हम अल्लाह के प्यारों में खड़े हैं  

जिन लोगों ने राहों से बनाए थे मरासिम
मंज़िल पे वही लोग, सितारों में खड़े हैं

तालीम पे इस अह्द में इक आप का हक है
इस मुल्क में हम कब से गंवारों में खड़े हैं

महसूस जिन्होंने भी किया दर्द हमारा
वो लोग तेरे मेरे सहारों में खड़े हैं

मंदिर हो या मस्जिद  वहाँ ये जंग छिड़ी है
हिंदू ओ' मुसलमान  कतारों में खड़े हैं

सूरज लिये फिरते हैं  हथेली पे जो पैहम
हम आज  उन्हीं रंगे सियारों में खड़े हैं

(शरारों = चिंगारियां, सहरा = रेगिस्तान, अब्र = बादल, फारोजाँ = चमकती, अदावत = दुश्मनी, मरासिम = रिश्ते, तालीम = शिक्षा, अहद = युग, पैहम = हमेशा)

(बह्र - मफऊल मफाईल  मफाईल फ़ऊलुन)

प्रेमचंद सहजवाला