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Friday, November 07, 2008

बाजार-भाव


यौवन के घनेरे बालों की खुशबू
तिस पर ऐसा मोहक अनुरोध
अनमोल है यह पल
इस निराले उन्माद में
यह रूठना मनाना
नाजुक कलाई से उभरता प्यार
कल भले ही मरघट की
सीढ़ियों पर चढ़ कर
गुमनाम हो जाय
उल्का की तरह चमक कर
विलुप्त हो जाय
न जाने कब धूल-धुसरित कर दें
काल के धागों में गुंथे अलगाव;
कला से ढांपे हुये जिस्म
रूह को बाजारी बना दें
गुणवत्ता के मापतोल
दूकानों पर मिलते कमिशन
लचीली शर्तें
मोहक विज्ञापन के जादू
बाजार-भाव के एहसास
लाभ की
मनोवृत्ति से उफनती आँच
न जाने कब
इस क्षण के घरौंदे को
लपेट कर
सब कुछ निगल जाय !

-हरिहर झा

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13 कविताप्रेमियों का कहना है :

Seema Sachdev का कहना है कि -

बाजार-भाव के एहसास
लाभ की
मनोवृत्ति से उफनती आँच
न जाने कब
इस क्षण के घरौंदे को
लपेट कर
सब कुछ निगल जाय !
सुंदर भाव ......seema sachdev

neeti sagar का कहना है कि -

कविता का भावः मैं समझ रही हूँ,! पर कविता को नाम दिया बाज़ार भाव वो मुझे समझ नही आया! शायद मैं अभी सीख रही हूँ इसलिए आपसे माफ़ी चाहूंगी, मुझे लगा कविता मैं कुछ और भावों की ज़रूरत थी,,,,

sahil का कहना है कि -

thik thak bhaw ubhar aaye,achhi nahin kah sakta par achhi jaisi kavita.
ALOK SINGH "SAHIL"

sumit का कहना है कि -

पिछली रचनाओ के मुकाबले कुछ कमजोर लगी

सुमित भारद्वाज

sumit का कहना है कि -

और नीति जी कि बात से सहमत हूँ शीर्षक कविता से मेल नही खा रहा

"Arsh" का कहना है कि -

kavita me bhavbodh badhiya hai .....


jari rahe....

vinay k joshi का कहना है कि -

माननीय,
अनमोल है यह पल
कल भले ही मरघट की
सीढ़ियों पर चढ़ कर
गुमनाम हो जाय
.
सुंदर शब्द संयोजन |
पल भी वर्षा बूंद की मानिंद होते है | न जाने किस पल को स्वाति सीप संजोग मिले |
सादर
विनय के जोशी

भूपेन्द्र राघव । Bhupendra Raghav का कहना है कि -

बहुत सुन्दर लगी आपकी काव्याभिव्यक्ति..
अतयंत गहराई लिये..
बहुत बहुत बधाई

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन का कहना है कि -

भाव अच्छे हैं,
नाजुक कलाई से उभरता प्यार
उपरोक्त उपमा ऊपर से गुज़र गयी!

शोभा का कहना है कि -

कल भले ही मरघट की
सीढ़ियों पर चढ़ कर
गुमनाम हो जाय
उल्का की तरह चमक कर
विलुप्त हो जाय
न जाने कब धूल-धुसरित कर दें
बहुत अच्छा लिखा है.

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

काफी पेचीदी कविता है। पूरी तरह से समझ में नहीं आई।

neelam का कहना है कि -

कला से ढांपे हुये जिस्म
रूह को बाजारी बना दें
गुणवत्ता के मापतोल
दूकानों पर मिलते कमिशन
लचीली शर्तें
मोहक विज्ञापन के जादू
बाजार-भाव के एहसास
लाभ की
मनोवृत्ति से उफनती आँच
न जाने कब
इस क्षण के घरौंदे को
लपेट कर
सब कुछ निगल जाय !
aaj ke parprekchay me bilkul sahi ,
kavita ko wahi shabd ,jo sabhi ke manon ,me hai dene par aap ka shukriya





























लाभ की
मनोवृत्ति से उफनती आँच
न जाने कब
इस क्षण के घरौंदे को
लपेट कर
सब कुछ निगल जाय !

vuong का कहना है कि -

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