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खैराती में खुद्दारी


चलती साँसों को रोकने का जुर्म
नहीं कर सकती थी
मकसदों से मुंह नहीं मोड़ सकती थी
तो हर घाव को भरने के लिए
खैरात में मिली ज़िन्दगी पर
खुद्दारी का पैबंद लगाया है

खुद्दारी की इतनी चिप्पियाँ हैं
कि लोग हुनर की दाद देने लगे हैं
ये तो धागों की कमी थी
तो जब जहाँ जैसा मिला
उससे रफू कर दिया
काफी नाम है
इस खैराती ज़िन्दगी के पैबन्दों की
इस कारीगरी के आगे
आत्मा में लगे घावों की क्या बिसात
और क्यूँ?

सत्य तो बस इतना ही होता है
कि तुमने क्या खाया
क्या पहना
कहाँ से ... इस का उत्तर
लोगों की जुबान पर अपना अपना ही होता है
सच, झूठ की छानबीन होती नहीं
फैसला महत्वपूर्ण....

पैबंद जितना गहरा
फैसला उतना ही गहरा
और रंग चोखा!

कवयित्री- रश्मि प्रभा

स्त्री और माँ.......


प्रश्नों के कटघरे में,
हर उंगलियाँ स्त्री पर थीं....
महारथियों के आगे
दुर्योधन,
और दुर्योधन के साथ कर्ण और पांडव भी !
मन खून से सराबोर,
दिमाग में शून्यता.......
एक स्त्री,
जब कटघरे में होती है
तो प्रश्न और तथाकथित न्याय
उसीके संग होते हैं !
पर एक स्त्री,
जब माँ होती है,
साथ में होती है उसकी निष्ठा ,
तब बच्चे सुदर्शन चक्र बन जाते हैं,
उनकी जीत,
माँ के हर अध्याय पर,
पवित्र शंखनाद करते हैं,
उठी हुई उंगलियाँ,
प्रार्थना में करबद्ध हो जाते हैं,
सुरक्षा कवच बन ये बच्चे
माँ की पूरी ज़िन्दगी बदल देते हैं.........

सन्नाटे को तोड़ो.....


सन्नाटा है...................
कमरे में ही नहीं,
दिल-दिमाग में भी ...
हर चेहरा ताज - सा दिखता है,
रुतबे में भी,
आतंक में भी !
किसे दोष दूँ?
तत्कालीन व्यवस्था,
या फैशनपरस्ती को ,
या फिर घर की चारदीवारों से निकले क़दमों को !
...........
मुझे बेचारगी से मत देखो,
कुछ कहो,
कुछ भी-
सन्नाटे को तोड़ो !
शब्द नहीं,
तो रो ही लो-
पर,
इस सन्नाटे को तोड़ो !!!

अनोखी भाषा !


मृत्यु की दहलीज़ तक होती है माँ ,

जब नई ज़िन्दगी

जन्म लेने को आतुर होती है !

एक मासूम रुदन,

माँ s s s s s से स्वर में,

संजीवनी बन

कानों से दिल तक उतरती है ........

माँ के आंसुओं से मंत्रोच्चार होता है,

आशीष बन बरसता है,

खून की एक-एक बूंद ,

दूध बन जाती है,

आँचल में सुरक्षा की शक्ति

और मन में जीने की दृढ़ता होती है...........

एक मासूम ज़िन्दगी के साथ

माँ भी जन्म लेती है,

नई ज़िन्दगी,

नए रूप में,

दोनों साथ-साथ जीते हैं !

आहट,करवट,खामोशी,उद्विग्नता

माँ पहचान लेती है,

सारथी बन

जीवन के अर्थ देती है....

इस रिश्ते को कह सकते हो ' त्रिवेणी ',

बच्चे और माँ के मध्य

एहसासों की धारा

सरस्वती-सी बहती है...

गर्भनाल की भाषा

बड़ी अनोखी होती है !!!

--रश्मि प्रभा

अनुमान !


मेरे आस-पास के फ्लैट में
कौन रहता है-
मुझे नहीं पता,
उन्हें भी नहीं पता !
दरवाज़े बंद हुआ करते हैं,
दो कमरे
और बाल्कनी में
ज़िन्दगी और अनुमान रहते हैं !
हाँ ,.... अनुमान...
कि,
बगल में कौन रहता है,
क्या करता होगा!
लड़का,लड़की...
भाई-बहन हैं या पति-पत्नी !
(अब तो कोई पहचान शेष नहीं न )!
बात करने में
'इगो' बीच में टहलता है....
प्रश्न उठता है जाती,धर्म का,
भय की खामोशी
अलग करती जाती है......
"मुझे हिन्दी आती है"
इस बात की विशेषता नहीं रही,
इसे परिवर्तन कहते हैं?
या विध्वंस?
पर्यावरण,भाषा,संस्कार....
सब लुप्त होते जा रहे हैं!
'कारण' का नारा,
सब लगाते हैं,
पर ख़ुद को जिम्मेदार नहीं मानते !
पहल कौन करेगा-
सब सोचते हैं,
वह कौन है?
न वे जानते हैं,
न मैं जानती हूँ !
चल रहे हैं सब,
चलते जा रहे हैं........
साथ कौन है,
उसकी पहचान नहीं ,
उत्सुकता नहीं........
ज़िन्दगी ,
दो कमरे,
बाल्कनी,
और वातानुकूलित गाड़ी में बंद है,
सारे दरवाज़े बंद हैं........
चारों तरफ़,
बस अनुमान है, सिर्फ़ अनुमान !!!

स्वागत करो...


मन के उन कमरों को खोलो
जिन्हें बरसों से
तुमने बंद कर रखा है।
उन सपनों को निकालो वहाँ से
जो तुम्हारी साँसें बन सकते हैं
तुम्हारे वजूद को
एक सशक्त आकृति दे सकते हैं।
बरसों से बंद दरवाजों की आवाजें
बहुत होंगी.....
पर उससे घबड़ाना मत
सीलन तो ख़त्म होगी
और
नई साज-सज्जा मिलेगी.......
हो सके
तो कोई धुन बजाना.....
संगीत का जादू
बड़ा गहरा होता है
हर निर्णय को-
नई ऊर्जा
नया विश्वास देता है।
तो चलो
आज एक नई शुरूआत करो...
नई ज़िन्दगी
मन के मुखर सपनों का
स्वागत करो...............

-रश्मि प्रभा


कवयित्री रश्मि प्रभा आज से हिन्द-युग्म से स्थाई तौर पर जुड़ रही हैं। ये अपनी कविताएँ रविवार को प्रकाशित किया करेंगी।

रश्मि प्रभा की मर्ज़ी


कवयित्री रश्मि प्रभा हिन्द-युग्म पर पिछले महीने से दस्तक दे रही हैं। मार्च माह की यूनिकवि प्रतियोगिता में भी इनकी एक कविता टॉप 10 में स्थान बना चुकी है। आज हम उसी कविता को प्रकाशित कर रहे हैं।

पुरस्कृत कविता- तुम्हारी मर्ज़ी

तुम...कवि की प्रेरणा,
तुम...सृष्टि का गर्भ गृह,
तुम...शक्ति,
तुम...धन,
तुम...ममता,
तुम...अर्धांगिनी,
तुम...धैर्य,
तुम...अन्नपूर्णा,
तुम...प्रारंभिक संस्कार!
फिर भी,
आज तक नहीं कोई आधार !
तुम घर की शोभा,
फिर भी कहलाती टुकड़ों की मोहताज !
इन टुकड़ों से ऊपर
नहीं कोई पहचान!
अपने टुकड़े लेकर भी,
तुम आज भी हो असुरक्षित,
आलोचना की शिकार!
तुम चित्रकार की तुलिका का हो स्तम्भ,
पर इसमें भी है
पुरूष का दंभ!
तुमने क्या दिया,
क्या खोया,
इससे परे-
तुम्हारे ख़्वाबों, ख्यालों की चिन्दियाँ उडाने में
है उसका पुरुषार्थ!
आह!...
तब भी,
तुम कांच की चूड़ियाँ पहनना
नहीं भूलती,
पाजेब की रुनझुन में,
ढूंढ़ती हो राग ,
माथे पर बिंदी सजाती हो!
....मृत्यु शय्या तक जो ले जाता है,
भरे समाज में जो इज्ज़त है उछालता,
उसकी दीर्घायु कामनाओं का व्रत रखती हो!
हे नारी,
इस दुर्भाग्य की अपराधिनी तुम हो!
विनम्रता में
तुमने सर को इतना झुकाया
कि ....
तुम नज़र नहीं आती!
ख़ुद को पहचानना तुम्हारे ऊपर है,
परिवर्तन का सूत्र तुम्हारी मुठ्ठी में है.....
ख़ुद मरती हो,
बेटी को मरता देखती हो,
बहू को ख़ुद मारती हो
तुम अपनी छवि ख़ुद मिटाती हो !
खबरदार!
ईश्वर को दोष न दो,
ईश्वर ने तो तुम्हें तेज दिया-
तुमने ख़ुद अँधेरा किया,
कस्तूरी मृग की तरह ख़ुद से दूर रही !
इस स्व का दायित्व तुम्हारे अन्दर है,
अब जागो या मरो ,
तुम्हारी मर्जी!


प्रथम चरण मिला स्थान- दसवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- छठवाँ

पुरस्कार- हिजड़ों पर केंद्रित रुथ लोर मलॉय द्वारा लिखित प्रसिद्ध पुस्तक 'Hijaras:: Who We Are' के अनुवाद 'हिजड़े:: कौन हैं हम?' (लेखिका अनीता रवि द्वारा अनूदित) की एक प्रति।

रश्मि आई हैं नज्मों की सौगात लिए


यूनिकवि प्रतियोगिता के चौथे स्थान की कविता की रचयिता रश्मि प्रभा हिन्द-युग्म पर कवि के तौर पर पहली बार दस्तक दे रही हैं। यद्यपि ये हिन्द-युग्म को बहुत पहले से पढ़ती रही हैं। १३ फरवरी को सीतामढी (बिहार) में जन्मी रश्मि को कलम और भावनाओं के साथ रहना अच्छा लगता है। ये मानती हैं कि यह इनका सौभाग्य है कि ये महाकवि पन्त की मानस पुत्री सरस्वती प्रसाद की बेटी हैं और इनका नामकरण भी सुमित्रा नंदन पन्त ने किया था। तथा इनके नाम के साथ अपनी स्व रचित पंक्तियाँ पंत ने इनके नाम की..."सुन्दर जीवन का क्रम रे, सुन्दर-सुन्दर जग-जीवन"। शब्दों की पांडुलिपि इन्हें विरासत में मिली है। इनका मानना है कि अगर ये शब्दों की धनी न होतीं तो इनका मन, इनके विचार इनके अन्दर दम तोड़ देते...इनका मन जहाँ तक जाता है, इनके शब्द उसकी अभिव्यक्ति बन जाते हैं... शैक्षणिक तौर पर इतिहास ऑनर्स में स्नातक रश्मि प्रभा की रचनाएँ "कादम्बिनी", "वांग्मय" और कुछ महत्त्वपूर्ण अखबारों में प्रकाशित हो चुकी हैं।

पुरस्कृत कविता- नज्मों की सौगात

मैंने नदी में नाव डाल दी है
आओ,
एक पतवार तुम थाम लो,
एक मैं!
चलें बादलों के साए में............
तुम कुहासों की बातें करना,
मैं कल-कल ध्वनि की
नज्में सुनाऊँगी !
मेरी नज्मों को
अपनी आंखों में जब्त कर लेना,
जब कभी आंसू बहेंगे,
इन नज्मों की याद आएगी.....
फिर बरबस तुम्हारे कदम
उस झील की ओर बढ़ेंगे
जहाँ मेरी नाव -
तुम्हारी राह में
पानी के थपेड़ों से जूझती मिलेगी
और रहूंगी मैं -
जलतरंग-सी नज्मों की सौगात लिए !



प्रथम चरण मिला स्थान- पाँवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- चौथा


पुरस्कार- कवयित्री निर्मला कपिला के कविता-संग्रह 'सुबह से पहले' की एक प्रति