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Friday, September 04, 2009

हर तरफ़ हो गई भिखारी रात


जबसे तुम ले गये हमारी रात
हर तरफ़ हो गई भिखारी रात

चांद जैसा नहीं है, चांद तो है
बस यही सोच के गुज़ारी रात

सारा दिन इंतेज़ार करते हैं
फिर उसे ढूंढ़ते हैं सारी रात

उसने फिर मेरे दिन भी जीत लिये
बे-वजह मैंने उससे हारी रात

हमने दिन सारे बेच डाले हैं
आपके साथ है हमारी रात

--नाज़िम नक़‌वी

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12 कविताप्रेमियों का कहना है :

Anonymous का कहना है कि -

उसने फिर मेरे दिन भी जीत लिये
बे-वजह मैंने उससे हारी रात
हमने दिन सारे बेच डाले हैं
आपके साथ है हमारी रात
अति सुन्दर, बहुत ही भाव पूर्ण रचना,
धन्याद
विमल कुमार हेडा

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

चांद जैसा नहीं है, चांद तो है
बस यही सोच के गुज़ारी रात..

सुन्दर रचना!!!

Manju Gupta का कहना है कि -

बहुत सुंदर गज़ल है . बधाई .

Shamikh Faraz का कहना है कि -

नाजिम नकवी साहब मैंने आपको कई बार बैठक पर पढ़ा है. आप काफी शानदार रहते हैं लेकिन आज आपकी ग़ज़ल में कोई खास मज़ा नहीं आया. मुझे यह कुछ कमज़ोर ग़ज़ल लगी. वैसे यह शे'र पसंद आया.

हमने दिन सारे बेच डाले हैं
आपके साथ है हमारी रात

अर्चना तिवारी का कहना है कि -

सुंदर रचना ...

अपूर्व का कहना है कि -

चांद जैसा नहीं है, चांद तो है
बस यही सोच के गुज़ारी रात

कितनी खूबसूरत सी बात कह दी आपने..बहुत उम्दा!

दिपाली "आब" का कहना है कि -

जबसे तुम ले गये हमारी रात
हर तरफ़ हो गई भिखारी रात

खूबसूरत ग़ज़ल नाजिम साहेब, मतला ख़ास पसंद आया.
--
Regards
-Deep

manu का कहना है कि -

उसने फिर मेरे दिन भी जीत लिये
बे-वजह मैंने उससे हारी रात

क्या बात है हुज़ूर....
बहुत शानदार शे'र है...

बे-वजह उस से मैंने हारी रात

mohammad ahsan का कहना है कि -

shaamikh ne bilkul sahi kaha.

Admin का कहना है कि -

चाँद से कुछ कम बात रह गयी

Admin का कहना है कि -

चाँद से कुछ कम बात रह गयी

Admin का कहना है कि -

चाँद से कुछ कम बात रह गयी

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