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....थी वो हकीकत या खाब था वो ....


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थी वो हकीक़त या खाब था वो, जो शब खुदा ने लिखा जबीं* पे
मिले जो कितने हंसीं हो रहबर, ये दिल के आए फकत तुम्हीं पे


है राज़ उसकी मुहब्बतों में, है प्यार हमसे, गिला हमीं से
सिला ज़माने की नफरतों का फिराक़ बनकर गिरा हमीं पे


ना हो यकीं या हो रश्क* सबको, है पाया ऐसा नसीबा हमने
के हमने देखा है हुस्न उसका, पिघल के बादल गिरे ज़मीं पे


जुनूं-ओ-हालात इश्क़ के न हैं बदले बरसों हुए बिछड़ के
हो जश्ने-उल्फत या दर्दे-ग़म हो, कहीं पे चुनरी है हम कहीं पे


सिखा अदब, बारिशों के बादल, बरसने का ग़म के बादलों को
ये क्या के यादों के सुर्ख बादल उठे जहाँ से गिरे वहीं पे


१२१२.२ X 4

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जबीं= माथा, रश्क=जलन
_RC_
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...ग़ज़ल ....


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चल पड़े आदतन, रुक गए आदतन
आज फिर हम वहीं आ खड़े आदतन

खामखा प्यार का भ्रम है उनको हुआ
बात पर मुस्करा थे दिये आदतन

तोड़ वादा सितारों ने फिर की जफा
सुबह आई तो सब मिट गए आदतन

पूछते आज क्यों याद उनको किया
आदतन तो न था, कह दिए 'आदतन'!

बाद बरसों मिले हम अचानक वहीं
आए वो दफ-अतन, हम गए आदतन !

आँख पत्थर-सी थी, मैं भी चट्टान सी
टुकड़े जुम्बिश पे दिल के हुए आदतन

खुशनसीबी भी थी तेज़ भी था ज़हन
मुफलिसी का सबब मुफलिसे-आदतन

आदतन आदतन आदतन आदतन
प्यार क्यों यार हम थे किये आदतन
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(बहर सीख रही हूँ यह मेरी दूसरी ग़ज़ल

है जो बहर में है - फाएलुन X ४ )

जाते-जाते एक fusion शे'र :-)

लड़-झगड़ कर हुए थे जुदा कल मगर
ब्लॉग खोला तेरा ''आई*'' ने आदतन
*आई = IE, Internet Explorer
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..RC..

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दरमियां .................


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अब कोई बात न होगी
हमारे बीच ...

वो अपने गुनाहों से पशेमां
होठों से लफ्ज़ों को भींच
मैं उसकी खताओं से परेशां
उसकी नासमझी पर खीज
अब कोई बात न होगी
हमारे बीच .....

इधर मेरी नाराजगियां
रंजिश से उपजती नफरत
उधर शर्म की खामोशी और
न माफ़ी की कोई गुंजाइश
अब कोई बात न होगी
हमारे बीच ...

वो मेरे रहम के इंतज़ार में
मैं उसी अर्ज़ के इंतज़ार में
शायद अब यूँ ही बीते सदियाँ
इक पहल के इंतज़ार में
ज़िंदगी के धागे अब भागेंगे आगे
कुछ गिरहों को छोड़ पीछ
अब कोई बात न होगी
हमारे बीच ....

फिर एहसास रिश्ते की संजीदगी का
और हर बाक़ी शै के सिफर* होने का
मेरे सामने रक्खा मेरा फोन
और एक पल के फैसले का बीज
और अब
.... कोई बात न होगी
हमारे बीच .....

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RC
सिफर= zero
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...... अंत


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अंत .....
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कुछ ऐसा अजीब रिश्ता था वह
जैसे
मेरी दो हथेलियों को मिलाकर बने चाँद का
उसमें रखे दो घूँट चंचल पानी से ....

जिसे गर मैं पी भी लेता
तो प्यास न बुझती ...
या
जिसमें गर मैं अपना प्रतिबिंब ढूंढता
तो जब तक वो नज़र आता
मेरी ही उँगलियों के बीच की दरारों से होकर
मेरा अस्तित्व
बूँद-बूँद गिरता नज़र आता ...!


उस पानी को
न गिरने से रोक सकता था
न उन हथेलियाँ अलग कर सकता था
जो तेरे लिये मैंने जोड़ लीं थीं

गर ऐसे निर्मल प्रेम का अंत
क़तरा......क़तरा ..... गिर कर ही होना है
तो वो उसी निर्गुण, निराकार के लिये गिरे
जिसने इस रिश्ते को बनाया था

अपने ही डूबते सूरज की तरफ़
ये हथेलियों का चाँद उठाकर
अब उंगलियाँ खोल दी है मैंने
और उस रिश्ते को ...
बूँद-बूँद कविताओं में
गिरने दे रहा हूँ ...

.... एक अर्घ्य देकर.


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RC
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...... तय किए ज़िंदगी ने कई फासले ....


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वक्त के पाँव तो कुछ क़दम थे चले
तय किए ज़िंदगी ने कई फासले

चलते-चलते फकत कुछ महीने हुए
पार हैं कर चुके उम्र के मरहले*

कहनी है बात पिछले जनम की तुझे
इस खुदी की बहस में न दिन फ़िर ढले

बाँह ने, बात ने, फ़िर है बदली जगह
बाँह यादों में है, बात चुभती गले

ये नशा- ए-सुखन* तेरी तल्खी से है
जाम औरों के मीठे हो कितने भले

दिल का रिश्ता था दिल सा धड़कता चला
दिल झुके, दिल उठे, दिल रुके, दिल चले

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फाइलुन X 4
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*मरहले= पड़ाव
*नशा-ए-सुखन= काव्य का नशा
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RC
March 02, 09
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अब दर्द नहीं होता ..


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और एक दिन वो मेरी गाड़ी के नीचे आ गया!
एक हादसा मेरे रोज़मर्रा के रास्ते पर हो गया था !

उसका ज़ख्म गहरा था
मुझे दिख रहा था उसका खून बह रहा है
मगर मैं वहां से चल दिया क्योंकि
.... ग़लती उसकी थी

उस दिन के बाद
मैं हर रोज़ उसे देखता
वहीँ सड़क के किनारे वो बैठा रहता
अपने खुले घाव लेकर

उसे दर्द होता था .................
और शायद ....
....... मुझे भी

फिर उसके ज़ख्म
नासूर होने लगे
पकने लगे ........ रिसने लगे

उसे चुभने लगे
और शायद .......
मुझे भी

उसका दर्द मुझसे देखा न गया
कुछ करना ज़रूरी था ....
हाँ .... कुछ करना ज़रूरी था

इसलिए
... मैंने अपना रास्ता बदल दिया !

अब उसके ज़ख्मों में दर्द नहीं है ..............
........
अब मुझे भी दर्द नहीं होता

...........
RC

............................................................

आज फिर वही बात है .....


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आज फिर वही बात है .....

आज फिर कुछ बातें याद आई हैं
बेटी के स्कूल का कुछ सामान ...
किसी की शादी का तोहफा खरीदना ....
आफिस की मीटिंग में कहनी एक ज़रूरी बात ....
और ....
ज़हन में काफ़ी देर से घूमता
मुकम्मल होने को तरसता
एक खूबसूरत मिस्रा .....

सोचती हूँ एक कागज़ पर लिख लूँ
के भूल न जाऊं बातें जो याद आयीं हैं

मगर फिर वही गुज़ीदा* मजबूरी, वही बात है
आज फिर वही हालात है
.
.
आज फिर आटे से सने हाथ हैं .............
.
.
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RC
Dec ०९, 2008

(*गुज़ीदा = ख़ुद चुनी हुई /chosen)
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नि:शब्द .....


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ज़िन्दगी लेने वाले बस इतनी खता है तेरी
माँ से न पूछा ज़िन्दगी देना क्या है

(दो साल का नन्हा Mocshe जिसने अपने माँ-बाप मुंबई अटैक में खो दिए)
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राहे-फितना* लम्हे कुछ बिता जाती है
ज़िन्दगी फ़िर राहे-आम आ जाती है

खौल के जिसने सुर्ख किया था लाल रंग का खूँ
आग वो बुजदिल पानी में समा जाती है

यूँ सियासत को देने तानों की कमी नहीं
बारी इंतेखाब* की फ़िर सच बता जाती है

तर्ज़* भी रिश्वत खाने का इस मुल्क में ऐसा है
यास* मौत की फ़र्ज़ को खिला जाती है

यूँ तो फ़िक्र न रिश्तों के निभाने की है
कारे-ज़माना* बचने सब निभा जाती है

बेकदर वो बेबस मौतें कुछ सिखा जाती है
औकात वो मेरी मुझको ही दिखा जाती है

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राहे-फितना = path of revolution
इंतेखाब = make a choice / election
तर्ज़ = fashion
यास = fear
कारे-ज़माना = making the society a better place to live

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फ़ौरन -फ़ौरन .......................


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जित और देखूं हर शै है हो गई "फ़ौरन"
सुना पलकें झपकेगी अब और भी फ़ौरन

ये नहीं ये बात मालूम ही थी मुझको
हैरत हुई जब उलफत भी माँगी फ़ौरन

कहाँ गए वो "इन्सां", वो नरम-दिल वाले
क्यों लोगों की आँख अब सूख जाती फ़ौरन

दुनिया यूँ तो मेरी है पर रही हरदम आगे
मिलाऊँ कदम जब तक मुड जाती फ़ौरन

कितने लबालब है दूकानो-बाज़ार यहाँ
क्यों नहीं फिर ये गरीबी हटती फ़ौरन

यूँ तो चीज़ बिकने बेवक्त भी दुकां खुल जाए
क्या नज़ीर*, वफ़ा-ओ-भीख नहीं मिलती फ़ौरन
(नज़ीर=तुलना/match)

अब तसवीरें और इश्तेहार ही बनी खबरें
ख़बर अखबार में भी नहीं मिलती फ़ौरन

शुक्र है बच्चों के मासूमियत नहीं बदली
उनकी गलती पे हंसो, उन्हें हंसी आती फ़ौरन !

(अब देखोगे जब किसी बच्चे को यूँ हँसते
तो इस शेर, इस शायरा की याद आएगी फ़ौरन :-)

रिझाने मुझे ज़माने, तेरी तकनीक बेकार
खिलौनों से तेरे तबीयत उकता गई फ़ौरन

तुझ जैसे तेरी खुशियाँ भी है, ज़माने, "फ़ौरन"
क्यों नही बनाता कुछ हो गम में कमी फ़ौरन

क्या है बदला ज़मानों से अब तलक आख़िर
दिन तो कटता है, शबे-गम नहीं कटती फ़ौरन

खुदा बस! अब इस 'माया' से मुझे ले चल
हो रहम इतना मिले ज़ीस्त नयी फ़ौरन
(ज़ीस्त=ज़िन्दगी)

~RC
जून 08
Profile link
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(पुरानी रचना है, जब काफिया और रदीफ़ से आगे ग़ज़ल का ज्ञान था |
ज़्यादा तबदीलियाँ करते हुए जैसी बनी थी, पोस्ट कर रही हूँ

दूकानो-बाज़ार = दूकान और बाज़ार, उर्दू में 'और' लिखने का एक खूबसूरत तरीका )

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शब्दहीन हूँ ..................


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शब्दहीन हूँ ख़ुद के लिए आज उस तरह
थी निरुत्तर इक दिन मैं सब को जिस तरह
किए उन्होंने प्रश्न तेरे जाने पे किस तरह
ख़ुद मैंने भी पूछे तुझसे उस तरह
......विश्वास मेरा मुझे कहता है इन जैसी नहीं हूँ मैं ||

जब जा रही थी जां तब तो कोई आया
जा रहा था प्यार तो अपनों ने भी रुलाया
शोक मनाने लेकिन चौथे हर कोई आया
यही रोये सारे के मैंने क्यों बचाया
......ये कहते मुझको 'अपनी', पर उनकी कहाँ हूँ मैं ||

अब लोग कहे जता उसे अब-भी लगाव है
इस दुनिया में घाव के बदले सब देते घाव है
तू भी जफा कर, खेल के जैसा खेला वो दांव है
मैं सोचूँ के ये प्यार कहाँ, ये तो अहंभाव* है
......मेरा 'अहम्'* ये सुनकर कहने लगा के 'तुझे में नहीं हूँ मैं' ||

क्यों सब कहते मैं हार गई, उसकी ये जीत है
जो भागे है वो आगे है, दुनिया की रीत है
कैसे समझाऊँ ये दौड़ नहीं ये मेरी प्रीत है
जो खुश है वो मेरी हार में, मेरी भी जीत है
......फिर भी जिद है तो लो सुन लो के, हार गई हूँ मैं ||

प्रीत हुई इक बार मन में अब ये कैसा क्लेश
प्रीत हो जब कोई लगे भला वरना रखते हैं द्वेष ?
गणित ये जग समझ पायी, जाने कैसा ये पेंच
मैं तो बदलूँ , बदले दुनिया, चाहे बदले ईश
......प्रीत कहे इस जग में क्या अब कहीं नहीं हूँ मैं ? ||


~RC
Link to Profile
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अहंभाव=ego
अहम्=conscience/zameer
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मौसम बदल रहा है .............


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आने से तेरे दिल का मौसम बदल रहा है
हाँ अब ये लग रहा है के वक्त चल रहा है

ना पूछ राज़ जाना फींकी-सी इस हँसी का
काँटा कोई पुराना इस दिल में खल रहा है

शमएं कई जलीं दिल के मोम कितने पिघले
देख मोम है पर दिल मेरा जल रहा है

जैसे हवाओं से लौ शमओं की थरथराये
यादों से उसकी ये दिल जल-जल मचल रहा है

इब्तेदा--कुर्बत, इन्तहा* थी उसकी मर्ज़ी
पूरब से निकला सूरज, पूरब में ढल रहा है

पर तू है जब से आया, फिर धूप खिल रही है
दिल-संग* ये मेरा भी कुछ-कुछ पिघल रहा है

दिल है के जैसे कैफी* देखे किसी हंसी को
अब-अब ये लडखडाया, अब-अब संभल रहा है

जो हाथ तूने थामा, बदली लकीर उसकी
बेनासीब वो पुराना ख़ुद हाथ मल रहा है

तेरे साथ आज हँसते इक आया बूँद आंसू
रस्सी तो जल चुकी है थोड़ा-सा बल रहा है

दिल मेरा गर यूँ रोये, संभाल यार लेना
तू 'आज' है मेरा पर, वो मेरा 'कल' रहा है

लकीर लम्बी खेंचो हो दूजी छोटी करनी
यूँ भी कई लकीरे-किस्मत का हल रहा है

तेरी बज़्म पता शब् दिन का चल रहा है
हाँ अब ये लग रहा है के वक्त चल रहा है

हुस्ने-गज़ब कंवल सा सहरा* में खिल रहा है
आने से तेरे दिल का मौसम बदल रहा है


~RC

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संग = पत्थर, इब्तेदा=शुरुआत,
कैफी = नशे में
कुर्बत=नजदीकी, इन्तेहा = end
शमआ = शमा, दीपक
सेहरा=मरुस्थल

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सेल्समैन


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तेरे सितम कम थे जो
अब 'ये' भी मुझे सताता है
जाने कहाँ से रोज़ तेरी
यादों का सेल्समैन आता है

हर याद की कीमत दो आंसू
ये तो अत्याचार है
तेरी यादों को कैसे मना करूं
जब तुझसे इतना प्यार है

तेरी हसीन यादों का ख़याल
मेरे दिल को खिला गया
बेहोशी में दस्तखत लेकर
"डील !" कहकर चला गया

"तू नहीं तेरी याद सही"
सेल्समन रोज़ लाने लगा
तेरी याद देख बूँद नहीं
दरिया बहकर आने लगा

इतने आंसू देख मैंने कहा
"एक्स्ट्रा एडवांस में ले लो"
बोला "क्रेडिट चलेगा डेबिट नहीं
मुझे तो बस दो ही दे दो"

रो-रोकर फिर एक दिन
दरिया मेरा ख़तम हुआ
यादें फिर भी आती रही
दिल उसका न नरम हुआ

मना करने पर रुका नही तो
मैं अपनी बात पर अडी रही
"मैडम ये है लाइफ टाइम डील"
आपने कंडिशन्स पढ़ी नहीं?"

यादों के भंवर में ऐसी फँसी
उन्हीसे दहशत उन्हीसे प्यार
सेल्समन हालत देख मुस्काया
"all is 'fear' in love & war!" :-)

तेरे बाद तेरी यादें तो हैं
सोचकर सौदा उठाया था
तूने नहीं, सेल्समैन ने सही
अपना वादा निभाया था

हर याद पर, फिर आंसू नहीं
हाँ जान हर दफा निकली
तेरी तरह यादें भी तेरी
कमबखत बेवफा निकली

सेल्समन अब भी आता हैं
सौदा उधारी पे चलता है
बिना आंसू की घुटन से
मेरा दम निकलता है

सेल्समन से फ़िर मिन्नत की
"बस अब सहन नहीं होता"
बोला "मैडम, ये उसकी यादें है
जहाँ रहम नहीं होता"


~ RC
July 08
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..... फिर ... शायद...


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इश्क
की बेडी का बल कलाई पर पड़ गया शायद
या फिर ख्वाब में वो मेरी कलाई पकड़ गया शायद

गली के इक मकान में फिर दो बुजुर्ग रहने आए
लगता है फिर कोई लाडला बिगड़ गया शायद

फिर कोई बूढा ऐनक लगा ढूंढ रहा तिनके
फिर घोंसले से बच्चा नहीं, पंछी उड़ गया शायद

सुना था ये 'फ़ोन' लोगों के फासले कम कर देगा
मगर हाथ से फ़ोन का फासला बढ़ गया शायद

कहते हैं वो आजकल फिर फूल खरीदने लगा है
मेरे बाद उसका घर किराये पे चढ़ गया शायद

फिर दिल से उठी कराह, आंसू बना, ग़ज़ल बनी
फिर दिल में तेरी याद का बादल घुमड़ गया शायद

फिर दिल से उठी कराह, आंसू बना, ग़ज़ल भी बनी
फिर इक बार आंसू उँगलियों से झड़ गया शायद

फिर दिल से उठी कराह, फिर तेरी दुआ निकली
भूली सितम, फिर तुझपे प्यार उमड़ गया शायद

है जिद पे अडा, याद जाए तो ग़ज़ल हो ख़तम
दिले-नादां मेरा फिर ख़ुद ही से लड़ गया शायद

~ RC
July 08
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दिल्लगी उश्शाक से ...


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(1)
दिल्लगी उश्शाक से, लुत्फे-वसल माहिर का हो
शाइरी दादे-अवाम पर मशवरा शाइर का हो
(उश्शाक=आशिक , लुत्फे-वसल= वस्ल का लुत्फ़
दादे-अवाम= जनता की वाह-वाह)


()
साया--यादों से निकली सामने दिलबर मिला
दामे-गिरफ्तारी--ताज़ा हाल मुहाजिर का हो
(साया--यादों=यादों के शरण से,
दामे-गिरफ्तारी--ताज़ा = नए जाल में गिरफ्तारी
मुहाजिर=refugee)

(३)
मकतब ही था सो हम मिले, वो बेवफा, फुरकत हुई
मर्ज़ी अगर अल्लाह की क्यों फैसला काफिर का हो
(मकतब=मुक़द्दर में लिखा था,
फुरकत
=जुदाई, काफिर= ungrateful, bewafaa)


(4)
यादे-जां ना ज़ख्मे-जां से मौत का आराम हो
ज़ख्म तीरे-दीद का हो बोसा--नादिर का हो
(यादे-जां = दिलबर की याद, ज़ख्मे-जां = जान का ज़ख्म
तीरे-दीद=आंखों का तीर, बोसा--नादिर = rare kiss)


(5)
क्या मज़ा सौ जीत का के जो मुकाबिल जैफ हो
हूँ शिकस्ते-मौत राज़ी वार अगर शातिर का हो
(मुकाबिल = सामने, जैफ = कमज़ोर
शिकस्ते-मौत = हार से हुई मौत)

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()
दिल्लगी करनी हो तो आशिक से मगर वस्ल का लुत्फ़ हो तो माहिर से हो |
वैसे ही, शाइरी पर वाह-वाह अवाम की हो मगर मशवरा लेना हो तो शाइर का हो

() यादों के शरण से क्या निकले के सामने दिलबर खड़ा था | मुहाजिर जो यादों में शरण लिए हुए था उसका हालये हुआ के नए जाल में फंस गया |

(3) वो खुदा की रहमत/इच्छा थी सो उसने हमें मिलाया, मगर दिलबर बेवफा निकला सो जुदा हो गए|
जब अल्लाह की मर्ज़ी थी के हम मिलें, तो फैसला लेने का हक उस बेवफा/काफिर क्यों है ?

(4) मेरी मौत आम लोगों की तरह जान/दिलबर की याद में, या जान के ज़ख्म से हो | अगर मौत होनी हो तो वो ज़ख्म उसकी आंखों के तीर का हो और ऐसे बोसे का हो जो भुलाया नहीं जा सकता |

(5) उस सौ बार जीत का क्या मज़ा जो बाज़ी किसी कमज़ोर के साथ लड़ी हो | ऐसी जीत से ज्यादा मुझे उस हार की मौत मंज़ूर है जो किसी शातिर के वार से हुई हो


~RC
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