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Sunday, March 08, 2009

खैर, माँ तो माँ ही है ना....


आज बहुत दिनों बाद लौटा हूँ घर,
एक बीत चुके हादसे की तरह मालूम हुआ है
की मेरी बंद दराज की कुछ फालतू डायरियां
(ऐसा माँ कहती है, तुम्हे बुरा लगे तो कहना,
कविता से हटा दूंगा ये शब्द....)
बेच दी गयी हैं कबाडी वाले को....
मैं तलाश रहा हूँ खाली पड़ी दराज की धूल,
कुछ टुकड़े हैं कागज़ के,
जिनकी तारीख कुतर गए हैं चूहे,
कोइ नज़्म है शायाद अधूरी-सी...
सांस चल रही है अब तक...

एक बोझिल-सी दोपहर में जो तुमने कहा था,
ये उसी का मजमून लगता है..
मेरे लबों पे हंसी दिखी है...
ज़ेहन में जब भी तुम आती हो,
होंठ छिपा नहीं पाते कुछ भी....
खैर, मेरे हंस भर देने से,
साँसे गिनती नज़्म के दिन नहीं फिरने वाले..
वक़्त के चूहे जो तारीखें कुतर गए हैं,
उनके गहरे निशाँ हैं मेरे सारे बदन पर..

क्या बतलाऊं,
जिस कागज़ की कतरन मेरे पास पड़ी है,
उस पर जो इक नज़्म है आधी...
उसमे बस इतना ही लिखा है,
"काश! कि कागज़ के इस पुल पर,
हम-तुम मिलते रोज़ शाम को...
बिना हिचक के बिना किसी बंदिश के साथी...."

नज़्म यहीं तक लिखी हुई है,
मैं कितना भी रो लूं सर को पटक-पटक कर,
अब ना तो ये नदी बनेगी,
ना ये पुल जिस पर तुम आतीं...
माँ ने बेच दिया है अनजाने में,
तुम्हारे आंसू में लिपटा कागज़ का टुकडा...
पता है मैंने सोच रखा था,
इक दिन उस कागज़ के टुकड़े को निचोड़ कर....
तुम्हारे आंसू अपनी नदी में तैरा दूंगा,
मोती जैसे,
मछली जैसे,
कश्ती जैसे,
बल खाती-सी..

खैर, माँ तो माँ ही है ना..
बहुत दिनों के बाद जो लौटा हूँ तो इतनी,
सज़ा ज़रूरी-सी लगती है...

निखिल आनंद गिरि

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9 कविताप्रेमियों का कहना है :

Anonymous का कहना है कि -

बहुत बढ़िया कविता... बधाई...
नाज़िम नक़वी

divya naramada का कहना है कि -

मार्मिक रचना.

Ria Sharma का कहना है कि -

खैर, माँ तो माँ ही है ना..
बहुत दिनों के बाद जो लौटा हूँ तो इतनी,
सज़ा ज़रूरी-सी लगती है..


बहुत मार्मिक व माँ के असीम प्यार को दर्शाती अभिव्यक्ति !!!

manu का कहना है कि -

शानदार रचना निखिल जी,,
हर विषय पर आपके तेवर अनूठे ही होते हैं,,
लगता है की कोई लिख रहा है,,और कोई पढ़ रहा है,,,
ek alag hi pahchaan hai aapki,,,

Nikhil का कहना है कि -

सभी का शुक्रिया....लेकिन, इस बार टिप्पणियाम बहुत कम आयी हैं, ये चिंताजनक है....

भूपेन्द्र राघव । Bhupendra Raghav का कहना है कि -

बहुत सुन्दर ह्र्दय स्पर्शी कबिले तारीफ रचना..

Anonymous का कहना है कि -

निखिल जी
आप की हर कविता कुछ अलग होती है इस कविता में कितने सुंदर तरीके से आप ने दर्द और माँ के प्रति प्यार दोनों दिखाया है .बहुत खूब
सादर
रचना

रज़िया "राज़" का कहना है कि -

आज मेरी माँ मौत के बिछौने पर है उसी वक़्त आपकी यह रचना। ओह!

Shanno Aggarwal का कहना है कि -

निखिल जी,
मातृ-दिवस पर आपकी यह कविता बहुत अच्छी लगी.

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