हिन्द-युग्म यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता के परिणाम में यह पहली बार हो रहा है कि एक ही कवि को हम दूसरी बार यह सम्मान दे रहे हैं। अमूमन यूनिकवि बनने के बाद कवि हिन्द-युग्म की स्थाई सदस्यता लेकर स्वयं ही अपनी कविताएँ प्रकाशित करने लगता है, लेकिन कई कवि स्थाई तौर पर योगदान देना एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी मानते हैं, इसलिए कभी-कभार प्रतियोगिता के रास्ते अपना योगदान देते रहते हैं। आज हम जिस कवि की बात कर रहे हैं उनका नाम है गुलशन सुखलाल। गुलशन सुखलाल ने
मई २००८ के यूनिकवि का खिताब भी जीता था। गुलशन सुखलाल के अतिरिक्त
यूनिकवि केशव कुमार कर्ण और
यूनिकवयित्री दिव्या श्रीवास्तव ने पुरस्कार पाने के बाद इस प्रतियोगिता में भाग लिया है।
नये पाठकों को बता दें कि यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता का आयोजन हिन्द-युग्म द्वारा प्रत्येक माह किया जाता है। प्राप्त कविताओं से यूनिकविता चुनने का काम कई चरणों के जजमेंट द्वारा सम्पादित किया जाता है। एक निर्णायक को न तो दूसरे निर्णायक के बारे में कोई जानकारी दी जाती है और न ही रचना के रचनाकार के विषय में। जनवरी माह की यूनिकवि प्रतियोगिता के लिए हमें कुल ४५ कविताएँ प्राप्त हुई थीं। इस बार निर्णय ३ चरणों में कराया गया। पहले चरण में तीन जज, दूसरे में २ और अंतिम चरण में एक निर्णायक की अनुभवी दृष्टि से गुजरने के बाद गुलशन सुखलाल की कविता
'अर्थ का भय' यूनिकविता बनी। इस कविता पर टिप्पणी करते हुए हमारे अंतिम निर्णयकर्ता ने कहा-
"शब्दों की सार्थकता पर एक अच्छी कविता। आज समय और साहित्य की चुनौतियाँ हैं कि शब्दों को निर्रथक होने से बचाया जाय। पर समय इतना कठिन है कि रचनाकार को अपने शब्द यानी अपनी अभिव्यक्ति को सार्थकता प्रदान करने के लिये निरंतर संघर्ष करना पड़ता है। कवि पर एक ओर अपने परिवेश का दबाव काम करता है, तो दूसरी ओर शब्दों से भी संघर्ष करना पड़ता है-
"आज मेरे शब्दों के चारों तरफ़
काला घना कोहरा छा रहा है
काई सी बैठ रही है
तमाम
तेलाँस पदार्थों की काई
जैसे
गाड़ी के शीशे पर बैठती है"
कविता की लय कहीं-कहीं टूट गयी है पर उसकी अंतर्वस्तु इन्टैक्ट है जो कविता के लक्ष्य को सफलीभूत करती है।"
गुलशन सुखलाल महात्मा गांधी संस्थान, मोका मॉरिशस के हिन्दी विभाग में वरिष्ठ व्याख्याता हैं। हंसराज कॉलिज, दिल्ली विश्वविध्यालय से बीए गुलशन गंगाधरसिंह सुखलाल को अनुभूति-अभिव्यक्ति की संपादिका पूर्णिमा वर्मन प्रवासी हिन्दी युवा कवियों में बहुत ऊँचा स्थान देती हैं-
"बहुत ही कम कवि ऐसे हैं जो विदेशी होने के बावजूद हिन्दी को उतनी ही सहजता से अनुभूत करते और व्यक्त करते हैं जैसे गुलशन सुखलाल। निसन्देह यह हिन्दी के प्रति उनकी गहरे लगाव ही नहीं उनकी निरंतर श्रम और अध्ययन को व्यक्त करता है। नई समय की हर नई चीज़ और जीवन के हर टुकड़े से जुड़ी उनकी सीधी भाषा में लिखी गई तरल कविताएँ पाठक की संवेदना को गहराई से छूती हैं और सदा के लिए अपनी छाप छोड़ जाती हैं।"
इनकी कविता पर और अधिक बात तो पाठक करेंगे, हम सीधे कविता प्रकाशित करते हैं।
पुरस्कृत कविता- अर्थ का भय
बहुत डर लगता था मुझे
निरर्थकता से
बहुत...
बहुत ध्यान रखता था
एक-एक शब्द
एक-एक बात...
इतना ज़्यादा कि बहुत पहले से
मज़ाक करना भी बन्द कर दिया
इतना डरता था
लगता था
अर्थविहीन शब्द
पाप होते हैं
झूठ होते हैं
अन्याय होते हैं
या फिर शब्द ही नहीं होते
लगता था कोई आएगा
लाल स्याही की लिए हुए कलम
और बड़ा सा क्रॉस लगा देगा मेरे शब्दों पर
फ़ेल हो जाऊँगा
इसलिए चुनता था
छोटे-बड़े
तत्सम-तद्भव
अच्छे-बुरे...
सभी तरह के शब्द
अपनी विद्वत्ता दिखाने के लिए नहीं
मात्र निरर्थक न होने के लिए
पर फिर
थकने लगा
अर्थवान होते-होते
अकेला
घिरा हुआ
उन सभी से
जो हर वक्त, दिन-रात
ऐसे शब्द बोलते रहे हैं
जो अब नहीं आते समझ में किसी के
इतनी बार बोले गए हैं वे शब्द
और उनपर इतनी बार
निष्क्रियता
बेईमानी
लालच का
फेरा गया है झारन
कि उनका रूप बिगड़ गया है
अब वे निरर्थक हो गए है
सभी के लिए
फिर भी ये बोले जाते हैं
बोले जाते हैं
बोले जाते हैं
आज वे निरर्थक शब्द
एक-एक करके
घेर रहे हैं
मेरे शब्दों को
चुने हुए
सार्थक शब्दों को
आज मेरे शब्दों के चारों तरफ़
काला घना कोहरा छा रहा है
काई सी बैठ रही है
तमाम
तेलाँस पदार्थों की काई
जैसे
गाड़ी के शीशे पर बैठती है
आज इन सभी निरर्थक शब्दों से घिरकर
मेरे शब्द भी हो रहे हैं
निरर्थक
अब डर कम लगता है निरर्थकता का
आदत पड़ रही है
लेकिन जो गुज़र चुके है
इस काले कोहरे से
उन्होंने चेताया मुझे
'बहुत जल्द
फिर लगने लगेगा डर
सार्थकता से
अपने शब्दों की सार्थकता से...'
प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ३, ७, ६॰८
औसत अंक- ५॰६
स्थान- दसवाँ
द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ४॰८, ५, ५॰६ (पिछले चरण का औसत
औसत अंक- ५॰१३३३
स्थान- नौवाँ
अंतिम चरण के जजमेंट में मिला अंक- ८
स्थान- प्रथम
पुरस्कार और सम्मान- रु ३०० का नक़द पुरस्कार, प्रशस्ति-पत्र और रु १०० तक की पुस्तकें।
यूनिकवि की कुछ कविताएँ फरवरी माह के अन्य तीन सोमवारों को भी प्रकाशित होंगी, अतः शर्तानुसार रु १०० प्रत्येक कविता के हिसाब से रु ३०० का नग़द इनाम दिया जायेगा।
हिन्द-युग्म प्रत्येक माह इस प्रतियोगिता से कम से कम १० कवियों की कविताएँ प्रकाशित करता है और रचनाकार को पुस्तक के रूप में उपहार भी देता हैं। इस बार जिन अन्य १० कवियों को ग़ज़लगो द्विजेन्द्र द्विज का ग़ज़ल-संग्रह 'जन गण मन' भेंट किया जायेगा, उनके नाम हैं-
मुहम्मद असहन
चन्द्रदेव यादव
प्रदीप वर्मा
रेनू जैन
विवेक असरी
संजय सेन सागर
शामिख फ़राज़
अरूण मित्तल अद्भुत
स्मिता
उमेश पंत
उपर्युक्त कवियों से निवेदन है कि कृपया २८ फरवरी तक अपनी कविता न तो कहीं प्रकाशित करें और न ही करवायें।
अब पाठकों की बात भी कर ली जाय। हिन्द-युग्म के नियमित पाठकों में महिला पाठकों की संख्या शुरू से ही बहुत अधिक रही है। इस बार भी चार पुरस्कृत पाठकों में ३ स्थान महिला पाठकों ने ले रखा है। इस बार यूनिपाठिका के सम्मान के लिए हम चुन रहे हैं नीलम मिश्रा को। नीलम मिश्रा ने हिन्द-युग्म के सभी मंचों को सबसे अधिक पढ़ा, टिप्पणी की। इनकी टिप्पणियों से साफ झलकता है कि ये हर एक प्रविष्टि को बहुत ध्यान से पढ़ती हैं।
यूनिपाठिका- नीलम मिश्रा
पिता -श्रीधर मिश्रा
जन्मस्थान -ग्राम (पांडे वारी ), जिला- लखीमपुर खीरी, उत्तर प्रदेश
जन्म दिनांक ०१-०१-१९७१
प्रारम्भिक शिक्षा -बरेली, पटना, लखनऊ से
उसके बाद सारी शिक्षा (औपचारिक व अनौपचारिक) लखनऊ से ही संपन्न हुई। पुरातनपंथी ब्राह्मण परिवार में जन्म होने के कारण सिर्फ़ औपचारिक शिक्षा पर ही बल दिया गया, एम॰ए॰- अर्थशास्त्र में तथा बी.एड
सपना -भारत को और उसकी भाषा को पूरा सम्मान दिलाना
आत्म कथ्य -संभ्रांत और शिक्षित व्यक्तियों द्बारा प्रकृति की अवहेलना मन को आहत करती है, किसी भी रोते हुए मासूम के आँसू पोछना चाहती हूँ, किसी भी बूढ़ी औरत के घुटनों पर मलहम लगाकर उसके दर्द को बांटने की कोशिश, किसी हमदर्द की तन्हाई से बातें करने की कोशिश, सार यह है कि सभी को खुश देखना चाहती हूँ
अपने पिता को अपना आदर्श मानती हूँ, जिनके संघर्षों के साथ मैं भी बड़ी होती गई दुनिया का सबसे अच्छा इंसान मानती हूँ उन्हें, दूसरों कि नजरों में वो क्या हैं इसकी परवाह किए बिना
पुरस्कार और सम्मान- रु ३०० का नक़द पुरस्कार, प्रशस्ति-पत्र और रु २०० तक की पुस्तकें।
दूसरे से चौथे स्थान के पाठकों के लिए हमने क्रमशः एम॰ ए॰ शर्मा 'सेहर', निर्मला कपिला और दिलशेर खान को चुना है। इनमें से एम॰ए॰ शर्मा 'सेहर' ने हिन्द-युग्म को खूब पढ़ा। हम उम्मीद करते हैं कि आगे से ये अपनी पठनीयता को और बढ़ायेंगी। तीनों पाठकों को कवि द्विजेन्द्र द्विज के ग़ज़ल-संग्रह 'जन गण मन' की एक-एक प्रति भेंट की जायेगी।
हम निम्नलिखित कवियों के भी आभारी हैं, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर इसे सफल बनाया और यह निवेदन करते हैं कि फरवरी २००९ की यूनिकवि एवम् यूनिपाठक प्रतियोगिता में भी अवश्य भाग लें।
मनु ’बेतखल्लुस’
तपन शर्मा
सुधीर सक्सेना 'सुधि'
दिलशेर "दिल" दतिया
अलका मिश्रा
चारु लेखा
प्रताप नारायण सिंह
अखिलेश श्रीवास्तव
नीलम मिश्रा
सारदा अरोरा
अवनीश तिवारी
केशव कुमार कर्ण
शिखा वार्ष्नेय
कमलप्रीत सिंह
सीमा सचदेव
पंकज स्मित
रश्मि प्रभा
प्रदीप पाठक
एम॰ ए॰ शर्मा 'सेहर'
संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
बृजेश गुप्त 'अक्स'
संगीता
योगेश गाँधी
अबयज़ ख़ान
अमन 'बस अमन'
अनिरुद्ध सिंह चौहान
शिवम शर्मा
विपुल कुमार श्रीवास्तव
बृजेश पंत
दिनेश शर्मा
सुनील सोनू
सोनिया शर्मा
सुनील मंथन शर्मा
जी मिश्रा