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कुछ दिनों से माँ मेरी सोयी नहीं


यूनिकवि प्रतियोगिता में ८वें पायदान पर सम्मिलित कविता पुणे की कवयित्री आशिका प्रदीप कुमार पांडेय की है। नागपुर में पढ़ीं-लिखीं आशिका अपने नाम में 'तन्हा' तखल्लुस लगाती हैं। इस तरह से ये हिन्द-युग्म की दूसरी 'तन्हा' रचनाकार हुईं। आशिका 'तन्हा' की रचनाएँ ग्लोरीयस टाइम्स नामक राइटर्स फोरम मे प्रकाशित होती हैं। पूणे में काफेरत्ती नामक राइटर्स ग्रूप में भी इनकी रचनाएँ पढ़ी और सराही जाती हैं। लेखन इन्हें अपनी माता से विरासत में मिला है।

पुरस्कृत रचना- कुछ दिनों से माँ मेरी सोयी नहीं

ये बेचैन सा चेहरा
ये सूनी सी मुस्कान
ये डरा सा लह्जा
ये आह के निशान
ये पथराई आंखें कब से रोई नहीं
गोया कुछ दिनों से माँ मेरी सोयी नहीं

वो अनसुलझे सवाल
वो कराहते जवाब
वो अपनों का बवाल
वो परायों का अज़ाब
वो पेशानी की सिमटी सिलवटें खोयी नहीं
गोया कुछ दिनों से माँ मेरी सोयी नहीं

ये दर - ओ - घर के मसायल
ये नफरत का कोहरा
ये जिस्म-ओ-जिगर घायल
ये जेहाद का मोहरा
ये फ़रज़न्दों में अपना उसका कोई नहीं
गोया कुछ दिनों से माँ मेरी सोयी नहीं

वो मन्दिर-ओ-दरगाह पर शिरकत
वो सिसकती दुआ का काफीला
वो दिल ओ दिमाग की मशक्कत
वो न कुबूल होने का सिलसिला
वो दीवारे जो सरहदों का बोझ ढोई नहीं
गोया कुछ दिनों से माँ मेरी सोयी नहीं

ये जिस्म पर पड़े खून के कतरे
ये सांसो पर पड़े ज़ख्मो के दाग
ये फटे से ज़हन के चिथड़े
ये बदले की जलन और रंजिश की आग
ये खुला हुआ सीना- किसी ने उसकी आबरू बचायी नहीं
गोया कुछ दिनों से माँ मेरी सोयी नहीं

कोई उसके बच्चो को मिलाता नहीं
कोई खुदा को भी उसकी आवाज़ सुनाता नहीं
उसके बच्चे करवट लिए सोते रहे
कोई उन्हें नीद से जगाता नहीं
कोई रहनुमा बनकर उसको बचाता नहीं
कोई उसकी दीद को आता जाता नहीं
उसके बच्चे आपस में ही लड़-लड़ मरे
कोई उसके दिल को सुकून पहुँचता नहीं
कोई उसे आब-ऐ-हयात से नहलाता नहीं
कोई रिसते ज़ख्मो को उसके सिलता नहीं
उसके बच्चो को फुर्सत नहीं यलगार से
कोई उसके सीने पर दुपट्टा ओढ़ाता नहीं
वो जन्नत की चाह में अपनों के ही लहू से खेल रहे है होली
दोज़ख की आग में जलने- लूट रहे है अपनी बहेनो की डोली
रूह काँपती है उसकी दहशत-ओ-वहशत से
जार जार बहते हैं अश्क उसके हर शहादत पे
मेरी प्यारी माँ चीख-चीख कर हार गई है
रो-रो कर अब उसकी आँखे भी पथरा गई हैं
चलो मिटाएँ उसकी परेशां पेशानी के कुछ बल
चलो दे दे उसे भी रहत-ओ-सुकून के कुछ पल
जो अब भी ग़म दिया तो ना खोयेगी वो
जा अब न सुकून दिया तो न रोएगी वो
मेरी माँ को बस चैन-ओ-अमन चाहिए
जो अब भी न दे सके तो ना सोयेगी वो
उसे बस चैन और अमन चाहिए - जो न दे सके तो ना सोयेगी वो..........

प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- २, ५॰५, ७॰१
औसत अंक- ४॰८६६६७
स्थान- सत्रहवाँ


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ४, ५, ४॰८६६६७ (पिछले चरण का औसत
औसत अंक- ४॰६२२
स्थान- आठवाँ


पुरस्कार- कवि गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल' द्वारा संपादित हाडौती के जनवादी कवियों की प्रतिनिधि कविताओं का संग्रह 'जन जन नाद' की एक प्रति।

पाँच साल का मेरा चांद (निदा फ़ाज़ली)


दुनिया पर मंडरा रहे आतंक के बादलों को देख हर संवेदनशील व्यक्ति आतंकित है। भारत के जाने-माने साहित्यकार निदा फ़ाज़ली भी इससे अछूते नहीं है। मुम्बई में हुई २६ नवम्बर की घटना पर निदा ने भी एक कविता लिखी, जिसका प्रकाशन हम उन्हीं की अनुमति से हिन्द-युग्म पर कर रहे हैं। नये पाठकों को बता दें कि ७० वर्षीय निदा फाज़ली का जन्म दिल्ली में हुआ और प्राथमिक शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर में हुई। विभाजन के वक़्त इनके पिता जो खुद एक जाने-माने शायर थे, पाकिस्तान चले गये, परंतु निदा भारत रुक गये। निदा एक बार एक मंदिर के पास से गुजर रहे थे तो उन्होंने सूरदास का वह भजन सुना जिसमें सूरदास ने राधा का कृष्ण से वियोग होने के दुःख का वर्णन किया था। इस भजन ने निदा को बहुत प्रभावित किया और इससे ही प्रभावित होकर निदा ने कविता में अपना पहला गंभीर प्रयास किया। निदा फाजली मानते थे कि उर्दू कविता का दायरा सीमित है, निदा ने उर्दू कविता के आकाश को महाकवि टी॰ एस॰ इलियट, गोगोल, एंटन पावलोविच चेखोव (Anton Pavlovich Chekhov) तथा ताकासाकी इत्यादि को पढ़कर फैलाया। ये मीर और ग़ालिब के अंदाज़-ए-बयाँ के भी समर्थक रहे, साथ ही साथ कबीर तथा मीरा के गेयात्मकता के भी अनुगामी। निदा को इनके कविता-संग्रह 'खोया हुआ सा कुछ' के लिए १९९८ का साहित्य-अकादमी पुरस्कार भी मिला। इन्होंने फिल्मों में भी गीत लिखें, जिसमें रज़िया-सुल्तान, आप ऐसे तो ना थे, यात्रा, सुर तथा सरफ़रोश के नाम उल्लेखनीय है। निदा के ऊपर लिखने के लिए कीबोर्ड पर बिना रुके चलने वाली उँगलियाँ चाहिए, फिलहाल इतना सामर्थ्य मुझमें नहीं है। साहित्यकार का साहित्य ही उसकी पहचान होता है। फिलहाल हम उनकी कविता पढ़ते हैं।

मनु बे-तक्खल्लुस
जो भी हुआ था किसने किया था..
पता नहीं है...
बस इतना मालूम है हमको
जिंदा इंसानों के बिखरे टुकड़ों में
मेरा बच्चा भी शामिल था...
कोई किसी की अंगूठी को अपना रिश्ता मान रहा था...
कोई किसी के नाम को उसकी एनक से पहचान रहा था...
मेरे मातम का कोई भी नाम नहीं था...
किसे बताती वो कैसा था …?
छोटे-छोटे हाथ पांव थे…
बच्चा था.... बच्चों जैसा था...
पता नहीं जिस क़ब्र पे उसके नाम का पत्थर लगा हुआ है
उसमें वो कितना है लेकिन...
घर के ताक़ में उसकी जो तस्वीर लगी है
उसमें वो पूरा है अबतक…
पांच साल का चांद ये मेरा यूं ही रहेगा पूरा
मैं ज़िंदा हूं जब तक...

वो अल्लाह मेरा भी है


जेहाद के नाम पर
मासूमों को बरगलाने वालो
उनको अपने नापाक मंसूबों
को पूरा करने में लगाने वालो
जो हाथ कितने चमत्कार कर सकते थे
उनके हाथ में बन्दूक थमाने वालो
कायरो
सामने आओ
एक माँ,
करेगी क्या हश्र तेरा
देखना है तो सामने आ
ये तेरी फितरत नहीं
बुझदिल
तू मासूमों के हाथों
मासूमों का कत्ल करा रहा है
कमीने
तुझे
तो
नहीं मिलेगी
दोजख में भी जगह
ये उस माँ शाप है
जिसने तुम्हारे लिए
पाँचों वक़्त की नमाज़ अदा करनी
शुरू कर दी है
तुम्हारी तबाही के लिए
तुम्हारी बर्बादी के लिए
क्योंकि वो अल्लाह मेरा भी है

--नीलम मिश्रा

हम बनाते रहे पुल


कार्टूनिस्टः मनु बेतक्खल्लुस
हम बनाते रहे पुल
वे खोदते रहे खाइयां,
हम ढूंढते रहे मरहम
वे चूभोते रहे सुईयां,
हमने सत्संग रचे
सांस्कृतिक सरोकार के,
उन्होंने बीज बोये
बन्दूकों हथियार के,
हम समझौता एक्सप्रेस के
डिब्बे चमकाते रहे ,
वे तीरों तलवार पर
धार लगाते रहे ,
हम शोयेब-इमरान
बोबी-अदनान के सेलेब्रिटी
सम्मान मे व्यस्त रहे,
वे दहशतगर्दों संग
खूनी शतरंज चाले
विमर्श करते रहे ,
जब हम अली हसन
कासिद शकील संग
लाफ़्टर के ठहाके
लगा रहे थे ,
तब वे असलमों को
झूठे विडियों और
खूनी तकरीरे
परोस रहे थे ,
.
लेकिन आज
साठ घंटों ने
जला दिये है सारे पर्दे
आंखे हमारी
देखे सकती
हर चालक हरकत,
पढ ली
पेशानी पर लिखी
धोखे की ईबारत,
पर....
कुछ कर नही सकते,
खडी है,
सियासत की अदृश्य
स्वार्थी दीवार,
जिसके पार
सब कुछ दिखता तो है ,
पर कर कुछ नही सकते,
जरा सोचों .......,
जिस दिन ये दीवार
बिखर जायेगी
उस दिन ....
एक अरब से ज्यादा
शान्ति सैनिकों का सैलाब
रौंद डालेगा
जर्रे जर्रे को ।

आतंकवादी


सुबह
आँख खुलते ही मैंने देखा
मच्छरदानी के भीतर बहुत से मच्छर हैं
मोटे-मोटे, लाल-लाल
मेरा खून पीकर मस्त
छोटे-छोटे छिद्रों से
बाहर निकलने का मार्ग ढूँढ़ने में व्यस्त
लम्बे पैरों वाले रक्त पिपासु मच्छर !

नहीं
कोई मुझे काट नहीं रहा था
न ही मेरे शरीर का कोई अंग
इनके काटने से दुःख रहा था
मैंने सोचा
मुक्त कर दूं इन्हें कैद से
नाहक क्यों गंदा करूं अपना हाथ
इन्हें मारकर।

तभी अखबार वाला अखबार दे गया
लेटे-लेटे पढ़ने के लिए उठाया
हेडलाइन्स पर निगाह गई-
मुम्बई में आतंकवादियों द्वारा सौ से अधिक लोगों की हत्या
मरने वालों में
हेमंत करकरे, अशोक काम्टे, विजय सालस्कर भी-----
आगे पढ़ने की इच्छा नहीं हुई

मुझे अपनी भूल का एहसास हुआ
मैने मच्छरदानी को चारों ओर से कस कर बंद कर दिया
और चुन चुनकर मच्छरों को मारने लगा।

हर बार
जब मेरी हथेलियाँ आपस में टकरातीं
तो उससे निकलने वाली करतल ध्वनि
मुझे और हिंसक बना देती

धीरे-धीरे सारे मच्छर मर गये
मैंने देखा-
मेरी हथेलियों में मेरा ही खून उतर आया था
मैंने उठकर हाथ धोया
और चाय की प्याली में
नई सुबह की धूप घोलकर पीने लगा।

--देवेन्द्र कुमार पाण्डेय

हेमंत करकरे नाम का एक आदमी मर गया था


मुम्बई में आम लोगों की सुरक्षा में शहीद हुए हिन्द के नायकों को श्रद्दासुमन अर्पित करते हुए आवाज़ पर विश्व दीपक 'तन्हा' की एक कविता और कुछ लोगों के उद्गार हमने प्रकाशित किये थे। आज दुबारा एक प्रकाशित रचना द्वारा ही वीरों की शहादत को दुबारा याद कर रहे हैं---



आज ही हमें सूचना मिली कि मुम्बई में होटेल ताज़ पर हुए आतंकवादी हमले के दौरान हिन्द-युग्म के नियमित पाठक, कवि और हिन्दी-सेवी राजीव सारस्वत का देहांत हो गया। पढ़िए पूरी ख़बर॰॰

एक आदमी दिखाता था अपना हाथ बार बार
कैमरे के सामने
जिसमें से चूता था टप टप खून,
एक आदमी ने अपने कमरे की खिड़की के शीशे पर
लिखा था, ‘हमें बचा लो’
कोलगेट के टूथपेस्ट या जिलेट की शेविंग क्रीम से।
खिड़की पर ज़ूम होता था बार बार कैमरा।
जाने कौनसा मॉडल था,
बहुत बढ़िया था रिज़ोल्यूशन।

दनादन गोलियाँ निकलती थीं
चलती हुई जिप्सी में से,
लोग लेट जाते थे लेटी हुई सड़क पर,
हम सब लिहाफ़ों में लेटकर देखते थे टीवी,
बदलते रहते थे चैनल,
बार बार चाय पीते थे।

समाचार वाली सुन्दर लड़कियाँ बताती थीं
हमें और भी बहुत सारी नई बातें
और जब हम सब कुछ भूल जाना चाहते थे
उनकी छातियों पर नज़रें गड़ाकर
तब सारी उत्तेजनाएँ जैसे किसी खानदानी दवाखाने की
शिलाजीत की गोलियों में छिप जाती थी।
उचककर छत से चिपककर
फूट फूट कर रोने का होता था मन।
नहीं आता था रोना भी।

हेमंत करकरे नाम का एक आदमी
मर गया था
और नहीं जीने देता था हमें।
ऐसे ही कई और साधारण नामों वाले आदमी
मर गए थे
जो नहीं थे सचिन तेंदुलकर, आमिर ख़ान
या अभिनव बिन्द्रा,
नहीं लिखी जा सकती थी उनकी जीवनियाँ
बहुत सारे व्यावसायिक कारणों से।

वह रात को देर से पहुँचने वाला था घर,
फ़्रिज में रखा था शाही पनीर
और गुँधा हुआ आटा,
एक किताब आधी छूटी हुई थी बहुत दिन से,
माँ की आती रही थीं शाम को मिस्ड कॉल,
उसे भी करना था घर पहुँचकर फ़ोन,
ढूंढ़ना था कोल्हापुर में
कॉलेज के दिनों की एक लड़की को,
बस एक बार देखना था उसका अधेड़ चेहरा,
उसके बच्चे,
अपने बच्चों के साथ देखनी थी
पच्चीस दिसम्बर को गजनी।
गजनी माने आमिर ख़ान।

एक दिशा थी
जहाँ से आने वाले सब लोग
भ्रमित हो जाते थे,
एक प्यारा सा चमकीला शहर था
जिसका दुखता था पोर पोर,
जबकि वह एक से अधिक पिताओं का दौर था,
खेलते-सोते-पढ़ते-तुनकते-ठुनकते पचासों बच्चे
रोज हो जाते थे अनाथ,
हमें आता था क्रोध
और हम सो जाते थे।

कमज़ोर याददाश्त और महेन्द्र सिंह धोनी के इस समय में
यह हर सुबह गला फाड़कर उठती हुई हूक,
हेमंत करकरे, अशोक काम्टे, विजय सालस्कर
और बहुत सारे साधारण लोगों को बचाकर रख लेने की
एक नितांत स्वार्थी कोशिश है,
इसे कविता न कहा जाए।

--गौरव सोलंकी

दो मिनट का मौन रखना सीख ले


हर तरफ़ फैली हुई ये ज़ुल्मतें
रौशनी होंगी तेरी कब रहमतें

शह्र को अब कर रहे हैं सब सलाम
हज़्म कर ली शह्र ने सब ज़िल्लतें

कुछ कंदीलें जल रही मरहूमों पर
गिन नहीं पाते हैं इतनी मैय्यतें

दो मिनट का मौन रखना सीख ले
कारगर होती हैं अच्छी सोहबतें

मौत का साया धुआं बन कर उड़ा
बढ़ गई इक दूसरे से कुर्बतें

ये सियासत है संभल कर के चलो
हो सके तो सीख लो सब तोहमतें

अलविदा पर ख़त्म है ये दास्ताँ
कौन रखेगा किसी से चाहतें

(अर्थ: ज़ुल्मतें = अंधेरे, जिल्लतें = अपमान, कंदीलें = मोमबत्तियां, मरहूम = मृत व्यक्ति, मैय्यतें = अर्थियां, कारगर = उपयोगी, सोहबत = संगत, साथ, कुर्बतें = करीबियां, सियासत = राजनीति, तोहमतें = इल्जाम)

ग़ज़लगो--प्रेमचंद सहजवाला

आतंकवाद पर दो प्रतिक्रियाएँ


मुम्बई के घटनाक्रम से आम आदमी कितना आहत है-इसका अंदाज़ा आप सीमा सचदेव की यह कविता पढ़कर लगा सकते हैं।

न जाने क्यों......?


मन आहत है
आँखे नम
कितना पिया जाए गम
नहीं देखा जाता
बिछी हुईं लाशों का ढेर
नहीं सहन होती माँ की चीख
नहीं देखी जाता
छन-छनाती चूडियों का टूटना
नहीं देखा जाता
बच्चों के सर से उठता
माँ-बाप का साया
नहीं देखी जाती
माँ की सूनी गोद
नहीं देखी जाती
किसी बहन की कुरलाहट
न जाने कब थमेगा
यह मृत्यु का नर्तन
यह भयंकर विनाशकारी ताण्डव
न जाने कितनी
मासूम जाने लील लेगा
और भर जाएगा
पीछे वालों की जिन्दगी में अन्धेरा
मजबूर कर देगा जिन्दा लाश बनकर
साँस लेने को
न जाने क्यों......



शौकिया तौर पर कार्टून तथा चित्र बनाने वाले मनु 'बे-तक्खल्लुस' अपनी प्रतिक्रिया इस तरह से भेजी है।

अस्पष्ट वक्तव्य को इस तरह से पढ़ें- अगर हम सत्ता में आये तो सभी राज्यों को एक जुट कर एक ही राज्य बना देंगे।

'आतंकवाद' पर ऑनलाइन परिचर्चा में भाग लें


वर्ष २००८ का लगभग सारा समय आतंकवाद के साये में बीता है। ऐसा लगता है कि भारत में यदि कोई बात आम है तो वो है कहीं बम फटना, कहीं गोली चलना तो कहीं दंगे फैलना। इस नई सदी में पूरी दुनिया ने आतंकवाद का भयावह चेहरा देखा है। कौन है इसका जिम्मेदार? हम, सरकार या हमारा तंत्र? कब थमेगा आदमी से आदमी का यह हिंसक संग्राम?

इसी विषय पर यानी आतंकवाद पर इस रविवार ३० नवम्बर २००८ को हम एक ऑनलाइन परिचर्चा का आयोजन कर रहे हैं। हम चाहते हैं कि वैश्विक पहुँच वाले इस टूल (इंटरनेट) का इस्तेमाल हम वैचारिक मंथन कर सकें और किसी निष्कर्ष पर पहुँच सकें। परिचर्चा रविवार ३० नवम्बर २००८ को भारतीय समयानुसार सुबह १० बजे से १२ तक स्काइपी पर आयोजित होगी। स्काइपी का इस्तेमाल बहुत आसान है। स्काइपी का इस्तेमाल कैसे करें?-पर संपूर्ण ट्यूटोरियल यहाँ उपलब्ध है। स्काइपी पर अपना खाता बनाकर हिन्द-युग्म की स्काइपी आईडी hindyugm को खुद से जोड़ें।

परिचर्चा में ज़रूर भाग लें। कृपया नीचे के फॉर्म में आवश्यक जानकारी भरकर अपना पंजीकरण करा लें।



परिचर्चा-संचालकः डॉ॰ श्याम सखा 'श्याम'
तकनीकी-सहयोगः तपन शर्मा

लहू सभी का है जब एक तो ये मज़हब क्या


क्यों अपने शहर के माहौल से हिरासाँ हूँ
ख़ुद अपने साए से लोगो रहा पशेमाँ हूँ

कहीं पे कोई ठिकाना नहीं मिला मुझ को
सबब ये कह रहे हैं सब कि मैं मुसलमाँ हूँ

जवाब जिन के न दे पाये हैं मसीहा भी
उन्हीं सवालों से अक्सर रहा गुरेज़ाँ हूँ

शह्र में घूमना फिरना है मेरी फितरत पर
यूँ अपने आप में चलता हुआ सा ज़िन्दाँ हूँ

हरेक शख्स के मज़हब से यूँ तो उल्फत है
ये कह रहे हैं खिरदमंद बहुत नादाँ हूँ

धुआँ ये नफरतों का ता-फलक पहुँचता देख
मैं अपनी आंखों से किस कद्र तो परेशाँ हूँ

लहू सभी का है जब एक तो ये मज़हब क्या
इसेक बात पे मैं अज़ल से ही हैराँ हूँ

खलल में डाल दी जिस ने तेरी इबादत तक
मुझे लगा है मसीहा कि मैं वो शैताँ हूँ

(अर्थ: हिरासाँ = भयभीत, पशेमाँ = शर्मिंदा, गुरेज़ाँ = भागा हुआ, फितरत = स्वभाव, ज़िन्दाँ = जेल, खिरदमंद = अक्लमंद, ता-फलक = आसमान तक, लहू = रक्त, अज़ल = सृष्टि रचना काल, खलल = विघ्न, )

--प्रेमचंद सहजवाला

वहशत की दहशत...


स्याह बादल छंट गये, आसमाँ भी धुल गये,
कल की आँधी भूल सब आगे निकल गये.

धरती हुई थी लाल, लपटें उठी थीं विकराल,
अनदेखों ने अनजानों से खेली थी होली लाल,
न तुमको चेहरा मिला, ना ही कोई नाम मिला,
फिर क्यों किया मौत का तान्डव, ये ज़लज़ला...?

कोई भाई ढूंढता मिला, किसी को न दोस्त मिला,
बदहवास से समेटते रहे, वो दहशत का सिलसिला,
माँएँ बिलखती रहीं, बेटियाँ सिसकती रहीं,
कुछ वहशी पलों में, जीवन बेल टूटती रहीं,

रूपहले स्वप्न टूट गये, मोती सारे बिखर गये,
बिन चाहे वो तो अपना, अंतिम सफर कर गये,
लाचार हो खडे सब तमाशा देखते रहे,
और तूफानों में मुस्काते फूल बिखरते रहे.

देश अन्धेरे में डूबता रहा, सियासत अनजान रही,
हिन्द की धरती पर आज अपनों की साजिश रही,
आज यहाँ कल वहाँ बस यही सवाल रह गये,
कब तुम कब हम, बस अब यही हाल रह गये.


स्याह बादल छंट गये, आसमाँ भी धुल गये,
कल की आन्धी भूल सब आगे निकल गये...

--अरविन्द चौहान

अच्छा नहीं लगता


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हाथ खाली हों तो आँखें भर लाना अच्छा नहीं लगता
उनकी दुनिया लुट गई, उन पर गाना अच्छा नहीं लगता
माना सबके खिरजो-जज्बात* के अपने तरीके हैं मगर
मुझे 'धमाकों' पर कविता लिखना अच्छा नहीं लगता

माँ होकर क्यों देखती हूँ वही तमाशा जो बरहा लगता है
क्यों यतीम बच्चे देख मेरा खून खौलता नहीं पिघलता है
क्यों जागती हूँ तब ही जब कोई 'बापू' या 'बोस' जगता है
क्यों हरदम "मुझे" किसी रहनुमा* का इंतज़ार रहता है
उन शहीदों को यूँ नज्मों में मारना अच्छा नहीं लगता
मुझे 'धमाकों' पर कविता लिखना अच्छा नहीं लगता

मशहर-सा* माहौल है हरसू, दिल भी उदास ख़राब है
उठे हुए सवालों ने ऐसी 'सुखन' पाई के सब लाजवाब है**
अब लिखने को नहीं, करने को, उठने को हाथ बेताब हैं
क्यों लिख रही हूँ फिर, क्यों मेरी बगावत में हिजाब* है
कुछ कर नहीं सकती और 'कुछ न करना' अच्छा नहीं लगता
मुझे 'धमाकों' पर कविता लिखना अच्छा नहीं लगता

शायद कुछ मिनिट लगते हैं एक नज़्म लिखने में
और शायद कुछ मिनिट लगे थे वो जानें जाने में
कुछ मिनिट लगेंगे मॉल्स की 'सेक्युरिटी' परखने में
कुछ मिनिट लगेंगे हमें हरसू एहतियात बरतने में
'दानव बड़ा है' सोच कुछ पल लगेंगे सबको डरने में
'दानव बड़ा है' जान गुंजाइश घटेगी निशाने-तीर चूकने में
जागो तो कुछ पल लगेंगे सबको थोड़ा-थोड़ा जगने में
समझो तो पल भी नहीं लगेंगे मेरी बात समझने में
'चूड़ी-कंगन पहने' यूँ बैठे रहना अब अच्छा नहीं लगता
मुझे 'धमाकों' पर कविता लिखना अच्छा नहीं लगता

- रूपम चोपडा (RC)

(**सुखन = यहाँ दो मतलब लिए हैं - बातचीत और कविता
खिरजो-जज्बात = खिरज और जज्बात = श्रद्धांजलि और भावनाएं
मशहर = प्रलय, हिजाब = सुशीलता/नम्रता, रहनुमा = मार्गदर्शक, लीडर )

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वो इक विमान से तफ्तीश करने आया था


आतंकवाद - दो गजलें

कल हुई दहशत ने मारे थे बहुत
जो गए, वो लोग प्यारे थे बहुत

जिस जगह पर कल धुआँ उठने लगा
घर वहाँ मेरे तुम्हारे थे बहुत

दोस्तों के और अजीजों के लिए
लोग वो सच्चे सहारे थे बहुत

धूप मीठा खिलखिलाती थी मगर
छा गए फिर मेघ कारे थे बहुत

यक-ब-यक बस्ती धुएँ से भर गई
लोग कितना डर के मारे थे बहुत

कुछ नहीं मेरा तुम्हारा ये कुसूर
अज़ल से ही अश्क खारे थे बहुत

(अर्थ: दहशत = आतंक, अज़ल = सृष्टि रचना काल , यक-ब-यक = अचानक )

(2)

शहर में मौत पे अफ़सोस करने आया था,
वो कौन शख्स था जो दर्द पढ़ने आया था.

जहाँ पे आज धमाका हुआ था शाम ढले
वहीं पे कल ही तो मैं सैर करने आया था.

यहीं पे पहली मुलाक़ात में मिला था मुझे
यहीं पे आज वो सब से बिछड़ने आया था.

बहुत हसीन था वो लाजवाब सूरत थी
कफ़न के पैरहन में अब सँवरने आया था.

बहुत बयान दिए हुक्मराँ ने मकतल पर
वो इक विमान से तफ्तीश करने आया था.

तुम इस तर्ह मुझे मुजरिम समझ के मत देखो,
मैं अपने दीन पे ही जीने मरने आया था.

(अर्थ: पैरहन = वस्त्र मकतल = वधस्थल, तफ्तीश = जांच)

प्रेमचंद सहजवाला

वाह! मंत्री जी हों तो नत्थूलाल जैसे हों, वरना न हों


आतंकवाद
--------------
घटना घटी
नैतिकता के आधार पर
मंत्री जी घटनास्थल पर गये
घटना की निंदा की
मारे गये परिवारों के प्रति
संवेदना प्रकट की
और हर संभव सहायता का वचन दिया।

वाह!
मंत्री जी हों तो नत्थूलाल जैसे हों
वरना न हों।

आज फिर घटना घटी
मंत्री जी की नैतिकता फिर जागी
घटना स्थल पर गये
घटना की घोर निंदा की
दोषियों को पकड़कर
तत्काल मुकदमा चलाने का आदेश दिया
दूरदर्शन पर बार-बार दर्शन दिया
और हर संभव सहायता का वचन दिया।

वाह!
मंत्री जी हों तो नत्थूलाल जैसे हों
वरना न हों।

बार-बार घटना घटी
हर बार मंत्री जी की नैतिकता जागी
हर बार संवेदना प्रकट की
बार-बार दूरदर्शन पर दर्शन दिया

वाह!
मंत्री जी हों तो नत्थूलाल जैसे हों
वरना न हों।

नहीं किया
तो सिर्फ दो काम नहीं किया

एक
आजादी के इकसठ वर्षों के बाद भी
देश में
ऐसी व्यवस्था को जन्म नहीं दिया
कि ऐसी घटनाएँ
बार-बार न घटें।

दो
नैतिकता के आधार पर
अपना इस्तिफा नहीं दिया।

वाह!
मंत्री जी हों तो नत्थूलाल जैसे हों
वरना न हों।

--देवेन्द्र कुमार पाण्डेय

वो क्यों फोड़ते हैं बम? मुनिया नहीं जानती


एक छोटी बच्ची ने पूछा
अपनी माँ से
ये आतंकवाद क्या है?
वो क्यों फोड़ते हैं बम?
क्यों मारते हैं?
मेरी सहेली और उसके पापा को
उस बेटी को समझा न सकी -
उसकी माँ कुछ भी
क्योंकि उस बालमन की दुनिया में
नहीं है नफरत, ईर्ष्या और द्वेष कोई
और न ही है कोई शब्द
उसके शब्दकोष में
आतंकवाद जैसा कोई ..............................................

--नीलम मिश्रा