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माना तुम्हें शहर ने जगमग जगमग रातें दी होंगी


भरा-भरा सा दिन लगता है लेकिन खाली-खाली शाम
कहाँ गयी चौपालों वाली बतियाती मतवाली शाम

घर जाने का मन होता था मन में घर आ जाता था
शाम ढले ही इंतजार में खुलती खिड़की वाली शाम

सारे दिन की थकन मिटाती गय्या जैसी लगती थी
आँगन के पीपल के नीचे करती हुई जुगाली शाम

बाबूजी का हुक्का पानी अम्मा का चूल्हा चौका
सब बच्चों की अपने अपने हिस्से वाली थाली शाम

सूरज जाते जाते लेकर चला गया है अपने साथ
मैंने सिर्फ तुम्हारी ख़ातिर इतनी देर संभाली शाम

वो चौपालों की शामें थीं ये शामे चौराहों की
आवारा सड़कों संग बैठी होगी कहीं मवाली शाम

माना तुम्हें शहर ने जगमग-जगमग रातें दी होंगी
पर इसके बदले में इसने देखो 'रवि' चुराली शाम

--रवीन्द्र शर्मा 'रवि

सब रसूलों में बहुत तकरार है


किस के दिल में दर्द कितना है निहाँ
दे सके तो दे कोई ये इम्तिहाँ

हम मसीहा हो गए सब नातवाँ
मिट गए हैं तेरे क़दमों के निशाँ

ज़लज़लों की हो गई है इन्तिहा
ये हवा किस तर्फ होगी अब रवाँ

सब रसूलों में बहुत तकरार है,
टूट जाएगा किसी दिन ये मकाँ

नज्र मेरी क्या हुआ ये यक-ब-यक
बर्क़ सी दिखने लगी है कहकशाँ

बो रहे थे कल तलक जो खुशबुएँ
आज वो तामीर करते है धुआँ

मुझ पे रंजीदा हुआ भगवान क्यों
पूछता है अपने रब से मुस्लिमाँ

(अर्थ - निहाँ = छुपा हुआ, नातवाँ = कमज़ोर, ज़लज़ला = भूकंप, इन्तिहा = हद, रवाँ = प्रवाहित, रसूल = अवतार पैगम्बर, यक-ब-यक = अचानक, बर्क़ = बिजली, कहकशाँ = आकाश में सितारों भरा रास्ता, तामीर = निर्माण, रंजीदा- नाराज़).

- प्रेमचंद सहजवाला

लहू सभी का है जब एक तो ये मज़हब क्या


क्यों अपने शहर के माहौल से हिरासाँ हूँ
ख़ुद अपने साए से लोगो रहा पशेमाँ हूँ

कहीं पे कोई ठिकाना नहीं मिला मुझ को
सबब ये कह रहे हैं सब कि मैं मुसलमाँ हूँ

जवाब जिन के न दे पाये हैं मसीहा भी
उन्हीं सवालों से अक्सर रहा गुरेज़ाँ हूँ

शह्र में घूमना फिरना है मेरी फितरत पर
यूँ अपने आप में चलता हुआ सा ज़िन्दाँ हूँ

हरेक शख्स के मज़हब से यूँ तो उल्फत है
ये कह रहे हैं खिरदमंद बहुत नादाँ हूँ

धुआँ ये नफरतों का ता-फलक पहुँचता देख
मैं अपनी आंखों से किस कद्र तो परेशाँ हूँ

लहू सभी का है जब एक तो ये मज़हब क्या
इसेक बात पे मैं अज़ल से ही हैराँ हूँ

खलल में डाल दी जिस ने तेरी इबादत तक
मुझे लगा है मसीहा कि मैं वो शैताँ हूँ

(अर्थ: हिरासाँ = भयभीत, पशेमाँ = शर्मिंदा, गुरेज़ाँ = भागा हुआ, फितरत = स्वभाव, ज़िन्दाँ = जेल, खिरदमंद = अक्लमंद, ता-फलक = आसमान तक, लहू = रक्त, अज़ल = सृष्टि रचना काल, खलल = विघ्न, )

--प्रेमचंद सहजवाला

मुहब्बत की वापिस निशानी करें


मुहब्बत की वापिस निशानी करें।
शुरू फिर जो चाहें कहानी करें।।

है घाटे का सौदा मुहब्बत सदा।
हिसाब अब लिखें या जुबानी करें।।

चलो नागफनियाँ उखाड़ें सभी।
वहाँ फिर खड़ी रात-रानी करें।।

है रुत पर भला बस किसी का चला।
चलो बातें ही हम सुहानी करें।।

खरीदे बुढापे को कोई नहीं।
सभी तो पसन्द अब जवानी करें।।

बहुत जी लिये और मर भी लिये।
बता क्या तेरा जिन्दगानी करें।।

रवायत नहीं ‘श्याम’ जब ये भली।
तो फिर बातें क्यों हम पुरानी करें।।

ये भी क्या जिन्दगी हुई साहिब


घर जला, रोशनी हुई साहिब
ये भी क्या जिन्दगी हुई साहिब

है न मुझको हुनर इबादत का
सर झुका, बन्दगी हुई साहिब

भूलकर खुदको जब चले हम, तब
दोस्ती आपसे हुई साहिब

तू नही और ही सही कहना
क्या भला आशिकी हुई साहिब

खुद से चलकर तो ये नहीं आई
दिल दुखा, शायरी हुई साहिब

जीतकर वो मजा नहीं आया
हारकर जो खुशी हुई साहिब

तुम पे मरकर दिखा दिया हमने
मौत की बानगी हुई साहिब

'श्याम' से दोस्ती हुई ऐसी
सब से ही दुश्मनी हुई साहिब

फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन

--डॉ॰ श्याम सखा 'श्याम'

समझेगा कुरान की वो खामोशियाँ कैसे


Surendra Kumar Abhinnaयूनिकवि प्रतियोगिता के तीसरे स्थान पर हम सुरेन्द्र कुमार अभिन्न की कविता लेकर आये हैं। यमुना नगर (हरियाणा) में जन्मे अभिन्न अंग्रेजी भाषा और साहित्य में स्नातकोत्तर (एम.ए. व एम फिल्. ), यात्रा एवं पर्यटन प्रबंधन में स्नातकोत्तर (एम.टी.ए.) जैसी शिक्षाएँ ली हैं और आबकारी एवं कराधान अधिकारी के रूप में सेवारत हैं। सुरेन्द्र को अच्छा साहित्य (विधा चाहे कोई भी हो) पढना और उस पर चिंतन-मनन करना पसंद है।

पुरस्कृत कविता- अपने खिलाफ़

उजालों में पड़ी सच्चाई से मुंह मोड़ने वाले,
खोजेगा ख़ुद को अंधेरों के दरमियाँ कैसे

सुनाई न दी चीख जिसे मजलूम की,
समझेगा कुरान की वो खामोशियाँ कैसे

तोड़ेगा जब शाख से परिंदों के घोसले ,
बचायेगा मुसीबतों से अपना आशियाँ कैसे,

मैं ही गवाह हूँ अपने गुनाहों का चश्मदीद,
खोलूं खिलाफ अपने अपनी जुबान कैसे

पूछा न करो ख़त में के हम यहाँ कैसे,
समझ लो अपने शहर के हालत वहाँ कैसे



प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ५, ५, ६, ६॰८, ७
औसत अंक- ५॰९६
स्थान- चौथा


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ७, ७, ५॰९६ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ६॰६५३
स्थान- तीसरा


पुरस्कार- मसि-कागद की ओर से कुछ पुस्तकें। संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी अपना काव्य-संग्रह 'समर्पण' भेंट करेंगे।

रास्तों से गपगपाते चल दिये


ग़ज़ल- प्रेमचंद सहजवाला

रास्तों से गपगपाते चल दिये
बारहा ठोकर भी खाते चल दिये

हमसफ़र कोई मिला तो खुश हुए
राग उल्फत का सुनाते चल दिये

वक़्त जब बोला कि मंज़िल दूर है
बेवजह हम खिलखिलाते चल दिये

गर्मियों में छांव में बैठे कहीं
सर्द रुत में थरथराते चल दिये

हर हकीक़त से गले मिलते रहे
ख़्वाब से भी तो निभाते चल दिये

हाथ में परचम तमन्ना के लिए
ये कदम आगे बढ़ते चल दिये

---प्रेमचंद सहजवाला

वहां इंसानियत का खून करने वाले ही तो थे


टॉप १० कविताओं से आगे बढ़ते हैं। ११वें और १२वें स्थान की कविताओं का प्राप्तांक भी १०वें स्थान की कविता के लगभग बराबर ही था। इसलिए हमने इन दो कविताओं को भी प्रकाशित करने का निर्णय लिया है। इस स्थान पर अरूण मित्तल अद्‌भुत की एक ग़ज़ल है। अरूण मित्तल अद्‌भुत इससे पहले भी पुरस्कृत हो चुके हैं।

पुरस्कृत कविता- ग़ज़ल

वो धोखा दे गया हमको जरा से इक बहाने से
हमे शक उस पे था लेकिन डरे हम आजमाने से।

तेरे चेहरे पे ये मासूमियत भी खूब जमती है
क़यामत आ ही जायेगी जरा सा मुस्कुराने से।

वहां इंसानियत का खून करने वाले ही तो थे
नहीं था आग का रिश्ता किसी का घर जलाने से।

न ही जादूगिरी ना खेल है कोई तिलिस्मों का
यहाँ बनती है किस्मत अपने हाथों से बनाने से।

तुम्हे 'अद्‌भुत' से ही सारे मिले होंगे मगर हमको
शिकायत थी जमाने से शिकायत है जमाने से।



प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ६॰७, ३
औसत अंक- ४॰८५
स्थान- उन्नीसवाँ


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ५, ५, ४, ६॰४, ४॰८५(पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ५॰०५
स्थान- ग्यारहवाँ

जिस्म नीला पड़ा है मछली का


मुद्दतों बाद फिज़ा बदली है
उनके होठों पे' हँसी असली है

सूत रिश्तों का घेर लेता है
सूत कच्चा है इंसा तकली है

मेरा माज़ी गुज़र गया शायद
वो यह कहती है कैसी पगली है

राह भटके तो खो गई मंज़िल
कहने वालों की बात नकली है

जिस्म नीला पड़ा है मछली का
प्यास होगी इधर से निकली है


-अवनीश गौतम

तारे ज़मीन के हैं या हैं आस्मान के


क्यों लड़खड़ाते लफ्ज़ हैं मेरी ज़बान के
आसार हैं बहुत मेरे दिल की थकान के

इस शह्र में कहाँ रहूँ लोगो बताओ तो
दीवारो-दर वो तोड़ गए हैं मकान के

दे कर ज़मीन घूम रहा कार में देखो
इस गांव में बदल गए हैं दिन किसान के

हक़ मांगते हैं आज यहाँ बच्चे मुल्क के
तारे ज़मीन के हैं या हैं आस्मान के

मनसूबे किस को हैं यहाँ हाकिम बनाने के
दरवाज़े बंद कर दिए सब ने दुकान के

शायद हमीं से भूख बढ़ी है ज़मीन पर
शिकवे मिले हैं आज ये सारे जहान के

*मनसूबे = इरादे

--प्रेमचंद सहजवाला

आ गयी है सल्तनत फौलाद की अब गांव में


ख्वाब मेरी आँखों को बस खुशनुमा देते रहें,
रोज़ तकरीरें मुझे ऐ मेहरबाँ देते रहें

सारी खुशबू आपकी और खार हों मेरे सभी
और कितने इश्क के हम इम्तिहाँ देते रहें

मुजरिमों में नाम कितना भी हो शामिल आपका
आप अपनी बेगुनाही के बयां देते रहें

कर्जदारों के न कर्जे अब चुका पाएंगे हम
बा-खुशी कुर्बानियां अपनी किसाँ देते रहें

आ गयी है सल्तनत फौलाद की अब गांव में
या ज़मीं दे दें इन्हें या अपनी जाँ देते रहें

कायदों का मैं नहीं हों कायदे मेरे गुलाम
फलसफा ये मुन्सिफों को हुक्मराँ देते रहें

(फलसफा = दर्शन, philosopy, मुंसिफ = न्यायधीश, judge तकरीरें = वक्तव्य, speeches)

--प्रेमचंद सहजवाला

गुजरात 2002 में हुई नृशंस मुस्लिम हत्याओं पर


हुई है दोस्तो तकरार मज़हबों में अब
घरौंदे देख लो उन के इन्हें जलाने तक

गिरा हुआ है बहुत खून अब भी मकतल पर
खुली है आंख ये मेरे गवाह आने तक

कफस में कैद है बुलबुल बहुत से हैं सैय्याद
कोई न आएगा अब छटपटाते जाने तक

मिली है जिंदगी रिश्वत में हुक्मरां से मुझे
रहेंगे जिंदा कभी मौत के बुलाने तक

जला के जिस्म मेरा मुस्करा रहा है कोई
रुका हुआ है मेरी रूह को मिटाने तक

चमक है चेहरे पे जल्लाद के गुरूर भरी
सुनहले वर्क में तारिख को बनाने तक

लगा है ज़ख्म मसीहा को आज सूली पर
सदी भी कम है किसी घाव को भुलाने तक

(तकरार = लड़ाई, मज़हब = धर्म, मकतल = वधस्थल, कफस = पिंजरा, सैय्याद = पंछी पकड़ने वाले, रूह = आत्मा, वर्क = पृष्ठ, तारीख = इतिहास)
पुनश्च - तीसरा व चौथा शेर गुजरात हत्याओं की शिकार दो विशेष अभागी महिलाओं पर हैं. यह मैं पाठक पर छोड़ देता हूँ की उनके नाम का अनुमान लगाएं)

-प्रेमचंद सहजवाला

दर्द के घर में किया फिर से बसेरा हमने


गौहर-ए-ज़ीस्त सर-ए-राह बिखेरा हमने
दर्द के घर में किया फिर से बसेरा हमने

अब भी इक याद की शमा सी कहीं जलती है
लाख चाहा था भुलावे का अँधेरा हमने

हर वक्त वही सूरत थी शीशे में नज़र के
कैनवस पर जब कोई अक्स उकेरा हमने

रात की आँख से बहती रही अश्कों की नमी
तब कहीं पाया ये शबनमी सवेरा हमने

'अजय' ये ज़िंदगी नासूर बन गई तब से
जब किया था तेरी गलियों का फेरा हमने


गौहर-ए-ज़ीस्त : जीवन का मोती