संवादों के बीच खडा हूँ मौन हुआ
तू भी मुझको लूट, लूटकर चलता बन
दुनिया देखी चेहरा बदला
खुद से खुद का पहरा बदला
अंतस का मीठा स्वर बदला
शांतिमयी सुरभित घर बदला
समझ न पाया यह परिवर्तन, मैं कब, कौन हुआ?
संवादों के बीच खडा हूँ मौन हुआ
बाजारों में बिकने आया
जो न था वो दिखने आया
खुद की हर पहचान को खोया
हाँ, ये अंतर्मन तब रोया
कोमल उँगलियों से मैंने, जब अंगार छुआ
संवादों के बीच खडा हूँ मौन हुआ
जीना है यूँ कठपुतली बन
तन में केवल शेष हैं धड़कन
मैंने नाता खुद से तोडा
खुद को ही दुविधा में छोडा
लगता है कुछ अपनों की ही, मुझको लगी दुआ
संवादों के बीच खडा हूँ मौन हुआ






