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Saturday, September 05, 2009

भारत आज भी बहरा है शहर में गूँगा है गाँव में


लिंग भेद

हमारे एक मित्र हैं यादव जी
बड़े दुःखी थे
पूछा तो बोले-
सुबह-सुबह मन हो गया कड़वा
बहू को लड़की हुई भैंस को 'पड़वा'।

मैने कहा-
अरे, यह तो पूरा मामला ही उलट गया
लगता है 'शनीचर' आपसे लिपट गया।
फिर बात बनाई
कोई बात नहीं
लड़का-लड़की एक समान होते हैं
समझो 'ल‌क्ष्मी' आई।

सुनते ही यादव जी तड़पकर बोले-
अंधेर है अंधेर !
लड़की को लक्ष्मी कहें
तो पड़वा को क्या कहेंगे
कुबेर !

पंडि जी-
झूठ कब तक समझाइयेगा
हकीकत कब बताइयेगा ?

आज जब कन्या का पिता
अपनी पुत्री के लिए वर ढूंढने निकलता है
तो
वर का घर-दुकान
वर का पिता-दुकानदार
वर-मंहगे सामान होते हैं
कैसे कह दूँ कि लड़का-लड़की एक समान होते हैं।

आपने जीवन भर
लड़की को लक्ष्मी
लड़के को खर्चीला बताया
मगर जब भी
अपने घर का आर्थिक-चिट्ठा बनाया
पुत्री को दायित्व व पुत्र को
संपत्ति पक्ष में ही दिखाया।

मैने कहा-
ठीक कहते हैं यादव जी
पाने की हवश और खोने के भय ने
ऐसे समाज का निर्माण कर दिया है
जहाँ-

बेटे
'पपलू' बन आते हैं जीवन में
बेटियाँ
बेड़ियाँ बन जती हैं पाँव में
भैंस को मिल जाती है जाड़े की धूप
पड़वा ठिठुरता है दिन भर छाँव में।
इक्कीसवीं सदी का भारत आज भी
बहरा है शहर में
गूँगा है गाँव में।

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पड़वा- भैंस का नर बच्चा ।
पपलू- ताश के एक खेल का सबसे कीमती पत्ता.

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14 कविताप्रेमियों का कहना है :

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi का कहना है कि -

रचना सुंदर है। कविता में संवाद शैली उसे मंचीय बना देती है।

Nirmla Kapila का कहना है कि -

बिलकुल सही कहा है इक्कीसवीं सदी का भारत आज भी गूँगा बहरा है तभी तो
आज जब कन्या का पिता
अपनी पुत्री के लिए वर ढूंढने निकलता है
तो
वर का घर-दुकान
वर का पिता-दुकानदार
वर-मंहगे सामान होते हैं
कैसे कह दूँ कि लड़का-लड़की एक समान होते हैं।
कवि इस कविता के लिये बधाई के पात्र हैं

Anonymous का कहना है कि -

वर्तमान परिवेश में बहुत ही सुंदर रचना , बहुत बहुत बधाई, धन्याद

विमल कुमार हेडा

vinay k joshi का कहना है कि -

decendraji.
bahut hi badhiya rachana.
shabd sahaj pravaahi man bhavan,
sadar.
vinay k joshi

akhilesh का कहना है कि -

acchi lagi rachna, kabhi aap se sunne ko mile to aur accha ho.

Shamikh Faraz का कहना है कि -

कविता की शुरुआत ही बहुत सुन्दर की है.

हमारे एक मित्र हैं यादव जी
बड़े दुःखी थे
पूछा तो बोले-
सुबह-सुबह मन हो गया कड़वा
बहू को लड़की हुई भैंस को 'पड़वा'।

Shamikh Faraz का कहना है कि -

समाज का अच्छा चित्रण किया है.

बेटे
'पपलू' बन आते हैं जीवन में
बेटियाँ
बेड़ियाँ बन जती हैं पाँव में
भैंस को मिल जाती है जाड़े की धूप
पड़वा ठिठुरता है दिन भर छाँव में।
इक्कीसवीं सदी का भारत आज भी
बहरा है शहर में
गूँगा है गाँव में।

Manju Gupta का कहना है कि -

आज के भारत में लिंग भेद के कारण लडकियाँ कम होती जा रही हैं.जिसके कारण असंतुलन हो गया है .आज की ज्वलंत सामाजिक समस्या है . बधाई .

shanno का कहना है कि -

अपने समाज की कड़वी सचाई, आपने बहुत ही ढंग से बताई. घरों में अधिकतर 'पपलू' की ही जय- जयकार की जाती है.

वाणी गीत का कहना है कि -

लिंग भेद शहर में भी मौजूद है ...हो सकता है गाँव से कुछ कम मात्रा में हो..
शहर में लिंग परिक्षण की सुविधा [?]..न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी को चरितार्थ करती हुई समस्या {बेशक पढ़े लिखे अनपढो के लिए} पैदा ही नहीं होने देती है ..!!

manu का कहना है कि -

सुनते ही यादव जी तड़पकर बोले-
अंधेर है अंधेर !
लड़की को लक्ष्मी कहें
तो पड़वा को क्या कहेंगे
कुबेर !


कमाल का व्यंग ....

मगर उम्मीद है के जल्दी ही सब कुछ बदल जाएगा...
अब तो नवरात्र में भी नौ कन्याये नहीं मिल पाती..
कब तक न बदलेगा समाज...?

neelam का कहना है कि -

वर का घर-दुकान
वर का पिता-दुकानदार
वर-मंहगे सामान होते हैं
कैसे कह दूँ कि लड़का-लड़की एक समान होते हैं।

achchaa vyang haasya ke pu-t ke saath

devendra का कहना है कि -

कविता पढ़ने और उस पर अपना कमेंट देने के लिए सभी पाठकों का तहे दिल से आभारी हूँ।
--देवेन्द्र पाण्डेय।

SUNIL DOGRA जालि‍म का कहना है कि -

एक एक शब्द सांचे में ढलकर निकला है

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