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Thursday, January 08, 2009

दोहा गोष्ठी : ४ आया दोहा याद


दोहा सुहृदों का स्वजन, अक्षर अनहद नाद.
बिछुडे अपनों की तरह फ़िर-फ़िर आता याद.
बिसर गया था आ रहा, फ़िर से दोहा याद.
छोटे होगे पाठ यदि, होगा द्रुत संवाद.
अब से हर शनिवार को, पाठ रखेंगे मीत.
गप-गोष्ठी बुधवार को, नयी बनायें नित.
पाठ समझ करिए सबक, चार दिनों में आप.
यदि न रूचि तो बता दें, करुँ न व्यर्थ प्रलाप.
मात्र गणना का नहीं, किया किसी ने पाठ.
हलाकान गुरु हो रहा, शिष्य कर रहे ठाठ.


दोहा दिल का आइना:

दोहा दिल का आइना, कहता केवल सत्य.
सुख-दुःख चुप रह झेलता, कहता नहीं असत्य.


दोहा सत्य से आँख मिलाने का साहस रखता है. वह जीवन का सत्य पूरी निर्लिप्तता से कहता है-

पुत्ते जाएँ कवन गुणु, अवगुणु कवणु मुएण
जा बप्पी की भूः णई, चंपी ज्जइ अवरेण.


अर्थात्

अवगुण कोई न चाहता, गुण की सबको चाह.
चम्पकवर्णी कुंवारी, कन्या देती दाह.


प्रियतम की बेव फाई पर प्रेमिका और दूती का मार्मिक संवाद दोहा ही कह सकता है-

सो न आवै, दुई घरु, कांइ अहोमुहू तुज्झु.
वयणु जे खंढइ तउ सहि ए, सो पिय होइ न मुज्झु
यदि प्रिय घर आता नहीं. दूती क्यों नत मुख.
मुझे न प्रिय जो तोड़कर, वचन तुझे दे दुःख.


हर प्रियतम बेवफा नहीं होता. सच्चे प्रेमियों के लिए बिछुड़ना की पीड़ा असह्य होती है. जिस विरहणी की अंगुलियाँ पीया के आने के दिन गिन-गिन कर ही घिसी जा रहीं हैं उसका साथ कोई दे न दे दोहा तो देगा ही।

जे महु दिणणा दिअहडा, दइऐ पवसंतेण.
ताण गणनतिए अंगुलिऊँ, जज्जरियाउ नहेण.
जाते हुए प्रवास पर, प्रिय ने कहे जो दिन.
हुईं अंगुलियाँ जर्जरित, उनको नख से गिन.


परेशानी प्रिय के जाने मात्र की हो तो उसका निदान हो सकता है पर इन प्रियतमा की शिकायत यह है कि प्रिय गए तो मारे गम के नींद गुम हो गयी और जब आए तो खुशी के कारण नींद गुम हो गयी।

पिय संगमि कउ निद्दणइ, पियहो परक्खहो केंब?
मई बिन्नवि बिन्नासिया, निंद्दन एंव न तेंव.
प्रिय का संग पा नींद गुम, बिछुडे तो गुम नींद.
हाय! गयी दोनों तरह, ज्यों-त्यों मिली न नींद.


मिलन-विरह के साथ-साथ दोहा हास-परिहास में भी पीछे नहीं है. सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है अथवा मुल्ला जी दुबले क्यों? - शहर के अंदेशे से जैसी लोकोक्तियों का उद्गम शायद निम्न दोहा है जिसमें अपभ्रंश के दोहाकार सोमप्रभ सूरी की चिंता यह है कि दशानन के दस मुँह थे तो उसकी माता उन सबको दूध कैसे पिलाती होगी?

रावण जायउ जहि दिअहि, दहमुहु एकु सरीरु.
चिंताविय तइयहि जणणि, कवहुं पियावहुं खीरू.
एक बदन दस वदनमय, रावन जन्मा टाट.
दूध पिलाऊँ किस तरह, सोचे चिंतित मात.


दोहा सबका साथ निभाता है, भले ही इंसान एक दूसरे का साथ छोड़ दे. बुंदेलखंड के परम प्रतापी शूर-वीर भाइयों आल्हा-ऊदल के पराक्रम की अमर गाथा महाकवि जगनिक रचित 'आल्हा खंड' (संवत १२३०) का श्री गणेश दोहा से ही हुआ है-

श्री गणेश गुरुपद सुमरि, ईस्ट देव मन लाय.
आल्हखंड बरण करत, आल्हा छंद बनाय.


इन दोनों वीरों और युद्ध के मैदान में उन्हें मारनेवाले दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान के प्रिय शस्त्र तलवार के प्रकारों का वर्णन दोहा उनकी मूठ के आधार पर करता है-

पार्ज चौक चुंचुक गता, अमिया टोली फूल.
कंठ कटोरी है सखी, नौ नग गिनती मूठ.


कवि को नम्र प्रणाम:

राजा-महाराजा से अधिक सम्मान साहित्यकार को देना दोहा का संस्कार है. परमल रासो में दोहा ने महाकवि चाँद बरदाई को दोहा ने सदर प्रणाम कर उनके योगदान को याद किया-

भारत किय भुव लोक मंह, गणतीय लक्ष प्रमान.
चाहुवाल जस चंद कवि, कीन्हिय ताहि समान.


बुन्देलखंड के प्रसिद्ध तीर्थ जटाशंकर में एक शिलालेख पर डिंगल भाषा में १३वी-१४वी सदी में गूजरों-गौदहों तथा काई को पराजित करनेवाले विश्वामित्र गोत्रीय विजयसिंह का प्रशस्ति गायन कर दोहा इतिहास के अज्ञात पृष्ठ को उद्घाटित कर रहा है-

जो चित्तौडहि जुज्झी अउ, जिण दिल्ली दलु जित्त.
सोसुपसंसहि रभहकइ, हरिसराअ तिउ सुत्त.
खेदिअ गुज्जर गौदहइ, कीय अधी अम्मार.
विजयसिंह कित संभलहु, पौरुस कह संसार.
वीरों का प्यारा रहा, कर वीरों से प्यार.
शौर्य-पराक्रम पर हुआ'सलिल', दोहा हुआ निसार.


दोहा-मित्रों यह दोहा गोष्ठी समाप्त करते हैं एक दोहा से जो कथा समापन के लिए ही लिखा गया है-

कथा विसर्जन होत है, सुनहूँ वीर हनुमान.
जो जन जहां से आए हैं, सो तंह करहु पयान।




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9 कविताप्रेमियों का कहना है :

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

मेरे लिए थोडा क्लिष्ट है ये सब, लेकिन आपकी प्रस्तुती सुंदर है |

इतने तन्मयता के साथ हम सब से यह सब बांटने के लिए धन्यवाद |

-- अवनीश तिवारी

manu का कहना है कि -

आचार्य को प्रणाम ,
ये सही है के मैंने प्रिंट आउट पढने के बाद भी गिनती नहीं सीखी. गणना का काम मुश्किल हो या नहीं ...पर पता नहीं क्यूं भाता नहीं है..
क्षमा

विश्व दीपक ’तन्हा’ का कहना है कि -

"सलिल" जी दोहा का इतिहास जानने की इच्छा मुझे भी है, लेकिन वो क्या है कि जब तक "दोहा" में रूचि न जागे, इतिहास नहीं भाता। और रूचि तभी जाग सकता है , जब आप "दोहा"-लेखन सीखा दें। आपने पिछले पोस्ट में मात्राओं की गिनती के बारे में बताया था, कृप्या आप पहले उसे हीं पूरा कर दें। और हाँ मैने उस पोस्ट के कमेट में आपसे कुछ प्रश्न भी पूछे थे,लेकिन अभी तक उसका उत्तर मुझे नहीं प्राप्त हुआ है। और इस कारण मात्राओं की गिनती अभी तक नहीं समझ पाया हूँ।

आपके लेखों को पढके आपकी निर्निमेष तन्मयता को पता चलता है और मैं नहीं चाहता कि आपका प्रयास कतई भी व्यर्थ हो। मेरा मानना है कि अगर पहले आप दोहा के व्याकरण के बारे में बता देंगे तो पाठक-गण रूचि लेकर दोहा-लेखन के इतिहास को भी पढेंगे।

उम्मीद करता हूँ कि आप मेरी बात का बुरा नहीं मानेंगे।

आदर सहित,
विश्व दीपक

तपन शर्मा का कहना है कि -

आचार्य जी, क्षमा चाहता हूँ... दरअसल काम में फँस जाता हूँ तो समय ही नहीं निकल पाता है...
मैं धीरे धीरे आपके पाठ पढ़ रहा हूँ। लेकिन हाँ एक गुजारिश जरूर है कि पाठ थोड़े से छोटे हों।

Dr. Smt. ajit gupta का कहना है कि -

सलिल जी

प्रणाम। आपकी दोहा की कक्षाएं प्रारम्‍भ से तो क्रमबद्ध तरीके से मेरे द्वारा ग्रहण नहीं की गयी लेकिन अभी एक माह से ही सम्‍पूर्ण कक्षाओं को मैंने पढ़ा है। बहुत सारी जानकारियां प्राप्‍त हो रही हैं। आप इसे निरन्‍तर रखिए, ऐसा मेरा अनुरोध है। कभी हमें लगता है कि हमें बहुत कुछ आता है, लेकिन जब कक्षा में पढ़ते हैं तब मालूम पड़ता है कि अरे हमें तो कुछ नहीं आता। आप सभी के इस निष्‍काम प्रयास के लिए ह्वदय से आभारी हूँ। आगामी कक्षा की प्रतिक्षा में।

अजित गुप्‍ता

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