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Monday, April 05, 2010

युवा कहानीकार ने जीता मार्च 2010 का यूनिकवि पुरस्कार


हिन्द-युग्म हर महीने के पहले सोमवार को यूनिप्रतियोगिता के परिणाम प्रकाशित करता है। आज हम मार्च माह की प्रतियोगिता के परिणाम लेकर उपस्थित हैं। यूनिकवि प्रतियोगिता के साथ यह हमेशा से होता आया है कि कई बार शीर्ष 10 कविताओं में सर्वश्रेष्ठ कविता चुनना मुश्किल हो जाता है और कई बार प्रकाशित करने के लिए 10 कविता चुन पाना। इस बार भी 4-5 कविताएँ एक-दूसरे को कड़ी टक्कर दे रही थीं। यद्यपि किसी कविता में कथ्य की सघनता या उसकी कसावट का अभाव था तो किसी कविता में मौलिकता का। एक कविता की बिम्बात्मक सुंदरता निर्णायकों का मन मोह रही थी, वहीं एक कविता की समसामयिकता। कुछ निर्णायकों ने प्रतिभागियों से यह आग्रह भी किया कि कविता को अंतिम रूप से देने से पहले उसके कथ्य, विस्तार, भाषा-संरचना आदि पर कई-कई बार विचार करें, एक-एक पंक्ति, एक-एक शब्द पर कई बार सोचें, क्योंकि कविता लिखना एक जिम्मेदारी भी है।

बावजूद इसके हमने सभी 5 जजों (प्रथम चरण के 3 और अंतिम चरण के 2) द्वारा दिये गये औसत अंकों के आधार पर विमल चंद पाण्डेय की कविता को यूनिकविता चुन रहे हैं। विमल चंद पाण्डेय का नाम युवा कहानीकारों में अग्रगामी है। विमल चंद पाण्डेय को वर्ष 2009 में इनके पहले कहानी-संग्रह 'डर' के लिए भारतीय ज्ञानपिठ का प्रतिष्ठित नवलेखन पुरस्कार दिया गया।

यूनिकवि- विमल चंद्र पाण्डेय

इनका परिचय इन्हीं की जबानी-

जब आंखें खोलीं तो खुद को ऐसी किताबों के बीच पाया जिन्हें पढ़ने की सख्त मनाही थी। मेरी बुआ और मेरी मां उन उपन्यासों की प्रखर पाठिका थीं जिन्हें पढ़ते वे आपस में उन पात्रों पर चर्चा करतीं और उनके दुख से दुखी और उनकी खुशी में उल्लासित होती थीं। प्रतिबंध ने उत्सुकता को बढ़ाया और मैंने उन उपन्यासों को छिप-छिप कर पढ़ना शुरू किया तो एक नई दुनिया के द्वार मेरे लिए खुलने लगे। एक किताब में इतने भाव? यह मेरे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। छिप कर पढ़ने की वजह से पाठन में एक गति आई जो आज भी एक अच्छी आदत की तरह साथ है। 1996 में जब हाई स्कूल में 75 प्रतिशत अंक आए तो पिता के भीतर मुझे इंजिनियर या उसी टाइप की कोई चीज बनाने की इच्छा जोर मारने लगी। मैं अब तक सुरेंद्र मोहन पाठक, वेद प्रकाश शर्मा, प्रेम बाजपेई और मनोज वगैरह के सैकड़ों उपन्यास पढ़ चुका था। दो घटनाएं तभी साथ-साथ हुईं। पिता ने मेरी मर्जी के खिलाफ मुझे इंटर में गणित लेने पर विवश किया और मैंने अचानक एक दूसरी तरह का उपन्यास पढ़ा। यह एक ऐसा उपन्यास था जिसे पढ़ कर मैं कई रातों तक सो नहीं सका। मैं यह सोच कर आश्चर्य में था कि कोई कहानी इस तरह भी लिखी जा सकती है। उन सस्ते उपन्यासों से मन हट गया और इसी तरह के उपन्यासों की तलाश रहने लगी। वह उपन्यास था शरतचंद्र का गृहदाह। फिर क्या था। खोज-खोज के उनको पूरा पढ़ डाला। उनको खोजने गया तो रास्ते में प्रेमचंद मिल गए। उनको पढ़ के अलग तरह का हर्ष हुआ। उनको खोज-खोज कर पूरा पढ़ने में लगा था कि अज्ञेय, निराला और मुक्तिबोध टकरा गए। फिर तो इन सबसे दोस्ती होने लगी। ये मेरा हाथ पकड़ कर रास्ता दिखाने लगे। इन सबको पढ़ते-गुनते इंटर पास किया और अंकों के मामले में पिछली बार से दस प्रतिशत पिछड़ गया। अब स्नातक में हिंदी लेकर पढ़ने की इच्छा जोर मारने लगी थी पर पिता का सपना अभी पूरी तरह टूटा नहीं था। उन्होंने गणित लेकर पढ़वाने के लिए साम दाम दंड भेद सभी प्रयोग कर दिए। आखिरकार बी॰एस॰सी॰ करते हुए उदय प्रकाश, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, अमरकांत, मनोहर श्याम जोशी इत्यादि नामों से परिचित हुआ। साहित्य अब मेरे अंदर सांस लेने लगा था। साहित्य से जुड़ाव एक तरह से आध्यात्मिक क्रिया है, आप सबसे बेखबर रहने लगते हैं और अपनी दुनिया में मस्त। यह खतरनाक भी होता है खासतौर पर एक ऐसे लड़के के लिए जिसके सामने पूरा करियर पड़ा हो। बहरहाल बीण॰एस॰सी॰ में पहली बार मैं अपने शिक्षाकाल में ऐसी घटना से दो चार हुआ जिसे सेकेण्ड आना कहते हैं। वह भी इतने बुरे प्राप्तांकों के साथ कि उल्लेख करना संभव नहीं।
फिर पिताजी ने मेरे डगमगाते भविष्य को देखते हुए मुझे दिल्ली भेजा और अपने एक परिचित के संस्थान से कंप्यूटर कोर्स कराया ताकि लड़का धंधे से लग जाय। लड़का लग भी गया पर चैन नहीं था। अब लगता था जैसे कुछ ऐसा काम किया जाय जिसमें कहानियां न सही कुछ लिखना हो, कुछ पढ़ना हो, शब्द हों, अक्षर हों और सोंधी सोंधी गन्ध वाली किताबें हों। एक दिन अखबार में एक नोटिस देख कर दिल्ली विश्वविद्यालय में पत्रकारिता पाठ्यक्रम के लिए आवेदन कर दिया, घर पर बिना बताए। घर पर तब बताया जब साक्षात्कार के बाद दाखिले की तिथि आई। हंगामा मचा और बवाल हुआ पर प्रवेश हो गया। इस दौरान खुद को खोजा। खूब पढ़ा और कुछ लिखने की कोशिश भी की। कोशिशों को पहचान मिलने लगी तो हौसला बढ़ा। कहानियाँ छपने लगीं। पत्र आने लगे, फोन पर बधाइयाँ मिलने लगीं। अच्छा लगता है और अच्छा लिखने की प्रेरणा भी मिलती है। आज जब अमरकांत जी जैसे लेखकों के पास बैठता हूँ और उन्हें आज भी उसी श्रद्धा और मेहनत से लिखता और उसी उत्सुकता से पढ़ता देखता हूँ तो लगता है जैसे अभी कुछ भी नहीं पढ़ा। कहने को तो वागर्थ, कथा-क्रम, नया ज्ञानोदय, दैनिक जागरण, कथा-बिंब, कथन और साहित्य अमृत जैसी पत्रिकाओं में लगभग दस-ग्यारह कहानियां छप चुकी हैं जिसने ढेरों प्रशंसक और मित्र दिए हैं पर एक भी कहानी ऐसी नहीं जिसे लिखने के बाद लगा हो कि हाँ, ऐसे ही तो लिखना चाहता था इसे। पढ़ने को लिखने से ज्यादा महत्व देता हूँ और देता रहूँगा क्योंकि यह सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। उदय प्रकाश सबसे पसंदीदा कहानीकार हैं और मनोहर श्याम जोशी पसंदीदा उपन्यासकार। अपने समकालीन कहानीकारों में कुणाल सिंह, चंदन पाण्डेय, नीलाक्षी सिंह और मो॰ आरिफ का प्रशंसक हूँ। जब दो-तीन कहानियां छपी थीं तो लगभग हर दूसरे दिन एक कहानी तैयार कर दिया करता था। लगता था जैसे मैं बहुत अच्छा लिखता हूँ। अब गति धीमी हो गई है क्योंकि अब लिखने पर ज्यादा ध्यान देना चाहता हूँ। एक बार फिर दोहराना चाहूँगा कि ढेर सारा लिख देने में कोई बहादुरी नहीं अगर हम पढ़ने में लिखने से दस गुना ज्यादा उत्सुक नहीं हैं।

रुचियाँ- दुनिया भर की सभी भाषाओं की अच्छी फ़िल्में देखना (जिस प्रकार मुझे प्रत्येक भाषा की बढ़िया किताबें पढ़ने का) , फ़िल्म बनाना (कई डाक्यूमेंट्री फ़िल्मों का निर्माण

सपना- सफलतम फ़िल्म-निर्देशक बनना

जन्मतिथि- 20-10-1981

संप्रति- UNI, लखनऊ में सब-एडीटर

पुरस्कृत कविता- तुमसे प्रेम, तुम्हारे शहर से

अगर दुनिया का दस्तूर निभाने के लिये
तुमसे कहा जाय
अपनी ज़िन्दगी से निकाल फेंको
वे दो दिन
जो अचानक ख़त्म हो गये
रोंयेदार ख़रगोश की छलांग की तरह
जिसके सफ़ेद रोंये का एहसास
अब भी मौजूद है मेरे खुरदुरे गालों पर
वे दो दिन
जब एक पुराने अनुभवी शहर की देह पर
अचानक उगा था एक टापू
जिस पर मैं खड़ा था अकेला
तुम्हारा इन्तज़ार करता हुआ
जैसे हिरनी करती है अपने बच्चों का इन्तज़ार
तुम कैसे निकाल फेंकोगी
वे दो दिन
जब दिन में चाँद उगा था
अपने तमाम साथियों के साथ
उत्सुकतावश
सिर्फ़ हमें देखने के लिये
तुम आयी थी
तुम्हारे आने पर गिर गई थी
इन्तज़ार की पत्ती पर टिकी संशय की वह बूँद
मैंने तुम्हें शहर के बीचोंबीच चूमा था
और इस तरह प्यार किया था तुम्हारे शहर को
ख़ूब-ख़ूब प्यार
बदले में तुम मुझसे लिपट गई थी मुझसे
अपने शहर की तमाम ख़ासियतों के साथ
तुमसे ख़ूशबू आयी थी फूलों-पत्तियों के साथ
तमाम खनिजों की
एक चमत्कार से मैं हतप्रभ थ
तुम कैसे करोगी वह फ्लाईओवर पार
जिससे गुज़रते अनायास तुम्हारी गर्दन मुड़ जाया करेगी
एक ख़ास दिशा की ओर
तुम कैसे बनाओंगी अपने लिये खीर
वहाँ हर निवाले में मेरे स्वाद की वंचना होगी
सच
तुम्हारा शहर बहुत ख़ूबसूरत है
चाँद, फूलों, गिलहरियों, कौओं, चट्टानों
और मोबाइल टॉवरों के साथ
तुम कैसे कर सकोगी
अपने शहर से उतना प्यार
जितना मैंने मेहमान होकर सिर्फ़ दो रातों में किया है
मैं जानता हूं
जो मैं कर सकता हूं आसानी से
तुम नहीं कर सकोगी उसी तरह
मैं तुम्हारी मदद करूँगा इसमें
अपने शहर का हाल सुनाकर
तुम तुलना करना दोनों की
और ख़ुश हो जाया करना
मेरे शहर में चाहे जितने हादसे हों
मैं हर बार तुम्हें ´ख़ैरियत है तमाम´ लिखूँगा
मैं हर चिट्ठी में अपना बदलता हुआ नाम लिखूँगा।


पुरस्कार और सम्मान- समयांतर, की ओर से पुस्तकें तथा हिन्द-युग्म की ओर से प्रशस्ति-पत्र। प्रशस्ति-पत्र वार्षिक समारोह में प्रदान किया जायेगा। समयांतर में कविता प्रकाशित होने की सम्भावना।

इनके अतिरिक्त हम जिन अन्य 9 कवियों की कविताएँ प्रकाशित करेंगे तथा उन्हें विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की ओर से पुस्तकें प्रेषित की जायेंगी, उनके नाम हैं-

अतुल चतुर्वेदी
मृत्युंजय श्रीवास्तव ’साधक’
रविंद्र शर्मा ’रवि’
भावना सक्सेना
ओम आर्य
गोपाल दत्त देवतल्ला
अविनाश मिश्र
एम वर्मा
रेणु दीपक


हम शीर्ष 10 के अतिरिक्त भी बहुत सी उल्लेखनीय कविताओं का प्रकाशन करते हैं। इस बार हम निम्नलिखित 3 कवियों की कविताएँ भी एक-एक करके प्रकाशित करेंगे-

दीपक चौरसिया ’मशाल’
ऋषभ मिश्रा
देवेश पांडेय


उपर्युक्त सभी कवियों से अनुरोध है कि कृपया वे अपनी रचनाएँ 3 मई 2010 तक अनयत्र न तो प्रकाशित करें और न ही करवायें।

इस बार हम किसी भी पाठक को यूनिपाठक नहीं चुन रहे हैं क्योंकि इस बार कोई भी पाठक टिप्पणी करने में निरंतर नहीं रहा। हम अपने पाठकों से निवेदन करते हैं कृपया 1 अप्रैल से 30 अप्रैल के मध्य हिन्द-युग्म पर प्रकाशित सभी कविताओं को गंभीरता से पढ़ें और उनपर समीक्षात्मक टिप्पणी करें, इससे कवियों को प्रोत्साहन और मार्गदर्शन तो मिलेगा ही साथ ही साथ हमें भी स्वयं में सुधार करने की प्रेरणा मिलेगी।

हम उन कवियों का भी धन्यवाद करना चाहेंगे, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर इसे सफल बनाया। और यह गुजारिश भी करेंगे कि परिणामों को सकारात्मक लेते हुए प्रतियोगिता में बारम्बार भाग लें। इस बार शीर्ष 13 कविताओं के बाद की कविताओं का कोई क्रम नहीं बनाया गया है, इसलिए निम्नलिखित नाम कविताओं के प्राप्त होने से क्रम से सुनियोजित किये गये हैं।

सुधीर गुप्ता चक्र
राजेंद्र स्वर्णकार
विजय प्रकाश सिंह
रजनीकांत मिश्र
दीपक कुमार
संध्या पेडण॓कर
कमल किशोर सिंह
तरुण ठाकुर
मनसा आनंद
ब्रह्मनाथ
विपुल दुबे
आर्य मनु
नमिता राकेश
तपन शर्मा
शामिख फ़राज
अंतराम पटेल
हिमानी दीवान
महेंद्र प्रताप पांडेय ’नन्द’
नीलम अरोरा
अमिता कौंडल
आशीष पंत
स्नेह सोनकर ’पीयूष’
डॉ अनिल चड्डा
शशि सागर
अनामिका (सुनीता)
ब्रजेंद्र श्रीवास्तव ’उत्कर्ष’
रतन शर्मा
बोधिसत्व कस्तुरिया
संगीता सेठी
अमित सागर
अजय दुरेजा
प्रदीप वर्मा

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17 कविताप्रेमियों का कहना है :

बेचैन आत्मा का कहना है कि -

परिचय है या संक्षिप्त पढ़ाकू जीवनी अच्छा व अभिभावकों के लिए शिक्षाप्रद- बच्चे को वही पढ़ाओ जो उसका मन करे।
यूनिकविबनने के लिए ढेरों बधाई ।

Srijan का कहना है कि -

वे दो दिन
जो अचानक ख़त्म हो गये
रोंयेदार ख़रगोश की छलांग की तरह....

सुंदर अभिव्यक्ति....
विमल जी बधाई।

avid reader का कहना है कि -

itna bharpoor aur leek se hat kar parichay hi apne aap mein bahut prabhavi hai,us par kavita aisi ki ek benaam si udasi mehsoos hui jo jaane kyun bahut suhani si leg rahi hai...anayas hi kuchh ehsaas bahut saanjhe se kar gaye aap...kafi din baad kuchh acha padhne ko mila ...agli kavita ka intezar rahega...hardik badhai sweekar karen

sumita का कहना है कि -

तुमसे ख़ूशबू आयी थी फूलों-पत्तियों के साथ
तमाम खनिजों की
एक अलग तरह का एहसास जिसे बडी खूबसूरती से अपनी कविता मे निभाया है..विमल जी यूनिकवि बनने के लिए बहुत-बहुत बधाई!

विमल कुमार हेडा का कहना है कि -

विमल चंद्र पाण्डेय जी को यूनिकवि बनने पर बहुत बहुत बधाई , धन्यवाद
विमल कुमार हेडा

akhilesh का कहना है कि -

kavita se bada to parichay hai..
aap gadh bhi bahut accha likte hai.
Kavita to hai hi payri..
badhayee .

rachana का कहना है कि -

aap ka parichya ek kahani sa laga aap achchhi kahani likhte hain sabhi jante hain kavita bhi kamal ki likhi hai
is safalta ke liye aap ko badhai
rachana

Deepali Sangwan का कहना है कि -

विमल जी

यूनिकवि बनने के लिए बहुत बहुत बधाई.. बदलते समय के साथ उनिकविता की इस प्रतियोगिता के स्तर में जो बदलाव आया है वो देखने योग्य है, बहुत ख़ुशी हुई आज यहाँ आकर.. कह सकते हैं आना सार्थक रहा..
सुन्दर कविता के लिए इक बार फिर से शुबकामनाएं.

दीप

preeti का कहना है कि -

Bahut hi pyaari kavita hai Vimal ji Apki...Seedhe Dil ko chhuti hai...

Bodhisatva का कहना है कि -

Parichay bhi utna hi achha tha jitni Kavita....ya thoda jada laga kyoki kahi na kahi mai bhi usi kahani me hu...abhi bahut aage jana hai...beech me aise rukna aur pani me chehra dekh lena achha lagta hai...Congratulations !!!

addictionofcinema का कहना है कि -

sabhi doston ko shukriya
Vimal chandra Pandey

अपूर्व का कहना है कि -

विमल जी को यूनिकवि बनने के लिये देर से ही मगर हार्दिक शुभकामनाएँ..यह कविता बार-बार पढ़ी गयी और हर बार शब्दों मे गुँथी एक करुण काव्यानुभूति का जादू अपनी गिरफ़्त मे ले लेता है..और एक एक पंक्ति जैसे कविता मे कीलों द्वारा जड़ी गयी है..कि इधर से उधर करना संभन नही लगता...और यह कविता मे व्यक्त भावना बड़ी आम लगती है..हम सबमे अंतर्निहित..
..जिंदगी हमें हर मोड़ पर समझौते करना सिखा देती है..मगर चीजों को भूलना नही सिखा पाती..और कुछ बीती यादें खयालों के पन्नों के बीच रखे बुकमार्क सी रह जाती हैं..बस जिंदगी चलती रहती है..
मेरे शहर में चाहे जितने हादसे हों
मैं हर बार तुम्हें ´ख़ैरियत है तमाम´ लिखूँगा
मैं हर चिट्ठी में अपना बदलता हुआ नाम लिखूँगा।

प्रतियोगिता के अन्य सभी प्रतिभागियों को भी शुभकामनाएँ!!

दीपक 'मशाल' का कहना है कि -

Vimal ji ko bahut-bahut badhai.. na sirf Yunikavi banne ke liye balki ek behatreen kavita ke liye bhi..

राकेश कौशिक का कहना है कि -

यूनिकवि विमल जी को हार्दिक बधाई

Kirti Vardhan का कहना है कि -

vimal bhai,badhai
aapki kalam me bhavon ka samandar bhara hai,bahur achcha likha hai.
dr a kirtivardhan
09911323732

sharman का कहना है कि -

vimal G congratulations....
Your poetry is very very good.....

小 Gg का कहना है कि -

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