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थी वो हकीक़त या खाब था वो, जो शब खुदा ने लिखा जबीं* पे
मिले जो कितने हंसीं हो रहबर, ये दिल के आए फकत तुम्हीं पे
है राज़ उसकी मुहब्बतों में, है प्यार हमसे, गिला हमीं से
सिला ज़माने की नफरतों का फिराक़ बनकर गिरा हमीं पे
ना हो यकीं या हो रश्क* सबको, है पाया ऐसा नसीबा हमने
के हमने देखा है हुस्न उसका, पिघल के बादल गिरे ज़मीं पे
जुनूं-ओ-हालात इश्क़ के न हैं बदले बरसों हुए बिछड़ के
हो जश्ने-उल्फत या दर्दे-ग़म हो, कहीं पे चुनरी है हम कहीं पे
सिखा अदब, बारिशों के बादल, बरसने का ग़म के बादलों को
ये क्या के यादों के सुर्ख बादल उठे जहाँ से गिरे वहीं पे
१२१२.२ X 4
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जबीं= माथा, रश्क=जलन
_RC_
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