चलती साँसों को रोकने का जुर्म
नहीं कर सकती थी
मकसदों से मुंह नहीं मोड़ सकती थी
तो हर घाव को भरने के लिए
खैरात में मिली ज़िन्दगी पर
खुद्दारी का पैबंद लगाया है
खुद्दारी की इतनी चिप्पियाँ हैं
कि लोग हुनर की दाद देने लगे हैं
ये तो धागों की कमी थी
तो जब जहाँ जैसा मिला
उससे रफू कर दिया
काफी नाम है
इस खैराती ज़िन्दगी के पैबन्दों की
इस कारीगरी के आगे
आत्मा में लगे घावों की क्या बिसात
और क्यूँ?
सत्य तो बस इतना ही होता है
कि तुमने क्या खाया
क्या पहना
कहाँ से ... इस का उत्तर
लोगों की जुबान पर अपना अपना ही होता है
सच, झूठ की छानबीन होती नहीं
फैसला महत्वपूर्ण....
पैबंद जितना गहरा
फैसला उतना ही गहरा
और रंग चोखा!
कवयित्री- रश्मि प्रभा




यूनिकवि प्रतियोगिता के चौथे स्थान की कविता की रचयिता रश्मि प्रभा हिन्द-युग्म पर कवि के तौर पर पहली बार दस्तक दे रही हैं। यद्यपि ये हिन्द-युग्म को बहुत पहले से पढ़ती रही हैं। १३ फरवरी को सीतामढी (बिहार) में जन्मी रश्मि को कलम और भावनाओं के साथ रहना अच्छा लगता है। ये मानती हैं कि यह इनका सौभाग्य है कि ये महाकवि पन्त की मानस पुत्री सरस्वती प्रसाद की बेटी हैं और इनका नामकरण भी सुमित्रा नंदन पन्त ने किया था। तथा इनके नाम के साथ अपनी स्व रचित पंक्तियाँ पंत ने इनके नाम की..."सुन्दर जीवन का क्रम रे, सुन्दर-सुन्दर जग-जीवन"। शब्दों की पांडुलिपि इन्हें विरासत में मिली है। इनका मानना है कि अगर ये शब्दों की धनी न होतीं तो इनका मन, इनके विचार इनके अन्दर दम तोड़ देते...इनका मन जहाँ तक जाता है, इनके शब्द उसकी अभिव्यक्ति बन जाते हैं... शैक्षणिक तौर पर इतिहास ऑनर्स में स्नातक रश्मि प्रभा की रचनाएँ "कादम्बिनी", "वांग्मय" और कुछ महत्त्वपूर्ण अखबारों में प्रकाशित हो चुकी हैं।

