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Saturday, May 30, 2009

फ्रीलांसर का दर्द


पिछली बार रामजी यादव की पिछली कविता में हमने प्रेम की कुछ नई छवियाँ देखी थी। आज मैं उनकी जो कविता आपके लिए लाया हूँ, उसमें आज का समय क़ैद है। इस कविता में दिल्ली जैसे शहर में अपने लिए रोटी, अपनी शर्तों पर जुगाड़ते एक फ्रीलांसर के दर्द कहीं-कहीं कलात्मकता से तो कहीं-कहीं कथात्मकता उजागर हुए है।

'फ्रीलांसर'

फ्रीलांसर होना
विजेताओं के बीच
एक लगातार हारते हुए सैनिक की तरह से गुजरना है।

बचना उतना ही सम्भव है
जितना उस कबूतर का
उस जगह से बच पाना संभव है
जब वह बाजों के बीच से गुजरता है
भागना भी उतना ही संभव है
जितना घर से भाग सकता है कोई घर की तलाश में

घुटने छिले बस यूँ कि
जैसे खीरा छीलता है कोई
और नमक लगाता है अच्छी तरह
लेकिन कहाँ पहुँचा
कहीं इस दिल्ली की भीड़ में
खोपड़ी के नीचे टँकी दो आँखें
और बत्तीस दाँत हैं
सारी दुनिया
वहीं कहीं खो गया हूँ मैं

हर कोई लिए हुए है
सहानुभूति की बर्छी
नफ़रत की ढाल
और लालच की दूरबीन
और ढूँढ़ता है मुझे ही

मैं फ्रीलांसिंग का मतलब
दीवानगी लगाए बैठा हूँ
वे चाहते हैं
एक पॉजीटिव समीक्षा अपने नए संकलन पर
मैं सूली मानता हूँ अपनी मंजिल
वे रम की बोतल को सच समझ बैठे हैं

कितना विपर्यय पसरा है हमारे बीच
कि एक दाना नहीं है
मेरे लिए इस अर्थव्यवस्था में
मंजिल नहीं है कोई
जो अच्छी लगे मुझे
चारों तरफ फैला यह बेशर्म समय
क्या बीतना भूल गया है!

निर्लज्जता की हद तक
साफ है यह आकाश
भर जाएग कभी तारों से
पटी हुई हैं जैसे अकादमियाँ
बोरियत भरे संकलनों, जन विरोधी योजनाओं
और लूट-खसोट की गोपनीय फाइलों से
गंधा रहा है जैसे साहित्य
बूढ़े छिछोरों, झूठों, कायरों, मक्कारों और चापलूसों से

अकेला हूँ वैसे मैं कि
नियति है यह मेरी
जानता था कि फ्रीलांसर होना
पूरी जिंदगी गुजार देना है दोस्त के बगैर

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10 कविताप्रेमियों का कहना है :

Harihar का कहना है कि -

घुटने छिले बस यूँ कि
जैसे खीरा छीलता है कोई
और नमक लगाता है अच्छी तरह
रामजी यादव की रचना फ्रीलान्सर की वेदना को अच्छी तरह उजागर करती है
धन्यवाद शैलेश जी

मुकेश कुमार तिवारी का कहना है कि -

शैलेश जी,

पुनः, धन्यवाद!!

एक जागरुक कविता जो आज के समय के साथ आँखों में आँखे डालकर बात कह रही है। एक फ्रीलांसर होने की पीड़ा को तो नही भोगा है परंतु कविता के माध्यम से उस दर्द को भली-भांति महसूस किया जा सकता है।

मैं यदि कवि के प्रयोगवादी होने के बारे में कुछ कहूं तो यही कह सकता हूँ कि बिना इस पीड़ा से गुजरे इसकी कल्पना भी नही की जा सकती।

श्री रामजी यादव को हार्दिक बधाईयाँ एक बहुत अच्ची कविता के लिये और हिन्द-युग्म का आभार, पाठकों के लिये अच्छी रचनायें चुनने का।

सादर,


मुकेश कुमार तिवारी

रश्मि प्रभा... का कहना है कि -

मैं फ्रीलांसिंग का मतलब
दीवानगी लगाए बैठा हूँ
वे चाहते हैं
एक पॉजीटिव समीक्षा अपने नए संकलन पर
मैं सूली मानता हूँ अपनी मंजिल
वे रम की बोतल को सच समझ बैठे हैं...बहुत ही शानदार अभिव्यक्ति...

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

''निर्लज्जता की हद तक
साफ है यह आकाश
भर जाएग कभी तारों से
पटी हुई हैं जैसे अकादमियाँ
बोरियत भरे संकलनों, जन विरोधी योजनाओं
और लूट-खसोट की गोपनीय फाइलों से
गंधा रहा है जैसे साहित्य
बूढ़े छिछोरों, झूठों, कायरों, मक्कारों और चापलूसों से''
वाह..ये पंक्तियां तो बेहतरीन हैं.....आपकी पूरी कविता अच्छी लगी....

mohammad ahsan का कहना है कि -

pichhli kavita ke muqaable yeh kavita adhik prabhaavkaari lagi ram ji yadav ji ki. thoda adhik kasi bandhi hai, adhik bhogi hui hai.
गंधा रहा है जैसे साहित्य
बूढ़े छिछोरों, झूठों, कायरों, मक्कारों और चापलूसों से
saahitya ke chhitij ki sachchaaiyaan sahi dhang se kahi gayiin.

manu का कहना है कि -

सच मुच पहले वाली से बेहतर बन पडी है....
इसमें कोई दो राय नहीं...

manju का कहना है कि -

Mein freelancing ka matlab
deewangi lagaye baitha hoon.
Yeh panktiyan sakaratmak paksh ko darshati hai aur ek latt hai. Jis tarah se kavi apni rachna ko samaj ke samane sunana chata hai, apne dard aur anubhav batata hai. Isi tarah se hamein aur prabhavshali rachna ka intazar rahega.

Manju Gupta.

डा.राष्ट्रप्रेमी का कहना है कि -

निर्लज्जता की हद तक
साफ है यह आकाश
भर जाएग कभी तारों से
पटी हुई हैं जैसे अकादमियाँ
बोरियत भरे संकलनों, जन विरोधी योजनाओं
और लूट-खसोट की गोपनीय फाइलों से
गंधा रहा है जैसे साहित्य
बूढ़े छिछोरों, झूठों, कायरों, मक्कारों और चापलूसों से

अकेला हूँ वैसे मैं कि
नियति है यह मेरी
जानता था कि फ्रीलांसर होना
पूरी जिंदगी गुजार देना है दोस्त के बगैर

Safarchand का कहना है कि -

Dhanyawaad Shailesh ji. Yadav ji kii ye kavita "solid reality" hai. Ise mein Prayag Shukl ke bade bhai (Late Ramnanarin Shukl) ke jeevan se jod ke dekhtaa hoon to "Freelancer ke dard" ke kavi, aur aap, jisne is dard ko prasaad ki tarah baatne ka sarahniya yant kiya, dono ko badhai, dhanyawad aur shubhkaamnayein.

विमलेश त्रिपाठी का कहना है कि -

बचना उतना ही सम्भव है
जितना उस कबूतर का
उस जगह से बच पाना संभव है
जब वह बाजों के बीच से गुजरता है
भागना भी उतना ही संभव है
जितना घर से भाग सकता है कोई घर की तलाश में

bahut achhi kavitayen.... achha laga....badhaai

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