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शांति दूत


हे कृष्ण
ये परम्परा शुरु हुई थी तुमसे
और इसीलिए शायद आज भी जीवित है

आज भी असफल होते हैं शांति-दूत
आज भी बजता है युद्ध का बिगुल
और आज भी शान्ति स्थापित करने के लिए
भेजे जाते हैं
टैंकों पर सवार
हथियारों से लैस.....
योद्धा

लेकिन क्यों आज
दोनो पक्षों में से
किसी पक्ष से
मध्य में खड़ा होकर कोई योद्धा
अपने हथियार डालते हुए यह नहीं पूछता
कि शायद जो उधर खडा है वो मेरा अपना है
क्यों आज मध्य में खड़े किसी रथ पर
कोई कृष्ण किसी अर्जुन को
गीता का सन्देश नहीं देता

समस्या तुम्हारी उसी युग में समाप्त हो गई थी
लेकिन
हमारे प्रश्नों के उत्तर
नहीं मिल पा रहे हैं आज भी

क्यों आज असम्भव हो रहा है
यह निश्चित कर पाना
कि कौन सा पक्ष धरूँ
और कौन सा अधर्म करूँ?

यूनिकवि- गुलशन सुखलाल

विश्वनागरिक


देश के बड़े से शहर में
बारह मंज़िला इमारत में
बालकनी वाले फ़्लैट में रहता हूँ।

ऊपर से मुख्य सड़क दिखती है।
नीचे सभी छोटे-छोटे दिखते है ।
बालकनी पर ही साइकल चलाता हूँ
और उसकी दीवारों के साथ फ़ुटबॉल खेलता हूँ।
नीचे भी एक लड़का मेरी तरह ही फ़ुटबॉल खेलता है।
लेकिन उसका नाम पापा को मालूम नहीं है।
कभी समय मिलेगा तो पूछूँगा।

अभी तो मैं
अपने कम्प्यूटर के चूहे पर सवार
दुनिया की सैर कर रहा हूँ
डिस्नीलैण्ड और पैरिस घूमा हूँ।

अभी सीर्फ़ पाँच साल का हूँ
लेकिन तीन भाषाएँ जानता हूँ।
पिताजी ने कहा
बड़ा होकर विदेश जाऊँगा तो काम आएँगी।

घर में चीन के भालू
फ्रांस के खिलौने
अमेरिका का वीडियो गेम हैं।
लेकिन खेलने का समय नहीं मिलता
सुबह पापा को जल्दी काम पे जाना होता है
शाम को मम्मी देर से दफ्तर से लौटती है
स्कूल से ज़्यादा समय
क्रेश में बिताता हूँ।

आज स्कूल में हमने पौधे बोए
टीचर बोली
इनसे दुनिया बचेगी
हरियाली आएगी
जब मैं घर आया
तो मम्मी से कहा
मुझे घर पर एक पेड़ बोना है
मम्मी ने कहा...
बेटा यहाँ पेड़ बोएँगे कैसे?
नीचे तो माटी है नहीं
जड़े कहाँ जाएँगी
और किसी तरह पेड़ लग भी गया तो
पत्ते उपर छत से टकराकर सूख जाएँगे...

(मैं थोड़ा रोया
फिर मम्मी ने वही कार्टून चलाया
जिसमें मेरा प्रिय जापानी हीरो
दुनिया को बचाता है)

यूनिकवि- गुलशन सुखलाल

अपने फैसले क्या ले पाएगी शिवानी?


अजीब लगा उसे देखकर
स्कूल जाती
10 साल की
छोटी
शिवानी
सोचता रहा
दादी जब उसकी उम्र की थी कैसी होगी?
बहुत लम्बा सफर
तय कर आयी है
शिवानी

अब नहीं ढोती वह
गाय बकरी का चारा
चूल्हे के लिए लकड़ियाँ
नहीं ले जाती नदी तट तक
मैले कपड़ों की मोठरी पर
कमर अपनी सीधी
क्यूँ नहीं रखती शिवानी?

दादी बताती है
चौदह साल की थी
जब तीन किलो का बच्चा अपना
गोद में लिये काम करती थी....
शिवानी के साथ नहीं होगा यह
पर छः किलो का बस्ता
पीठ पर टाँग़े क्यूँ कराहती है
शिवानी

घर गृहस्थी-चिंता
अभी दूर है उसके लिए
दस साल की है
फिर
जीवन भर की सफलता का निर्णय
अगले साल कैसे कर लेगी
शिवानी

मुझे लगता है
हँसना चाहिये था उसको खुलकर
खिलकर
उम्र है यही उसकी अभी
पर जब शाम को आती है
दो दो ट्यूशन के बाद
उदास लगती है
शिवानी

खाना नहीं बनाती
झाड़ू नहीं लगाती
फिर भी अपने कार्टून
नहीं देख पाती शिवानी
सुबह से शाम
अध्यापक से ऊबकर
जब घर आती...माँ ढूंढती
पर यहाँ भी अध्यापक ही पाती है
शिवानी

सोचता हूँ
आगे क्या करेगी
शिवानी

पढ़ पायी तो... नहीं पढ़ पाई तो...

न पढ़ पाई तो ...
सुने.. और सुने कूढ़े
खीजे
सिए, पकाए, पोंछे
नोच-नाच से बचे
खींचे
खिजे चुप रहे
काम करे
शादी करे...
पर कमर शायद ही सीधी कर पाएगी
शिवानी

पढ़े तो.. और पढ़े ...
और पढ़े
फिर दौड़े
फिर कूढ़े
नोच-नाच से बचे
खींचे खिजे चुप रहे
काम करे
शादी करे...
पर यहाँ भी
कमर शायद ही सीधी कर पाएगी
शिवानी

किसी से नहीं पूछ पाता हूँ
अपने फैसले क्या ले पाएगी शिवानी?


अब जब देखता हूँ
दादी से ज़्यादा अलग
नहीं लगती है
शिवानी

यूनिकवि- गुलशन सुखलाल

फिर महका कविता का गुलशन


हिन्द-युग्म यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता के परिणाम में यह पहली बार हो रहा है कि एक ही कवि को हम दूसरी बार यह सम्मान दे रहे हैं। अमूमन यूनिकवि बनने के बाद कवि हिन्द-युग्म की स्थाई सदस्यता लेकर स्वयं ही अपनी कविताएँ प्रकाशित करने लगता है, लेकिन कई कवि स्थाई तौर पर योगदान देना एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी मानते हैं, इसलिए कभी-कभार प्रतियोगिता के रास्ते अपना योगदान देते रहते हैं। आज हम जिस कवि की बात कर रहे हैं उनका नाम है गुलशन सुखलाल। गुलशन सुखलाल ने मई २००८ के यूनिकवि का खिताब भी जीता था। गुलशन सुखलाल के अतिरिक्त यूनिकवि केशव कुमार कर्ण और यूनिकवयित्री दिव्या श्रीवास्तव ने पुरस्कार पाने के बाद इस प्रतियोगिता में भाग लिया है।

नये पाठकों को बता दें कि यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता का आयोजन हिन्द-युग्म द्वारा प्रत्येक माह किया जाता है। प्राप्त कविताओं से यूनिकविता चुनने का काम कई चरणों के जजमेंट द्वारा सम्पादित किया जाता है। एक निर्णायक को न तो दूसरे निर्णायक के बारे में कोई जानकारी दी जाती है और न ही रचना के रचनाकार के विषय में। जनवरी माह की यूनिकवि प्रतियोगिता के लिए हमें कुल ४५ कविताएँ प्राप्त हुई थीं। इस बार निर्णय ३ चरणों में कराया गया। पहले चरण में तीन जज, दूसरे में २ और अंतिम चरण में एक निर्णायक की अनुभवी दृष्टि से गुजरने के बाद गुलशन सुखलाल की कविता 'अर्थ का भय' यूनिकविता बनी। इस कविता पर टिप्पणी करते हुए हमारे अंतिम निर्णयकर्ता ने कहा-

"शब्दों की सार्थकता पर एक अच्छी कविता। आज समय और साहित्य की चुनौतियाँ हैं कि शब्दों को निर्रथक होने से बचाया जाय। पर समय इतना कठिन है कि रचनाकार को अपने शब्द यानी अपनी अभिव्यक्ति को सार्थकता प्रदान करने के लिये निरंतर संघर्ष करना पड़ता है। कवि पर एक ओर अपने परिवेश का दबाव काम करता है, तो दूसरी ओर शब्दों से भी संघर्ष करना पड़ता है-
"आज मेरे शब्दों के चारों तरफ़
काला घना कोहरा छा रहा है
काई सी बैठ रही है
तमाम
तेलाँस पदार्थों की काई
जैसे
गाड़ी के शीशे पर बैठती है"

कविता की लय कहीं-कहीं टूट गयी है पर उसकी अंतर्वस्तु इन्टैक्ट है जो कविता के लक्ष्य को सफलीभूत करती है।"



गुलशन सुखलाल महात्मा गांधी संस्थान, मोका मॉरिशस के हिन्दी विभाग में वरिष्ठ व्याख्याता हैं। हंसराज कॉलिज, दिल्ली विश्वविध्यालय से बीए गुलशन गंगाधरसिंह सुखलाल को अनुभूति-अभिव्यक्ति की संपादिका पूर्णिमा वर्मन प्रवासी हिन्दी युवा कवियों में बहुत ऊँचा स्थान देती हैं-

"बहुत ही कम कवि ऐसे हैं जो विदेशी होने के बावजूद हिन्दी को उतनी ही सहजता से अनुभूत करते और व्यक्त करते हैं जैसे गुलशन सुखलाल। निसन्देह यह हिन्दी के प्रति उनकी गहरे लगाव ही नहीं उनकी निरंतर श्रम और अध्ययन को व्यक्त करता है। नई समय की हर नई चीज़ और जीवन के हर टुकड़े से जुड़ी उनकी सीधी भाषा में लिखी गई तरल कविताएँ पाठक की संवेदना को गहराई से छूती हैं और सदा के लिए अपनी छाप छोड़ जाती हैं।"



इनकी कविता पर और अधिक बात तो पाठक करेंगे, हम सीधे कविता प्रकाशित करते हैं।

पुरस्कृत कविता- अर्थ का भय

बहुत डर लगता था मुझे
निरर्थकता से
बहुत...
बहुत ध्यान रखता था
एक-एक शब्द
एक-एक बात...
इतना ज़्यादा कि बहुत पहले से
मज़ाक करना भी बन्द कर दिया
इतना डरता था

लगता था
अर्थविहीन शब्द
पाप होते हैं
झूठ होते हैं
अन्याय होते हैं
या फिर शब्द ही नहीं होते

लगता था कोई आएगा
लाल स्याही की लिए हुए कलम
और बड़ा सा क्रॉस लगा देगा मेरे शब्दों पर
फ़ेल हो जाऊँगा

इसलिए चुनता था
छोटे-बड़े
तत्सम-तद्भव
अच्छे-बुरे...
सभी तरह के शब्द

अपनी विद्वत्ता दिखाने के लिए नहीं
मात्र निरर्थक न होने के लिए

पर फिर
थकने लगा
अर्थवान होते-होते
अकेला
घिरा हुआ
उन सभी से
जो हर वक्त, दिन-रात
ऐसे शब्द बोलते रहे हैं
जो अब नहीं आते समझ में किसी के
इतनी बार बोले गए हैं वे शब्द
और उनपर इतनी बार
निष्क्रियता
बेईमानी
लालच का
फेरा गया है झारन
कि उनका रूप बिगड़ गया है

अब वे निरर्थक हो गए है
सभी के लिए


फिर भी ये बोले जाते हैं
बोले जाते हैं
बोले जाते हैं

आज वे निरर्थक शब्द
एक-एक करके
घेर रहे हैं
मेरे शब्दों को
चुने हुए
सार्थक शब्दों को

आज मेरे शब्दों के चारों तरफ़
काला घना कोहरा छा रहा है
काई सी बैठ रही है
तमाम
तेलाँस पदार्थों की काई
जैसे
गाड़ी के शीशे पर बैठती है

आज इन सभी निरर्थक शब्दों से घिरकर
मेरे शब्द भी हो रहे हैं
निरर्थक
अब डर कम लगता है निरर्थकता का
आदत पड़ रही है

लेकिन जो गुज़र चुके है
इस काले कोहरे से
उन्होंने चेताया मुझे

'बहुत जल्द
फिर लगने लगेगा डर
सार्थकता से
अपने शब्दों की सार्थकता से...'



प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ३, ७, ६॰८
औसत अंक- ५॰६
स्थान- दसवाँ


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ४॰८, ५, ५॰६ (पिछले चरण का औसत
औसत अंक- ५॰१३३३
स्थान- नौवाँ


अंतिम चरण के जजमेंट में मिला अंक-
स्थान- प्रथम


पुरस्कार और सम्मान- रु ३०० का नक़द पुरस्कार, प्रशस्ति-पत्र और रु १०० तक की पुस्तकें।

यूनिकवि की कुछ कविताएँ फरवरी माह के अन्य तीन सोमवारों को भी प्रकाशित होंगी, अतः शर्तानुसार रु १०० प्रत्येक कविता के हिसाब से रु ३०० का नग़द इनाम दिया जायेगा।

हिन्द-युग्म प्रत्येक माह इस प्रतियोगिता से कम से कम १० कवियों की कविताएँ प्रकाशित करता है और रचनाकार को पुस्तक के रूप में उपहार भी देता हैं। इस बार जिन अन्य १० कवियों को ग़ज़लगो द्विजेन्द्र द्विज का ग़ज़ल-संग्रह 'जन गण मन' भेंट किया जायेगा, उनके नाम हैं-

मुहम्मद असहन
चन्द्रदेव यादव
प्रदीप वर्मा
रेनू जैन
विवेक असरी
संजय सेन सागर
शामिख फ़राज़
अरूण मित्तल अद्भुत
स्मिता
उमेश पंत

उपर्युक्त कवियों से निवेदन है कि कृपया २८ फरवरी तक अपनी कविता न तो कहीं प्रकाशित करें और न ही करवायें।

अब पाठकों की बात भी कर ली जाय। हिन्द-युग्म के नियमित पाठकों में महिला पाठकों की संख्या शुरू से ही बहुत अधिक रही है। इस बार भी चार पुरस्कृत पाठकों में ३ स्थान महिला पाठकों ने ले रखा है। इस बार यूनिपाठिका के सम्मान के लिए हम चुन रहे हैं नीलम मिश्रा को। नीलम मिश्रा ने हिन्द-युग्म के सभी मंचों को सबसे अधिक पढ़ा, टिप्पणी की। इनकी टिप्पणियों से साफ झलकता है कि ये हर एक प्रविष्टि को बहुत ध्यान से पढ़ती हैं।
यूनिपाठिका- नीलम मिश्रा

पिता -श्रीधर मिश्रा
जन्मस्थान -ग्राम (पांडे वारी ), जिला- लखीमपुर खीरी, उत्तर प्रदेश
जन्म दिनांक ०१-०१-१९७१
प्रारम्भिक शिक्षा -बरेली, पटना, लखनऊ से
उसके बाद सारी शिक्षा (औपचारिक व अनौपचारिक) लखनऊ से ही संपन्न हुई। पुरातनपंथी ब्राह्मण परिवार में जन्म होने के कारण सिर्फ़ औपचारिक शिक्षा पर ही बल दिया गया, एम॰ए॰- अर्थशास्त्र में तथा बी.एड
सपना -भारत को और उसकी भाषा को पूरा सम्मान दिलाना
आत्म कथ्य -संभ्रांत और शिक्षित व्यक्तियों द्बारा प्रकृति की अवहेलना मन को आहत करती है, किसी भी रोते हुए मासूम के आँसू पोछना चाहती हूँ, किसी भी बूढ़ी औरत के घुटनों पर मलहम लगाकर उसके दर्द को बांटने की कोशिश, किसी हमदर्द की तन्हाई से बातें करने की कोशिश, सार यह है कि सभी को खुश देखना चाहती हूँ
अपने पिता को अपना आदर्श मानती हूँ, जिनके संघर्षों के साथ मैं भी बड़ी होती गई दुनिया का सबसे अच्छा इंसान मानती हूँ उन्हें, दूसरों कि नजरों में वो क्या हैं इसकी परवाह किए बिना

पुरस्कार और सम्मान- रु ३०० का नक़द पुरस्कार, प्रशस्ति-पत्र और रु २०० तक की पुस्तकें।

दूसरे से चौथे स्थान के पाठकों के लिए हमने क्रमशः एम॰ ए॰ शर्मा 'सेहर', निर्मला कपिला और दिलशेर खान को चुना है। इनमें से एम॰ए॰ शर्मा 'सेहर' ने हिन्द-युग्म को खूब पढ़ा। हम उम्मीद करते हैं कि आगे से ये अपनी पठनीयता को और बढ़ायेंगी। तीनों पाठकों को कवि द्विजेन्द्र द्विज के ग़ज़ल-संग्रह 'जन गण मन' की एक-एक प्रति भेंट की जायेगी।

हम निम्नलिखित कवियों के भी आभारी हैं, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर इसे सफल बनाया और यह निवेदन करते हैं कि फरवरी २००९ की यूनिकवि एवम् यूनिपाठक प्रतियोगिता में भी अवश्य भाग लें।

मनु ’बेतखल्लुस’
तपन शर्मा
सुधीर सक्सेना 'सुधि'
दिलशेर "दिल" दतिया
अलका मिश्रा
चारु लेखा
प्रताप नारायण सिंह
अखिलेश श्रीवास्तव
नीलम मिश्रा
सारदा अरोरा
अवनीश तिवारी
केशव कुमार कर्ण
शिखा वार्ष्नेय
कमलप्रीत सिंह
सीमा सचदेव
पंकज स्मित
रश्मि प्रभा
प्रदीप पाठक
एम॰ ए॰ शर्मा 'सेहर'
संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
बृजेश गुप्त 'अक्स'
संगीता
योगेश गाँधी
अबयज़ ख़ान
अमन 'बस अमन'
अनिरुद्ध सिंह चौहान
शिवम शर्मा
विपुल कुमार श्रीवास्तव
बृजेश पंत
दिनेश शर्मा
सुनील सोनू
सोनिया शर्मा
सुनील मंथन शर्मा
जी मिश्रा