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Monday, February 02, 2009

फिर महका कविता का गुलशन


हिन्द-युग्म यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता के परिणाम में यह पहली बार हो रहा है कि एक ही कवि को हम दूसरी बार यह सम्मान दे रहे हैं। अमूमन यूनिकवि बनने के बाद कवि हिन्द-युग्म की स्थाई सदस्यता लेकर स्वयं ही अपनी कविताएँ प्रकाशित करने लगता है, लेकिन कई कवि स्थाई तौर पर योगदान देना एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी मानते हैं, इसलिए कभी-कभार प्रतियोगिता के रास्ते अपना योगदान देते रहते हैं। आज हम जिस कवि की बात कर रहे हैं उनका नाम है गुलशन सुखलाल। गुलशन सुखलाल ने मई २००८ के यूनिकवि का खिताब भी जीता था। गुलशन सुखलाल के अतिरिक्त यूनिकवि केशव कुमार कर्ण और यूनिकवयित्री दिव्या श्रीवास्तव ने पुरस्कार पाने के बाद इस प्रतियोगिता में भाग लिया है।

नये पाठकों को बता दें कि यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता का आयोजन हिन्द-युग्म द्वारा प्रत्येक माह किया जाता है। प्राप्त कविताओं से यूनिकविता चुनने का काम कई चरणों के जजमेंट द्वारा सम्पादित किया जाता है। एक निर्णायक को न तो दूसरे निर्णायक के बारे में कोई जानकारी दी जाती है और न ही रचना के रचनाकार के विषय में। जनवरी माह की यूनिकवि प्रतियोगिता के लिए हमें कुल ४५ कविताएँ प्राप्त हुई थीं। इस बार निर्णय ३ चरणों में कराया गया। पहले चरण में तीन जज, दूसरे में २ और अंतिम चरण में एक निर्णायक की अनुभवी दृष्टि से गुजरने के बाद गुलशन सुखलाल की कविता 'अर्थ का भय' यूनिकविता बनी। इस कविता पर टिप्पणी करते हुए हमारे अंतिम निर्णयकर्ता ने कहा-

"शब्दों की सार्थकता पर एक अच्छी कविता। आज समय और साहित्य की चुनौतियाँ हैं कि शब्दों को निर्रथक होने से बचाया जाय। पर समय इतना कठिन है कि रचनाकार को अपने शब्द यानी अपनी अभिव्यक्ति को सार्थकता प्रदान करने के लिये निरंतर संघर्ष करना पड़ता है। कवि पर एक ओर अपने परिवेश का दबाव काम करता है, तो दूसरी ओर शब्दों से भी संघर्ष करना पड़ता है-
"आज मेरे शब्दों के चारों तरफ़
काला घना कोहरा छा रहा है
काई सी बैठ रही है
तमाम
तेलाँस पदार्थों की काई
जैसे
गाड़ी के शीशे पर बैठती है"

कविता की लय कहीं-कहीं टूट गयी है पर उसकी अंतर्वस्तु इन्टैक्ट है जो कविता के लक्ष्य को सफलीभूत करती है।"



गुलशन सुखलाल महात्मा गांधी संस्थान, मोका मॉरिशस के हिन्दी विभाग में वरिष्ठ व्याख्याता हैं। हंसराज कॉलिज, दिल्ली विश्वविध्यालय से बीए गुलशन गंगाधरसिंह सुखलाल को अनुभूति-अभिव्यक्ति की संपादिका पूर्णिमा वर्मन प्रवासी हिन्दी युवा कवियों में बहुत ऊँचा स्थान देती हैं-

"बहुत ही कम कवि ऐसे हैं जो विदेशी होने के बावजूद हिन्दी को उतनी ही सहजता से अनुभूत करते और व्यक्त करते हैं जैसे गुलशन सुखलाल। निसन्देह यह हिन्दी के प्रति उनकी गहरे लगाव ही नहीं उनकी निरंतर श्रम और अध्ययन को व्यक्त करता है। नई समय की हर नई चीज़ और जीवन के हर टुकड़े से जुड़ी उनकी सीधी भाषा में लिखी गई तरल कविताएँ पाठक की संवेदना को गहराई से छूती हैं और सदा के लिए अपनी छाप छोड़ जाती हैं।"



इनकी कविता पर और अधिक बात तो पाठक करेंगे, हम सीधे कविता प्रकाशित करते हैं।

पुरस्कृत कविता- अर्थ का भय

बहुत डर लगता था मुझे
निरर्थकता से
बहुत...
बहुत ध्यान रखता था
एक-एक शब्द
एक-एक बात...
इतना ज़्यादा कि बहुत पहले से
मज़ाक करना भी बन्द कर दिया
इतना डरता था

लगता था
अर्थविहीन शब्द
पाप होते हैं
झूठ होते हैं
अन्याय होते हैं
या फिर शब्द ही नहीं होते

लगता था कोई आएगा
लाल स्याही की लिए हुए कलम
और बड़ा सा क्रॉस लगा देगा मेरे शब्दों पर
फ़ेल हो जाऊँगा

इसलिए चुनता था
छोटे-बड़े
तत्सम-तद्भव
अच्छे-बुरे...
सभी तरह के शब्द

अपनी विद्वत्ता दिखाने के लिए नहीं
मात्र निरर्थक न होने के लिए

पर फिर
थकने लगा
अर्थवान होते-होते
अकेला
घिरा हुआ
उन सभी से
जो हर वक्त, दिन-रात
ऐसे शब्द बोलते रहे हैं
जो अब नहीं आते समझ में किसी के
इतनी बार बोले गए हैं वे शब्द
और उनपर इतनी बार
निष्क्रियता
बेईमानी
लालच का
फेरा गया है झारन
कि उनका रूप बिगड़ गया है

अब वे निरर्थक हो गए है
सभी के लिए


फिर भी ये बोले जाते हैं
बोले जाते हैं
बोले जाते हैं

आज वे निरर्थक शब्द
एक-एक करके
घेर रहे हैं
मेरे शब्दों को
चुने हुए
सार्थक शब्दों को

आज मेरे शब्दों के चारों तरफ़
काला घना कोहरा छा रहा है
काई सी बैठ रही है
तमाम
तेलाँस पदार्थों की काई
जैसे
गाड़ी के शीशे पर बैठती है

आज इन सभी निरर्थक शब्दों से घिरकर
मेरे शब्द भी हो रहे हैं
निरर्थक
अब डर कम लगता है निरर्थकता का
आदत पड़ रही है

लेकिन जो गुज़र चुके है
इस काले कोहरे से
उन्होंने चेताया मुझे

'बहुत जल्द
फिर लगने लगेगा डर
सार्थकता से
अपने शब्दों की सार्थकता से...'



प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ३, ७, ६॰८
औसत अंक- ५॰६
स्थान- दसवाँ


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ४॰८, ५, ५॰६ (पिछले चरण का औसत
औसत अंक- ५॰१३३३
स्थान- नौवाँ


अंतिम चरण के जजमेंट में मिला अंक-
स्थान- प्रथम


पुरस्कार और सम्मान- रु ३०० का नक़द पुरस्कार, प्रशस्ति-पत्र और रु १०० तक की पुस्तकें।

यूनिकवि की कुछ कविताएँ फरवरी माह के अन्य तीन सोमवारों को भी प्रकाशित होंगी, अतः शर्तानुसार रु १०० प्रत्येक कविता के हिसाब से रु ३०० का नग़द इनाम दिया जायेगा।

हिन्द-युग्म प्रत्येक माह इस प्रतियोगिता से कम से कम १० कवियों की कविताएँ प्रकाशित करता है और रचनाकार को पुस्तक के रूप में उपहार भी देता हैं। इस बार जिन अन्य १० कवियों को ग़ज़लगो द्विजेन्द्र द्विज का ग़ज़ल-संग्रह 'जन गण मन' भेंट किया जायेगा, उनके नाम हैं-

मुहम्मद असहन
चन्द्रदेव यादव
प्रदीप वर्मा
रेनू जैन
विवेक असरी
संजय सेन सागर
शामिख फ़राज़
अरूण मित्तल अद्भुत
स्मिता
उमेश पंत

उपर्युक्त कवियों से निवेदन है कि कृपया २८ फरवरी तक अपनी कविता न तो कहीं प्रकाशित करें और न ही करवायें।

अब पाठकों की बात भी कर ली जाय। हिन्द-युग्म के नियमित पाठकों में महिला पाठकों की संख्या शुरू से ही बहुत अधिक रही है। इस बार भी चार पुरस्कृत पाठकों में ३ स्थान महिला पाठकों ने ले रखा है। इस बार यूनिपाठिका के सम्मान के लिए हम चुन रहे हैं नीलम मिश्रा को। नीलम मिश्रा ने हिन्द-युग्म के सभी मंचों को सबसे अधिक पढ़ा, टिप्पणी की। इनकी टिप्पणियों से साफ झलकता है कि ये हर एक प्रविष्टि को बहुत ध्यान से पढ़ती हैं।
यूनिपाठिका- नीलम मिश्रा

पिता -श्रीधर मिश्रा
जन्मस्थान -ग्राम (पांडे वारी ), जिला- लखीमपुर खीरी, उत्तर प्रदेश
जन्म दिनांक ०१-०१-१९७१
प्रारम्भिक शिक्षा -बरेली, पटना, लखनऊ से
उसके बाद सारी शिक्षा (औपचारिक व अनौपचारिक) लखनऊ से ही संपन्न हुई। पुरातनपंथी ब्राह्मण परिवार में जन्म होने के कारण सिर्फ़ औपचारिक शिक्षा पर ही बल दिया गया, एम॰ए॰- अर्थशास्त्र में तथा बी.एड
सपना -भारत को और उसकी भाषा को पूरा सम्मान दिलाना
आत्म कथ्य -संभ्रांत और शिक्षित व्यक्तियों द्बारा प्रकृति की अवहेलना मन को आहत करती है, किसी भी रोते हुए मासूम के आँसू पोछना चाहती हूँ, किसी भी बूढ़ी औरत के घुटनों पर मलहम लगाकर उसके दर्द को बांटने की कोशिश, किसी हमदर्द की तन्हाई से बातें करने की कोशिश, सार यह है कि सभी को खुश देखना चाहती हूँ
अपने पिता को अपना आदर्श मानती हूँ, जिनके संघर्षों के साथ मैं भी बड़ी होती गई दुनिया का सबसे अच्छा इंसान मानती हूँ उन्हें, दूसरों कि नजरों में वो क्या हैं इसकी परवाह किए बिना

पुरस्कार और सम्मान- रु ३०० का नक़द पुरस्कार, प्रशस्ति-पत्र और रु २०० तक की पुस्तकें।

दूसरे से चौथे स्थान के पाठकों के लिए हमने क्रमशः एम॰ ए॰ शर्मा 'सेहर', निर्मला कपिला और दिलशेर खान को चुना है। इनमें से एम॰ए॰ शर्मा 'सेहर' ने हिन्द-युग्म को खूब पढ़ा। हम उम्मीद करते हैं कि आगे से ये अपनी पठनीयता को और बढ़ायेंगी। तीनों पाठकों को कवि द्विजेन्द्र द्विज के ग़ज़ल-संग्रह 'जन गण मन' की एक-एक प्रति भेंट की जायेगी।

हम निम्नलिखित कवियों के भी आभारी हैं, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर इसे सफल बनाया और यह निवेदन करते हैं कि फरवरी २००९ की यूनिकवि एवम् यूनिपाठक प्रतियोगिता में भी अवश्य भाग लें।

मनु ’बेतखल्लुस’
तपन शर्मा
सुधीर सक्सेना 'सुधि'
दिलशेर "दिल" दतिया
अलका मिश्रा
चारु लेखा
प्रताप नारायण सिंह
अखिलेश श्रीवास्तव
नीलम मिश्रा
सारदा अरोरा
अवनीश तिवारी
केशव कुमार कर्ण
शिखा वार्ष्नेय
कमलप्रीत सिंह
सीमा सचदेव
पंकज स्मित
रश्मि प्रभा
प्रदीप पाठक
एम॰ ए॰ शर्मा 'सेहर'
संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
बृजेश गुप्त 'अक्स'
संगीता
योगेश गाँधी
अबयज़ ख़ान
अमन 'बस अमन'
अनिरुद्ध सिंह चौहान
शिवम शर्मा
विपुल कुमार श्रीवास्तव
बृजेश पंत
दिनेश शर्मा
सुनील सोनू
सोनिया शर्मा
सुनील मंथन शर्मा
जी मिश्रा

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39 कविताप्रेमियों का कहना है :

ѕαηנαу ѕєη ѕαgαя का कहना है कि -

लगता था कोई आएगा
लाल स्याही की लिए हुए कलम
और बड़ा सा क्रॉस लगा देगा मेरे शब्दों पर
फ़ेल हो जाऊँगा

आप फ़ेल नही हुए दोस्त पास हो गए,ये पंक्तियाँ मुझे बहुत पसंद आई हलाकि सारी रचना ही दिल में उतरना वाली है !! यूनिकवि कवि बनने पर आपको और यूनिपाठिका बनने पर नीलम जी को हार्दिक बधाई !!
हिंद युग्म के एक और सफल प्रयास पर समस्त ''हिंद युग्म'' परिवार को तहे-दिल से बधाई!!

संजय सेन सागर

manu का कहना है कि -

आज वो निरर्थक शब्द ...एक एक करके घेर रहे हैं.....मेरे शब्दों को ...मेरे चुने हुए सार्थक शब्दों को.........

बिल्कुल ऐसा ही होता है .......
बधाई स्वीकारें.......
मगर महोदय जी, नीलम जी ने इस महीने तो जम कर अंग्रेजी की टांग तोडी है .........फ़िर भी........??? हिन्दी में...हा..हा..हा...हा...हा...

बधाई हो आपको भी नीलम जी........मजाक नहीं ..दिल से बधाई हो....

आलोक सिंह "साहिल" का कहना है कि -

sabhi ko shubhkamnayein.
ALOK SINGH "SAHIL"

आलोक सिंह "साहिल" का कहना है कि -

yunikavi aur yunipathika ko vishesh taur par badhai.
ALOK SINGH "SAHIL"

neelam का कहना है कि -

जब भोजपुरी माँ कमेन्ट करत रहली तब तो इ मानुष ,सुत जाए कैली ,जब हमे इनाम देने की बात आई तो अंग्रेजी
में टांग तोड़ने की बात करने लगे ,इ ठीक बात नइखे वोट करवा लो ,शिकायती टट्टू ,

हिन्दयुग्म का उत्साह वर्धन है ,सीमा जी दिल थाम के बैठिये आप की बारी है ,अमूल्य योगदान
बाल उद्यान को देने के लिए |

neelam का कहना है कि -

लगता था
अर्थविहीन शब्द
पाप होते हैं
झूठ होते हैं
अन्याय होते हैं
या फिर शब्द ही नहीं होते
"बहुत ही कम कवि ऐसे हैं जो विदेशी होने के बावजूद हिन्दी को उतनी ही सहजता से अनुभूत करते और व्यक्त करते हैं जैसे गुलशन सुखलाल। निसन्देह यह हिन्दी के प्रति उनकी गहरे लगाव ही नहीं उनकी निरंतर श्रम और अध्ययन को व्यक्त करता है। नई समय की हर नई चीज़ और जीवन के हर टुकड़े से जुड़ी उनकी सीधी भाषा में लिखी गई तरल कविताएँ पाठक की संवेदना को गहराई से छूती हैं और सदा के लिए अपनी छाप छोड़ जाती हैं।"

अब इसके बाद कुछ कहना सूरज को दिया दिखाने वाली बात ही होगी
बधाई स्वीकारें गुलशन जी ,

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

तत्सम-तद्भव
अच्छे-बुरे...
सभी तरह के शब्द
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है |

अब डर कम लगता है निरर्थकता का
आदत पड़ रही है
-- नहीं जम रहा | " निरर्थकता का " ?
बहुत बधाई |

--अवनीश तिवारी

विश्व दीपक ’तन्हा’ का कहना है कि -

यूनिकवि "गुलशन जी" और यूनिपाठिका "नीलम जी" को ढेरों बधाईयाँ। बाकी सारे प्रतिभागियों का भी तहे-दिल से शुक्रिया। आप सभी की भागीदारियों की बदौलत हीं प्रतियोगिता जीवित है।

"गुलशन जी" आपकी लेखनी के क्या कहने। लोग एक बार नंबर १ बनने के लिए ऎंडी-चोटी एक कर देते हैं आपको तो ऎसा सौभाग्य दो-दो बार मिला है। आपको विशेष बधाई और उम्मीद करता हूँ कि आप स्थाई सदस्यता के लिए भी हामी भर देंगे। हम आपकी रचना एक साल में एक बार पढना गंवारा नहीं कर सकते। आपकी रचनाएँ तो कम-से-कम महीने में एक बार आनी चाहिए।

नीलम जी, आप अपनी बेबाक टिप्पणियों का दौर ऎसे हीं जारी रखें। अच्छा लगता है।

-विश्व दीपक

sumit का कहना है कि -

ये कविता मुझे बहुत अच्छी लगी क्योकि कुछ समय पहले मैने एक हजल लिखी थी जिसके मतले के विचार और आपकी कविता की शुरूवात मिलती है, जिससे मुझे याद आ गया उसे पूरा भी करना है, परीक्षा की वजह से चार शे'र लिखके बाकी लिखना भूल गया था

आपकी कविता के लिए धन्यवाद, जिससे मुझे हजल को पूरा करना याद आ गया,नही तो वो मेरे मोबाईल फोन मे ही खो जाती

नीलम जी,
यूनिपाठिका के सम्मान के लिए बधाई

सुमित भारद्वाज

आलोक शंकर का कहना है कि -

bhai bahut badhai
www.alokshankar.tk

शोभा का कहना है कि -

बहुत ही सुन्दर लिखा है।

तपन शर्मा का कहना है कि -

कविता अच्छी है पर थोड़ी लम्बी लगी...

बधाई स्वीकारें गुलशन जी..
सभी विजेताओं को भी बधाई

नीलम जी.. आपको भी बधाइयाँ...
केवल २ पायदान से रह गया मैं.. :-( फिर कोशिश करूँगा!!!

rachana का कहना है कि -

गुलशन जी आप को बहुत बहुत बधाई हो
नीलम जी बहुत अच्छे आप की मजेदार लिखाई ने रंग जमा ही दिया .बधाई हो लाख लाख बधाई हो .
रचना

manu का कहना है कि -

और मैं केवल एक पायदान से...................और मैं शायद अब दोबारा कोशिश भी ना करुँ............इतना ही काफ़ी है.....परसों दसवें पायदान वाली कवितअ पर कुछ ऐसाही कमेन्ट भी दिया है मैंने....
पर तपन जी आप अवश्य कोशिश कीजियेगा......
अपुन तो इस मोहल्ले में पाठक ही ठीक हैं.......पता नहीं क्यूं एक और भी नज़र दे रखी है मालिक ने देखने के लिए.....

manu का कहना है कि -

अब देखो फ़िर से १३ के बदले १४ नंबर के कमेंट पर आ गया न..........?कह तपन जी को रहा था और आ गयीं रचना जी .....

Arun Mittal का कहना है कि -

मुझसे रहा नहीं गया, मैं ये प्रतिक्रिया नहीं करना चाहता था परन्तु आखिर कब तक हम निपट बौद्धिक व्यायाम से उपजी तथाकथित कविताओं की गुत्थी सुलझाते रहेंगे, कहीं तो कोई स्थान छोडिये छंद और लय का जिस से कविता गद्य से अलग हो सके, मुझे तो कई बार यह सब कविता को एक आम आदमी से दूर ले जाने की साजिश लगाती है . यह मेरा अपना विचार है और किसी के अंतस में चुभ जाए तथा कहीं कोई संवेदना का दूसरा पहलू भी जन्म ले इसलिए लिख रहा हूँ. आज कितनी कवितायेँ हैं जो एक आम आदमी की जुबान पर हैं, और यह भी कोई आश्चर्य नहीं कि वो सभी छंदमय है . प्रश्न केवल छंद का और लय का ही नहीं है, प्रश्न तो उस वैचारिक क्रांति का है जो हम आम आदमी में कविता के माध्यम से लाना चाहते हैं. पता नही हिन्दयुग्म की दिशा क्या है ... दोहे और गजल के इतने नायाब अध्याय सिखाते सिखाते क्या क्या पढने पर मजबूर कर देते हैं. हो सकता है आप इस टिप्पणी के बाद नहा धो कर मेरे पीछे पड़ जाएँ, पर अपने मन की बात नहीं कहता तो शायद साहित्य से जुड़ने के अपने लक्ष्य से विमुख हो जाता..... जो मन करे मुझे कहें , बात पर गौर करें या न करे ................ मुझे पीडा हुई तो मैंने कह दिया.........................

suny का कहना है कि -

यदि यह कविता है तो क्षमा चाहूँगा हमारे आज तक के जितने भी कवि हुए हैं वे कवि कहलाने के लायक नहीं हैं, मेरा आपसे सविनय अनुरोध है इनमें से किसी एक का काव्य स्वीकार करें....................

sonuu का कहना है कि -

कविता क्या ऐसी होती है
होती है तो हमी सही हैं
जो अब तक तो कवि नही हैं

neelam का कहना है कि -

आप की बात से कुछ हद तक तो सहमत हुआ जा सकता है,पर पूरी तरह कदापि नही ,हिन्दयुग्म का लक्ष्य हिन्दी को प्रोत्साहन देना है ,हिन्दी भाषा का इस हद तक प्रचार हो कि लोग हिन्दी -अपनी मातृ भाषा को रोचक बना सके सबको ग्राह्य हो ,सब आसानी से अपनी बात को एक दूसरे तक संप्रेषित कर सके ,इस कंप्यूटर की विधा के द्वारा ,रही बात कविता की तो थोड़ा बहुत विचारों की लय मिलने पर भी हम उसे पुरस्कार देते हैं ,ताकि वो प्रोत्साहित
हो और उसके बाद हमारे साथ जुड़कर और अच्छा कार्य सम्पादन कर सकें हमारे इस मंच से हम मैथिलि शरण गुप्त की कविता का पाठ भी करते हैं ,हम उन्हें अपने महान कवियों के और नजदीक लातें है ,अपनी भाषा के प्रति सम्मान जगाते हैं ये हिन्दी साहित्य और कविता जगत से दूर ले जाने की नही उन्हें अपने साहित्य और काव्यजगत
के पास लाने की मुहिम है |हिन्दयुग्म में आपका भी स्वागत है ,|
आपकी कविता के इंतज़ार में
समस्त हिंद युग्म परिवार

manu का कहना है कि -

अरुण जी,
आप अपनी बात तो खुल कर कह सकते हैं.......मगर जिस ने इस प्रतियोगिता में हिसा ले रखा हो....उसके लिए कहना बड़ा ही मुश्किल है ....यही लगेगा के सवाल अपने लिए उहाया जा रहा है....तपन जी को याद होगा के मैंने उन्हें जब मैं दो महिन्र पहले एकदम नया नया आया था तो मैंने फोन करके उन्हें कहा था के मैं भी युग्म से जुड़ना चाहता हूँ....चाहता हूँ के कभी कभार अपनी भी कोई ग़ज़ल जैसी चीज छप जाए......और मैं इस प्रतियोगिता में भी भाग नहीं लेना चाहता......." क्यूनके हारना तो किसी को भी पसंद नहीं होता.....मुझे हारने के अलावा जीतना भी पसंद नहीं है....." मूड है अपना अपना.....दिल की बात है...मगर मुझे कहा गया के ये तो पहली शर्त है.......और मैंने न चाहते हुए भी ये शर्त कबूल कर ली...
फ़िर धीरे धीरे मुझे मालोम्म्म हुआ के जिन को परमानेंट एक दिन दे रखा है...उन्हें कितने प्रेस्सर में लिखना पड़ता है...वो क्या लिखते हैं..कैसा लिखते हैं.........

ये मैं एकदम पुख्ता स्टडी के दम पर कह रहा हूँ...चाहे कितनी भी जल्द बाजी में कमेंट करून.........जो बात इस मंच पर लिखी है वो हमेशा ..." और हमेशा" इसी मंच से जुड़ी होती है...पर जिहें लम्बी चौडी कविता से कुछ नहीं समझ अत ..एक ज़रा सी टिपण्णी से क्या.पता चलेगा के क्या बोल गया........

अब सुमित भाई जी एक छोटी सी बात से आपको भी समझा ता हूँ.......

जो हम कभी छोए मोटे लेख वगैरह लिखते हैं न......है ना.....

उन में से कुछ शब्द छाँट कर ...ज्यादा टेंशन लिए बिना " होरिजोंटल फार्म " के बजाय ......................
................................" वर्टिकल फार्म "..........

में लिख दिया जाए तो बनती है................कविता ....आधुनिक कविता ......

जैसा अपनी आधुनिक चित्र कला ............

अब सोच लो के इस कविता को कैसे देखोगे...........और पेंटिंग्स को कैसे देखोगे ........आफिस जाना है..........बाकी रात को आकर .........

IS LIYE AAJ IS PRATIYOGITAA ME DOBAARA BHAAG NAA LENE KAA NIRNAY LENAA PAD RAHAA HAI>............

नियंत्रक । Admin का कहना है कि -

अरूण मित्तल अद्भुत जी,

कविता क्या है? इसके आतंरिक और बाह्य सौंदर्य के तत्व समय के साथ बदलते चले गये। ट्रैंड बदला, समय बदला, कविता बदल गई। किसी समय कविता लिखना पांडित्य होता था, कभी मनोरंजन भी हुआ, कभी समाज सुधार भी। लेखनी जब आम आदमी के पास आ गई तो कविता में कुछ और मुखरित होने लगा। मम्मट ने कविता के बारे में जो कहा उसे प्रसाद ने नहीं माना। प्रसाद और द्विवेदी ने जो कहा उसे निराला और अज्ञेय ने नहीं माना।

आज का आलोचक कहने लगा कि कहीं कुछ नया है, अद्भुत है, रचनात्मक है, मौलिक है तो वो एक अच्छी कविता है। भोजने बनाने वाला कड़ाही में कलछुन चलाना में कविता खोज सकता है। शिल्पकार कुछ नया गढ़ देता है, उसे वहाँ कविता दीख जाती है। लालित्य के विस्तार के अनंत आयाम हैं, और यही कविता है। सोच की नई और साफ दृष्टि कविता है। कविता को कविता कहने वाला निर्णायक भी अपनी परिभाषाओं की परिपाटी पर ही कविता जाँचता है। आपके लिए जो कविता है, हो सकता है उसके लिए वह कविता कम हो।

ऐसा बिलकुल नहीं है कि हिन्द-युग्म ने छंद को नकारा हो। और ऐसा भी नहीं है कि यह छंदवादी या गैरछंदवादी है। आप अब तक के २५ परिणाम पढ़ें, छंद के स्थापित नियमों में लिखी कविताएँ भी यूनिकविता बनीं दिखाई देंगी।

आप हिन्द-युग्म के पुराने कवि हैं। आपको यहाँ पाठकों ने खूब पढ़ा है, आपने हिन्द-युग्म को खूब पढ़ा है। ऐसे में आप इतनी जल्दी कोई मत न बनायें। हम सबकुछ समेटना चाहते हैं। वो चाहे भाषा, कला, साहित्य का जो विस्तार हो। 'युग्म' का मतलब जोड़ना ही होता है ना, कम से कम इसके अर्थ से भय तो हमें बिलकुल नहीं है।

pooja का कहना है कि -

यूनिकवि गुलशन जी को और यूनिपाठिका नीलम जी को हार्दिक बधाई.

Anonymous का कहना है कि -

kavita acchi hai bahut achhi badhyee
parntu ek bat samjh nahin aayee
1st and second me ank mile aur kavita rahi 9 and 10 number par
ANK MILE yani kyee logo ne jancha parkha
fir
antim daur men ANK MILA yani kisi ek ne noven ,dasven se seedhe
pahle par laa diya
azeeb tarika hai JANCH parakh ka
Fir to last wale k pas VETO POWER HAI NUMBER dene ki
bhalaa firaisi kya majboori hai itne parkh ki

Anonymous का कहना है कि -

kavita acchi hai bahut achhi badhyee
parntu ek bat samjh nahin aayee
1st and second me ank mile aur kavita rahi 9 and 10 number par
ANK MILE yani kyee logo ne jancha parkha
fir
antim daur men ANK MILA yani kisi ek ne noven ,dasven se seedhe
pahle par laa diya
azeeb tarika hai JANCH parakh ka
Fir to last wale k pas VETO POWER HAI NUMBER dene ki
bhalaa firaisi kya majboori hai itne parkh ki

manu का कहना है कि -

anonymous......जी ,
आप से फिलहाल सहमती नहीं जता सकता......क्यूंकि इस माह तो मैं इस प्रतियोगिता में भाग लेने की गलती कर चुका हूँ......लेकिन यहाँ पर अगले महीने इसी बात को समझाना चाहूंगा....तीन जज में से लगभग पचास प्रतिशत तो मैं समझ ही चुका हूँ...
ऐसा नहीं है के मुझे कोई छंद की ही बात करनी है...इसी युग्म पर छंद रहित भी एक से बढ़कर एक कवियों को पढा है ....उन छंद रहित कविताओं के कितने ही हिस्से आज भी मन में बसे हुए हैं....और चाहता भी नहीं के वो लोग छंद में आने की कोशिश में अपनी इस चमत्कारी लेखनी में से उस चीज की अनदेखी करीं जो मुझे उनकी तरफ़ खींचती है.....एक नहीं कई नाम हैं...

पर फ़िर भी कुछ तो है जो मैं महसूस करना बंद नहीं कर प् रहा हों..आपसे नम्र निवेदन है के हो सके तो बिना अनामी होकर बात करें.............मुझे डर है के आपकी यह टिपण्णी लोग बाग़ मेरे या अरुण जी, सोनू जी, या सनी जी के खाते में ना डाल दें....

हां अगर.... अगर आप नंबर दो या नंबर एक वालोँ जज में से कोई एक हैं ...तो आप अनाम ही लिखें..

neelam का कहना है कि -

manu ji ,

hum bhi aa gaye angreji ki taang todne ,aapki baat se poora itfaak
rakhte hue.

Anonymous का कहना है कि -

धन्यावाद आपका नीलम जी....आपने अंग्रेजी की ही नहीं अच्छे भले बन्दे की भी खूब टांग तोडी हैं...पेंटर से कार्टूनिस्ट तो बनाया शैलेश जी ने ...और फ़िर कार्टूनिस्ट से....

कार्टून...
टोपी वाला.....
टोपी वाला बंद......नहीं ये नहीं लिखता....
और ...अब..
शिकायती..टट्टू.......
हा..हा.हा..हा....

देखिये तो कहीं अनजाने में मुझसे कोई कविता तो नहीं हो गयी............

मैडम, आप शायद समझ सकती हैं के प्रतिभागी को निर्णायकों से सवाल करने का कोई हक़ नहीं होता....इसलिए मैं इस प्रतियोगिता का बहिस्कार करता हूँ.....अब एक महीना पड़ा है....

निर्णायक लोग निर्णय ले लें अपने बारे में...
अगले महीने से सवाल किए जायेंगे ....के किस कविता में आपको क्या सही लगा....और किसी और में क्या ग़लत लगा.....
हाँ हिंद युग्म को मैं कभी भी नहीं छोड़ना चाहूंगा....भले ही किसी प्रतियोगिता में भाग लूँ या ना लूँ.....इन्टरनेट पर मेरा पहला प्यार है युग्म आख़िर......
वो दोस्त जिसने मुझे यहाँ पर आए हुए चार दिन भी नहीं हुए थे ....मुझे पहली बार मेल किया..........वो आज भी मेरा सब से अजीज दोस्त है....वक्त नही मिलता ये और बात है.....

वो शख्श जिसने मुझे दर्द में डूबी तस्वीरों से निकाल कर बच्चों की खुशनुमा दुनिया दिखाई ...वो भारत वासी मुझे आज भी उतना ही प्रिय है....और भी बहुत से मित्र बने..अब एकाध ग़लत बन्दे के चलते इन सब का साथ नहीं छोडा जा रहा...पर आशा है के जिस तरह यहाँ पर मैंने काफ़ी सारे एनी माउस कम कर दिए हैं..जो एकाध आता है तो उसके मजबूरी होगी...

उसी तरह इस "प्रतियोगित से दूर रह कर "...इसमे भी कुछ अच्छे बदलाव देखना चाहूंगा........और मुझे सहयोग भी मिलेगा ....
आख़िर जिन लोगों ने कुछ ग़लत सलत ही सही लिखा है तो उन्हें भी तो ये पता होना चाहिए..के लिखते कैसे हैं...और सुधार कैसे आयेगा......?

अब अगली परिक्षा ..परीक्षकों की है................

और जवाब ना देने वाले को मुझ से ज्यादा अच्छी तरह आप...खींच सकती हैं..ये तो मैंने जान लिया...
chalo aaj fir se ani mouse bantaaa hoon...

Arun Mittal का कहना है कि -

मनु जी, लगता है आप छंद से सम्बंधित मेरा आशय गहराई से नहीं समझ पाए, या फिर कहीं सब कवियों ने ठान लिया है की अरुण 'अद्भुत' जैसे लोग आज भी छंद जैसी बेकार चीज़ के पीछे पड़े हैं तो पड़े रहे हमें नहीं पड़ना. मेरा एक प्रश्न है बहुत साधारण सा "हम कविताएँ मात्र कवियों के पढने के लिए लिखते हैं, या आम आदमी के लिए? प्रस्तुत कविता को एक आदमी अगर पढेगा तो शायद दुबारा किसी कविता का पढने का सहस नहीं कर पायेगा, ये २८ वी टिपण्णी है क्या कोई बता सकता है कितनी टिप्पणियां उन लोगों की हैं जो कवि नहीं हैं. मैं फिर अपनी बात दोहराता हूँ कि "प्रश्न केवल छंद का और लय का ही नहीं है, प्रश्न तो उस वैचारिक क्रांति का है जो हम आम आदमी में कविता के माध्यम से लाना चाहते हैं"
पता नहीं हम सब सत्य स्वीकार क्यों नहीं करते, आप बात कितनी भी गहरी कहें, जब उसे सरल शब्दों में लयात्मकता के साथ कहेंगे तो उसका प्रभाव और अधिक बढ़ जायेगा और यही कविता का लक्ष्य होना चाहिए. ...........

Anonymous जी ने जो बात कही उस पर तो मेरा ध्यान उनकी प्रतिक्रिया पढने के बाद ही गया................. बहुत सही प्रश्न उठाया उन्होंने....... उनको भी साधुवाद

shyamskha का कहना है कि -

आज पहली बार युग्म पर खली बहस देखने को मिली अच्छी बात है
कविता में छंद हो या न हो कविता होना जरूरी है
और कविता लिखने को एक कवि ह्रदय होना भी जरूरी है
एक और बात मुक्त छंद में लिखी कविता एवं छंद मुक्त कविता [जिसे मैं कविता नहीं मानता ]
में क्या अन्तर होता है इसे जान्नाने के लिए नियंत्रक श्री निराल की मुक्त छंद की कविता छापें तो पाठकों को मुक्त छंद एवं छंद मुक्त का अन्तर पता लगेगा

मुक्त छंद कविता में यती गति ,लय,व् त्कांत भी रहतें हैं केवल मात्रिक गणना पर कविता छान्द्सिकता से परे होती है |
जजमेंट पर नियंत्रकों को गंभीरता से सोचना चाहिए छ; जजों पर एक जज की बात को सर्वोपरी मानना न प्रतिभागियों के प्रति न शेष जजों के प्रति न्याय हो सकता है श्याम सखा श्याम

M.A.Sharma "सेहर" का कहना है कि -

नीलम जी
सोच तो रही थी आपको बधाई देने की

शायद थोड़ा देर हो गयी और बीच मैं ये नया विषय आ गया

अब इसे विराम देते हैं ..सभी की भावनावों का मान रखते हुए (सादर )

बहुत बधाई !!!

monika का कहना है कि -

सभी की टिप्पणियां पढ़ी कवियों की भी, अच्छे कवियों की भी, और ख़ुद को कवि कहने वालों की भी. सभी ने आम आदमी को बीच में घसीट लिया. अब एक आम पाठक की तरह बस यही कहना चाहूंगी की वो भी एक वक्त था जब हम जैसे आम पाठक अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी का तनाव दूर करने के लिए कवितायें पढ़ते थे पर इस कविता को पढ़कर यह लगता है की जिस दिन जिन्दगी तनाव मुक्त हो उस दिन तनाव की कमी पूरी करने के लिए ऐसी कविताओं को पढ़ लिया जाए.. परंतु अगर किसी सम्माननीय कवि ने इसे प्रथम परस्कार योग्य समझा है तो उनका लिहाज़ करते हुए आपको बधाई.. सबसे ज्यादा धन्यवाद् अरुण 'अद्भुत' जी का जिन्होंने आम पाठक के लिए कविता के महत्व को समझा..

Arun Mittal का कहना है कि -
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Arun Mittal का कहना है कि -

एम् ऐ शर्मा जी से माफ़ी चाहता हूँ बस एक अन्तिम प्रतिक्रिया मेरी तरफ़ से शायद मेरा मुख्य सवाल संप्रेषित हो जाए, धन्यवाद मोनिका जी, कम से कम एक आम पाठक की टिपण्णी तो आई

श्याम सखा श्याम जी,

आपसे मिला तो नहीं हूँ एक बार भिवानी (हरियाणा) में आपको मंच से सुना है, मैं आपका बहुत सम्मान करता हूँ . चलो किसी को तो प्यार है कविता से जो जो छंद मुक्त को कविता नही मानता... तीन दिन पहले मैंने यही प्रश्न हरियाणा के राज्यकवि श्री उदय भानु हंस जी और हास्य कवि प्रताप सिंह फौजदार से भी किया था और उनका भी यही उत्तर था. चलिए मैं इस जवाब से सहमत भी हूँ, लेकिन सच माने तो छंद मुक्त और मुक्त छंद में अन्तर करने का कोई वैज्ञानिक पैमाना नहीं है. मेरा मुख्य प्रश्न तो यह है कि कविता पाठक की समझ में भी तो आनी चाहिये, मोनिका जी के बारे में पता नहीं वो कवयित्री हैं या पाठिका, जो भी लिखा है उस से आप समझ जायेंगे की मेरा यह विषय उठाने का क्या उद्देश्य है....... या फ़िर काका हाथरसी जी का यह दोहा लिखकर अपनी वाणी को विराम दूँ:

बड़े वही कविराज हैं, और सभी कवि व्यर्थ
श्रोता जिनके काव्य का, समझ न पायें अर्थ

Anonymous का कहना है कि -

Waah ji tod koshis ki Arun ji aapne apni bat kahne ke liye.....mogambo khush hua....!! pr afsos ...hame bhi kavita bhot acchi lagi.....sorry!

नियंत्रक । Admin का कहना है कि -

साथियो,

अभी तक हिन्द-युग्म अंतिम चरण से पहले के जजमेंट-चरणों को क्वालीफाइंग राउंड की तरह लेता रहा है। लेकिन आप सभी की सलाहों तथा आदरणीय श्याम जी की सलाहों पर ध्यान देते हुए हम आगे से अंतिम चरण में भी एक से अधिक जज रखेंगे (तथा साथ ही साथ अन्य चरणों की तरह पिछले चरणों का औसत अंक अंत में जोड़ेंगे)।

यह विवाद पहली बार नहीं है। जब भी इस तरह के विवाद आये हैं, हमने यह बात स्पष्ट की है कि शीर्ष १० कविताओं में न तो इनके प्राप्तांकों में बहुत अंतर होता है और न ही इनके स्तर में।

इसलिए अरूण जी, मनु जी तथा तमाम प्रतिभागी कवियों से निवेदन है कि प्रतियोगिता की इस कड़ी को अंतिम न मानें। धीरे-धीरे आपकी सलाहों पर गौर करते हुए हम इसे बेहतर से बेस्ट बना लेंगे।

अमूल्य सुझावों के लिए धन्यवाद।

mohammad ahsan का कहना है कि -

bahut hi vidwtapuurn kavita hai pratham puraskaar praapt.

Mauritius Ki Hindi Kavita का कहना है कि -

हिन्द-युग्म के सभी पाठकों और प्रतियोगिता के निर्णायकों को प्रणाम ... मॉरिशस के इस छोटे कवि को आप लोगों का इतना सम्मान पाने की आशा नहीं थी... शब्द (सार्थक शब्द) कम पड़ रहे हैं...
आशा हैं कि आगे भी जो लिख पाएँगे उसपर आपकी ऐसी हे दृष्टि रहेगी सम्पूर्ण मॉरिशसीय हिन्दी जागत की ओर से आप सभी को
प्रणाम
गुलशन सुखलाल

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