दोहा गाथा सनातन :
पाठ ६ - दोहा दिल में झांकता...
दोहा दिल में झांकता, कहता दिल की बात.
बेदिल को दिलवर बना, जगा रहा ज़ज्बात.
अरुण उषा के गाल पर, मलता रहा गुलाल.
बदल अवसर चूक कर, करता रहा मलाल.
मनु तनहा पूजा करे, सरस्वती की नित्य.
रंग रूप रस शब्द का, है संसार अनित्य.
कवि कविता से खेलता, ले कविता की आड़.
जैसे माली तोड़ दे, ख़ुद बगिया की बाड.
छंद भाव रस लय रहित, दोहा हो बेजान.
अपने सपने बिन जिए, ज्यों जीवन नादान.
अमां मियां! दी टिप्पणी, दोहे में ही आज.
दोहा-संसद के बनो, जल्दी ही सरताज.
अद्भुत है शैलेश का, दोहा के प्रति नेह.
अनिल अनल भू नभ सलिल, बिन हो देह विदेह.
निरख-निरख छवि कान्ह की, उमडे स्नेह-ममत्व.
हर्ष सहित सब सुर लखें, मानव में देवत्व.
पाठ ६ में अद्भुत रस के दोहे के चौथे चरण में 'विविथ' को सुधार कर 'विविध' कर लें. भक्ति रस के दोहे में दोहा संग्रह का नाम 'गोहा कुञ्ज' नहीं 'दोहा कुञ्ज' है.
गोष्ठी ६ में निम्न संशोधन कर लीजिये.
दोहा क्र. १ चरण ३ 'बन' के स्थान पर 'बने', दोहा क्र. ४ चरण २ 'धरे' के स्थान पर 'धारे' . आपकी बात आपके साथ में दोहा क्र. १ चरण २ 'बन' के स्थान पर 'बने' दोहा क्र. ५ चरण २ व् ४ में 'बतलाएं' व समझाएं' के स्थान पर क्रमशः 'बतलांय' व 'समjhaanय, दोहा क्र. ७ चरण ४ में 'ह्रियादा' के स्थान पर 'हृदय' . टंकन त्रुटि से हुई असुविधा हेतु खेद है.
नमन करुँ आचार्य को; पकडूं अपने कान.
'तपन' सीखना चाहता' देते रहिये ज्ञान.
करत-करत अभ्यास के, जडमति होत सुजान.
१११ १११ २२१ २, ११११ २१ १२१.
रसरी आवत-जात ते, सिल पर पडत निसान.
११२ २११ २१ २, ११ ११ १११ १२१.
याद रखिये :
दोहा में अनिवार्य है:
१. दो पंक्तियाँ, २. चार चरण .
३. पहले एवं तीसरे चरण में १३-१३ मात्राएँ.
४. दूसरे एवं चौथे चरण में ११-११ मात्राएँ.
५. दूसरे एवं चौथे चरण के अंत में लघु गुरु होना अनिवार्य.
६. पहले तथा तीसरे चरण के आरम्भ में जगण = जभान = १२१ का प्रयोग एक शब्द में वर्जित है किंतु दो शब्दों में जगण हो तो वर्जित नहीं है.
७. दूसरे तथा चौथे चरण के अंत में तगण = ताराज = २२१, जगण = जभान = १२१ या नगण = नसल = १११ होना चाहिए. शेष गण अंत में गुरु
या दीर्घ मात्रा = २ होने के कारण दूसरे व चौथे चरण के अंत में प्रयोग नहीं होते.
उक्त तथा अपनी पसंद के अन्य दोहों में इन नियमों के पालन की जांच करिए, शंका होने पर हम आपस में चर्चा करेंगे ही. अंत में
दोहा-चर्चा का करें, चलिए यहीं विराम.
दोहे लिखिए-लाइए, खूब पाइए नाम.
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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7 कविताप्रेमियों का कहना है :
सलिल जी
कृपया क्रमांक 5,6 और 7 को उदाहरण देकर समझाएं तो एकदम से विषय स्पष्ट हो जाएगा। आपका द्वारा दी जा रही जानकारी से हम सब लाभान्वित हो रहे हैं। आपका बहुत आभार।
प्रणाम आचार्य.,
डॉ. अजीत जी की बात मैं भी कहना चाहूंगा ..
और आचार्य ये भी कहें के ...इतनी गहराई में जाए बिना भी क्या दोहा कहा जा सकता है...??
यदि ऐसा संभव हो तो क्या कहने,,,??
आचार्य जी,
ऊपर दिए गए दोहों में से एक को , आपके द्वारा दिए गए ७ नियम जांचने के लिए , उदाहरण के तौर पर ले रही हूँ.
छंद भाव रस लय रहित, दोहा हो बेजान.
अपने सपने बिन जिए, ज्यों जीवन नादान.
१११ २१ ११ ११ १११, २२ २ २२१ .
११२ ११२ ११ १२ , १२ २११ २२१.
१. इस दोहे में दो पंक्तियाँ हैं .
२. चार चरण भी हैं .
३. पहले एवं तीसरे चरण में १३-१३ मात्राएँ हैं .
४. दूसरे चरण में 11 मात्राएँ हैं एवं चौथे चरण में १२ मात्राएँ मिली, कृपया इसे स्पष्ट करें एवं हमारी त्रुटि सुधारें .
५. दूसरे एवं चौथे चरण के अंत में लघु गुरु है, २२१ , २२१ .
६.पहले तथा तीसरे चरण के आरम्भ में १११ नगण नसल = ३
एवं ११२ , सगण सलगा ऽ = ४ है , अतः जगण = जभान = १२१ का प्रयोग नहीं किया गया है.
७. दूसरे तथा चौथे चरण के अंत में तगण = ताराज = २२१ है.
आपसे एक और निवेदन है, हम सब जो भी दोहे लिखते हैं, आप उन्हें परिष्कृत करके अथवा थोडी फेर बदल करके हमें फिर से बताते हैं, इस से हम अपनी गलतियों को नहीं जान पाते, क्या आप हमारे द्वारा की हुई गलती को भी बताने का कष्ट करेंगे?
बहुत बहुत आभार सहित
पूजा अनिल
aachaarya ji,
kyaa poojaa ji,.....""jyoon"" ahabd ko theek se pakad paa rahi hain..???
पाठ ६ : त्रुटि सुधार
दोहा क्र. २- बदल नहीं बादल
पाठ ६ नहीं पाठ ५
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