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Friday, November 07, 2008

प्रश्‍नोत्‍तर खंड 6 बिजली की आंख मिचौली के बीच सवाल जवाब का सिलसिला


कई सारे पुराने परिचित मिले सबसे मिलकर अच्‍छा लगा । यूं लगा कि कोई प्रवासी भारतीय वर्षों बाद लौट कर अपने गांव आया हो । अच्‍छा लगा ये जानकर कि लोगों के मन में ग़ज़ल सीखने को लेकर उतना ही उत्‍साह है । शोले फिल्‍म का एक बेहतरीन डायलाग है ''मैं देखना चाहता था कि तुम्‍हारे बाजुओं में अब भी वही जान है या वक्‍त की दीमक ने तुम्‍हारे बाजुओं को खोखला कर दिया है '' । चूंकि मंगलवार को स्‍वागत भाषण था इसलिये कुछ विशेष सवाल नहीं हैं फिर भी जो हैं उन पर ही चलते हैं ।
sumit गुरू जी शुक्रवार की कक्षा का इंतजार रहेगा
उत्‍तर - सुमित जी शुक्रवार को कक्षा नहीं सवाल जवाब खंड होना है । कक्षा तो मंगलवार को ही लगेगी ।
sumit मैने रेडियो पर कुछ गज़ले ऐसी सुनी है जिनका रदीफ एक होने से एक गजल सुनते ही दूसरी दिमाग मे घूमने लगती हैउदाहरणः गजल-रहे ईश्क की इंतहा चाहता हूँ,जुनूं सा कोई रहनुमा चाहता हूँ.दूसरी- तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ ये दूसरा शायद गीत है और एक याद नही आ रही वो भी कुछ ऐसी ही हैइसलिए रदीफ चुनते हुए दिक्कत आ रही हैसुमित भारद्वाज
उत्‍तर - ये वस्‍तुत: तरही मुशायरे की उपज होती हैं । तरही मुशायरे में उस्‍ताद एक मिसरा दे देते हैं और फिर सारे शागिर्द उसी पर काम करते हैं बंदिश होती है कि बहर और रदीफ वही रखना है काफिया आप उसी से मिलता जुलता कोई भी रख सकते हैं । रदीफ, बहर और काफिया की ध्‍वनि एक होने से समानता नजर आती है। इसको उर्दू में जायज माना जाता है । हिंदी में ऐसी परम्‍परा नहीं है ।
नीरज गोस्वामी "समय से जूझिये यूं जाइये मत,गवाही दीजिये तुतलाइये मत'' सुभान अल्लाह...अब आप यहाँ आ गए हैं समझिये जानकारी का खजाना हाथ लग जाएगा और प्रसाद स्वरुप ऐसे नायाब शेर पढने को मिलेंगे सो अलग. अपनी तो लाटरी लग गई समझिये...ज़हे-नसीब जो आप आए.नीरज
उत्‍तर - नीरज जी मुझे अपनी ग़ज़ल कक्षा के लिये एक योग्‍य प्रिंसीपल की तलाश है आपसे बेहतर कौन हो सकता है । भूषण स्‍टील से अनुमति ले लें पार्ट टाइम काम करने की । कभी मेरे यहां बिजली नहीं हो तो मेरे स्‍थान पर प्रिंसीपल साहब कक्षा ले लेंगें ।
अंकित "सफ़र" नमस्कार गुरु जी,अब सप्ताह के दो दिनों का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा.
उत्‍तर - आपके इंतजार का मुझे भी इंतजार रहेगा ।
venus kesari गुरु जी प्रणामजब आपने यहाँ पर क्लास बंद की थी तो मेरे पास कई सवाल थे जिनका कोई जवाब मुझे सूझ नही रहा था और वो कुछ दिन कितनी बेचैनी भरे थे मेरे सिवा और कौन जान सकता है और फ़िर आपके ब्लॉग जब मिला तो ही मन शांत हो पाया था ये क्लास जो आप यहाँ पर चलायेगे मेरे लिए भी काफी लाभदायक होगी क्योकि मैंने आपके ब्लॉग की क्लास बहुत जल्दी में पूरी की थी १ साल की क्लास लगभग १० दिन में सो मेरे लिए तो ये एक अच्छा रिविज़न होगा क्लास शुरू होने के इंतज़ार में आपका वीनस केसरी
उत्‍तर - चलिये ये मान कर चलिये कि आपने पहले एक 20-20 मैच खेला था और अब आपको टैस्‍ट मैच में खेलना है । जमकर खेलना होगा । 1 साल की 10 दिन में पूरी करना मतलब जल्‍दी का काम शैतान का काम ।
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी गुरू जी, मेरा होमवर्क भी जाँच लें ...प्लीज :)लगी है कक्षा बेहतरीन ग़जलकारी की।ग़जल है कहनी,बने का़फिया पिचकारी की॥गुरू सुबीर सिखाया किए कानून-ए-मतला।औ रुक्न,वज़्न,व मिसरे की कलमकारी की॥चुना जो काफिया - रदीफ़ अपने मतले में।शेर- दर- शेर निभा लेने की फनकारी की॥लिखा किए थे जो कविता बना के तुकबन्दी।कसेंगे उसको कसौटी कसीदाकारी की॥हुए शागिर्द तो कह डालो भी मक्ता-ए-ग़जल।तूने ‘सिद्धार्थ’ अजब सी ये अदाकारी की॥
उत्‍तर - सिद्धार्थ आपने लिखा किए थे जो कविता बना के तुकबन्दी।कसेंगे उसको कसौटी कसीदाकारी की॥ जो लिखा है ये किसी भी ग़ज़ल लिखने वाले के लिये एक आदर्श बात है । जो लिखा है उसको एक बार कसौटी पर जरूर कसों । आपकी ग़ज़ल लगभग बहर में है और सबसे अच्‍छी बात ये है कि आपने पिचकारी के ढेर सारे अच्‍छे काफिया तलाशे हैं । लाइट जाने की तलवार सिर पे लटकी है सो ज्‍यादा बात नहीं करूंगा । शायद मैंने 10 में से नंबर दिये थे होली के समय तो आपको 7 नंबर देता हूं ।
AMIT ARUN SAHU
धन्यवाद सर , आप आए ........मै क्या कहूँ ,मेरे पास तो शब्द ही नही है कि कैसे अपनी खुशी जाहिर करूँ............अगली क्लास का इंतज़ार रहेंगा......." आप आए तो हिन्दयुग्म पर बहार आ गई "अमित अरुण साहू
उत्‍तर - अमित जी मैंने आप आये बहार आई को पूरा ऐसे भी सुना है । आप आये बहार आई, जहां बैठे दरार आई । हा हा । खैर आपकी प्रस्‍न्‍नता से मैं भी प्रसन्‍न हूं । लेकिन इस बात का पूरा श्रेय शैलेष जी को जाता है ।

sanjay हिंदी और गज़ल के बीच जो बास्ता है वो आपने बड़े ही प्यारे और एक खूबसूरत अंदाज़ मे बताया ,जो मुझे काफी पसंद आया !खैर हिंदी युग्म पर नापसंद जैसा तो कुछ भी नहीं है !अनमोल तहों से बाकिफ कराने के लिए शुक्रियासंजय सेन सागर
उत्‍तर - संजय जी हिंद युग्‍म को मैं आने वाले समय का एक प्रमुख हिंदी समूह देखता हूं । आपको अच्‍छा लगा धन्‍यवाद
गौतम राजरिशी
सप्ताह के बस दो दिन....बुहुहुहुहुहुहुहुहुहु!!!!!इतने सारे शक-सवाल हैं-लेकिन गुरू जी जैसा कि आपने कहा है ये तो धैर्य का काम है.धिमी आँच पर धिरे-धिरे पकाया जाने लायक.शुक्र है हिन्दी-युग्म वालों.
उत्‍तर - मेजर साहब यूं बच्‍चों के समान रोओगे तो दुश्‍मनों से कैसे लड़ोगे । हिंद युग्‍म के पाठकों के लिये सूचना गौतम की एक ग़ज़ल ( या ग़ज़ल जैसी कोई चीज़) अक्‍टूबर कादम्‍िबिनी में प्रकाशित हुई है । उनको अच्‍छी जगह छपने के लिये बधाई
"Arsh"
सर,सादर प्रणाम ,जैसा की आज हमारी बात हो ही रही थी,और मुझे आप समझा रहे थे के अरबी और फारसी से मेरे ग़ज़ल के प्रवाह में थोड़ा सा प्रॉब्लम आरहा है और आज सुबह ही आपने मुझे कहा था की अगला ग़ज़ल का मीर या गालिब हिन्दी से ही पैदा होगा ...मैं उमीद करता हूँ के आपका प्यार और आशीर्वाद मेरे ऊपर बना रहेगा और मैं अच्छा लिखने के लायक बन पाउँगा या मुझे लोग पसंद करेंगे..आपका विनीत ,अर्श
उत्‍तर - अर्श जी कुछ लोग मुझे उर्दू का विरोधी मान लेते हैं । उर्दू तो बहुत मीठी ज़ुबान है । मगर मैं उर्दू में मोटे मोटे अरबी फारसी के शब्‍दों का विरोधी हूं । वो भी केवल इसलिये कि वे शब्‍द रसभंग करते हैं । मैं गा़लिब के मिसरे '' हरेक बात पे कहते हो तुम के तू क्‍या है'' का दीवानगी की हद तक फैन हूं । दरअस्‍ल में उर्दू हिंदी और कुछ कुछ संस्‍कृत को मिला कर जो हिन्‍दुस्‍तानी भाषा बनी है वही भाषा साहित्‍य की होनी चाहिये ।
मीत
गुरु जी प्रणाम !पिछली बार की कक्षाओं की posts पिछले दो-चार दिनों में पढी ... बहुत सारे सवाल अभी से हैं ... लेकिन आप की अब की कक्षाओं के आधार पर फिर से शुरू कर रहा हूँ. बिल्कुल ही अनाड़ी हूँ .... मात्राओं को पढने / गिनने से शुरू करना है .... लेकिन करना है ..... जैसे मन की कोई मुराद पूरी हो रही हो ...
उत्‍तर - मीत जी आप वही हैं ना जो बहुत सुंदर सुंदर गीत अपने ब्‍लाग पर सुनवाते हैं और आपके उपहार में दिये दो गीत भी मेरे पास हैं । मात्राओं को गिनने का काम हम जल्‍द पहले इसलिये कर लेंगें कि उससे विद्यार्थियों को आसानी होगी ।
तपन शर्मा का कहना है कि -
गुरू जी,आप बस शुरु कीजिये.. अब इंतज़ार मुश्किल हो रहा है...
उत्‍तर - दो आरजू में कट गये दो इंतेजार में । खैर जल्‍द ही आपका इंतजार खत्‍म होगा ।
रविकांत पाण्डेय
गुरू जी,अच्छा है जो क्लास फ़िर शुरू हुई। मेरे जैसे अनाड़ियों के लिये रिवीजन जरूरी था।
उत्‍तर - करत करत अभ्‍यास के । अनाड़ी ही आने वाले समय के खिलाड़ी होते हैं ।
mohammad ahsan
एक सवाल. क्या कारण है कि दुष्यंत के अलावा किसी हिन्दी ग़ज़ल कार के श'एर आम बोलचाल या भाषण इत्यादि के बीच उद्धृत नही होते हैं मुहम्मद अहसन
उत्‍तर - अहसन जी मैंने हिंदी के दायरे को ऊपर स्‍पष्‍ट किया है । दरअस्‍ल में जो एक भाषा थी जिसे हिंदवी कहते था । उसमें और आज की हिंदी में काफी फर्क है । अगर आपको इस बार का रामधारी सिंह दिनकर जी पर प्रकाशित स्‍मारिका ''हूंकार हूं मैं '' मिले तो देखें उसमें मैंने इसी पर लेख दिया है । हिंदवी को हिंदी बनाने से पहले उसमें उर्दू, संस्‍कृत, अंग्रेजी के शब्‍दों को मिलाकर एक काढ़ा बनाया गया जो आज हिन्‍दुस्‍तानी के नाम से जानी जाती है । उसे हिंदी न कह कर हिन्‍दुस्‍तानी भाषा कहें तो अच्‍छा होगा । ऊपर गालिब का जो मिसरा मैंने कोट किया है वो हिन्‍दुस्‍तानी भाषा का है । आपको पता होगा कि गालिब पहले शुद्ध अरबी फारसी में ही लिखते थे मगर उनको लोकप्रियता तब मिली जब उन्‍होंने हिन्‍दुस्‍तानी में लिखना प्रारंभ किया । बशीर बद्र के कई शेर, निदा फाजली के कई शेर, मुनव्‍वर राना के कई कई शेर, आलोक श्रीवास्‍तव के कई शेर आज भाषणों में लेखों में कोट किये जाते हैं । ये सब भी तो हिन्‍ुदस्‍तानी में ही लिखते हैं । आपको बताना चाहूंगा कि वर्षों पूर्व सिंधू नदी के पार वालो को को सिंधी कहा जाता था और चूंकि खाड़ी के देशों की बंजारा जातियां स को ह बोलती थीं सो वे सिंधी को हिंदी कहती थीं इसी हिंदी से हिदू का जन्‍म हुआ । और रोम में ह को अ उच्‍चारण किया जाता था सो हिंदू का इन्‍दू हुआ जो कालांतर में इन्दिया या आज का इंडिया हो गया । सो हिंदी कोई भाषा नहीं थी हिन्‍दवी थी जो खड़ी थी और एक आर्यभाषा संस्‍कृत थी । उर्दू की आवश्‍यकता तब पड़ी जब मुगल सेना में भर्ती भारतीय सैनिको से बात चीत करने के लिये एक नई भाषा की आवश्‍यकता हुई और सेना की भाषा होने के कारण इसका नाम उर्दू पड़ा । किन्‍तु इसे बनाया गया था हिंदवी से ही । आप जानते हैं कि उर्दू भाषा का अविष्‍कार मुगल राजाओं के लिये कुछ पंडितों ने किया था । एक गल़त बात जो प्रचलित है जिसका मैं हर जगह विरोध करता हूं वो ये कि हिंदी हिंदुओ की भाषा है और उर्दू मुसलमानों की । भाषा किसी सम्‍प्रदाय की नहीं होती भाषा तो जन की होती है । आज हमारे ही देश में उर्दू के सबसे बड़े जानकार श्रद्धेय गोपीचंद नारंग जी हैं । वस्‍तुत: तो जो भाषा हम बोलते हैं वो हिदी उर्दू संस्‍कृत और अंग्रेजी की मिश्र धातु है ।
आपने एक बहुत अच्‍छा प्रश्‍न उठाकर मुझे लम्‍बी बात का मौका दिया उसके लिये धन्‍यवाद ।
अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -
पंकजी को दुबारा आने के लिए धन्यवाद हिंद युग्म और शैलेश को भी इसबार का सफर लंबा और कामयाब रहे ऐसी शुभकामनाएं अवनीश तिवारी
उत्‍तर - आमीन । शैलेष जी ने गुलज़ार साहब के शेर की तरह काम किया है ''हाथ छूटे भी तो रिश्‍ते नहीं तोड़ा करते । ''
Harkirat Haqeer का कहना है कि -
"ग़ज़ल आने वाले समय की हिंदी कविता है, आने वाले समय के मीर और गालिब हिंदी से ही आयेंगें"sach kha subir ji aapne.
उत्‍तर - भाषा वही होती है जो प्रवाह के साथ होती है । जो रुक जाये वो भाषा नही होती हे ।

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16 कविताप्रेमियों का कहना है :

sumit का कहना है कि -

धन्यवाद गुरू जी,

सुमित भारद्वाज

RC का कहना है कि -

Pranaam,
Hindi aur Hindustaani bhasha per aapke vyakt kiye gaye vichaar behad achche lage.
-Roopam

venus kesari का कहना है कि -

गुरु जी प्रणाम
आपकी पोस्ट बड़े मनोयोग से पढ़ी अहसान जी के सवाल पर आपने जो बात कही और जो भी जानकारी दी बहुत ही रोचक है
आपने सही कहा है १ साल का १० दिन में काम तो शैतान का है मगर उस समय तो मेरी हालत वैसी ही थी की

कितने दिनों के प्यासे होंगे यारो सोंचो तो
शबनम का कतरा भी जिनको दरिया लगता है

आपका वीनस केसरी

Yogesh का कहना है कि -

गुरु जी प्रणाम

बहुत अच्छा लगा जान कर कि कक्शाए फ़िर से शुरु होने जा रही है।
मैने पिछ्ले पाठ जल्दी जल्दी में पढ़े थे। बाकी सब तो समझ में आ गये थे बस बहर समझ में नही आया था। लगता है, बहर को दोबारा दोहराना होगा।

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

योगेश जी,

आप पुरानी कक्षाओं को ध्यान से पढ़ें, अभी बहर की तो बात ही नहीं हुई है। कक्षाएँ व्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ेंगी। खूब रीविजन करें, खुद को माँजते रहें।

Anonymous का कहना है कि -

नियंत्रक महोदय इसे अलग ब्लाग बना कर देन तो अच्छा हो कविता में हम कविता ही पढ़ना चाहतें हैं कोई क्लास नहीं अनाम .बाकी आपकी mrji

Anonymous का कहना है कि -

यही नहीं कई बार कई एनी आलेख भी कविता पर आ जाते हैं ,फ़िर तो आप कहानी भी इसी पर दे दे

नियंत्रक । Admin का कहना है कि -

अनाम जी,

हम यही कोशिश कर रहे हैं कि सारी सामग्री को यहीं समेट लें (लेकिन वर्गीकृत कर दें)। किसी भी वेबसाइट पर सारी सामग्री एक जगह होती है। हम वेबसाइट का लुक देना चाह रहे हैं।

तपन शर्मा का कहना है कि -

गुरू जी,
हिंदी के विषय में दी गई जानकारी अच्छी लगी...

oakleyses का कहना है कि -

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