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Thursday, February 14, 2008

माँएं नहीं मरतीं


माँ गर्मी की छुट्टियाँ होती है
जिससे शुरु होती है ज़िन्दग़ी
और हर साल
थके-हारे हम
भागकर लौट आते हैं उसी में
फिर बोर हो जाते हैं
और कुछ दिनों में जुलाई माँगते हैं
माँ,
हम बार बार छटपटाकर लौटते हैं
कैद होते हैं
तेरे नियमों, प्रतिबन्धों
और प्यारी सी सनक भरे निर्देशों वाले
प्यारे से घरौंदे में
और फिर
जाने क्यों रिहाई माँगते हैं;

माँ मन्दिर नहीं होती
न ही भगवान
नहीं जाना पड़ता उस तक जूते उतारकर
माँ हमारा अपना कमरा है
जो राह देखता है
साल भर / रात भर
हम चाहें लौटें या नहीं
और लौटकर
जूते पहने हुए ही पसर जाते हैं हम उसकी गोद में
और ज़माने भर का कीचड़
सुना देते हैं उस कमरे को
सने हुए कमरे
सुनती हुई माँएं
गुस्सा करते हैं कुछ देर
मगर कभी नाराज़ नहीं होते
नहीं फेर लेते चेहरा प्रेमिकाओं की तरह
नहीं कहते कि “तुम गन्दे हो, लौट जाओ”;

माँ इतवार की सुबह
टी.वी. पर आने वाली रंगोली है
जो देती है बहाना
पकौड़ियाँ खाते हुए साथ बैठने का
माँ, बैठकर-लेटकर गाया जा सकने वाला
राष्ट्रगान है
जिसे प्यार करने के लिए
सलामियों की जरूरत नहीं होती;
दिनभर की मेहनत के बाद
माँ चाँदनी तले की नींद है
भूखे महीने के बाद
वो सेंवईयों वाली ईद है;

माँ इतिहास है
जो दोहराती रहती है ख़ुद को
ये भूलकर
कि कल शाम ही बताया था उसने वह सब;

माँ है
माँ है
माँ है
वे कहते हैं कि माँ मर गई!
मेरे इस नीले-सफेद स्वेटर में
दीदी के कढ़ाई वाले दुपट्टे में
मेरे पागल ख़्वाबों में
बाबूजी की गर्म साँसों में
मेरी डायरी में लिखे सारे शब्दों में
खिड़कियों पर लगे सब परदों में
पीपल पे टंगे अल्हड़ झूले में
आँगन में गड़े मिट्टी के चूल्हे में
बगीचे में लगे गेंदे की क्यारियों में
करीने से सजी सब अलमारियों में
रसोई में खनकते सब बर्तनों में
पूजाघर में, ईश्वर के सब दर्शनों में
मेरी माँ है।
उनसे कह दो
कि गर्मी की छुट्टियाँ
मन्दिर-भगवान
मेरा कमरा
इतवार की सुबह
राष्ट्रगान
और इतिहास भी नहीं मरे अब तक
तो वो कैसे मर सकती है?
उनसे कह दो
कि माँएं कभी नहीं मरतीं।

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36 कविताप्रेमियों का कहना है :

vijaya का कहना है कि -
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सजीव सारथी का कहना है कि -

माँ पर जाने कितनी कवितायें, ग़ज़लें लिखी जा चुकी हैं, पर श्याद ऐसी कविता मैंने कभी नही पढी, हर हर्फ़ सच्चा हर भाव खरा, जितनी भी तारीफ करूँ कम है -
दिनभर की मेहनत के बाद
माँ चाँदनी तले की नींद है
भूखे महीने के बाद
वो सेंवईयों वाली ईद है
गौरव मुझे तुम्हारे संग्रह का इंतज़ार है, मेरी नज़र में तुम्हारा काव्य किसी भी समकालीन कवि से कमतर नही है, बहुत बहुत बधाई

seema gupta का कहना है कि -

वे कहते हैं कि माँ मर गई!
मेरे इस नीले-सफेद स्वेटर में
दीदी के कढ़ाई वाले दुपट्टे में
मेरे पागल ख़्वाबों में
बाबूजी की गर्म साँसों में
मेरी डायरी में लिखे सारे शब्दों में
खिड़कियों पर लगे सब परदों में
पीपल पे टंगे अल्हड़ झूले में
आँगन में गड़े मिट्टी के चूल्हे में
बगीचे में लगे गेंदे की क्यारियों में
करीने से सजी सब अलमारियों में
रसोई में खनकते सब बर्तनों में
पूजाघर में, ईश्वर के सब दर्शनों में
मेरी माँ है।
" माँ शब्द का ऐसा वर्णन और चित्रण मैंने कभी नही देखा या पढा , न जाने क्यों आंख कुछ नम हो आए पढ़ कर, माँ सच मे माँ ही होती है, वो एक ऐसा साथी होती है जो हर कदम पर हमे सहारा देती है और हमारे साथ होती गई, हम कितने भी बडे हो जायें फ़िर भी माँ की गोद और उसका साथ महसूस होता है. कवीता के रूप मे आपने बडा ही विचित्र और सच्चा रूप दीखा दिया" बहुत सुंदर "
Regards

रंजू का कहना है कि -

गौरव आज आपकी माँ पर लिखी कविता पढी तो अपनी लिखी एक कविता याद आगई http://ranjanabhatia.blogspot.com/2007/07/blog-post_08.html सच में माँ हर हर वक्त साथ होती है और इस पर लिखा हर लफ्ज़ सुंदर !!

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

माँ पर लिखी यह रचना सुंदर है , बिल्कुल सच है |
सभी माताओं को प्रणाम |

अवनीश तिवारी

तपन शर्मा का कहना है कि -

गौरव भाई, क्या कहूँ? मुझे लगता है कि आपने लगभग हर रिश्ते पर लिखा है। आपका लिखने का तरीका अपने आप में अलग है। मैंने तो जबसे आपकी "पिता" वाली रचना पढी है, मैं आपकी इस शैली का प्रशंसक बन गया हूँ। सजीव जी सही कहते हैं, आप किसी भी समकालीन कवि से कमतर नहीं हैं। एक ही साँस में पढीं जाने वाली रचनाओं में से एक है ये कविता।
धन्यवाद।

mehek का कहना है कि -

बहुत सुंदर

Alpana Verma का कहना है कि -

गौरव तुम्हारी कम उम्र और दिन ब दिन परिपक्व होता लेखन----कहानी हो या कविता-हर विधा में लगता है बड़ी तेजी से अपनी कलम पैनी कर रहे हो-यह कविता भी एक उदाहरण है.
-विजया के कोमेंट पर यही कहूँगी-कि
१-वैलेंटाइन डे सिर्फ़ प्रेमी-प्रेमिका के लिए नहीं होता-आप किसी को भी अपना valentine सकते हो-और यह आज के दिन एक उपहार है माँ को समर्पित-आप इस दिन के बारे में डिटेल में पढ़ें.
२-विजया कहते हैं कि मान कभी बेटे के लिए खुदकुशी नही करती प्रेमिका करती है-टू सुनीये--खुदकुशी बुजदिल करते हैं-और माएं बुजदिल नहीं होतीं.भावनाओं में बह कर ऐसा कदम नहीं उठती जिस से किसी तरह कि रुसवाई हो.जान देना क्या प्रेम का कोई सबूत होता है??-
प्रेम शक्ति देता है जिस से विपरीत परिस्थितियों में भी इंसान अपने आप को संभाले रखे-

sahil का कहना है कि -

गौरव भाई,मैं रात में माँ पे कविता पढ़ रहा था,एक पुरी की पुरी किताब ही माँ पे थी.पर वो भाव थे एक ५५-६० साल के बूढे व्यक्ति के(मैं मानता हूँ उम्र का भावनाओं से बहुत मतलब नही होता),पर सुखद बात यह है की एक बिल्कुल जवान लड़के के माँ के प्रति ऐसे भाव बेहद सराहनीय है,वो भी ऐसे दिन जिसे तथाकथित तौर पर प्रेम दिवस का नाम दे दिया गया है(क्योंकि आधुनिक माहौल में प्रेम का मतलब वो नहीं जो माँ,बहन,पिता,भाई आदि के साथ होता है,प्रेम सिर्फ़ प्रेमिका तक सीमित हो गया है.),बहुत ही बेहतरी और मैं अल्पना जी के विचारों से बिल्कुल सहमत हुन्की प्रेम...केवल प्रेमिका तक ही सीमित नही होना चाहिए,क्योंकि प्रेम के रूप अनेक..........
प्रेम के कवि प्रेमी ह्रदय आपको मेरा सदर नमन
अलोक संघ "साहिल"

गिरिराज जोशी का कहना है कि -

वाह!

सच कहा गौरवजी! माँएं नहीं मरती, कभी नहीं मरती...

कभी नाराज़ नहीं होते
नहीं फेर लेते चेहरा प्रेमिकाओं की तरह
नहीं कहते कि “तुम गन्दे हो, लौट जाओ”;

माँ है
वे कहते हैं कि माँ मर गई!
मेरे इस नीले-सफेद स्वेटर में
दीदी के कढ़ाई वाले दुपट्टे में
मेरे पागल ख़्वाबों में
बाबूजी की गर्म साँसों में
मेरी डायरी में लिखे सारे शब्दों में
खिड़कियों पर लगे सब परदों में
पीपल पे टंगे अल्हड़ झूले में
आँगन में गड़े मिट्टी के चूल्हे में
बगीचे में लगे गेंदे की क्यारियों में
करीने से सजी सब अलमारियों में
रसोई में खनकते सब बर्तनों में
पूजाघर में, ईश्वर के सब दर्शनों में
मेरी माँ है।
उनसे कह दो
कि गर्मी की छुट्टियाँ
मन्दिर-भगवान
मेरा कमरा
इतवार की सुबह
राष्ट्रगान
और इतिहास भी नहीं मरे अब तक
तो वो कैसे मर सकती है?
उनसे कह दो
कि माँएं कभी नहीं मरतीं।


नमन!

Pankaj Bengani का कहना है कि -

इस तरह की ज्यादातर कविताएँ माँ के विषय पर आधारित होती है. जाहिर है माँ के साथ जो भावनात्मक रिश्ता होता है वह कागज पर उतरना स्वाभाविक ही है.

परंतु मुझे कभी कभी समझ नही आता कि हम हमारे विभिन्न रिश्तों का तुलनात्मक अध्ययन क्यों करते हैं? मसलन... माँ है तो महान ही होगी!! माँ है तो वह पत्नी अथवा प्रेमिका से अच्छी , प्रेमिका बुरी या पत्नी ने माँ को प्रताडित किया.. मैं माँ की गोद में जाना चाहता हुँ. कभी गाँव याद आता है कभी गोद याद आती है. अजीब लगता है मुझे तो.

माँ माँ होती है. पत्नी पत्नी होती और प्रेमिका होती है. सब बुरे हों यह जरूरी नही, सब बहुत अच्छें हों यह भी जरूरी नही... सबका अपना अपना रोल होता है.

इसमे इतनी महानता पता नही कहाँ से आ जाती है.

आलोक शंकर का कहना है कि -

gaurav, abhi kuch nahi kahoonga, ispar fursat me kuch kahta hoon

sunita yadav का कहना है कि -

माँ .......माँ ..... क्यों नहीं हो .....देखो न आज भी तुम्हारे बिन घर सूना लगता होगा ...तुम होती तो मैं भाग कर आ न जाती ....देखो न माँ सालों से कभी घर गयी नहीं... आँगन में....रसोई में खनकते सब बर्तनों में ,पूजाघर में ....तुम कहीं भी नजर नहीं आयी थी ..मैं नाराज हूँ मम्मा मेरे आने तक क्यों न इन्तजार किया ....तुम्हारी जगह दिए क्यों जल रहे थे ?...नाराज होना मेरा हक है माँ...पर तुम तो मुझसे कभी नाराज न होती थी ...फ़िर क्यों ....? मम्मा ....तुम होती तो मैं यूं अकेले प्रसव पीडा से चीत्कार न करती...मुझे भूख लगते ही खाना मिल जाता .. बच्ची को पकड़ना तुम सिखा देती ...हर साल गरमी की छुट्टियों में मैं इन्तजार न करती ...कोई मुझे भी बुलाये... माँ तुम बिन मैंने कुछ सीखा तो आंसू अपने आप पोछ्ना ... माँ...तुम न पूजा घर में हो ...न मंदिरों में ...तुम तो उस कौर में हो जिसे मैं अपने हाथों से खाती हूँ ...उन कपडों में हो जिसे मैं पहनती हूँ ...मम्मा तुम उस दवा में हो जिसे मैं कभी लगाती हूँ ...उस प्यार में हो जिसे मैं अपनी गुडिया को देती हूँ ..i miss you mamma ...गौरव थैंक्स .....

vijaya का कहना है कि -
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Bhupendra Raghav का कहना है कि -

गौरव भाई माँ की याद आई और माँ को समर्पित मेरी एक कविता की कुछ पंक्तियाँ बरबस गुनगुनाने लगा..

माँ तेरे आँचल में मैने सरपट दौड़ लगायी थी ।
कभी लगी जो ठोकर मुझको में माँ-माँ चिल्लाई थी ॥

तेरी ऊँगली थाम कर मैने रूक-रूक चलना सीखा था ।
माँ तेरा स्पर्श प्यार का सचमुच कितना नीका था ॥
.
.
.
.
.
माँ तेरी पोषित ये डाली आज बड़ी सी शाख हुई ।
मुझे पता है मेरी खातिर माँ तू एक दिन राख हुई ॥
नही छूट सकता ये बंधन प्रान पखेरू उड़ने तक ।
नही छोड़कर जाने की वो, क़सम तूने भी खाई थी ॥
कभी लगी जो ठोकर ....................

बहुत ही उतकृष्ट कविता..

वे कहते हैं कि माँ मर गई!
मेरे इस नीले-सफेद स्वेटर में
दीदी के कढ़ाई वाले दुपट्टे में
मेरे पागल ख़्वाबों में
बाबूजी की गर्म साँसों में
मेरी डायरी में लिखे सारे शब्दों में
खिड़कियों पर लगे सब परदों में
पीपल पे टंगे अल्हड़ झूले में
आँगन में गड़े मिट्टी के चूल्हे में
बगीचे में लगे गेंदे की क्यारियों में
करीने से सजी सब अलमारियों में
रसोई में खनकते सब बर्तनों में
पूजाघर में, ईश्वर के सब दर्शनों में
मेरी माँ है।

अतुलनीय लेखन..

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

रंजना जी और भूपेन्द्र जी, आपके रचनाएं पढ़ी। माँ पर हमारा लिखा हुआ अपने आप ही अच्छा हो जाता है। बहुत अच्छा लगा।
विजया, तुम्हें लगता होगा कि मैंने इस दिन माँ के प्यार पर लिखकर और उसकी प्रेमिका से तुलना करके ग़लत किया है। लेकिन मुझे एक ही तरह से प्यार करना आता है। मैं माँ से भी उसी तरह प्यार करता हूं, जिस तरह प्रेमिका से। अब उसे अलग अलग कैसे करूं?
आप सबने रचना को सराहा, हार्दिक धन्यवाद।

anuradha srivastav का कहना है कि -

गौरव कविता दिल को छू गई। आज खुद बडे-बडे बच्चों की मां होने के बावजूद ,उम्र के इस मोड पर भी मेरे मन में मां के लिये वही प्यार है,वही संवेग है।

दिवाकर मिश्र का कहना है कि -

गौरव जी ! बधाई । सचमुच बड़ी अच्छी अभिव्यक्ति दी है आपने माँ की भावना को । आपकी कविताएँ और कहानियाँ- दोनों ही विधाएँ गज़ब की हैं ।
और राघव जी की कविता भी, और टिप्पणी देने का अन्दाज़ भी सदा की तरह यहाँ भी प्रशंसनीय है ।

गौरव जी, कहना तो पुनरुक्ति ही होगी क्योंकि और लोग कह चुके हैं कि ऐसी अभिव्यक्ति माँ पर पहले नहीं पढ़ी, मेरे साथ भी ऐसा है । इससे बढ़कर कुछ है तो अपना निजी अनुभव ही पर कोई कविता नहीं याद आती । माँ के कितने रूपकों से आपने व्यक्त किया है, ऐसा भगवान् जिसके पास जाने के लिए पवित्र होने की जरूरत नहीं, ऐसा राष्ट्रगान जिसके लिए सावधान मुद्रा में खड़े होने की जरूरत नहीं, वह जो प्रतिदिन के रूटीन से ऊबती नहीं, थके हुए तथा हिम्मत हारे का सहारा .... तथा और भी .... ।

इन सभी से आपने तुलना की तो किसी को कोई ऐतराज नहीं हुआ (मुझे भी ऐतराज नहीं है, ऐतराज की बात भी नहीं है) पर प्रेमिका के प्रेम से तुलना करने पर जाने क्यों ऐतराज की बात हो जाती है ? जबकि उसमें भी ऐतराज की कोई बात मुझे नहीं लगती । "तुम गन्दे हो, लौट जाओ" ये किसी द्वेष में कही हुई पंक्तियाँ नहीं हैं, नाराज़गी, नखरे, मजाक, चिढ़ाना आदि तो उस प्यार का अंग हैं (जिससे तुलना पर किसी किसी को ऐतराज होता है) ।
वैलेण्टाइन डे पर उचित अवसर देखते हुए आपने उस नाराजगी लीला को भी स्थान ठीक ही दिया । इस तुलना से (उस) प्यार का न्यून होना नहीं सिद्ध होता । क्योंकि यह तुलना दोनों प्यारों (वैसे प्यार ऐसे अलग अलग नहीं होने कि उसका बहुवचन बन सके) का भेद दिखता है, ऊँच नीच नहीं । प्रेमिका के साथ मान-मनौवत, नखरे आदि चलते हैं पर माँ इस तरह की बातें नहीं करती, न गम्भीरता से और न ही मजाक में (कि भागो यहाँ से) । प्रेमी-प्रेमिका के साथ यह चलता है और वहाँ वह दोष भी नहीं है । अतः यह कविता किसी के वैलेण्टाइन के स्वाद को कड़वा करने वाली नहीं है । और न ही यह किसी को प्रेमिका या पत्नी के प्रेम पर शक करने को प्रेरित करती है ।

वैसे यह जरूरी नहीं कि कविता को पाठक उसी रूप में ले जिस रूप में कवि के भाव हैं । पाठक (सहृदय) भी अर्थ सृजन करता है । उसकी इस सृजनशीलता को भावयित्री प्रतिभा कहा गया है । और कवि की प्रतिभा को कारयित्री प्रतिभा । दोनों में समान यही है कि दोनों कुछ नया सृजित करते हैं, कवि नए काव्य को और सहृदय (पाठक) नए अर्थ को । इसीलिए प्रतिभा का लक्षण भी है प्रतिभा अपूर्ववस्तुनिर्माणक्षमा प्रज्ञा (- अभिनवगुप्त) । इसके पहले इनके गुरु श्री भट्टतौत ने प्रतिभा का लक्षण दिया था प्रज्ञा नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभा मता । इसलिए कोई यदि इस कविता का कुछ और भी अर्थ लेता है तो यह कोई गलत नहीं है ।

Alpana Verma का कहना है कि -

वजया तुम ने कहा --- ''अल्पना tum ek homly woman jaise react kar rahi ho ......मैंने जो कुछ कहा वह अपने अनुभव से कहा--सिर्फ़ ७ महीने से ही किन्ही कारणों से घर पर हूँ अन्यथा १७ सालों से घर बाहर दोनों की जिम्मेदारी सभाल रही थी और दो महीने बाद फ़िर वोही chakkar शुरू हो जाएगा isliye अब मैं नहीं मानती की मेरी सोच सीमित है.
२-विजय कहती हैं--
''alpana , first of all tumko mai batana chahti hu marne kay liye himmat chahiye hoti hai woh bhi bahut sari , -
और कहती हैं--......think intellectually ''
तो विजिया बता दूँ कि मैंने इतने साल १७ से ३० साल की युवतियों के विश्विद्यालय में ही उन के बीच काम किया है to unki manskta ka padh sakti hun-और रही बात सुसाईड की तो maine कई suicidal केसेस को manage किया है.
और तीन महीने पुरूष मनोरोगियों के बीच काम bhiकिया है.
intellectually तर्क सुनो---
सुसाईड करना कोई हिम्मत का काम नहीं है-यह एक मनोरोग 'डिप्रेशन' के कारन उठने वाली इच्छा है- ह्यूमन मनोविज्ञान पढ़ा है मैंने-इसलिए तुम्हारी बात कि 'आत्महत्या हिम्मत का काम है' सिरे से नकार देती हूँ-क्यूंकि तुम्हारा himmatwala तर्क किसी को भ्रमित कर सकता है.jo khatarnaak hai.
यह कायरता है इसीलिए ऐसे केसेस को कोउन्सेल्लिंग दी जाती है-दवाईयों से इलाज होता है--जब ऐसे केस रिपोर्ट होते हैं तो सीधा पुलिस केस बनते हैं--यह तो मालूम होगा???इस स्टेप को कानून जुर्म बताने वाले बुद्धिजीवी भी तुम्हारे हिसाब से ग़लत हुए--?
मैं कोई बहस नहीं चाहती बस यही कहूँगी कि वह प्रेम प्रेम नहीं जो सुसाईड करने पर मजबूर करे--प्रेम में समर्पण होता है लेकिन ऐसा नहीं कि जान ले या जान देदे-
3-Now i just dont knw y u commented me .......maine tou poet ko bola tha.....coz i wanted change his way of thinking........
यहाँ तुमने कहा कि मैंने क्यों कमेंट किया-तो यह पब्लिक मंच है-जहाँ हम किसी भी प्रितिक्रिया पर अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं-इसलिए मैंने तुम्हारी इस बात पर अपनी असहमति दी--अगर तुम्हे सिर्फ़ पोएट को कहना था तो ऐ-मेल या मेसेज कर के कहतीं-पब्लिक व्यू होगा तो बात पर बहस हो सकती है-
-रही बात गोरव की सोच बदलने कि तो विजया--उस बच्चे की सोच इतनी विस्तृत है कि तुम उस का एक छोर पकड़ कर दिखा दो तो बड़ी बात होगी--उस का लिखा पढो -हर वह जो उस ने लिखा है-आखिरी एक कहनीउसने लिखी थी-जिस को पढ़ कर यकीनन तुम मेरी बात पर सहमत होगी aur sochogi jarur कि किस की सोच बदलने की बात कर रही thi vijaya-

आखिर मैं फ़िर अपनी बात दोहराना चाहूंगी की माँ के प्यार की तुलना किसी प्यार से न हो सकती है न कोई कर पायेगा-
think again Vijya--if you can not -then just leave this-when you will grow up,you will understand what i a saying.
didi kaha hai to gudiya rani-khush raho--all the best-no more comments wil be on this topic from my side anymore.
Thanks.

Dr Anjali solanki का कहना है कि -

ur poem forced me to comment....halanki mai pehle sun chuki thee magar dubara padhkar aur achchha laga kyunki is kavita mein meri bhi man hai.
har rishta alag hota hai aur apni jagah khas bhee...par kuchh atulaniya hote hain.
maa bhee aisi hai
maa hamaree har galti maaf kar saktee hai chahe vo kitni bhi badi ho, kisi aur mein yeh himmat kahn?

vijaya का कहना है कि -
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गौरव सोलंकी का कहना है कि -

उस पंक्ति का उद्देश्य प्रेमिका के प्यार को कमतर बताना नहीं था।
माँ का प्यार ही ऐसा है जो गुण अवगुण, रुचियों की समानताएं या कुछ भी देखकर नहीं किया जाता। वह प्रेम की आदर्श स्थिति है, जिसमें संतान की शून्यता से प्यार होता है...और किसी भी चीज से नहीं।
और मेरे ख़याल से हम आपसी बहस न करके सिर्फ़ विषय पर ही चर्चा करें तो बेहतर होगा।

vijaya का कहना है कि -
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seema gupta का कहना है कि -

"Vijaya, it is really appreciable that in the end u felt sorry, i dont know whether u realised it or u said to avoid all this conversations.

But wanna say that we all are human beings and we should not hurt at all any bodys feelings and emotions by any means. It does not matter on which special day or ocassions different poems are being posted, what matters is that the feeling emotion and the message hidden under that poem and thoughts the poet wanna share with all of us. more over the subject was about mother and always mother is the best and only best and she can not be compared with any kind of relation.
so understand the feelings n message of the poem. more over u said sorry in the end, it is all over and once again i appreciate you are realising it and writing sorry"

Regards

vijaya का कहना है कि -
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Avanish Gautam का कहना है कि -

मैंने सारी टिप्पणियाँ तो नहीं पढीं हाँ मैं इस बात से एत्तेफाक़ रखता हूँ कि माँ के बरक़्स न तो प्रेमिका को खडा किया जा सकता है न प्रेमिका के बरक़्स माँ को . दोनों की अपना अलग वज़ूद और अहमियत है और किसी को कमतर नहीं आँका जाना चाहिये. रही बात कविता की तो यह अच्छी कविता है बस एक कमी मुझे महसूस हुई वह थी "नर्मी" की, मुझे लगता है कविता अपने विषय के हिसाब से और ज्यादा मुलायम शिल्प और शब्दों की माँग करती है.

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

मेरे मत से माँ सर्वोत्तम होती है हर सम्बन्ध मे |
प्रेमिका उससे आगे नही हो सकती |

अवनीश तिवारी

तपन शर्मा का कहना है कि -

मैं बचपन से एक भजन सुन रहा हूँ अपने घर परिवार में जिसकी एक पंक्ति है-
पूत कपूत सुने हैं पर न माता सुनी कुमाता।
माँ का प्यार वो है जो हमें हमारा वो व्यक्तित्व देता है जिससे प्रेमिका को प्रेम होता है। कहते हैं सब माँ पर निर्भर होता है कि बड़े होकर बच्चा कैसा बनता है। सच ही कहते हैं। प्रेमिका का प्रेम फिर भी किसी दिन मुँह मोड़ सकता है, पर वो माँ जिसने बचपन से जवानी तक बड़े होते हुए हमें देखा हो, वो हमेशा वैसा ही प्रेम करेगी। न कम न ज्यादा।चाहें परिस्थितियाँ कैसी भी रहीं हों। टेरेसा के नाम के आगे "मदर" लगा दिया गया। क्यों? उनसे ऐसा प्यार मिला जगत को, जैसा एक माँ ही दे सकती है। माँ , माँ है। इस शब्द में ही अजब की शक्ति है। कहना बस इतना है कि गौरव ने जो पंक्ति लिखी मुझे उसमें कोई बुरा नहीं लगा।
धन्यवाद

RAVI KANT का कहना है कि -

टिप्पणी करने को तो कुछ बचा नही...काफ़ी सारा कुछ पहले ही कहा जा चुका है... रचना सुन्दर है इससे इनकार नही किया जा सकता।

दिवाकर मिश्र का कहना है कि -

गौरव जी, आपकी कविता पर चर्चा चल पड़ी थी वह सार्थक रूप ले सकती थी । परन्तु उसकी दिशा भटक जाने के कारण ऐसा नहीं हो पाया । कुछ कमी मुझे यह दिखी जो सार्थक और इंटेलेक्चुअल चर्चा के लिए आवश्यक होती है । वह है कि दूसरों की बात को भी शान्ति से सुना जाए और अपनी बात भी दृढता से पर बिना आवेश या ऐसी भावना के कही जाए । किसी की बात को शान्ति से सुनने का मतलब यह कतई नहीं होता कि उसकी बात से सहमत हुआ जाए । सार्थक चर्चा के लिए यह भी आवश्यक नहीं होता कि किसी अन्तिम निष्कर्ष पर अवश्य पहुँचें, या तो दूसरे की बात मान लें या उसे मनवा लें । वैसे जो विषय (मेरी दृष्टि में) कविता में नहीं था पर उठ आया था, उस पर सार्थक चर्चा की बड़ी सम्भावना थी ।

मुझे आशा है कि पंकज जी आपत्ति नहीं करेंगे यदि मैं उनकी टिप्पणी पर कहूँ । पंकज जी आपकी इस बात से मैं भी सहमत हूँ कि अलग अलग रिश्तों के प्यार की तुलना नहीं की जानी चाहिए । यह भी सही है कि सबका अपना अपना रोल होता है । अगर कोई भी तुलना में कम ज्यादा होता भी है तो इससे वह महत्त्वहीन नहीं हो जाता । (क्योंकि परफेक्शन दुर्लभ है) । पर आप जब कहते हैं कि इसमें महानता कहाँ से आ जाती है, तो वह आती है अपने रोल को किस तरह निभाया जाता है उससे, और उसके अहसास से । एक उदाहरण लें, जब कोई किसी को कोई गिफ़्ट देता है (मौके के अनुसार वैलेंटाइन डे का गुलाब ही मान लें), तो इसे सामान्य रूप में लिया जा सकता है कि इस मौके पर तो अक्सर लोग इसे देते ही हैं । पर जब इसकी भावना का अहसास होता है, तो पाने तथा देने वाले दोनों ही भाव-विह्वल हो जाते हैं । कुछ कुछ इसी तरह से रिश्तों में महानता भी आती है ।

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

आप सही कह रहे हैं दिवाकर जी,
कविता मैंने उस मंतव्य से नहीं लिखी थी, जिस पर चर्चा शुरु हो गई।
माँ बीच में ही कहीं खो गई, प्रेमिका के कारण...

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

मुझे लगता है कि प्रेमिका के प्यार की समीक्षा किये बिना कविता निकल जाती तो और सुंदर हो जाती। कविता बहुत पसंद आई, लेकिन अवनीश जी की बातों पर भी ध्यान दें।

vijaya का कहना है कि -

Gaurav i deleted all mah comments b4 coz no one ws understanding what i ws sayng . first mai yeh bata du, sabko pata hai Mom is sarvotam , koi shak nahi hai iss mey.......all moms r gr8 ...nd tumari poem maa se related bahottttttttt touchy hai ........


my q ws jub tumne poem likhni start ki what made u compare MOM nd PREMIKA.

MOM SE TOU BLOOD RELATION HAI ND PREMIKA SE PYAR KA relation hai ........den how u can compare both of dem ??????/

theek hai?
secnd agar tum chahte thai compare karna tou MOM KAY pyar ko sis kay pyar se compare karte ( coz dono ka blood relation hai as bro nd son )....nd dono women bhi hai .............


tumne bola ki maa kaha chali gayi poem se ,,..ask ur self datq. ......

poet ki maansikata always open , deep thinking nd also koi acha sandesh deni wali hone chahiye ........

am agree wid dat tumne poem bahot achi likhi hai except dat premika thng ......acha hota tum nahi likhte woh sentence coz oosee tumari mansikta jhalk gayi ........jisko maine easily catch kia .........hehheheheheheh .......i suggest u.... tum delet kr dou oos sentence ko poem se .......warna mere jaisa koi aur intelligent tumko criticize karega jum kr .....hehhehehe.............i knw tumko gussa aa raha hoga .but i always speak wht i feel ....shyd next time tum mere ko apni koi poem send bhi na karo comments kay liye , ..hehehehe......nyways .........

wish u all da best, ......

poemsnpuja का कहना है कि -

आभार प्रदर्शित करने के लिए शब्द नहीं है मेरे पास, मेरी इस मानसिक स्थिति में बहुत बड़ा संबल मिला आपकी कविता से. माँ के चले जाने पर सच में जैसे एक लड़ाई लड़नी पड़ती है अपनेआप से, यकीं ही नहीं होता की अचानक से वो चली गई है. आपकी कविता बहुत ही अच्छी लगी.बहुत बहुत धन्यवाद इसे बाँटने के लिए.

shanno का कहना है कि -

सोलंकी जी,
माँ के कितने ही रूपों के कितनी सहजता से दर्शन करा दिए. धन्यबाद.

रज़िया "राज़" का कहना है कि -

आज अचानक ईस पोस्ट पर आकर :माँ" फ़िर याद आ गइ।

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