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हमको आप बचाने आये अन्ना जी




भ्रष्टाचार भगाने आये अन्ना जी

सोया देश जगाने आये अन्ना जी

सत्य, अहिंसा सत्याग्रह की ताकत को

फिर से याद दिलाने आये अन्ना जी

इन्कलाब के, आजादी की यादों के

गीत दुबारा गाने आये अन्ना जी

आगे आओ सब मिलकर संघर्ष करो

सबको यह समझाने आये अन्ना जी

बचके रहना भ्रष्ट मंत्रियो जनता से

ऐसा बिगुल बजाने आये अन्ना जी

बलिदानों की अमर कथा लिख जायेंगे

खुद भेंट चढाने आये अन्ना जी

शत शत नमन आपके दृढ संकल्पों को

हमको आप बचाने आये अन्ना जी

अरुण मित्तल ‘अद्भुत’


इश्क उस से ही किया जाता है...........


मुहब्बत में जो खता होती है
उसकी खुशबू ही जुदा होती है

इश्क उस से ही किया जाता है
जिस से उम्मीदे वफ़ा होती है

मौत से जिस्म ही नहीं मरता
दिल से धड़कन भी जुदा होती है

सब्र करने से पता चलता है
दर्दे दिल की भी दवा होती है

उसकी कुदरत में एक शय है जो
मेरी चाहत पे फ़ना होती है

मौत ही है कि जो नहीं आती
जिन्दगी रोज़ खफा होती है

संवादों के बीच खडा हूँ मौन हुआ


संवादों के बीच खडा हूँ मौन हुआ
तू भी मुझको लूट, लूटकर चलता बन

दुनिया देखी चेहरा बदला
खुद से खुद का पहरा बदला
अंतस का मीठा स्वर बदला
शांतिमयी सुरभित घर बदला
समझ न पाया यह परिवर्तन, मैं कब, कौन हुआ?
संवादों के बीच खडा हूँ मौन हुआ

बाजारों में बिकने आया
जो न था वो दिखने आया
खुद की हर पहचान को खोया
हाँ, ये अंतर्मन तब रोया
कोमल उँगलियों से मैंने, जब अंगार छुआ
संवादों के बीच खडा हूँ मौन हुआ

जीना है यूँ कठपुतली बन
तन में केवल शेष हैं धड़कन
मैंने नाता खुद से तोडा
खुद को ही दुविधा में छोडा
लगता है कुछ अपनों की ही, मुझको लगी दुआ
संवादों के बीच खडा हूँ मौन हुआ

यह कैसा सन्देश .........


लोकतंत्र ने अब दिया, यह कैसा सन्देश
हंसों के दरबार में, कव्वों के उपदेश

धर्म न्याय कानून सब, रखे दाँव पर आज
इस कुर्सी की होड़ में, लुटी देश की लाज

जिन गुंडों ने देश में, सदा लगाई आग
राजनीति में मिट गए, उनके सारे दाग

मानवता की हो गयी, अब ऐसी तस्वीर
आँसू से भीगा हुआ, जर्जर सकल शरीर

धूल धुआँ आकाश में, धरती पर संग्राम
अमन चैन के गीत हम, गायें कैसे राम

लहू बारूदों ने किया, धरती का श्रृंगार
अत्याचारी लोग हैं, इस युग के अवतार

आग द्वेष की आजकल, जलती है चहुँ ओर
सत्य, प्रेम, सदभाव को, नहीं कहीं भी ठौर

डूब गयी हर आस्था, धर्म ओर ईमान
ढूँढ रहा हूँ आज मैं, अपना हिन्दुस्तान

मेरे प्रियतम पास हैं मेरे


हर घर उल्लास बहुत है
ये गम का उपहास बहुत है

उस पर भी यकीन है पूरा
खुद पर भी विश्वास बहुत है

यूँ आँखों से कहा लबों ने
दिल में अब भी प्यास बहुत है

मेरे प्रियतम पास हैं मेरे
हर लम्हा अब ख़ास बहुत है

मिलना जुलना चाहे ना हो
अपनों का अहसास बहुत है

इस कड़वाहट भरे दौर में
ढूंढो अभी मिठास बहुत है

पंख ज़रा फैलाओ "अद्भुत"
उड़ने को आकाश बहुत है

भारत में जब हर कागज़ पर हिंदी में लिक्खा जाएगा


जन जन की भाषा हो हिंदी .........

हर शब्द अटल निर्माण करे
नवयुग की आशा हो हिंदी
हर मन की भाषा हो हिंदी
जन-जन की भाषा हो हिंदी
पर जाने क्यों जब कहता हूँ
हिंदी को भाषा जन-जन की
तब बरबस ही उठ जाती है
एक दबी हुई पीडा मन की

अंग्रेजी महलों में सोती
इसकी ही बढ़ी पिपासा है
झोंपडियों में जो रहती है
हिंदी निर्धन की भाषा है

हिंदी में नींद नहीं आती
सपने भी लो अंग्रेजी में
अंग्रेजीमय बस हो जाओ
खाओ खेलो अंग्रेजी में

है दौड़ लगी अंग्रेजी पर
हिंदी बस रोये दुखडा है
अंग्रेजी नोट है डालर का
हिंदी कागज़ का टुकडा है

अंग्रेजी मक्खन ब्रैड और
खस्ता मुर्गे की बोटी है
जबरन जो भरती पेट सदा
हिंदी वो सूखी रोटी है

हर शिक्षा कर दी अंग्रेजी
कण कण में भर दी अंग्रेजी
खेतों में डाली अंग्रेजी
आँगन में पाली अंग्रेजी

बस मन समझाने की खातिर
एक हिंदी दिवस मनाते हैं
हिंदी को ही अपनाना है
यह कहकर दिल बहलाते हैं

हम पाल रहे बचपन अपना
अंग्रेजी की घुट्टी लेकर
हिंदी का मान बढाते हैं
अंग्रेजी में भाषण देकर

अब तो तुतलाते स्वर को भी
अंग्रेजी की अभिलाषा है
अंग्रेजी बोले वह शिक्षित
हिंदी अनपढ़ की भाषा है

सब भाग रहे मदहोश हुए
सब सीख रहे हैं अंग्रेजी
हिंदी लिबास को छोड़ दिया
सब दीख रहे हैं अंग्रेजी

यह आज प्रतिष्ठा सूचक हैं
हम अंग्रेजी में बात करें
हिंदी है पिछडों की भाषा
ना हिंदी भाषी साथ रखें

कानून समूचा अंग्रेजी,
शिक्षा में छाई अंग्रेजी
चाहे हिंदी अध्यापक हो
उसको भी भाई अंग्रेजी

अपनी भाषा कहते हैं तो
हिंदी को मान दिलाना है
बस नाम नहीं देना केवल
सच्चा सम्मान दिलाना है

भारत में जब हर कागज़ पर
हिंदी में लिक्खा जाएगा
उस दिन ही हर भारतवासी
हाँ हिंदी दिवस मनायेगा

आँखों में आँसू मत रखना
करने की अभिलाषा रखना
निज कलम और अधरों पर बस
केवल हिंदी भाषा रखना

फिर से आवाज़ लगाता हूँ
नवयुग की आशा हो हिंदी
बस केवल यही पुकार मेरी
जन जन की भाषा हो हिंदी

अरुण मित्तल 'अद्भुत'

गौर से देखना चिरागों को..........(अरुण मित्तल 'अद्भुत' की गजल)


यूँ तो सब ही गजल सुनाते हैं
ऐसे कितने हैं जो निभाते हैं

गौर से देखना चिरागों को
जब ये जलते हैं मुस्कुराते हैं

अक्लमंदी हो या हो भोलापन
हम तो दोनों से खौफ खाते हैं

लोग बनते हैं आइना लेकिन
अपनी औकात भूल जाते हैं

कोई पत्थर कहाँ पिघलता है
अश्क हम बेवजह बहाते हैं

हमको मतलब क्या दुनियादारी से
दर्द गजलों में हम सुनाते हैं

आया फिर से सावन आया.....


आया फिर से सावन आया, मौसम ने ली अंगडाई
झरने कल-कल बहते निर्झर, नदियाँ झूमें बौराई

टप-टप बूँदें गिरती, घिरती सुर्ख घटायें काली सी
रिमझिम रिमझिम बरखा छाये, शाम हुई मतवाली सी
बहती शीतल हवा सुहानी, सबके ही मन को भाई
आया फिर से सावन आया, मौसम ने ली अंगडाई

घुमड़ घुमड़ यूँ मेघ गरजते, मानो पास बुलाते हों
टर्र-टर्र टर्राते मेंढक, जैसे राग सुनाते हों
सुन-सुन कर सुमधुर आवाजें, जागी दुनिया अलसाई
आया फिर से सावन आया, मौसम ने ली अंगडाई

मदमाता हर फूल महकता, फैले गंध निराली यूँ
मधुबन खुद में नहीं समाता, झूमे डाली-डाली यूँ
भागी दूर तपिश कण-कण की, धरती फिर से मुस्काई
आया फिर से सावन आया, मौसम ने ली अंगडाई

खेतों में लहराती फसलें, छाई अनुपम हरियाली
पगलाया सा जनजीवन है, चहुँदिशी बिखरी खुशहाली
घर आँगन फुलवारी सारी, यूँ कुदरत ने महकाई
आया फिर से सावन आया, मौसम ने ली अंगडाई

मन मयूर सम नाच रहा है, पग-पग उठे तराना सा
रोम-रोम में भरे शरारत, कोई राग पुराना सा
इठलाती हैं निज यौवन में, मस्त लताएँ बलखाई
आया फिर से सावन आया, मौसम ने ली अंगडाई

नभ में इन्द्रधनुष छाया, सब पंछी चिहुंक-चिहुंक गायें
स्वागत करते नई भौर का, इक दूजे को बहलायें
मिलकर नव उल्लास मनाएं, मनमोहक यह ऋतू आई
आया फिर से सावन आया, मौसम ने ली अंगडाई

हर पल मन को लगे सुहाना, मौसम दूर न जाए ये
मिट जाए हर द्वेष धरा से, प्रेम सुमन बरसाए ये
बनी मधुरतम अद्भुत बेला, नवयुग के पथ पर छाई
आया फिर से सावन आया, मौसम ने ली अंगडाई

गजल : अरुण मित्तल अद्भुत


बस वो ही मेरे अपने हैं
जो अंतस में घाव बने हैं

पेड़ वही कुर्सी बनते हैं
जिनके अवसरवाद 'तने' हैं

एक डाकिये के थैले में
जाने कितनो के सपने हैं

आँसू अब बरसेंगे शायद
गम के बादल आज घने हैं

'अद्भुत' सच का खून हुआ है
किसके बाजू नहीं सने हैं ?


बहर : फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन

अरुण मित्तल अद्भुत

गजल "अरुण मित्तल अद्भुत"


कौन कहता है गम नहीं है रे
आँख ही बस ये नम नहीं है रे

चाहता है तू आदमी होना
आरजू ये भी कम नहीं है रे

मैं हूँ, बस मैं ही, सिर्फ मैं ही हूँ
एक भी शब्द "हम" नहीं है रे

थी दुआ जिसकी बेअसर उसकी
बद्दुआ में भी दम नहीं है रे

वो मेरा हमसफ़र तो होगा पर
वो मेरा हमकदम नहीं है रे

दर्द दे और छीन ले आँसू
इससे बढ़कर सितम नहीं है रे

खुद को 'अद्भुत' मैं मान लूं शायर
मुझको इतना भी भ्रम नहीं है रे

-अरुण मित्तल अद्भुत

(बहर- फाइलातुन मफाइलुन फेलुन)

गजल.....होता नहीं खजाना अच्छा ........


गजल

यूँ खुद को बहलाना अच्छा
गीत बना 'गम' गाना अच्छा

शक हो जाए अगर किसी पर
फिर उसको आजमाना अच्छा

सबसे हाथ मिलाकर चलता
होता अगर ज़माना अच्छा

खुद महफ़िल में आगे आकर
बिगड़ी बात बनाना अच्छा

अन्धकार से लड़ना है तो
घर घर दीप जलाना अच्छा

अगर किसी पर दिल आ जाए
उस पर जान लुटाना अच्छा

लुटा हुआ मक्तूल कहेगा
होता नहीं खजाना अच्छा

इक उसूल, इक मंजिल तो है
मुझसे तो दीवाना अच्छा

बिटिया यूँ खुश हो जायेगी
बेमतलब डर जाना अच्छा

हर इंसां से लड़ने से तो
खुद को ही समझाना अच्छा

बाद इतना कहने के 'अदभुत'
मक्ता लिख, सो जाना अच्छा

अरुण 'अद्भुत'

(मक्तूल= जिसका कत्ल हुआ हो)

बहर= फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन

बोल कैसा बेवफा कह दूं उसे


गजल

अपनी शर्तों पर हमेशा की तरह
मैं जिया हूँ जिन्दगी अपनी तरह

प्यार को न कैद कर सकता कोई
ये सदा उड़ता है खुशबू की तरह

आंसुओं का सार है ये शायरी
शब्द चाहे दो बदल कितनी तरह

बोल कैसा बेवफा कह दूं उसे
दे सका ना गम भी वो अच्छी तरह

दर्द से जीवंत है अब तो 'अरुण'
अब धड़कती है गजल दिल की तरह

अरुण मित्तल 'अद्भुत'

(बहर: फाइलातुन फाइलातुन फ़ाइलुन)

अकेला वो घर धूप में


आजकल यूँ घुला है जहर धूप में
पल में धुंधला गई हर नज़र धूप में

जो अँधेरे में बरसों से गुमनाम था
आते ही हो गया बेबसर धूप में

उसने शायद सियासत की परवाह न की
बस तभी है अकेला वो घर धूप में

छाँव गाँवों में पीपल की हो जायेगी
पर जलेगा बहुत ये शहर धूप में

शब तो रहती है वीरान ही देखिये
आज होने लगा हर कहर धूप में

वक्त ले आया है हमको किस मोड़ पर
लग रहा है अंधेरों का डर धूप में

ना ही यादे किसी की ना साथी कोई
कितना तनहा हुआ है सफ़र धूप में

सच के साए में "अद्भुत" जला आशियाँ
हमको रहना पड़ा उम्र भर धूप में

बेबसर= अंधा

(बहर: फाइलुन फाइलुन फाइलुन फाइलुन)

अरुण मित्तल "अद्भुत"

दफ्न कर दो मुझे


दफ्न कर दो मुझे भी अब
जी नहीं सकता मैं भी
और तुम भी नहीं सहन कर सकते
मेरा चैतन्य होना
दफ्न कर दो मुझे अब क्योंकि
दफ्न कर चुके हो तुम सारी मर्यादाएं
हर विषय
जड़-चेतन
स्वतंत्र सोच और निस्सीम शब्द
आह और पुकार
चिंतन का विस्तार
विद्रोह से उपजे कुछ अनुत्तरित प्रश्न
दफ्न कर दो मुझे
क्योंकि जाने कितने ही भेंट चढ़ गए इस क्रांति की
कुछ असहाय और बेबस थे
तो कुछ खुद्दार और दुस्साहसी
पर जो भी हो खून तो सबने ही बहाया न
दफ्न कर दो मुझे भी अब क्योंकि
मैं जानता हूँ कि
मेरी मृत्यु ही मेरे पुनर्जन्म का आधार है
मेरे अस्तित्व की नवीन देह और
आस्था का विस्तार है
मैं फिर जन्म लूँगा
सूरज की पहली किरण के साथ
तमस को चीरता हुआ
सागर की लहरों से स्वागत पाता हुआ
भौर में औंस की बूंदों को बाहों में समेटे
धरती के गर्भ से अंकुर सा फूटता हुआ,
बेखौफ दफ्न कर दो मुझे
पर ये समझ लेना
की मुझे दफ्न करना नहीं है
मेरी आत्मा को दफ्न करना
मेरी चेतना को दफ्न करना
क्योंकि तुम देख नहीं पा रहे हो मैं यहीं हूँ
मेरा अंश कहीं न कहीं तो बिखरा ही है
सूरज की किरण
औंस की बूँद
सागर की लहरें और
धरती की ऊपरी सतह की कोमल मिट्टी
मुझे फिर जन्म देंगी
एक विद्रोह के लिए
एक क्रांति के लिए
एक परिवर्तन के लिए

अरुण मित्तल "अद्भुत"

तीन रंगों से बड़ा कोई नहीं


ना ही मंजिल, रास्ता कोई नहीं
सच है फिर मेरा खुदा कोई नहीं

है बड़ा ये गाँव भी, वो गाँव भी
तीन रंगों से बड़ा कोई नहीं

सब गले का हार बन बैठे मगर
हाथ की लाठी बना कोई नहीं

जिन्दगी से दूरियां सिमटी जरूर
मौत से भी फासला कोई नहीं

कुछ न कुछ होने का सबको इल्म है
इस शहर में सिरफिरा कोई नहीं

ना ही आँसूं, दर्द है, ना बेबसी
जिन्दगी में अब मजा कोई नहीं

उसको 'अद्भुत' सिर्फ सच से प्यार है
उसके जख्मों की दवा कोई नहीं

(बहर: फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन)

खून में ज्वार अब नहीं उठता


पिछले डेढ़ बरस से युवा कवि अरूण मित्तल अद्‍भुत हिन्द-युग्म पर लगातार अपनी उपस्थिति दर्ड करते रहे हैं। कई बार इनकी कविताएँ हिन्द-युग्म ने प्रकाशित भी की। आज से ये स्थाई तौर पर हिन्द-युग्म से जुड़ रहे हैं। आगे से शुक्रवार को अपनी कविताएँ लेकर अपने समक्ष आया करेंगे। आज पढ़िए ये ग़ज़ल-

साथ में जो भी सच के रहता है
आज के दौर में वो तन्हा है

मेरी आँखों में देख वो बोला
तेरा आँसू से कोई रिश्ता है

खून में ज्वार अब नहीं उठता
जिस्म में और कुछ ही बहता है

खुद को देखूं तो किस तरह देखूं
अक्स भी अजनबी सा लगता है

तुम बिछड़ जाओ ये सहूँ कैसे
मैंने दुनिया से तुमको छीना है

लोग भी सोचते हैं अब अक्सर
क्या क्या अद्भुत गजल में कहता है

-अरूण मित्तल अद्‍भुत

सबसे बड़ा डर


हिन्द-युग्म की यूनिकवि प्रतियोगिता के शीर्ष १० कवियों ने नामों में अधिकतर नाम पुराने कवियों के हैं। पाँचवें स्थान की कविता के रचयिता अरूण मित्तल अद्‍भुत बहुत लम्बे समय से हिन्द-युग्म से जुड़े हैं।

पुरस्कृत कविता- सबसे बड़ा डर

मेरे बचपन से दादू बनने तक
जो कुछ भी हुआ..... मेरी आँखों के सामने ही हुआ
पर पता नहीं कब हो गया
कब आ गया मैं खुले आँगन की गोद से
शहर के मशीननुमा फ्लैट में
यहाँ तो सब कुछ सुव्यवस्थित है
सच कहूं तो मेरी पीपल की छाँव में पली सोच
यहाँ सांस नहीं ले पाती
न जाने कब पहुँच गया मैं देसी हुक्के से "बेड टी" तक
और कब हो गया सफ़र तय
चौपाल के ठहाकों से लेकर अंग्रेजी अखबार तक का
न जाने कौन सा नशा है इस मशीनी जिन्दगी में
की बदल ही जाते हैं रिश्तों के संबोधन
मेरा पोता अपनी माँ को "मॉम" और पिता को "डैड" ही नहीं कहता
बल्कि भाई को "ब्रो" और बहन को "सिस" भी कहता है
न जाने किस चक्की में पीस रही है ये शहरी जिन्दगी सबको
की हर रिश्ता हो गया एक औपचारिकता
क्या बाप और बेटे के बीच में प्रयोग हो सकते हैं
"सॉरी" और "थैंक यू" जैसे शब्द
दफ्तर को शाम से आने पर मेरा बेटा
समय ही नहीं निकाल पाता मेरे साथ बतियाने का
बेटा, बहू, पोता और पोती का ये परिवार
मेरे लिए है
एक चलचित्र के धारावाहिक के पात्रों की भांति
जिन्हें मैं देख और सुन तो लेता हूँ
पर महसूस नहीं कर पाता
मेरी आँखों के सामने ही
मेरी पोती ने पहननी शुरू कर दी है वो पोशाक
जो शरीर को ढँकती कम और दिखाती ज्यादा है
और मेरा पोता जाने कहाँ से सीख गया है
अंग्रेजी गालियाँ
जिस पर उसे माँ बाप से न केवल मिल रही हैं मौन स्वीकृतियां
अपितु माडर्न होने के लिए शाबासियां भी
फिर भी न जाने किस संस्कार से बंधा ये परिवार
मुझे अपने पास रखता तो है
किसी त्यौहार वाले दिन मेरे पांव छूकर
आशीर्वाद तो लेता है
मेरे पोता और पोती कोलेज जाने से पहले
अक्सर "बाये दादू" कहकर तो निकलते हैं
बस यही मेरे लिए सबसे बड़ी ख़ुशी है
पर कभी कभी सोचता हूँ
और भी वक्त पड़ा है अभी जिन्दगी में
कहीं ये सब भी न बदल जाए
बस यही डर है मुझे
सच कहूं तो आदमी की सबसे बड़ी ख़ुशी ही
देती है उसे......................
सबसे बड़ा डर


प्रथम चरण मिला स्थान- बीसवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- पाँचवाँ


पुरस्कार- हिजड़ों पर केंद्रित रुथ लोर मलॉय द्वारा लिखित प्रसिद्ध पुस्तक 'Hijaras:: Who We Are' के अनुवाद 'हिजड़े:: कौन हैं हम?' (लेखिका अनीता रवि द्वारा अनूदित) की एक प्रति।



हिन्दी कविता में खत्म नहीं हुई हैं संभावनायें


प्रत्येक महीने के पहले सोमवार को हिन्द-युग्म यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता का परिणाम प्रकाशित कर सकता है। इस प्रतियोगिता के माध्यम से हिन्द-युग्म की यही कोशिश रही है कि हिन्दी में लिखने और पढ़ने वालों को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ रचनात्मकता को भी मंच दिया जाय।

यह प्रतियोगिता पिछले २६ महीने से अनवरत आयोजित हो रही है। जनवरी २००९ माह की प्रतियोगिता के परिणामों को लेकर कुछ पाठकों ने सवाल उठाया। कुछ ने निर्णय प्रक्रिया को गलत ठुकराया तो कुछ ने निर्णायकों के पक्ष को। हिन्द-युग्म की प्रबंधन टीम को भी ऐसा लगा कि प्रत्येक चरण के जजों के दृष्टिकोण का सम्मान इसी में है कि किसी भी चरण के जज को इतना अधिकार न मिले कि पिछले चरणों से मिले अंकों के आधार पर बनी वरियता क्रम से निरपेक्ष राय ही अंतिम राय हो। इसलिए हर चरण में साझा मत ही अंतिम हों, यह एक बेहतर विकल्प है।

जहाँ तक निर्णायकों की क्षमता और उनके दृष्टिकोण का तल्लुक है तो हर एक निर्णायक की अपनी दृष्टि होती है। हिन्द-युग्म अपने सभी निर्णायकों को अपने मापदंड खुद तय कर बेहतर कविता कविता चुनने का अधिकार देता है। बहुत संभव है कि हमारे किसी जज के लिए कथ्य महत्वपूर्ण होता हो, किसी के लिए शिल्प यो किसी के लिए मौलिकता। कविता की मात्र एक ही निर्धारित परिभाषा पूरे साहित्य में न तो कहीं उपलब्ध है और न ही कहीं मान्य। इसलिए हिन्द-युग्म निर्णय को हमेशा से ही कई चरणों में अधिकाधिक निर्णायकों से कराता रहा है।

हमने पारदर्शिता को बनाये रखने की सदैव कोशिश की है। और अभी भी प्रयासरत हैं॰॰॰॰

खैर॰॰ परिणामों की बात करते हैं। इस बार हमें कुल ३८ कविता प्रविष्टियाँ प्राप्त हुई। निर्णय २ ही चरणों में कराया गया (पहले चरण में ३ जज और दूसरे चरण में २ जज)। प्रथम चरण से २२ कविताओं को चुनकर अंतिम चरण के २ जजों को भेजा गया, जहाँ चन्द्रदेव यादव की कविता 'ख़त्म नहीं हुई हैं संभावनायें' को यूनिकविता चुना गया। कवि चंद्रदेव यादव ने जनवरी २००९ माह की प्रतियोगिता में भी हिस्सा लिया था, जहाँ इनकी कविता 'उदास बचपन' तीसरे स्थान पर रही थी।


यूनिकविः चंद्रदेव यादव


कवि चन्द्रदेव यादव का जन्म १ अगस्त १९६२ को गाजीपुर जिले (यू पी) के विक्रमपुर नामक गांव में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई। गोरखपुर विश्वविद्यालय से संबद्ध यू.पी कालेज, वाराणसी से हिन्दी साहित्य में एम.ए, उसके बाद जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से छायावादी आलोचना विषय पर पी एच डी पूरी की। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की आलोचना दृष्टि, हिन्दी पत्रकारिता: स्वरूप और संरचना, शब्द बोध, लोक गीतों में समाज और संस्कृति, अब्दुल बिस्मिल्लाह का कथा साहित्य (संपादन), इंसानियत, समझदारी (प्रौढ़ साक्षरों के लिए) पुस्तकें प्रकाशित हुईं। तीन वर्षों तक अफ्रीका जर्नल ( हिन्दी) का साहित्य संपादन।
अखिल भारतीय भोजपुरी परिषद, उ॰ प्र॰ (लखनऊ) द्वारा भोजपुरी कविताओं के लिए 'भोजपुरी भास्कर' सम्मान।
संप्रति- केंद्रीय विश्वविद्यालय जामिया मिलिया इस्लामिया के हिन्दी विभाग में साहित्य एवं पत्रकारिता का अध्यापन।

पुरस्कृत कविता- ख़त्म नहीं हुई हैं संभावनायें

तुम्हारे हाथ
पाले में ठंडाए लोहे की तरह
सर्द हैं
तुम्हारा चेहरा
भयभीत मेमने की तरह
जर्द है
तुम्हारी आँखों से
छलक रही है दहशत
तुम्हारी पूरी धज
हिन्दुस्तान हो गयी है
दंगों से मुस्टांडों से
आहत हिन्दुस्तान
जले घरों की राख में
अपना भविष्य ढूंढ़ते
अपाहिज, अनाथ बच्चों
बलात्कृत कच्ची उम्र की लड़कियों
बेसहारा बूढ़ों और विधवाओं का हिन्दुस्तान
सच में
बेखौफ़ नहीं हैं गलियाँ
गाँव और खेत खलिहान
शहर और राजपथ भी नहीं
हर जगह
डरे सहमे चेहरों पर
विजड़ित है लकवाग्रस्त दुख और संत्रास
ख़ौफ़ की नदी का नाम
कोसी हो गया है
प्रिये, मुझे ऐसे ना छुओ
जैसे छूती हैं
दहशत की हवायें
ऐसे में
जबकि तन-मन को मार गया हो काठ
कुछ भी महसूसना
संभव ना हो
तुम मुझे ऐसे छुओ
जैसे छूती है शरद की चाँदनी
या कि वसंत की शीतल सुगंधित हवा
प्रिये
निरापद नहीं है यह समय
फिर भी सबकुछ के बावजूद
ख़त्म नहीं हुई हैं संभावनायें



प्रथम चरण मिला स्थान- प्रथम


द्वितीय चरण मिला स्थान- प्रथम


पुरस्कार और सम्मान- प्रशस्ति-पत्र, कवयित्री निर्मला कपिला के कविता-संग्रह 'सुबह से पहले' की एक प्रति।

नोट- यूनिकवि की कविताएँ आप इसी महीने के आनेवाले तीन सोमवारों को भी पढ़ सकेंगे।

हिन्द-युग्म प्रत्येक माह इस प्रतियोगिता से कम से कम १० कवियों को पुस्तक के रूप में उपहार देता है और साथ ही साथ उनकी कविताएँ भी प्रकाशित करता है। इस बार जिन अन्य १० कवियों को कवयित्री निर्मला-कपिला के कविता-संग्रह 'सुबह से पहले' की एक-एक प्रति भेंट की जायेगी, उनके नाम हैं-

हिमांशु कुमार पाण्डेय
विवेक आसरी
रश्मि प्रभा
दिव्य प्रकाश दुबे
मनोज भावुक
स्मिता पाण्डेय
शामिख फ़राज़
उमेश पंत
प्रदीप वर्मा

कुछ और कवियों की कविताएँ भी उल्लेखनीय हैं, जिनकी कविताएँ हम मार्च महीने में ही प्रकाशित करेंगे। उनके नाम हैं-

मुहम्मद अहसन

उपर्युक्त सभी कविताकारों से निवेदन है कि कृपया ३१ मार्च तक अपनी कविताएँ अन्यत्र न प्रकाशित न करें/करवायें।

पाठकों की बात करें तो हिन्द-युग्म की यूनिकवि प्रतियोगिता में विगत १३-१४ महीनों से भाग ले रहे और हिन्द-युग्म की गतिविधियों पर गहरी दृष्टि रखने वाले युवा कवि अरूण मित्तल 'अद्‌भुत' फरवरी महीने में हर कविता पर खुल कर बोले और जी भरकर बोले। फरवरी माह के यूनिपाठक के पुरस्कार के लिए ये निर्विवाद रूप से चुने जाते हैं। नये पाठकों के लिए इनका परिचय

यूनिपाठकः अरूण मित्तल 'अद्‍भुत'

नाम- अरुण मित्तल ‘अदभुत‘
जन्मस्थान- चरखी दादरी, जिला-भिवानी, हरियाणा
जन्म तिथि- 21-02-1985
शिक्षा- एम. बी. ए., एम. फिल., पी जी डी आर एम, पी. एच. डी. (शोधार्थी)।
कार्यक्षेत्र- प्रवक्ता, (प्रबंध), बिरला प्रौद्योगिकी संस्थान (समतुल्य विश्वविद्यालय) ए -7 सेक्टर-1 नोएडा।
प्रकाशित रचनाएं- विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में 200 से अधिक कविताएं, गजलें, लेख, लघुकथाएं, कहानियां आदि प्रकाशित।
सम्मान-पुरस्कार
1. चरखी दादरी अग्रवाल सभा द्वारा ‘अग्रकुल गौरव‘ से सम्मानित।
2. लायंस क्लब, भिवानी द्वारा ‘साधना सम्मान‘।
3. मानव कल्याण संघ, चरखी दादरी द्वारा ‘साहित्य सेवी सम्मान‘।
4. दिल्ली प्रैस द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित ‘युवा कहानी प्रतियोगिता-2005‘ में कहानी ‘गलतफहमी‘ को द्वितीय पुरस्कार।
5. विभिन्न मंचीय प्रतियोगिताओं मे लगभग 20 पुरस्कार।
6. स्थानीय गोष्ठियों से लेकर राष्ट्रीय हिन्दी काव्य मंचों से काव्य पाठ।
7 हिन्दी पद्य साहित्य में नारी विषय पर राष्ट्रीय अधिवेशन में शोध पत्र प्रस्तुत।

विशेष उल्लेख-

अंतरजाल पत्रिका रचनाकार, अनुभूति एवं सृजनगाथा, हिन्द युग्म में कविताएं एवं लेख प्रकाशित
हिन्दी छंद एवं ग़ज़ल व्याकरण में विशेष निपुणता मुख्यतः छंदबद्ध कविताओं का लेखन।
आकाशवाणी रोहतक एवं जैन टी वी, दिल्ली से काव्य पाठ।
अप्रकाशित महाकाव्य वीर बजरंगी का लेखन।
हिन्दी भवन, दिल्ली में दिशा फाउण्डेशन द्वारा विशेष रूप से युवा कवियों के लिए आयोजित कवि सम्मेलन 'दस्तक नई पाढ़ी की' में काव्य पाठ।

पुरस्कार और सम्मान- रु ३०० का नक़द पुरस्कार, प्रशस्ति-पत्र और रु २०० तक की पुस्तकें।

दूसरे से चौथे स्थान के पाठकों के लिए हमने क्रमशः मनु बेतखल्लुस, एम॰ ए॰ शर्मा 'सेहर' और संगीता पुरी को चुना है। हम उम्मीद करते हैं कि आगे से ये अपनी पठनीयता को और बढ़ायेंगी। तीनों पाठकों को कवयित्री निर्मला कपिला के कविता-संग्रह 'सुबह से पहले' की एक-एक प्रति भेंट की जायेगी।

हम निम्नलिखित कवियों के भी आभारी हैं, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर इसे सफल बनाया-

तिजेन्द्र कुमार
अनिल जींगर
अंजनी कुमार सिंहा
सुजाता दुआ
शिखा वार्ष्णेय
अभिषेक आनंद
पिंकी वाजपेयी
कुमारेन्द्र
योगेश गाँधी
संजय सेन सागर
तरूण ठाकुर
गौतम केवलिया
गोपाल कृष्ण भट्ट ‘आकुल’
सुमित भारद्वाज
धनन्जय तिवारी
अमित श्रीवास्तव
टॉम-जेरी (राय)
राकेश सकराल
नीति सागर
स्नेह पीयूष
शालिनी सिंह
गौरव खरे
मंजू गुप्ता
गौरव सचदेवा
अमनीश धवन
मो॰ मजिद आजिम
कमलप्रीत सिंह
शारदा अरोरा

सभी प्रतिभागियों से निवेदन है कि परिणामों को सकारात्मक लेते हुए बारम्बार भाग लें। मार्च महीने की यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए यहाँ क्लिक करें

वो अपने आंसुओं को घर से ही पीकर निकलता है


युवा कवि अरूण मित्तल अद्भुत एक वर्ष से भी अधिक समय से हिन्द-युग्म से जुड़े हैं और हिन्दी ग़ज़ल को साधने में प्रयासरत हैं। मुख्यरूप से छंदबद्ध कविता लिखने वाले अरूण मित्तल अद्भुत की हिन्द-युग्म में सम्मिलित पहली कविता आधुनिक शैली की थी। कवि की एक ग़ज़ल हम जनवरी माह की यूनिकवि प्रतियोगिता की नौवीं रचना के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। अरूण की कविताएँ वेबजीन अनुभूति पर भी प्रकाशित होती रही हैं।

पुरस्कृत कविता- ग़ज़ल

हमेशा वो मेरी उम्मीद से बढ़कर निकलता है
मेरे घर में अब अक्सर मेरा दफ्तर निकलता है

कहाँ ले जा के छोड़ेगा न जाने काफिला मुझको
जिसे रहबर समझता हूँ वही जोकर निकलता है

मेरे इन आंसुओं को देखकर हैरान क्यों हो तुम
मेरा ये दर्द का दरिया तो अब अक्सर निकलता है

तुझे मैं भूल जाने की करूं कोशिश भी तो कैसे
तेरा अहसास इस दिल को अभी छूकर निकलता है

अब उसकी बेबसी का मोल दुनिया क्या लगायेगी
वो अपने आंसुओं को घर से ही पीकर निकलता है

निकलता ही नहीं अद्भुत किसी पर भी मेरा गुस्सा
मगर ख़ुद पर निकलता है तो फ़िर जी भर निकलता है


प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ५॰५, ६, ७॰३५
औसत अंक- ६॰२८३३
स्थान- प्रथम


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ७॰४, ७, ६॰२८३३ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ६॰८९४४
स्थान- प्रथम


अंतिम चरण के जजमेंट में मिला अंक-
स्थान- नौवाँ
टिप्पणी- इस गजल को पढ़ने से आभास होता है कि यहाँ जीवन के गूढ़ अनुभव को रखने का प्रयास किया गया है पर उसके रूप और उसकी वस्तु का भी सवाल है। संवेदना का लक्ष्य गजल में भी उसके काव्यशास्त्रीय अनुशासन से भी उतना ही संपृक्त होता है जिसको भंग कर या जिसे अनदेखा कर अगर अपनी बात गजल में रखी जायेगी तो फिर वह गजल ही नहीं रह पायेगी। ऐसे छिछले अनुभव से बचने के लिये आवश्यक है कि हम दूसरों की भी अच्छी कविताओं पर गौर करें और अपने आस-पास घट रही छोटी-बड़ी चीजों के प्रति अपनी ज्ञानेन्द्रियाँ भी सजग रखें ताकि इन्द्रियबोध का बल हममें नित्य बढ़ता रहे। यह अच्छे कवि में स्वभावत: होता है जिससे हमारी आत्मबद्धता और आत्ममुग्धता कपूर की तरह उड़ती रहती है और हम अपनी दुनिया में शेष दुनिया को शामिल करने का जोखिम और साहस उठा पाने को प्रेरित होते रहते हैं। यह अनुभव हमें कविता के उस वृहत्तर संसार से जोड़ने में सहायक होता है जो कविता का असली यानी उसका यथार्थवादी संसार है। मात्र कल्पना का योग देकर कोई सच्ची कविता या गजल नहीं रच सकता।


पुरस्कार- ग़ज़लगो द्विजेन्द्र द्विज का ग़ज़ल-संग्रह 'जन गण मन' की एक स्वहस्ताक्षरित प्रति।

दिल था उसके पास लेकिन साथ में दिलबर न था


अरूण मित्तल अद्भुत लम्बे समय से हिन्द-युग्म की यूनिकवि प्रतियोगिता में भाग लेते रहे हैं और अकसर ही प्रकाशित भी होते रहे हैं। इस बार इनकी एक ग़ज़ल ६वें पायदान पर है। आइए पढ़ते है॰॰

पुरस्कृत कविता- ग़ज़ल

ये है सच मंजिल की खातिर मैं सही पथ पर न था
पर मैं ये कहता नहीं कि साथ में रहबर न था

देखने की इसलिए मैं कर सका हिम्मत नहीं
नूर था नज़रों में लेकिन काबिले मंजर न था

उन कलाकारों ने नेता बस बुलाये इसलिए
क्योंकि उनके पास सर्कस में कोई जोकर न था

वो अधूरा रह गया यूँ जिन्दगी में देखिये
दिल था उसके पास लेकिन साथ में दिलबर न था

बात तो उसने यूँ की थी जैसे कातिल मैं ही हूँ
थी गनीमत इतनी ही इल्जाम बस मुझ पर न था

दाग चेहरे के दिखाकर भी वो अद्भुत बच गया
आइना था सामने पर हाथ में पत्थर न था




प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ८॰२५, ४॰५, ६, ८, ६, ६॰६
औसत अंक- ६॰१७२८
स्थान- चौथा


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ४, ६, ६॰१७२८ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ५॰३९०
स्थान- छठवाँ


पुरस्कार- कवि शशिकांत सदैव की ओर से उनकी काव्य-पस्तक 'औरत की कुछ अनकही'