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हीर सारी उदास बैठी हैं-gazal


दिल में लेकर वे प्यास बैठीं हैं
और समन्दर के पास बैठी हैं

पालकी के यूँ पास बैठी हैं
सारी सखियाँ उदास बैठी है

खुदकुशी ठान ली चिरागों ने
ऑंधियाँ बदहवास बैठी हैं

मौत ने खत्म कर दिये शिकवे
सौतनें आस पास बैठी हैं

बेटे आफ़िस, बहुएँ गईं दफ़्तर
घर सँभाले तो सास बैठी हैं

हो गई खत्म नस्ल रांझों की
हीर सारी उदास बैठी हैं

‘श्याम’ के आसपास बैठी हैं
गोपियाँ कर के रास बैठी हैं

लूट लिया जिसने दिल को --gazal by shyam skha



यूँ तो वो चितचोर न था
दिल पे मेरा ही जोर न था

लूट लिया जिसने दिल को
वो मामूली चोर न था

अँखियाँ बरसीं, मन भीगा
नाचा मन का मोर न था

दिल का शीशा टूट गया
और कहीं कुछ शोर न था

दुख को देखा दूर तलक
दुख का कोई छोर न था

भरी दुपहरी सूरज गुम
बादल भी घनघोर न था

अब भी गर नाकाम रहा तो-gazal


कल वो मुझको याद करेगा
व्यर्थ आँसू बरबाद करेगा

कल सब-कुछ स्वीकारेगा वो
लेकिन आज फ़साद करेगा

लगता था उसका मैं भी कुछ
याद मौत के बाद करेगा

कुट्टी कर लेगा यदि मुझसे
फिर किससे संवाद करेगा

अब भी गर नाकाम रहा तो
नव साजि़श ईजाद करेगा

बस्ती में जो कर गुजरा वो
क्या कोई जल्लाद करेगा

एक और इम्तिहान है-गज़ल


है जान तो जहान है
फिर काहे का गुमान है

क्या कर्बला के बाद भी
एक और इम्तिहान है

इतरा रहे हैं आप यूँ
क्या वक्त मेहरबान है

हैं लूट राहबर रहे
जनता क्यों बेजुबान है

है श्याम बेवफ़ा नहीं
इतना तो इत्मिनान है

जीवन हुआ, पिटा सा मोहरा है


धुंध है
कोहरा है 

ठिठुर-ठिठुर 
बदन हुआ दोहरा है

झीलों में दुबके
बैठे हैं हंस
मौसम झेल रहा
मौसम का दंश
हर और ठिठुरन का पहरा है


परिजन घर में हैं
चोर इसी डर में हैं
राहगीर सभी
बटमारों की जद में हैं

टोपी पहन चौकीदार हुआ बहरा है

कोहरा
झल्ला गया
सब तरफ़ है
छा गया
जन जीवन हुआ, पिटा सा मोहरा है


औरत को समझने के लिए



11॰ गुण-अवगुण
नारी
रोटी, कपड़े, मकान
से
अधिक काम

तो पहले भी
करती थी,
अपना ही नहीं

अनेक का पेट भरती थी;

मगर जब से

तनख्वाह घर लाने लगी

आसमान
सर पर उठाने लगी है,
पहले लज्जा

उसका भूषण था

कवच था

अब तो
अपनी
बेहयाई से

पुरुष को भी लजाने लगी है

पुरुष के सभी
अवगुण
धड़ल्ले से
अपनाने लगी है।
12॰ औरत के समझने के लिए
औरत को
समझने के लिए

औरत होना
जरूरी नहीं है

जरूरी है

पुरुष न रहना

इन्सान बन जाना,

उससे भी
बेहतर है
बच्चा बन जाना ।

ग़म क्या एक बताशा है-


पल में तोला,पल में माशा है
जीवन भी क्या खूब तमाशा है

मुंह में डालो बस घुल जाएगा
यारो ,ग़म क्या एक बताशा है

जाने क्यों रहती मुझको हरदम
तुझसे मिलने की अभिलाषा है

वक्त बुरा आने पर आ जाती
हर इक मन में एक हताशा है

घर लौट सदा जो आ जाती है,
वो दोशीजा ही तो आशा है

नासमझो को समझा पाओगे
यार गजल उल्फ़त की भाषा है

श्याम सखा ने तो वक्त्न-फ़वक्त्न
गज़लों में माहौल तराशा है
or

‘श्याम’तुझे हम मान गये,तूने
यार गजल को खूब तराशा है

क्षणिकाएं


१
हम तो
सो रहे बेखबर
तुम्हें सौंपकर
अपने गम
रहजनों ने
लूट लिया
कारवां तुम्हें परीशां देखकर
२
सहूलियतों
की चाह ने
हमें निक्कमा कर दिया
बन्धन तोड़कर
सिरफ़िरे जो चले
मंजिलें पा गये

३परिन्दे से
उडे थे हम भी
तेरा साथ पाकर
पर न देख पाया
जमाना हमारी यह सुखी
तुम्हें उड़ा दिया शाख से
और पर मेरे
काट डाले सैयाद ने
४
तुम और
तुम्हारी मासूमयित
मेरा सहारा है
बीते कल को
जाने दो
आज हम हैं तुम हो
आने वाला
कल भी हमारा है

एक टुकड़ा दर्द का दिल से उखड़ा कहां गया



एक टुकड़ा
दर्द का
दिल से उखड़ा

कहां गया

एक टुकड़ा
दर्द का

रूह से लिपटा

दिल में समा गया


एक टुकड़ा

दर्द का

मेरे साथ साथ

भटका-
पगला गया


एक टुकड़ा

दर्द का

बड़ा मलूक था

सबको
भा गया


एक टुकड़ा

दर्द का

आसमान से
उतरा

जहन पर छा गया

एक टुकड़ा

दर्द का

जिन्दगी के

कई रंग दिखा गया


एक टुकड़ा

दर्द का

टीसता रहा

जहां गया


एक टुकड़ा

दर्द का

ढूंढता फिरता हूं

भला
कहां गया?


12 नंवम्बर1993
11 बजने में तीन मिनट दिवाली से पहले की रात

रिश्तों की ज़ंजीर तोड़ मत-श्याम


आज यहाँ पर भीड़ बड़ी है
जाने क्यों चुपचाप खड़ी है

इसके सर है उसकी पगड़ी
कैसी यह मनहूस घड़ी है

रिश्तों की ज़ंजीर तोड़ मत
तू भी उसकी एक कड़ी है

आपा-धापी मारा-मारी
तेरे-मेरे बीच खड़ी है

आईने से लगता है डर
उसमें तो तसवीर जड़ी है

अपने भी बेगाने-से हैं
सब दुनिया उजड़ी-उजड़ी है

कल तक लगा पराया था जो
आज उसी से आँख लड़ी है

'श्याम’ जऱा उसकी भी सुन ले
बस अपनी ही तुझको पड़ी है

कहो पागल उसे दीवाना कहो ना-श्याम सखा



नहीं कहना अगर सहरा को सहरा

वही किस्सा पुराना सा कहो ना
बहुत प्यारा है दोबारा कहो ना


नहीं कहना अगर सहरा को सहरा

इसे तुम रेत का दरिया कहो ना


जरूरत है कहां रिश्तों की हमको

मेरी जां बस मुझे अपना कहो ना


नहीं अच्छा घुमाकर बात करना

जो भी कहना है बस सीधा कहो ना


अचानक आज हम तुम जो मिले हैं
है
क्या ये सच,या है सपना कहो ना

सदा जो नाचती बंशी की धुनपर

उसे राधा कहो श्यामा कहो ना


फ़िरे है ‘श्याम’ खुद को ढूंढ़ता सा
उसे पागल या दीवाना कहो ना


मफ़ाएलुन,मफ़ाएलुन,फ़ऊलुन 128 sh,zind

मुझको नशे से ज्यादा नशा,प्यास में रहा-shyam skha



यूं तो वो हमेशा ही दिल के पास में रहा
पर,उसका जल्वा मुस्तकिल कयास में रहा

उसको ही ढूंढते रहे,कैसे थे बेखबर
हर वक्त ही जो अपने आस-पास में रहा

खुशबू बसी हुई है जिस तरह से फूल में
ऐसे ही कुछ वो मेरी सांस-सांस में रहा


वो जिन्दगी से दूर, बहुत दूर जा बसे
ता-उम्र मुन्तजिर मैं जिनकी आस में रहा

पीने को लोग ओक से भी पी गये मगर
उलझा हुआ मैं बोतलो-गिलास में रहा

पीने के बाद भी मेरी ,मिटती नहीं तलब
मुझको नशे से ज्यादा नशा,प्यास में रहा

फ़नकार अपने बीच नहीं है तो क्या हुआ
उसका वजूद कैद कैनवास में रहा

तौबा को तोड़ पी थी जिन्होने ,वो सब थे धुत
था रिन्द ही जो होश और हवास में रहा

तल्खी में हकीकत की मिला जो मजा
यारो कहां वो झूठ की मिठास में रहा

सूरज तो जल के मर गया अपनी ही आग में
पर चांद जिन्दा,उसके ही उजास में रहा


जो चापलूस बन न सका,उम्दा किस्म का
दरबारे शाह में वो कहां खास में रहा

समझेगा किस तरह वो गरीबों के दर्द को
शाही ठाठ-बाट शाही निवास में रहा


नंगे खड़े थे दोस्त सभी तो हमाम में
तू ही अकेला किसलिये लिबास में रहा


बारीकियां अदब की कहां सीख सका वो
उलझा हुआ जो हर घड़ी छ्पास में रहा

राधा का‘श्याम’ भी था वो मीरा का‘श्याम’ भी
जो गोपियों के साथ मस्त,रास में रहा

प्रतियोगिता में भाग लें और समारोह में सम्मानित होने का मौका पायें


मई 2009 में हमने उद्‍घोषणा की थी कि हम यूनिकवि को शिवना प्रकाशन की ओर से रु 1000 मूल्य की पुस्तकें देंगे। शिवना प्रकाशन के कर्ता-धर्ता पंकज सुबीर की मदद से अब यह तय हुआ है कि जनवरी 2010 के अंत में मई 2009 से दिसम्बर 2009 के यूनिकवियों को हिन्द-युग्म के वार्षिक समारोह में सम्मानित किया जाय। आज हम यह उद्‍घोषणा लेकर हाज़िर हैं कि हिन्द-युग्म के आने वाले वार्षिकोत्सव में यूनिकवियों को रु 1000 मूल्य की पुस्तकें, प्रशस्ति-पत्र इत्यादि किसी वरिष्ठ हिन्दी साहित्यकार के हाथों दिये जायेंगे।

उल्लेखनीय है कि हिन्द-युग्म वर्ष 2008 के वार्षिकोत्सव में 4 पाठकों को सम्मानित कर चुका है। इस वर्ष से यूनिकवियों (हर महीने की यूनिकवि प्रतियोगिता के प्रथम स्थान का विजेता) को भी समारोह में ही सम्मानित किया जायेगा।

हम समझते हैं कि हमारी यह उद्‍घोषणा नव कवियों और पाठकों में ऊर्जा भरेगी। अभी तक यदि आप इसके प्रतिभागी बनने से चूके हैं तो कोई बात नहीं, जब जागे तब सबेरा। आज से यह मौका अपने हाथ से जाने न दें। सितम्बर माह की इस प्रतियोगिता में बतौर कवि और बतौर पाठक अवश्य भाग लें।

सितम्बर 2009 का यूनिकवि बनने के लिए-

१) अपनी कोई मौलिक तथा अप्रकाशित कविता 18 सितम्बर 2009 की मध्यरात्रि तक hindyugm@gmail.com पर भेजें।

(महत्वपूर्ण- मुद्रित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं के अतिरिक्त गूगल, याहू समूहों में प्रकाशित रचनाएँ, ऑरकुट की विभिन्न कम्न्यूटियों में प्रकाशित रचनाएँ, निजी या सामूहिक ब्लॉगों पर प्रकाशित रचनाएँ भी प्रकाशित रचनाओं की श्रेणी में आती हैं।)

२) कोशिश कीजिए कि आपकी रचना यूनिकोड में टंकित हो।
यदि आप यूनिकोड-टाइपिंग में नये हैं तो आप हमारे निःशुल्क यूनिप्रशिक्षण का लाभ ले सकते हैं।

३) परेशान होने की आवश्यकता नहीं है, इतना होने पर भी आप यूनिकोड-टंकण नहीं समझ पा रहे हैं तो अपनी रचना को रोमन-हिन्दी ( अंग्रेजी या इंग्लिश की लिपि या स्क्रिप्ट 'रोमन' है, और जब हिन्दी के अक्षर रोमन में लिखे जाते हैं तो उन्हें रोमन-हिन्दी की संज्ञा दी जाती है) में लिखकर या अपनी डायरी के रचना-पृष्ठों को स्कैन करके हमें भेज दें। यूनिकवि बनने पर हिन्दी-टंकण सिखाने की जिम्मेदारी हमारे टीम की।

४) एक माह में एक कवि केवल एक ही प्रविष्टि भेजे।

यूनिपाठक बनने के लिए

चूँकि हमारा सारा प्रयास इंटरनेट पर हिन्दी लिखने-पढ़ने को बढ़ावा देना है, इसलिए पाठकों से हम यूनिकोड ( हिन्दी टायपिंग) में टंकित टिप्पणियों की अपेक्षा रखते हैं। टायपिंग संबंधी सभी मदद यहाँ हैं।

१) 1 सितम्बर 2009 से 31 सितम्बर 2009 के बीच की हिन्द-युग्म पर प्रकाशित अधिकाधिक प्रविष्टियों पर हिन्दी में टिप्पणी (कमेंट) करें।

२) टिप्पणियों से पठनीयता परिलक्षित हो।

३) हमेशा कमेंट (टिप्पणी) करते वक़्त समान नाम या यूज़रनेम का प्रयोग करें।

४) हिन्द-युग्म पर टिप्पणी कैसे की जाय, इस पर सम्पूर्ण ट्यूटोरियल यहाँ उपलब्ध है।

कवियों और पाठकों को निम्न प्रकार से पुरस्कृत और सम्मानित किया जायेगा-


१) यूनिकवि को शिवना प्रकाशन की ओर से रु 1000 की मूल्य तक की पुस्तकें तथा प्रशस्ति-पत्र।

२) यूनिपाठक को श्याम सखा की ओर से रु 200 मूल्य की पुस्तकें तथा प्रशस्ति-पत्र।

३) दूसरे से दसवें स्थान के कवियों को तथा दूसरे से चौथे स्थान के पाठकों को श्याम सखा की ओर से रु 200 मूल्य की पुस्तकें।

कवि-लेखक प्रतिभागियों से भी निवेदन है कि वो समय निकालकर यदा-कदा या सदैव हिन्द-युग्म पर आयें और सक्रिय लेखकों की प्रविष्टियों को पढ़कर उन्हें सलाह दें, रास्ता दिखायें और प्रोत्साहित करें।

प्रतियोगिता में भाग लेने से पहले सभी 'नियमों और शर्तों' को पढ़ लें।

गज़ल __???????



बहुत सुन्दर, बहुत अच्छे, भईई वाह टिपणी कर
बुरे अच्छे की मत कर यार तू परवाह टिपणी कर

बहर पर हो न हो कोई गज़ल तो भी न तू कुछ सोच
दिखे चाहे न कोई भाव या अल्लाह टिपणी कर

हमें भी तो सिखा दें आप लिखना ये गज़ल साहिब
रहें कहते न सुन कुछ और न दे इस्लाह टिपणी कर

न मानेगा तू तो पछताएगा इक दिन बहुत ज्यादा
तुझे ऐ दोस्त करता हूं मैं आज आगाह टिपणी कर



अगर जो तू कहीं लग जाएगा उनको सिखाने तो
सभी नाराज होंगे तू कहेगा आह, टिपणी कर

रकीबों से निपटना सीख मेरे यार बनकर अनाम
निभा तू भी ब्लागिंग की ये रस्मो-राह टिपणी कर

लिखे अब कौन है रचना, पढे़ है कौन अब रचना,
किये जा पोस्ट बस सप्ताह दर सप्ताह टिपणी कर

यहां भी चलती गुट-बाजी,बना तू भी तो गुट अपना
करे जो तुझको टिपणी कर उसे तू वाह टिपणी कर



अगर है चाह टिप्पणियां मिलें तुझको बहुत सारी
तो लिख टिपणी पे टिपणी सब को कर गुमराह टिपणी कर

लिखेंगे तेरे ब्लोगों पर सभी टिपणी ,बहुत सुन्दर
बनेंगे लोग सारे ही तेरे हमराह टिपणी कर



'सखा' ने देख,अनुभव कर लिखा यह सब ब्लागिंग पर
न तो है यह गज़ल कोई न तू जर्राह टिपणी कर

मफ़ाएलुन.मफ़ाएलुन.मफ़ाएलुन.मफ़ाएलुन


राहत के दो पल -गज़ल








राहत के दो पल
आंखो से ओझल

रोज लड़े हम तुम
निकला कोई हल

न्यौता देतीं नित
दो आंखे चंचल

झेल नहीं पाए
हम अपनो के छल

भीड़ भरे जग से
दूर कहीं ले चल

मौन तुझे पाकर
चुप है कोलाहल

कितने गहरे हैं
रिश्तों के दलद्ल

`श्याम' मिलेंगे ही
आज नहीं तो कल

दिया हुस्न उसने अदा भी मिली थी-गज़ल


दिया हुस्न उसने अदा भी मिली थी
रहे-इश्क* मुझको जफ़ा भी मिली थी

न जीना ही सीखा न मरना ही आया
हमें जिन्दगी की दुआ भी मिली थी

भलाई मिली थी ,भलाई के बदले
गुनाहो की मुझको सजा भी मिली थी

हुआ था अकेला बियांबा में मैं जब
वहां मुझे 'उसकी`सदा भी मिली थी

है गर 'श्याम'छैला नहीं दोष उसका
मिला सांस जब तब अना भी मिली थी

रहे-इश्क =इश्क की राह,प्रेम गली

फ़ऊलुन,फ़ऊलुन,फ़ऊलुन,फ़ऊलुन

दुनिया भर के गम थे-गज़ल श्याम



दुनिया भर के गम थे
और अकेले हम थे

साथ न कैसे देते
गम भी मेरे गम थे

जख्मो की बस्ती से
गायब क्यों मरहम थे

सपने क्या भंग हुए
दिल दरहम-बरहम थे

टीस बहुत थी सुर में
बस स्वर ही मद्धम थे

आंखे तो गीली थीं
सूखे मन मौसम थे

देख तुम्हे साथ मेरे
यार हुए बेदम थे

श्याम,संवरते कैसे
सब किस्मत के ख़म थे

एक सवाल/कविता



प्रश्न उठा
दुख: का
सागर
है अपार

कठिन है
जाना इसके पार


समाधान गुना
तो छोड़

कश्ती को मझधार

अपना लहरों को

कर तूफानों से प्यार

गज़ल-श्याम सखा`श्याम'






















तन
कंचन मन चंद- वन


मुख से शरमाए दर्पन



थी छोटी सी इक उलझन

घेर लिया है पूरा मन


जब से छोड़ गए साजन

ताना मारे है जोबन


पिंजरे में देखी मुनिया

कैद हुआ खुद हीरामन


ग़म तो दिल में मीठा था

आंख बनी फिर क्यों सावन


कांटो से कैसा शिक्वा
थामा तो मेरा दामन


दिल ही तुझको क्या दूं मैं

तुझपर न्यौछावर जीवन


`श्याम' गोपियों संग गया

ढूंढ रही तू क्या जोगन



12/5/03

गज़ल--- श्याम सखा‘श्याम’


जि़न्दगी थी, ग़म न था
हादसा यह कम न था

इश्क में होगी सजा
जानता आदम न था

आसमाँ नजदीक था
बस परों में दम न था

सोग में तो थे महल
पर वहाँ मातम न था

टेढ़ी मेढ़ी राह थी
गेसुओं का खम न था

जख्म की थी बस्तियां
पर वहां मरहम न था


बारिशें आँखों में थीं
अब्र का मौसम न था

दूब सूरज जब मिले
फिर दिखा शबनम न था

बेवफ़ा ये 'श्याम’ तो
ऐ मेरे हमदम न था

27/11/98.1 am श्यामसखा‘श्याम’