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आतंकवाद पर दो प्रतिक्रियाएँ


मुम्बई के घटनाक्रम से आम आदमी कितना आहत है-इसका अंदाज़ा आप सीमा सचदेव की यह कविता पढ़कर लगा सकते हैं।

न जाने क्यों......?


मन आहत है
आँखे नम
कितना पिया जाए गम
नहीं देखा जाता
बिछी हुईं लाशों का ढेर
नहीं सहन होती माँ की चीख
नहीं देखी जाता
छन-छनाती चूडियों का टूटना
नहीं देखा जाता
बच्चों के सर से उठता
माँ-बाप का साया
नहीं देखी जाती
माँ की सूनी गोद
नहीं देखी जाती
किसी बहन की कुरलाहट
न जाने कब थमेगा
यह मृत्यु का नर्तन
यह भयंकर विनाशकारी ताण्डव
न जाने कितनी
मासूम जाने लील लेगा
और भर जाएगा
पीछे वालों की जिन्दगी में अन्धेरा
मजबूर कर देगा जिन्दा लाश बनकर
साँस लेने को
न जाने क्यों......



शौकिया तौर पर कार्टून तथा चित्र बनाने वाले मनु 'बे-तक्खल्लुस' अपनी प्रतिक्रिया इस तरह से भेजी है।

अस्पष्ट वक्तव्य को इस तरह से पढ़ें- अगर हम सत्ता में आये तो सभी राज्यों को एक जुट कर एक ही राज्य बना देंगे।

'आतंकवाद' पर ऑनलाइन परिचर्चा में भाग लें


वर्ष २००८ का लगभग सारा समय आतंकवाद के साये में बीता है। ऐसा लगता है कि भारत में यदि कोई बात आम है तो वो है कहीं बम फटना, कहीं गोली चलना तो कहीं दंगे फैलना। इस नई सदी में पूरी दुनिया ने आतंकवाद का भयावह चेहरा देखा है। कौन है इसका जिम्मेदार? हम, सरकार या हमारा तंत्र? कब थमेगा आदमी से आदमी का यह हिंसक संग्राम?

इसी विषय पर यानी आतंकवाद पर इस रविवार ३० नवम्बर २००८ को हम एक ऑनलाइन परिचर्चा का आयोजन कर रहे हैं। हम चाहते हैं कि वैश्विक पहुँच वाले इस टूल (इंटरनेट) का इस्तेमाल हम वैचारिक मंथन कर सकें और किसी निष्कर्ष पर पहुँच सकें। परिचर्चा रविवार ३० नवम्बर २००८ को भारतीय समयानुसार सुबह १० बजे से १२ तक स्काइपी पर आयोजित होगी। स्काइपी का इस्तेमाल बहुत आसान है। स्काइपी का इस्तेमाल कैसे करें?-पर संपूर्ण ट्यूटोरियल यहाँ उपलब्ध है। स्काइपी पर अपना खाता बनाकर हिन्द-युग्म की स्काइपी आईडी hindyugm को खुद से जोड़ें।

परिचर्चा में ज़रूर भाग लें। कृपया नीचे के फॉर्म में आवश्यक जानकारी भरकर अपना पंजीकरण करा लें।



परिचर्चा-संचालकः डॉ॰ श्याम सखा 'श्याम'
तकनीकी-सहयोगः तपन शर्मा

वहशत की दहशत...


स्याह बादल छंट गये, आसमाँ भी धुल गये,
कल की आँधी भूल सब आगे निकल गये.

धरती हुई थी लाल, लपटें उठी थीं विकराल,
अनदेखों ने अनजानों से खेली थी होली लाल,
न तुमको चेहरा मिला, ना ही कोई नाम मिला,
फिर क्यों किया मौत का तान्डव, ये ज़लज़ला...?

कोई भाई ढूंढता मिला, किसी को न दोस्त मिला,
बदहवास से समेटते रहे, वो दहशत का सिलसिला,
माँएँ बिलखती रहीं, बेटियाँ सिसकती रहीं,
कुछ वहशी पलों में, जीवन बेल टूटती रहीं,

रूपहले स्वप्न टूट गये, मोती सारे बिखर गये,
बिन चाहे वो तो अपना, अंतिम सफर कर गये,
लाचार हो खडे सब तमाशा देखते रहे,
और तूफानों में मुस्काते फूल बिखरते रहे.

देश अन्धेरे में डूबता रहा, सियासत अनजान रही,
हिन्द की धरती पर आज अपनों की साजिश रही,
आज यहाँ कल वहाँ बस यही सवाल रह गये,
कब तुम कब हम, बस अब यही हाल रह गये.


स्याह बादल छंट गये, आसमाँ भी धुल गये,
कल की आन्धी भूल सब आगे निकल गये...

--अरविन्द चौहान