फटाफट (25 नई पोस्ट):

कृपया निम्नलिखित लिंक देखें- Please see the following links

जाम आखिर जाम की सूरत कभी तो चाहिए


दास्ताँ-ए-इश्क को बस मेरा अफ़साना कहें
इस तरह सब इश्क से क्यूं खुद को बेगाना कहें

अक्स उनका,चाह उनकी,दर्द उनके, उनका दिल,
दिल में हो जिसके उसे सब, क्यों न दीवाना कहें

जाम आखिर जाम की सूरत कभी तो चाहिए
कब तलक तेरी हसीं आँखों को, मयखाना कहें

साथ जीने की ही जब उम्मीद तक बाकी नहीं
तेरे बिन जीने को फिर हम,क्यों न मर जाना कहें.

"बे-तखल्लुस" ये जहां वाले भला समझेंगे क्या.?
जां का जाना है, जिसे सब दिल का आ जाना कहें।

--मनु बेतखल्लुस

जब से है बज़्म में हमराजे सुखनवर मेरा (मनु की ग़ज़ल, स्वप्न मंजूषा का स्वर)


जब से है बज्म में हमराजे सुखनवर मेरा
शे'र क्या रुक्न भी होता है मुक्कमल मेरा

कुफ्र कहते हो जिसे तुम, कभी दीवानापन
कुछ नहीं और, है ये तौर-ऐ-इबादत मेरा

रश्क होता है फरिश्तों को भी आदम से तो फिर
बोल क्यों खटके मुझे रूतबा-ऐ-आदम मेरा

रात जो हर्फ़, तमन्ना में नया लगता है
सुबह मिलता है वोही हर्फ़-ऐ-मुक़र्रर मेरा

और गहराइयां अब बख्श न हसरत मुझको
कितने सागर तो समेटे है ये साग़र मेरा

आह निकली है ओ यूं दाद के बदले उसकी
कुछ तो समझा वो मेरे शे'र से मतलब मेरा

ग़ज़लगो- मनु बेतखल्लुस


इस ग़ज़ल को कनाडा निवासी संतोष शैल ने संगीतबद्ध किया और स्वप्न मंजूषा शैल ने गाया है। नीचे के प्लेयर से सुनिए। आशा है आप पसंद करेंगे।


शमा को दी कभी तूफ़ान की निगेहबानी


वफ़ा ने टूट कर यूं अपना दिल सम्भाला है
ग़ज़ल में जब भी तेरा अक्स मैंने ढाला है

तेरी जफ़ायें है इल्मे-इलाहियात मुझे
तेरा ख्याल, मेरी रूह का उजाला है

उसी के टूटने बनने से है हयात मेरी
वो एक ख्वाब जो मैंने नज़र में पाला है

वो इत्मीनान से मुझको हलाक कर के गया
जिसे मैं समझा था, बंदा ये देखा-भाला है

किये सवाल जो खुद से तो पाया है अक्सर
के मैंने खुद को अजब कशमकश में डाला है

शमा को दी कभी तूफ़ान की निगेहबानी
दवा का काम कभी ज़हर से निकाला है

भला सा होता है यूं तो कलाम अपना भी
पर उनके कहने का अंदाज़ ही निराला है

*इल्मे-इलाहियात--- जीवन-दर्शन

--मनु बेतखल्लुस

जब वो तेरे हैं तो फिर क्या दूरियां-नजदीकियां


शामे-तन्हाई में क्या-क्या कहर बरपाता है दिल
क्या-क्या कह जाता है जब कहने पे आ जाता है दिल

फिक्र में डूबे सफे जब दर्द से हों रूबरू
इक ग़ज़ल उम्मीद की हौले से लिख जाता है दिल

चुगलियाँ रंगीन प्याले की, सुराही के गिले
दोनों की सुनता है और दोनों को समझाता है दिल

चुप लगाकर धड़कनें और गुनगुना कर खामुशी
सुनती हैं तकरीरे-उल्फत, और फरमाता है दिल

खुश ख्यालों से घनेरी चांदनी की जुल्फ को
आप उलझा हो वले, पर हंस के सुलझाता है दिल

जब वो तेरे हैं तो फिर क्या दूरियां-नजदीकियां
जिंदगी को और कभी यूं खुद को बहलाता है दिल

मनु बेतखल्लुस

उसके वादे हैं जी लुभाने की शय


शोला-ए-ग़म में जल रहा है कोई
लम्हा-लम्हा पिघल रहा है कोई

शाम यूँ तीरगी में ढलती है
जैसे करवट बदल रहा है कोई

उसके वादे हैं जी लुभाने की शय
और झूठे बहल रहा है कोई

ख्वाब में भी गुमां ये होता है
जैसे पलकों पे चल रहा है कोई

दिल की आवारगी के दिन आये
फिर से अरमाँ मचल रहा है कोई

मुझको क्योंकर हो एतबारे-वफ़ा
मेरी जाने-ग़ज़ल रहा है कोई

मनु बेतखल्लुस

हरेक शाख पे पतझड़ के आशियाने हैं


हिन्द-युग्मी मनु-बेतखल्लुस यूनिपाठक भी रह चुके हैं, कार्टूनिस्ट हैं, कहानीकार हैं और समय-समय पर अपनी कविताओं-ग़ज़लों से भी नवाज़ते रहते हैं। मई माह की प्रतियोगिता में इन्होंने भाग लिया, और प्रतियोगिता के बाग में फूल भी खिलाया।

कविता

मिला जो दर्द तेरा और लाजवाब हुई
मेरी तड़प जो खींची तो, ग़म-ए-शराब हुई

कोई खबर न हुई, जब थी लाख परदों में
फलक से टूट के शबनम, सुहाना बाब हुई

वो क्या नज़र थी के यूं चाक हो गया सीना
वो क्या अदा थी, के दिल पर मेरे अजाब हुई

हरेक शाख पे पतझड़ के आशियाने हैं
हरेक आरजू सूखा हुआ गुलाब हुई

हुआ तू कब भला रुसवा मेरे विसाल से कह
मुझे ही दीद तेरी कब, बगैर ख्वाब हुई

शब्दार्थः-
बाब- द्वार, अज़ाब- दुःख, पीड़ा, परेशानी, विसाल- मिलन, संयोग, दीद- दर्शन


प्रथम चरण मिला स्थान- नौवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- उन्नीसवाँ

हो मुश्किल बहर से लाचार जैसे काफिया कोई


मनु बेतखल्लुस हिन्द-युग्म की यूनिकवि एवं॰ यूनिपाठक प्रतियोगिता में लगातार भाग लेते रहते हैं। इन्होंने अप्रैल माह की प्रतियोगिता में भी हिस्सा लिया, जहाँ इनकी कविता ने नौवाँ स्थान बनाया।

पुरस्कृत कविता- हो मुश्किल बहर से लाचार जैसे काफिया कोई

तेरी जिद से परीशां है तेरा ही आशना कोई
हो मुश्किल बहर से लाचार जैसे काफिया कोई

खुदाया कुछ जजा तो बख्श मेरी बुत-परस्ती को
मेरी राहों तलक भी आये उनका रास्ता कोई

वो मेरी कैफियत जो देख लें, मगरूर हो जाएँ
मेरे आगे जब उनका ज़िक्र छेड़े दूसरा कोई

खुदा कब पूछ बैठा वो इबादत क्या हुई तेरी
कहा अब दिल में शायद आ बसा है आपसा कोई

सुना था दर्द बढ़ जाने से भी आराम मिलता है
दवाओं का भला अहसां उठाये क्यूं भला कोई

न जाने क्या निकाला उसने मेरी बात का मतलब
रहा खाली निगाहों से खला में ताकता कोई

कहाँ तो वक़्त काटे जा रहा है 'बे-तखल्लुस' को
कहाँ देखा गया है वक़्त अपना काटता कोई...



प्रथम चरण मिला स्थान- पहला


द्वितीय चरण मिला स्थान- नौवाँ


पुरस्कार- विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र' के व्यंग्य-संग्रह 'कौआ कान ले गया' की एक प्रति।

नेता, चुनाव, राजनीति, लोकतंत्र, वोट और 13 कवि







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - लोकसभा चुनाव-लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव

अंक - पच्चीस

माह - अप्रैल २००९






३० अप्रैल २००९। आज हम सबसे बड़े लोकतंत्र के महोत्सव के तीसरे पड़ाव तक पहुँच गये हैं। ११ राज्यों के करोड़ों लोग लम्बी कतारों में खड़े होकर हमारे देश के भविष्य को चुन रहे हैं। और यहाँ हमारे कवि भी इसी चिन्तन में हैं कि किस तरह से हमारे देश को हर तरह से सम्पन्न बनाया जाये, एक क्रांति लाई जाये और हर कोई गर्व से कह सके "मेरा भारत महान"। जिस तरह हम नेताओं को उनका फ़र्ज याद दिलाते रहते हैं हम भी समझें कि वोट डालना हमारा अधिकार भी है और फ़र्ज़ भी। हमारे कवि "जूतों" के बारे में भी कह रहे हैं, राजनीति में घुस रहे बाहुबलियों की बातें भी कर रहे हैं। पिछले दिनों ही ’आवाज़’ के संचालक सजीव सारथी ने भी चुनावों के मद्देनजर अपनी बात रखी। आइये आज पढ़ते हैं हमारे कवियों को। मनाते हैं "लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव"।

आपको हमारा यह प्रयास कैसा लग रहा है?-टिप्पणी द्वारा अवश्य बतायें।



*** प्रतिभागी ***
सत्यप्रसन्न | मंजू गुप्ता | मुकेश कुमार तिवारी | प्रो.सी.बी. श्रीवास्तव विदग्ध | शन्नो अग्रवाल | मुहम्मद अहसन | विवेकरंजन श्रीवास्तव | रचना श्रीवास्तव | संगीता स्वरूप | मनु ’बेतखल्लुस’ | डा.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी | आलोक गौड़-डा नीरज जैन-सुरिंदर रत्ती

~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~






जमी झील में कंकड़ी, फेंक रहे हैं लोग।
क्यों हिलोर उठती नहीं, लगा रहे अभियोग॥
रोटी ठंडी आग पे, सेंक रहे अख़बार।
चाकू रखकर जेब में, बेच रहे बस धार॥
जिनके कांधे है पड़ी, उनकी अपनी लाश।
वे भी दावा कर रहे, बदलेंगे इतिहास॥
करवट ली है वक्त ने, रही न अब वो बात।
जीत रहे खरगोश अब, कछुए खातॆ मात॥
गठबंधन तो हो गया, पर रिश्ते बेमेल।
चली छोड़कर पटरियां, सम्बंधों की रेल॥
कल तक जो हरते रहे, संविधान की चीर।
वो फिर लिखने जा रहे , हम सबकी तकदीर॥
कीचड़ में लिपटे हुए ,चेहरे सभी समान।
किससे हैं महफूज़ हम, सांसत में है जान॥
हर अंधे धृतराष्टृ को, सिंहासन की चाह।
होता हो फिर क्यों नहीं, चाहे देश तबाह॥
संदेहों की जेल में, आशाएं हैं कैद।
तिस पर दुर्दिन हैं खड़े. पहरे पर मुस्तैद॥
असमंजस में आज है, फिर से अपना देश।
चुन लें ख़ूनी सन्त या, फिर डाकू दरवेश॥

--सत्यप्रसन्न





देखो आता पाँच साल बाद चुनाव
होती नाव उम्मीदवार की आर पार
आया भारत के लोकतंत्र का महापर्व
हमें इस हथियार पर होता महागर्व

सत्ता और विरोधी निर्दलीय करें प्रचार
आपस में कटू वाणियों में करते प्रहार
जूता फेंक का देखो आया है व्यवहार

रैलियों में भीड़ जुटाने आते फिल्मी स्टार
भाषण में भूल जाते उम्मीदवार का नाम
पार्टियों का उड़ाते खूब माल
वोट नोट की खेलते चाल

करो मंजु सही मतदान
बने सर्वश्रेष्ठ सरकार
जिससे हो देश का विकास
दूर हो भ्रष्टाचार बेरोजगार

--मंजू गुप्ता





प्रजातंत्र के पर्व पर, होत शाही स्नान ।
सभी प्रजाति कूद पड़ी, खूब रचावै स्वांग ॥

लाऊडस्पीकर पर हो रहा, यश-कीर्ती गान ।
छुटभैये गाल बजाकर, पा रहे सम्मान ॥

लालू पीले हो गये, हुये मुलायम सख्त ।
दोऊ लारि टपिका रहे, देखि ताज-ओ-तख्त ॥

पासवान पांसे चले, अमर चलावै दांव ।
शरद हूँकारी भर रहै, होवत कांव-कांव ॥

माया ठहरी मायावी, खूब अलापै राग ।
छींके पर अटकी नज़रें, कब जागेगें भाग्य ॥

सांप सूंघ गया वाम को, हुआ तीसरा फैल ।
चौथे की तैयारियाँ, खूब चला यह खेल ॥

अड़वाणी रथ लै भटिकै, छेड़े अपनी तान ।
भैरों रूठे रह गये, वरूण चलावै बाण ॥

हाथ हैं तरसे साथ को, कितै ना दीखे ठौर ।
सत्ता सुख की चाह में, भटकै चारो ओर ॥

राहुल धूल फांक रहै, हुईं सोनिया त्रस्त ।
राजनीति भगवान बचाये, रहैं मुकेश मस्त ॥

ढोल बजै ताली बजी, गलियन होय पुकार ।
नेता देहरी लाँघ रहैं, होवे जय-जयकार ॥

खुद ही माला पहनकर, जोड़े दोनो हाथ ।
वोट माँगते फिर रहैं, जिनके सिर पर ताज ॥

साड़ी बँटी दारू बँटी, और कम्बल का ढेर ।
चला रहै सब दांव-पेंच, ये कुर्सी के शेर ॥

नोट-वोट का घाल-मेल, चलेहिं सालों साल ।
नेता गब्बर हो गये, जनता भई कंगाल ॥

वादों की बौछार है, नारों की बरसात ।
यह मौसम की बात है, बाद किसे है याद ॥

फिर बारी पर ठगी गई, जनता देखे राह ।
लूटने फिर अईहैं, पाँच बरस के बाद ॥

जाति पाँत भाषा धर्म, ने बाँट दयौ इंसान ।
वोटरलिस्ट में सिमट गई, अब उसकी पहचान ॥

भाग्य बंद पेटी हुआ, उपर चढती साँस ।
रोज मनौती कर रहे, डगमग है विश्वास ॥

लात चली घूंसे चले, हो जूतम-पैजा़र ।
हिस्ट्रीशीटर देश के, बन गईले सरकार ॥

--मुकेश कुमार तिवारी




राजनीति से उड़ गया, देश प्रेम का रंग
छिड़ी हुई है दलों में सिर्फ स्वार्थ की जंग

खेल कर रहे सभी दल चुप जनता के साथ
करते बस बातें बड़ी दे भाषण दिन रात

पिछले अनुभव से गया खो मन का विश्वास
बातों मे सच्चाई कम है ज्यादा बकवास

लोगों में क्यों रुचि रहे या श्रद्धा के भाव
वादे तो मीठे मधुर मन में मगर दुराव

स्वार्थ नीति ही प्रमुख है राजनीति में आज
उदासीन है लोग सब बेबस सकल समाज

देखा है जब जब हुये जहां भी कहीं चुनाव
सभी दलों में आपसी बढ़ जाते टकराव

जन सेवा औ " समझ का कहीं न सही प्रचार
सुनने आते प्रलोभन औ" बीमार विचार

धोखे ही खाने मिले हर चुनाव के बाद
मत दाता का मत हुआ बार बार बेकार

दुनियां बस उनकी बसी जिनकी हो गई जीत
काम किये सबने सदा वादों के विपरीत

है चुनाव चक्कर अजब इसमें फंसकर लोग
पाल लिये करते सभी लेन देन का रोग

लोकतंत्र की भावना का दिखता विद्रूप
पावन होते तंत्र भी घिस पिट हुआ कुरूप

इसी लिये मिलती खबर जूता मारी खून
जिसकी लाठी साथ हो उसका ही कानून

--प्रो.सी.बी. श्रीवास्तव विदग्ध




ना चाहकर भी कुछ यहाँ
हम भी कहना चाहते हैं
हो रहा है कितना हल्ला
बस यह बताना चाहते हैं.

यह जोश, यह चीखना सब
बस केवल चुनावी बुखार है

जनता की भावनायों पर
यह एक सीधा प्रहार है.

हर किसी ने बना लिया है
यहाँ पर अपना-अपना hero
रात-दिन चीखते हैं मिलकर
इनमें कुछ अकल के zero.

कभी-कभी कुछ उम्मीदवार भी
उनके साथ प्रकट हो जाते हैं
पक्ष में करने को अपने वह
जनता के निकट हो जाते हैं.

भीड़ में घुसकर कभी वह
बच्चों की नाक पूँछ देते हैं
कभी रोते बच्चों को माँ की
गोद से लेकर चूम लेते हैं.

इस जानी-मानी सी कला में
यह सब लोग कितने दक्ष हैं

दिखाकर यह सारे कारनामें
जीत लेते जनता का पक्ष हैं.

कोई कहता इनमें बार-बार
'रामलला हम फिर आयेंगे
वादा करके जाते हैं आकर
मंदिर फिर यहीं बनायेंगें'.

या गरीब के घर रोटी खाने
कोई आंधी जैसा है आता
जगह बनाकर उसके दिल में
भगवान के जैसा बस जाता.

ना भूलो यह झूठे वादों से
दिल तोड़ने में माहिर हैं
समय आने पर भूल जायेंगे
सबको यह बात जाहिर है.

पता नहीं कहाँ-कहाँ से यह
इतने चमचे बटोर लाते हैं
फिर खुली जीपों में खड़े होकर
सब गला फाड़कर चिल्लाते हैं.

झूठे वादों से फुसलाकर यह
जनता को खूब फ़ूल बनाते हैं
उनके दिल जीत लेने के बाद
अपने वादों को भूल जाते हैं.

जेल में जाते हैं तब भी तो
इनका नाम ऊंचा ही होता है
वहीँ से ही बैठे-बैठे चमचों से
उन सबका सारा काम होता है.


वोट जिस किसी का भी हो
इतना भी सस्ता ना होगा
फिर भी आजमाने के लिए
कोई और रास्ता भी ना होगा.

--शन्नो अग्रवाल




सूरज सुबह उगता है
सुबह सुहानी लगती है
भारत बुलंद है

चिड़ियाँ चहचहाती हैं
फूल मुस्कराते हैं
भारत बुलंद है

आस्था हो न हो
मंदिर हैं , मस्जिद है
भारत बुलंद है

बिजली हो न हो
बिल तो आता ही है
भारत बुलंद है

सड़कें हो न हों
मंजिलें तो हैं
भारत बुलंद है

शिक्षक आये न आयें
शालायें हैं , छात्र भी
भारत बुलंद है

रोजगार मिले न मिले
स्वरोजगार योजना जो है
भारत बुलंद है

अपराध बढ़ते है तो बढ़ें
पुलिस है , अदालतें भी
भारत बुलंद है

उद् घाटन की नौबत आये न आये
शिलान्यास तो हो रहे हैं न
भारत बुलंद है

आबादी आबाद हो न हो
६०० करोड़ वाले नेता आबाद हैं
भारत बुलंद है

मंहगाई घटे न घटे
मुद्रा स्फिति की दर तो घट रही है
भारत बुलंद है

आमदनी हो न हो
कर्ज लो ,खर्च करो
भारत बुलंद है

उम्मीदवार पसंद हो न हो
वोटर हो तो वोट करो
भारत बुलंद है

--विवेक रंजन श्रीवास्तव




नेता बुद्धिमान हत्यारे होते हैं
वो शारीर नहीं मारते
बड़ी चालाकी से
लेलेते है हमारा वो समय
हमारे वो शब्द ,हमारी वो आवाज़
जिसमे हम रहते हैं .

हमारे छोटे छोटे सुखों की
छाँव ढूंढ लेते हैं
ढूंढ लेते हैं
हमारे दुखो और जरूरतों की गुमटियाँ
बिठा देते हैं पहरे
उसके मुहाने पर

सब्ज बाग कुछ यूँ दिखाते हैं
स्वर्ग यहीं होगा
हम मान जाते हैं
वादों को
कपट जाल तले बिछाते हैं
किस्मत के मारे
हम जब इसमें फस जाते हैं
तब पर हमारे क़तर देते हैं

कहते हैं झूठ
पर कुछ इस तरह
के वो हमारी ही
अवाज लगने लगता है
सत्ता में आते ही
उनका सच होता है बेनकाब
और ठगी जनता
तलाशती है नया सहारा

हमारे शब्द
यदि उनके खिलाफ हों
उसका फंदा वो हम पर ही कसते है
और उसी से कर देते हैं
हमारी हत्या

--रचना श्रीवास्तव




लोकतंत्र का उत्सव
मना रहे इस बार
जनता नेताओं से
खाये बैठी है खार .
जनता के हाथ में
आ गया एक हथियार
जूते से हैं लैस सब
चलाने को तैयार .
नेताजी अब सोच रहे
कैसे होगा बेडा पार
भरी सभा में डर रहे
क्या रखें अपने विचार ?
जनता से कर धोखा
और करके अत्याचार
आज खड़े हैं आ कर वो
जूते का पहने हार .
त्रस्त हुई अब जनता
नेताओं पर कर विश्वास
पर नेताजी घूम रहे
लेकर जीत की आस .
कोई नहीं है ऐसा नेता
जो सुने जनता की पुकार
जनता तो ठगी ही जायेगी
आये कोई भी सरकार ..

--संगीता स्वरूप




रैली ,परचम और नारों से कर डाला बदरंग
शहर वोटर को फिर ठगने निकले, नेता बनकर नटवरलाल
कैसे छांटें इन चेहरों में अपनी मर्जी का लीडर
जीत के बाद सभी कर देते हैं पब्लिक का दम बेहाल

--मनु ’बेतखल्लुस’




ओ बबुवा सुन ले रे आवा लोक तंत्र का त्यौहार

नेता पहुंचें गली गली बात बनावें बड़ी बड़ी
रात का सपना दिन माँ दिखलावें, लगाएं वोट की गुहार
ओ बबुवा सुन ले रे आवा लोक तंत्र का त्यौहार

बाँट बाँट के जाति बिरादरी सब अपना उल्लू सीधा कीन्हिन
खड़ी किहिन दौलत कोठी अपनी लै के वोटवा हमार
ओ बबुवा सुन ले रे आवा लोक तंत्र का त्यौहार

जस त्यौहार खतम चलिहैं नेता जी दिल्ली, बनिहैं मंतरी
कोठी बंगला गाडी छोड़ के फिर कहाँ झोपड़ी माँ हमार !
ओ बबुवा सुन ले रे आवा लोक तंत्र का त्यौहार

बीत गयी उमरिया अपनी देखत सब चुनाव का हाल
न गाँव माँ कछु बदला न बदली किस्मतिया हमार
ओ बबुवा सुन ले रे आवा लोक तंत्र का त्यौहार

--मुहम्मद अहसन




लोक सभा चुनाव
लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव
चुनाव आयोग सशक्त,
आचार-संहिता तोड़ते
राजनीति के भक्त,
चुनाव-घोषणा पत्र
जनता रूपी प्रेमिका को
बेबफा-प्रेमी नेता का प्रेम-पत्र
तारे तोड़कर लाने के वादे,
लूटकर प्रेमिका को,
प्रेमी वादे भुला दे,
बेच दे उसको, वैश्यालय पहुँचा दे।
चुनाव-उत्सव
होली का त्योहार,
रंग-बिरंगे रंगों का उपहार,
सभी उड़े रंग
जनता रह गयी दंग
बचा केवल रंग काला
चुनाव-गंगा बन गई नाला
सभी दल फँसे दल-दल में,
नेताओं के चेहरों पर
पुती है कालिख
आओ वोटर!
वोट बेच, कीमत वसूल
थोड़ी कालिख,
अपने चेहरे पर भी मल
अब नहीं रहा तू नाबालिग
वोट डाल चुनाव से हों फारिग।
संसदीय चुनाव
दीपावली का त्योहार
दीपों का उपहार,
दीपक का तेल हुआ गुमनाम,
स्विस बैंक के खातों में,
वोटर आते बातों में,
बाती को भी हड़पने की लगी,
नेताओं में होड़
तू टिकिट के लिए लगा दे दौड़,
जनता को छोड़।
दीपावली है,
चुनाव का जुआ खेल,
बाती को लगा दे दाँव पर,
जरा सा लगा के तेल
भारतीय, नारी, संस्कृति व विचार,
बचे हैं दाव पर लगाने को यार,
पश्चिमी-पारदर्शी-आकर्षक-नग्नता के आवरण में लपेट,
लगा दाव पर, भर ले अपना पेट।
संसदीय चुनाव,
रक्षाबंधन का त्योहार,
बाँधकर रक्षासूत्र,
जनता सौंपती लोकतंत्र की रक्षा का भार,
नेताओं के लिए रक्षासूत्र,
चुनाव तक की दरकार,
तोड़ देंगे चुटकी में,
बस बन जाए सरकार।
रक्षासूत्र ही बनेगा कामसूत्र,
रक्षासूत्र बाँधने वाली को ही
अंकशायिनी बनने को कर देंगे मजबूर,
वस्त्रों को कर तार-तार,
इसी के कर-कमलों से पहनेंगे,
जीत के हार।
विजयादशमी होगी,
चुनाव-परिणामों की घोषणा,
वोटर की मजबूरी है,
किसी ना किसी को,
वोट देना जरूरी है
यदि बहुमत नहीं मिलेगा,
सभी हो जायेंगे सवार
तभी सत्ता का रथ चलेगा
सभी एक-दूसरे के गले लगेंगे,
हम मिलकर सहयोग करेंगे,
यूपीए,राजग,तीसरा,चौथा या पाँचवा मोर्चा,
और सभी दल स्वतंत्र,
दल ही नहीं निर्दलीय उम्मीदवार भी
लोक को छोड़ पीछे,
अपनायेंगे सत्ता-तंत्र।
सभी का धर्म एक है,
सत्ता सभी की टेक है।
तंत्र पहनायेगा,
इन्हें जीत के हार,
जनता भले ही हो बेजार,
ये धर्म की रखेंगे लाज,
धार्मिक पर्यटन बढ़ायेंगे,
धार्मिक-स्थलों पर शराब पार्टी मनायेंगे,
होगें नग्न-नृत्य,
सभी वोटर बन जायेंगे भृत्य,
इनकी तिजोरी देखना,
वही होंगे इनके कृत्य,
जनता का हो राम नाम सत्य।

--डा.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी




हमारे नेताओं को क्या हो गया हमारी राजनीति को क्या हो गया
हम भी कहीं न कहीं कसूरवार हैं हमको भी न जाने क्या हो गया

तब कि बातें और थी तब लोगों को ज्ञान था
कथनी और करनी का अंतर गाँधी जी को ध्यान था
बच्चे से गुड़ खाना छोड़ो उस दिन तक ना बोले थे
जिसदिन तक गुड़ खाने का खुद बापू को अरमान था

अब लालटेन वाले नेता बैठें एसी दरबार में
साइकिल वाले नेता भी चलते हैं मोटर कार में
अब काटें भी मिलते हैं कुछ फूलों के हार में
अब पंजे तक से पिसता है बस वोटर हर सरकार में

चिकनी चुपड़ी बात करे जो कभी करे न काम

जगह से अपनी हिले नहीं जो मिले न जबतक दाम
पांच साल में एक बार जो करता हो सलाम
याद नहीं रखता उनको जो आते उसके काम
पहचान ही जिसकी ये हो जो नहीं आदमी आम
अपनों तक का सगा नहीं जो नेता उसका नाम

भरे पेट जो रोज़ लगाते नैतिकता के नारे
और सबको ये बतलाते हैं कि क्या अच्छा है प्यारे
वो शायद ना चल पाएँ खुद अपनी ही बोली राह पर
गर मिल ना पाए उनको उनका खाना उनकी चाह पर
भूखे रहना क्या होता है जबतक नहीं नेता जानेगें
क्या भूख से लड़ने वालों की बातों को वो मानेगें

हमारे नेताओं को क्या हो गया हमारी राजनीति को क्या हो गया
हम भी कहीं न कहीं कसूरवार हैं हमको भी न जाने क्या हो गया

--आलोक गौड़




रथ बताते फिर रहे चालाक मोटर की जगह
राजनेता फिट हुये हैं आज जोकर की जगह
दृशय मिश्रण आ गया है अब नई तकनीक में
ले रहे हैं 'गांधी' मुरली मनोहर की जगह
शुष्क रेगिस्तान की संभावना दिखने लगी
इस चमन की बुलबुलों को अब सरोवर की जगह
पोल क्या खोलेंगे पोलिंगबूथ शिक्षा के बिना
कुछ भगत सिंह चाहिये हैं आज वोटर की जगह

--डा नीरज जैन



भारत के लोकतंत्र का, क्या करूँ बखान,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान,
तुम हो महान नेताजी, तुम हो महान .....

मुँह उठाये फिर चले आये,
छुटभैये, चमचों से पर्चे बटवाये,
रंग-बिरंगे झण्डे फहराये,
इक्के-दुक्के काम गिनवाये,
मांग रहे हमसे मतदान,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान .....

पुराने वादे न दोहराओ,
घिसे-पिटे भाषण न सुनाओ,
धर्म का ज़हर न फैलाओ,
पाँच साल का हिसाब बताओ,
कितने किये अच्छे काम,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान .....

भाजप, कांग्रेस, समाजवादी,
ओढे रहो भईया सफेद खादी,
हर काम की तुमको आज़ादी,
होती है होने दो बर्बादी,
इसका है किसी को अनुमान,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान .....

सुस्त क़ानून व्यवस्था हमारी,
तिस पर महंगायी, बेरोजगारी,
सुरक्षा, शिक्षा की कमी भारी,
रिश्वत भी लाइलाज बिमारी,
पिस रही जनता हैं सब परेशान,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान .....

फेल हो तुम चौथा दर्जा,
फिर भर दिया तुमने पर्चा,
कौन भरेगा चुनाव का खर्चा,
देश पर बढेगा भारी कर्जा,
ख़ूब रौशन किया भारत का नाम,
तुम हो महान नेताजी, तुम हो महान .....

कौन सुखी है बोलो आज,
एक सपना है रामराज,
राम भरोसे सब कामकाज,
खीझ है मन में, हैं सब नाराज़,
"रत्ती" बचाये सबको भगवान,
भारत के लोकतंत्र का, क्या करूँ बखान,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान,
तुम हो महान नेताजी, तुम हो महान .....

--सुरिंदर रत्ती



सुर्ख उम्मीद के ये फूल खिलाए रखना


हिन्द-युग्म के सक्रियतम पाठक मनु बेतखल्लुस मार्च महीने की यूनिकवि प्रतियोगिता की दौड़ में भी शामिल हैं। इनकी कविता सातवें पायदान रही। इन्होंने यह कविता अल्मोड़ा के एक भूभाग को महसूसते हुए लिखी। हम साथ में वह चित्र भी प्रकाशित कर रहे हैं।

पुरस्कृत कविता

ये हरी बस्तियां महफूज बनाए रखना,
इस अमानत पे कड़े पहरे बैठाए रखना

अगले मौसम में परिंदे जरूर लौटेंगे
सब्ज़ पेडों को, किसी तौर बचाए रखना

जिंदगी इन के बिना और भी मुश्किल होगी
सुर्ख उम्मीद के ये फूल खिलाए रखना

कटी है शब तो कभी आफताब चमकेगा
सुनहरी मछलियों पे जाल लगाए रखना

तेरी गफलत से कहीं राह में ना रह जाए
ख्वाब की फिक्र में आँखों को जगाए रखना



प्रथम चरण मिला स्थान- प्रथम


द्वितीय चरण मिला स्थान- सातवाँ


पुरस्कार- हिजड़ों पर केंद्रित रुथ लोर मलॉय द्वारा लिखित प्रसिद्ध पुस्तक 'Hijaras:: Who We Are' के अनुवाद 'हिजड़े:: कौन हैं हम?' (लेखिका अनीता रवि द्वारा अनूदित) की एक प्रति।

अज्ञात कन्या का मर्म (राष्ट्रीय कन्या दिवस विशेष)


कन्या भ्रूण हत्या, घरेलू हिंसा और कुपोषण को हतोत्साहित करने के लिए भारत सरकार २४ जनवरी २००९ को राष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में मना रही है। यह उद्घोषणा महिला एवं बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी ने १९ जनवरी २००९ को की थी। कन्या दिवस पूरी दुनिया में मनाया जाता है। कन्या भ्रूण हत्या की वह वजह है जो भारत के लिंगानुपात को ९२५ से भी नीचे रखे हुए है। यूनिसेफ इस दिवस को २४ सितम्बर को मनाता है। १५ अक्टूबर को यह दिवस हमारे पड़ोसी देश बांग्लादेश में भी मनाया जाता है, जहाँ महिलाओं की हालत भारत से भी अधिक खराब है। दुनिया में जितने भी दिवस रखे गये हैं वो इसलिए ताकि हम उससे जुड़ी चीजों का महत्व समझ सकें। कन्या दिवस भी उसी कन्या का महत्व का समझाने के लिए है, जिसकी हालत पर मनु बेतखल्लुस ने कार्टून बनाया है और सीमा सचदेव ने कविता लिखी है।

अज्ञात कन्या का मर्म

भिनभिनाती मखियाँ
कुलबुलाते कीडे
सूँघते कुत्ते
कचरादान के गर्भ मे
कीचड़ से लथपथ
फिर से पनपी
एक नासमझ जिन्दा लाश
छोटे-छोटे हाथों से
मृत्यु देवी को धकेलती
न जाने कहाँ से आया
दुबले-पतले हाथों में इतना बल
कि हो गए इतने सबल
जो रखते है साहस
मौत से भी जूझने का
शायद यह बल
वह अहसास है
माँ के पहले स्पर्श का
वह अहसास है
माँ की उस धड़कन का
जो कोख मे सुनी थी
चीख-चीख कर कहती है
नन्ही सी कोमल काया....
मैं जानती हूँ माँ
मैं पहचानती हूँ
तुम्हारी ममता की गहराई को
तुम्हारे स्नेह को
तुम्हारे उस अनकहे प्यार को
महसूस कर सकती हूँ मैं
भले यह दुनिया कुछ भी कहे
मैं इस काबिल नहीं कि
सब को समझा सकूँ
तुम्हारी वो दर्द भरी आह बता सकूँ
जो निकली थी तेरे सीने की
अपार गहराई से
मुझे कूडादान में सबसे छुप-छुपा कर
अर्पण करते समय
यह तो सदियों से चलता आ रहा सिलसिला है
कभी कुन्ती भी रोई थी
बिल्कुल तुम्हारे ही तरह
मैं जानती हूँ माँ
तुम भी ममतामयी माँ हो
न होती
तो कैसे मिलता मुझे तुम्हारा स्पर्श
तुम तो मुझे कोख मे ही मार देती
नहीं माँ ! तुम मुझे मार न सकी
और आभारी हूँ माँ
जो एक बार तो
नसीब हुआ मुझे तुम्हारा स्पर्श
उसी स्पर्श को ढाल बना कर
मैं जी लूँगी
माथे पर लगे लाँछन का
जहर भी पी लूँगी
इससे जुड़ी प्रविष्टियाँ-

1. बालिका दिवस का नारा
2. एक महोदय बोले लड़कियों को कम फैशन करना चाहिए
3. मेरी बगिया की नन्ही कली
4. अपराधबोध!!!
5. कठपुतलियां तो नारी हैं
6. कन्या भ्रूण हत्या
7. दोषी कौन?
8. क्या नारी शक्ति आवाज़ उठा पायेगी?
तुम्हारे आँचल की
शीतल छाया न सही
तुम्हारे सीने से निकली
ठण्डी आह का तो अहसास है मुझे
धन्य हूँ मै माँ
जो तुमने मुझे इतना सबल बना दिया
आँख खुलने से पहले
दुनियादारी सिखा दिया
इतना क्या कम है माँ
कि तूने मुझे जन्मा
हे जननी!
अवश्य ही तुम्हारी लाचारी रही होगी
नहीं तो कौन चाहेगी
अपनी कोख में नौ माह तक पालना
कुत्तो के लिए भोजन
इसीलिए तो दर्द नहीं सहा तुमने
कि दानवीर बन कर
कुलबुलाते कीड़ों के भोजन का
प्रबन्ध कर सको
नहीं! माँ ऐसी नहीं होती
मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं
मैं ही अभागी
तुम्हारी कोख में न आती
आई थी तो
तुम्हें देखने की चाहत न करती
बस इसी स्वार्थ से
कि माँ का स्नेह मिलेगा
जीती रही, आँसू पीती रही
एक आस लिए मन में...
स्वार्थ न होता
तो गर्भ में ही मर जाती
तुम्हें लाँछन मुक्त कर जाती
किसी का भोजन भी बन जाती
पर यह तो मेरे ही स्वार्थ का परिणाम है
कि बोझ बन गई मैं दुनिया पर
कलंक बन गई तेरे माथे पर
कुत्तों, कीड़ों या चीलों का
भोजन न बन सकी
और बन गई एक अज्ञात कन्या
अज्ञात कन्या

इस बार देशी पाठक विलायती कवयित्री


देखते-देखते हिन्द-युग्म यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता का आयोजन होते २ वर्ष बीत गये। दिसम्बर २००८ की प्रतियोगिता इस आयोजन की २४वीं कड़ी थी। इसकी सफलता का जश्न हिन्द-युग्म ने २८ दिसम्बर २००८ को हिन्दी भवन, नई दिल्ली में मनाया। आज हम उसी २४वीं कड़ी का परिणाम लेकर उपस्थित हैं।

पिछले माह की यूनिकवि प्रतियोगिता में कुल ४१ प्रविष्टियाँ प्राप्त हुईं। पहले चरण के ३ निर्णायकों के दिये गये अंकों के आधार पर चुनी गईं २५ कविताओं को दूसरे चरण के २ निर्णायकों भेजी गईं। यानी ५ जजों मापदंडों ने छनकर रचना श्रीवास्तव की क्षणिकाएँ प्रथम स्थान बनाने में सफल रहीं।

यूनिकवयित्री रचना श्रीवास्तव सितम्बर २००८ की यूनिपाठिका भी रह चुकी हैं। ये अच्छी लेखिका ही नहीं अपितु अच्छी पाठिका भी हैं। डैलास (अमेरिका) में रह रहीं रचना का जन्म लखनऊ (उ॰प्र॰) में हुआ। रचना को लिखने की प्रेरणा बाबा स्वर्गीय रामचरित्र पाण्डेय और माता श्रीमती विद्यावती पाण्डेय और पिता श्री रमाकांत पाण्डेय से मिली। भारत और डैलस (अमेरिका) की बहुत सी कवि गोष्ठियों में भाग लिया, और डैलास में मंच संचालन भी किया। अभिनय में अनेक पुरस्कार और स्वर्ण पदक मिला, वाद-विवाद प्रतियोगिता में पुरुस्कार, लोक संगीत और न्रृत्य में पुरुस्कार, रेडियो फन एशिया, रेडियो सलाम नमस्ते (डैलस), रेडियो मनोरंजन (फ्लोरिडा), रेडियो संगीत (हियूस्टन) में कविता पाठ। कृत्या, साहित्य कुञ्ज, अभिव्यक्ति, सृजन गाथा, लेखिनी, रचनाकर, हिंद-युग्म, हिन्दी नेस्ट, गवाक्ष, हिन्दी पुष्प, स्वर्ग विभा, हिन्दी-मीडिया इत्यादि में लेख, कहानियाँ, कवितायें, बच्चों की कहानियाँ और कवितायें प्रकाशित।

पुरस्कृत कविता- क्षणिकाएँ

दीवार
नफरत के बीज
कुछ यूँ पनपे
हवा भी बीच से गुजरी
तो दीवार बन गई

लड़कियां
वो कोख है
कोसी जाती है
श्रापी जाती है
फिर गिरा दी जाती हैं

भूख
अमीरों के चोचले
गरीबों की मुसीबत
बेसहारा माँ के लिए
पुनः बिकने का दर्द

मुंबई
स्वप्न नगरी
खून की होली
ग्रेनेड की दीवाली
अपनों की शहादत
आतंकियों की विश्राम स्थली

नेता
लाज जाए
पर गद्दी न जाए
देश लुटे
घर अपना बचाए
कपड़े बदल मिडिया में आए
आसुँओं में वोट ढूंढें
कफन में मुह छुपाये

लड़कियां
देह से मापी जाती है
गोरी पतली लम्बी
सुंदर
शिक्षा, रूह की रज़ा
कोई नही पूछता

लड़कियां
नई किताब की मानिंद
पढ़ा सहलाया
अलमारी में ठूंस दिया
फिर न झाड़ा, पोंछा
न धूप दिखाया
अस्तित्व की चीख
धीरे-धीरे
दीमक चाटता गया



प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ४, ५॰५, ६॰८५
औसत अंक- ५॰४५
स्थान- छठवाँ


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ४, ८, ५॰४५ (पिछले चरण का औसत
औसत अंक- ५॰८१६६७
स्थान- प्रथम


पुरस्कार और सम्मान- रु ३०० का नक़द पुरस्कार, प्रशस्ति-पत्र और रु १०० तक की पुस्तकें।

यूनिकवयित्री की कुछ कविताएँ जनवरी माह के अन्य तीन सोमवारों को भी प्रकाशित होंगी, अतः शर्तानुसार रु १०० प्रत्येक कविता के हिसाब से रु ३०० का नग़द इनाम दिया जायेगा।

हिन्द-युग्म प्रत्येक माह कम से कम १० कवियों को उपहार-स्वरूप पुस्तकें देकर इनका प्रोत्साहन करता आया है। इस बार हम जिन अन्य ९ कवियों को कवि गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल' द्वारा संपादित हाडौती के जनवादी कवियों की प्रतिनिधि कविताओं का संग्रह 'जन जन नाद' की एक-एक प्रति भेंट करेंगे, वे हैं

प्रकाश बादल
डा. राम भारतीय
संजय सेन सागर
अनिल जींगर
आकांक्षा पारे
सुनील कुमार सिंह "तेरा दीवाना"
आशिका " तनहा
शारदा अरोरा
सन्तोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

इन सभी कवियों से निवेदन है कृपया अपनी कविता ३१ जनवरी २००९ से पहले अन्यत्र प्रकाशित न करें/ करवायें।

अब पाठकों की बात करते हैं। पिछले महीने जिस पाठक ने हिन्द-युग्म को सबसे अधिक प्रभावित किया, वे हैं मनु बेतख्खल्लुस। मनु बे-तख्खल्लुस के टिप्पणियों की ख़ास बात यह रही कि इन्होंने शे'रों के माध्यम से प्रसंशा या आलोचना की।

यूनिपाठक- मनु बे-तख्खल्लुस

जन्म :२ मार्च १९६७ , दिल्ली में
माता पिता :श्रीमती ब्रहमा देवी एवं श्री जगत नारायण ( बहुत सरल स्वभाव के )
शिक्षा :राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र से घबड़ाकर स्कूल बीच में ही छोड़ दिया था..
लेखन कार्य : ये इन्हें ठीक से याद नहीं है....पर सन २००२ में एक अज़ीज़ दोस्त ने शे'र कहते देख कर एक डायरी लाकर दी और आग्रह किया कि कभी भी कुछ कहें तो कृपया इसमे ज़रूर उतार लें.....अभी आधी भी नहीं भरी है ....शायद लिखने के लिए नहीं लिखते ...कहने के लिए लिखते हैं.....और कहा हमेशा थोड़े ही जाता है....आधी रात के बाद में जो भी आ जाए वो ही शायरी है........सीखने की कोशिश से भी परहेज
पहला प्रकाशन :एक बिल्कुल छोटी सी लघुकथा हिंद-युग्म पर...(इतनी छोटी जैसे हलवाई कढाई में तेल की गर्मी जांचने के लिए आटे की छोटी सी गोली डालता है , इस गोली का परिणाम सुखद रहा और तब से हिंद युग्म को अपने साथ ही ले लिया......हाँ ...ग़ज़ल बहुत मन मार के भेजी थी ....ने छपने के डर से नहीं ...बल्कि इसलिए के अपने ख्यालों में किसी को शामिल नहीं करना चाहता थे .....पर अब ऐसे भी लोग मिले हैं यहाँ पर के सब कुछ बाँट लेने को जी करता है ..में इस बदलाव के लिए युग्म का तहेदिल से आभारी...
रूचि: कभी मूड हुआ तो लिख लिया..या कुछ रेखाएं रंगों से उकेर लीं ...या कुछ सूफी साफी सा सुन लिया...पर बच्चों के लिए बैंगन का भुरता बनाने में मूड बिल्कुल नहीं देखते...दिल से जुट जाते हैं..
एक बड़ा सहारा : कुटुंब, रिश्तेदार और कुछ थोड़े से ही सही मित्रों का अपार प्रेम
और एक बिमारी भी : बेटी के द्बारा हंसाये जाने पर खुल कर तब तक ठहाके लगाना जब तक होंठों की हँसी आँखों से ना बहने लगे..........
एक मुश्किल काम : हिंद युग्म देखने के बाद अपने पन्द्रह घंटे के दिन को खीं.......च ...कर......उन्नीस बीस घंटे का किया है..
पुरस्कार और सम्मान- रु ३०० का नक़द पुरस्कार, प्रशस्ति-पत्र और रु २०० तक की पुस्तकें।

दूसरे से चौथे स्थान के पाठक के रूप में हमने क्रमशः एम॰ ए॰ शर्मा "सेहर" , रंजना सिंह और दिगम्बर नासवा को चुना है, जिन्हें कवि गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल' द्वारा संपादित हाडौती के जनवादी कवियों की प्रतिनिधि कविताओं का संग्रह 'जन जन नाद' की एक-एक प्रति भेंट करेंगे।

हम निम्नलिखित कवियों का भी धन्यवाद करते हैं, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर इसे सफल बनाया और यह निवेदन करते हैं कि जनवरी २००९ की यूनिकवि एवम् यूनिपाठक प्रतियोगिता में भी अवश्य भाग लें।

एम॰ ए॰ शर्मा 'सेहर'
कुमार लव
गोपाल कृष्‍ण भट्ट ‘आकुल’
चतुरानन झा 'मनोज'
शामिख फ़राज़
अरूण मित्तल अद्भुत
केशव कुमार कर्ण
शाश्वत शेखर
हर्षवर्धन त्रिवेदी
दिगम्बर नासवा
मनु बेतख्खल्लुस
सुजीत कुमार सुमन
योगेश समदर्शी
एन॰ कन्नन
हरकीरत कलसी 'हकी़र'
नीति सागर
नितिन जैन
चंद्रमणि मिश्रा
तपन शर्मा
योगेश गाँधी
कमलप्रीत सिंह
क्रांति दीक्षित
राहुल कुमार पाण्डेय
अनिरुद्ध सिंह चौहान
सचिन जैन
सुमन कुमार सिंह
सुनील कुमार सोनू
शिवम शर्मा
विपुल श्रीवास्तव
रौशन कुमार
महेश कुमार वर्मा

हम बनाते रहे पुल


कार्टूनिस्टः मनु बेतक्खल्लुस
हम बनाते रहे पुल
वे खोदते रहे खाइयां,
हम ढूंढते रहे मरहम
वे चूभोते रहे सुईयां,
हमने सत्संग रचे
सांस्कृतिक सरोकार के,
उन्होंने बीज बोये
बन्दूकों हथियार के,
हम समझौता एक्सप्रेस के
डिब्बे चमकाते रहे ,
वे तीरों तलवार पर
धार लगाते रहे ,
हम शोयेब-इमरान
बोबी-अदनान के सेलेब्रिटी
सम्मान मे व्यस्त रहे,
वे दहशतगर्दों संग
खूनी शतरंज चाले
विमर्श करते रहे ,
जब हम अली हसन
कासिद शकील संग
लाफ़्टर के ठहाके
लगा रहे थे ,
तब वे असलमों को
झूठे विडियों और
खूनी तकरीरे
परोस रहे थे ,
.
लेकिन आज
साठ घंटों ने
जला दिये है सारे पर्दे
आंखे हमारी
देखे सकती
हर चालक हरकत,
पढ ली
पेशानी पर लिखी
धोखे की ईबारत,
पर....
कुछ कर नही सकते,
खडी है,
सियासत की अदृश्य
स्वार्थी दीवार,
जिसके पार
सब कुछ दिखता तो है ,
पर कर कुछ नही सकते,
जरा सोचों .......,
जिस दिन ये दीवार
बिखर जायेगी
उस दिन ....
एक अरब से ज्यादा
शान्ति सैनिकों का सैलाब
रौंद डालेगा
जर्रे जर्रे को ।

आतंकवाद पर दो प्रतिक्रियाएँ


मुम्बई के घटनाक्रम से आम आदमी कितना आहत है-इसका अंदाज़ा आप सीमा सचदेव की यह कविता पढ़कर लगा सकते हैं।

न जाने क्यों......?


मन आहत है
आँखे नम
कितना पिया जाए गम
नहीं देखा जाता
बिछी हुईं लाशों का ढेर
नहीं सहन होती माँ की चीख
नहीं देखी जाता
छन-छनाती चूडियों का टूटना
नहीं देखा जाता
बच्चों के सर से उठता
माँ-बाप का साया
नहीं देखी जाती
माँ की सूनी गोद
नहीं देखी जाती
किसी बहन की कुरलाहट
न जाने कब थमेगा
यह मृत्यु का नर्तन
यह भयंकर विनाशकारी ताण्डव
न जाने कितनी
मासूम जाने लील लेगा
और भर जाएगा
पीछे वालों की जिन्दगी में अन्धेरा
मजबूर कर देगा जिन्दा लाश बनकर
साँस लेने को
न जाने क्यों......



शौकिया तौर पर कार्टून तथा चित्र बनाने वाले मनु 'बे-तक्खल्लुस' अपनी प्रतिक्रिया इस तरह से भेजी है।

अस्पष्ट वक्तव्य को इस तरह से पढ़ें- अगर हम सत्ता में आये तो सभी राज्यों को एक जुट कर एक ही राज्य बना देंगे।