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Wednesday, June 17, 2009

गज़ल--- श्याम सखा‘श्याम’


जि़न्दगी थी, ग़म था
हादसा यह कम था

इश्क में होगी सजा
जानता आदम न था

आसमाँ नजदीक था
बस परों में दम था

सोग में तो थे महल
पर वहाँ मातम था

टेढ़ी मेढ़ी राह थी
गेसुओं का खम था

जख्म की थी बस्तियां
पर वहां मरहम न था


बारिशें आँखों में थीं
अब्र का मौसम था

दूब सूरज जब मिले
फिर दिखा शबनम न था

बेवफ़ा ये 'श्यामतो
मेरे हमदम था

27/11/98.1 am श्यामसखा‘श्याम’

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25 कविताप्रेमियों का कहना है :

श्याम सखा 'श्याम' का कहना है कि -

मित्रो
आज मैं आपको दावत दे रहा हूं अपने एक अन्य ब्लाग पर और इस दावे के साथ कि वहां मेरी रचनाएं आपको निराश न करेंगी
एक और बात कल जो गजल वहां पोस्ट की है

उसका
एक शे‘र देखें
देखता जब भी तुझे हूं सुन मेरी तू गुलबदन
साँस थमती और धड़कन लड़खड़ाती है कि बस

श्याम
http//:gazalkbahane.blogspot.com/

विश्व दीपक ’तन्हा’ का कहना है कि -

श्याम जी!
"गज़ल" के शेर भी पसंद आए और आपकी टिप्पणी के भी। आपको ब्लाग जरूर देखूँगा...कहने की कोई बात है क्या!

वैसे पहली मर्तबा यह हुआ है कि "लेखक" ने हीं पहली "टिप्पणी" भी की हो :)

बधाई स्वीकारें।
-विश्व दीपक

GANGA DHAR SHARMA का कहना है कि -

उन घरों में सोग था
पर वहाँ मातम न था

bahoot khoob Shyam sakah ji.

Nirmla Kapila का कहना है कि -

उन घरों में सोग था
पर वहाँ मातम न था
श्याम सखा श्याम जी की कलम को तो मेरा सदा नमन है इस गज़ल ने तो मन मोह लिया बेहतरीन आभार्

Priya का कहना है कि -

देखकर सब चल दिए
जख्म थे, मरहम न था

बारिशें आँखों में थीं
अब्र का मौसम न था

mujhe to ye choti si gazal bahut raas aayi

अमित का कहना है कि -

अच्छी गज़ल है श्याम जी।
देखकर सब चल दिए
जख्म थे, मरहम न था
सुन्दर अन्दाज है।
सादर

Ambarish Srivastava का कहना है कि -

बहुत अच्छी अच्छी ग़ज़ल है

आसमाँ नजदीक था
पर, परों में दम न था

उन घरों में सोग था
पर वहाँ मातम न था

टेढ़ी मेढ़ी राह थी
गेसुओं का खम न था

देखकर सब चल दिए
जख्म थे, मरहम न था

बारिशें आँखों में थीं
अब्र का मौसम न था

दूब सूरज जब मिले
फिर दिखा शबनम न था

क्या कहने !

मुहम्मद अहसन का कहना है कि -

दूब सूरज जब मिले
फिर दिखा शबनम न था
मेरे विचार से , जैसा कि प्रयोग होता है, सही हो गा ' शबनम न थी' किन्तु तब काफिया खराब हो जाए गा.

बेवफ़ा ये 'श्याम’ तो
ऐ मेरे हमदम न था

इस शे'एर में भी कहीं कुछ खटक रहा है .मेरे विचार से इस में भी गलती है , यह होना चाहिए ' मेरा हमदम न था' किन्तु 'ऐ' शब्द का प्रयोग तब भी समझ में नहीं आ रहा.

mohammad ahsan का कहना है कि -

उन घरों में सोग था
पर वहाँ मातम न था
bhala kya arth hua is ka !!

venus kesari का कहना है कि -

उन घरों में सोग था
पर वहाँ मातम न था

इस शेर ने तो दिल लूट लिया

वीनस केसरी

Shamikh Faraz का कहना है कि -

आसमाँ नजदीक था
पर, परों में दम न था

मेरी नज़र में ग़ज़ल का सबसे अच्छा शेर.

श्याम सखा 'श्याम' का कहना है कि -

ahashan sahib

आपने देखा हो शायद इस गज़ल के नीचे इसके होने ,कहने की तारीख भी लिखी है,मैने यह गज़ल जस की तस पोस्ट कर दी थी,उसके पीछे मंशा भी थी कि
नव -गज़लकार जाने की हम कैसी-कैसी गलतियां भूलकर कर बैठते हैं ,यह गज़ल मेरे संग्रह-दुनिया भर के गम में सन२००७ में प्रकाशित हुई है वह हिन्द युग्म के कुछ सद्स्यों के पास भी है।उस संग्रह में शबनम वाला शे‘र नहीं है यानि निकाल दिया गया था kyonki shabanamस्त्री-लिंग में प्रयुक्त होता है जैसा आपने कहा है,
और श्बनम न थी
करने से रदीफ़ गड़बड़ा जाएगा-
कुछ और अशआर में भी तबदीलियां हुई हैंवहां उस संग्रह में -अब उस रूप में सेट किया है कृपया दोबारा गौर फर्माएं और मक्ते में तो ठीक कहन है वहां कहा जा रहा है ऐ मेरे हमदम ये श्याम बेवफ़ा तो न था
संभव हो तो मेरे ब्लॉग पर भी अपनी पारखी नज़र डालें
श्याम सखा‘श्याम’

sada का कहना है कि -

आसमाँ नजदीक था
पर,परों में दम न था ।
बहुत ही गहरे भाव, बेहतरीन गजल के लिये आपका आभार ।

तपन शर्मा का कहना है कि -

बारिशें आँखों में थीं
अब्र का मौसम न था....

waah...

mohammad ahsan का कहना है कि -

आसमाँ नजदीक था
पर, परों में दम न था
is gazal ka behrtreen she'er, bila shak o shubha

rachana का कहना है कि -

आसमाँ नजदीक था
बस परों में दम न था
अक्सर ही एसा होता है बहुत ही सुंदर शेर है
जख्म की थी बस्तियां
पर वहां मरहम न था
सुन्दर शेर
सादर
rachana

ओम आर्य का कहना है कि -

जख्म की थी बस्तियां
पर वहां मरहम न था

itani khubsoorat sher hai ki bayaan nahi kar sakata.........jindagi kuchh isi tarah ki hoti hai

Udan Tashtari का कहना है कि -

छोटी बहर मगर मस्त निभाया.

yashdeep का कहना है कि -

इश्क में होगी सजा
जानता आदम न था

आसमाँ नजदीक था
बस परों में दम न था

सोग में तो थे महल
पर वहाँ मातम न था

जख्म की थी बस्तियां
पर वहां मरहम न था

अब क्या कहें श्याम जी-खूब-खूब
अब तो कई बार जलन होने लगती है आपसे

स्वप्निल कुमार 'आतिश' का कहना है कि -

ek achhi ghazal ....lekin jis sher ne sabse gehra asar choda wo ye hai ....

इश्क में होगी सजा
जानता आदम न था


bahut khub sir.....

sumit का कहना है कि -

काफी समय बाद आपकी ग़ज़ल पढने को मिली ग़ज़ल अच्छी लगी
आप के ब्लॉग पर भी जरूर आऊँगा

sumit का कहना है कि -

काफी समय बाद आपकी ग़ज़ल पढने को मिली ग़ज़ल अच्छी लगी
आप के ब्लॉग पर भी जरूर आऊँगा

Sunil Kumar Pandey का कहना है कि -

श्याम जी आपकी गजलें अलग होती हैं, यह सब कहते हैं, पर आपकी दो पंक्तियों ने आपके विशाल एवं संवेदनशील हृदय का परिचय दिया।
आभार.......

Sunil Kumar Pandey का कहना है कि -

श्याम जी आपकी गजलें अलग होती हैं, यह सब कहते हैं, पर आपकी दो पंक्तियों ने आपके विशाल एवं संवेदनशील हृदय का परिचय दिया।
आभार.......

Manju Gupta का कहना है कि -

Gazal Wah wah...!!!!!!1
Badhayi.

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