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क्षणिकाएँ


1. चाँद-1

सुना है..
चाँद
पर मिला है पानी
मैं तो सोचता था वो पत्थर है !


2. चाँद-2

दिनभर रहता है मेरे साथ,
रात को चला जाता है
खुद को
सूरज समझता है मेरा चाँद !


3. चाँद-3

सुन..
अपने चाँद होने पर
इतना गुरूर मत कर
बार-बार तेरे चक्कर लगाकर
हमने भी वो जगह पा ली है !


4. सपना -1

जाने कितनी बार
मैं जागा हूँ तमाम रात
तेरा सपना देखने को सुबह-सुबह
माँ कहती है..
‘सुबह का सपना सच होता है’

झूठ कहती है !


5. सपना -2

कुछ दिखाई नहीं दे रहा आज....
सुबह सोकर उठा तो पता चला,
कल रात,
कुछ सपनों ने चुरा ली मेरी आंखें !


6. तुम -1

जो तुम हो, मैं वो चाहता हूँ
तुम जो हो, वो होना नहीं चाहतीं
आती हो तो कहती हो रात हूँ
जाती हो तो कहती हो सुबह थी !


7. तुम -2

तुम
आंख हो
आंख, जिसे कहते हैं शायर
जाम, कमल और समन्दर।
जो होती है
हर प्रेम कविता की अनिवार्य सुन्दरता !

अरे नहीं..
तुम तो आंख हो !
आंख,
जो लग जाती है बेवक़्त
और दिखा देती है
कुछ नामुराद सपने !


8. तुम -3

तुम
मिठास हो..
किसी खुशी पर बांटी जाने वाली
मिठाई में घुली मिठास
दिल में उतरी
और दिमाग पर चढी मिठास ।

अरे नहीं..
तुम तो मिठास हो !
मिठास,
जिसे चाहता है मधुमेह का रोगी
जानते हुए भी
यही है
सारी तक़लीफों का सबब !

9. तुम -4

तुम
सिक्का हो..
जिसकी झनझनाहट सुनकर,
चमक उठती हैं
अन्धे भिखारी की आंखे
सिक्के की गोलाई में
वो महसूस करता है
रोटी का आकार।

अरे नहीं..
तुम तो सिक्का हो !
अत्यंत श्रद्धा के साथ
किसी पवित्र नदी में फेंका गया सिक्का
जो अब किसी के
कुछ भी काम का नहीं !


10. तुम -5

तुम
नींद हो..
जो मुझे नहीं आती
मैं जागता हूं रात भर
कि आ जाओ !

अरे नहीं..
तुम तो नींद हो !
जो दिन भर आती है मुझे
और मैं सो नहीं पाता
जागता रहता हूँ जम्हाइयाँ लेकर !


11. दर्द

आज किसी ने बताया
दर्द रहता है ज़ख्म में
मैं तो सोचता था
मुझ में रहता है !


12. सज़ा

चोर चाहता है
कोई खूबसूरत सज़ा पाना
देखो..
अपनी दाढी में
तिनका उलझा कर लाया है !

-विपुल शुक्ला

(विपुल की यह रचना मैं प्रकाशित कर रहा हूँ)

दर्द-6


सज़ा होगी..
दर्द ने खुद कबूला है
अपना ज़ुर्म !
हां.. उसी ने मारी थी
खुशी को टक्कर
तब बड़ी स्पीड में थी
यादों की कार !
दर्द नशे में था
दिल की पुलिस ने
बरामद की है
उम्मीद की खाली बोतल !
बेशरम है दर्द..
कोई अफसोस नहीं उसे
मोहब्बत के जेल में बन्द
हंसता रहता है कम्बख्त !

तक़दीर के अस्पताल में
भर्ती है खुशी..
हसरतों का गुलदस्ता लेकर
मैं पहुंचा तो पाया
कोमा में है !
लड़ रही है मौत से..
वहीं पास में
कुर्सी पर बैठी मुस्कान
उदास थी
कहने लगी..
खुशी करती थी तुम्हे याद
पर तुम्हारा नम्बर
कहीं मिस हो गया था उससे !
उस दिन..
आंसुओं की दुकान पर
पूछ ही रही थी तुम्हारी पता
कि कमीने दर्द ने
मार दी टक्कर
और मुझसे लिपटकर
रो पड़ी मुस्कान !

तभी आया
वक़्त का डॉक्टर
देने लगा हिदायत
कि मत करो शोर..
फिर जांची
खुशी की धड़कन
और
अतीत का परहेज़ बता कर
लिख दी
ज़िन्दगी के परचे पर
समझौते की दवा !

सीमा


विस्तार जहां होता है खत्म
वहां होती है सीमा..
पर खत्म तो दृष्टी होती है
विस्तार नहीं !
विस्तार अनंत है।
’अनंत’ शब्द बहाना है
अंत ना खोजने का..
तो ‘अनंत’ स्वयं है एक सीमा
या कहें सीमा में है अनंत !
सीमाहीन कुछ भी नही
स्वयं सीमा के अलावा..
बस सीमा,सीमाहीन है !

खुली आंखों की सीमा है आसमान,
बन्द आंखों से देखे जा सकते है
उतने आसमान..
जितनी आती हो गिनती !
गिनती की सीमा नहीं..
पर गिनती आने की सीमा है !
वो कहती है.. करती हूं तुम्हे प्यार.
जितना तुम सोच भी नहीं सकते!
अर्थात
मेरी सोच के खत्म होते ही
शुरु होने लगती है
उसके प्यार की सीमा..
और सीमा के पार क्या है?
शायद नफरत..!

सोचता हूं, ब्रम्हांड के बाहर क्या है
किसके अन्दर है ब्रम्हांड ?
वो बाहर वाली वस्तु भी
कुछ के अन्दर ही होगी !
तो क्या है वो बाह्यतम सीमा..
जिसके अन्दर है सब कुछ !
यह कल्पना की सीमा है..
अगर सीमा कुछ नहीं होती
तो वो काल्पनिक है..
पर कल्पना की तो सीमा है ना !

दर्द की सीमा है मौत,
मौत की सीमा जीवन..
पर दर्द के लिये
ज़रूरी है जीवन होना..!
सोचता हूं,
गोल है सीमा
और हम सब
घेरे हुये हैं सीमा को
चारों तरफ से !

सीमा स्वयं नहीं होती
वो गढी जाती है..
अपनी ज़रूरतों के हिसाब से..
सीमा गढ लेने के बाद
हम रह जाते हैं एक बिन्दू !
और सीमा के बाहर से
शुरु होता है वास्तविक विस्तार।
चाहे कुछ भी हो..
सीमा,
दुनिया की सबसे ज्यादा
विस्तारित की जा सकने वाली वस्तु है !

दर्द-5


आज कांप रहा था दर्द
पहली बारिश में
नहाया जो था !
मैनें कहा..
लेट जाओ।
फिर लगाया
चाहत का थर्मामीटर..
104 डिग्री था
यादों का बुखार!
दिल की पेटी से निकाला..
झूठी उम्मीदों का कम्बल
और यथार्थ की गोलियां देकर
सुलाने लगा उसे !
भूखा था दर्द..
बोला..खा नहीं पाउंगा खाना
जाकर ले आओ किसी से
कोई वादा या कसम
वही खाउंगा आज !
फिर करवट लेकर
गुनगुनाने लगा कुछ..
उसे देखता हुआ
सो गया मैं भी।
जब उठा..
तो गायब था दर्द
ढूंढा,
मां के कमरे में मिला!
अपने साथ,
मां को भी
रुला रहा था कम्बख्त !
मैने रसीद किये..
दो-तीन तमाचे
और चिल्लाया-
”तू अब मुझे छोडकर
मेरे अपनों को सताने लगा !”
सन्न रह गया दर्द
फिर भावुक होकर
लिपट गया मुझसे..
सिसककर बोला-
”माफ करना दोस्त
गलती हो गयी..
अब कभी भी,
कहीं नहीं जाउंगा
तुझे छोडकर !

आख़िरी ख्वाहिश


आख़िरी ख्वाहिश है पूरा कर दूं
कोई मिले शहर का सौदा कर दूं

बंद हों आँखें तो दीदार होता है
सोचता हूँ नींद से तौबा कर दूं

पड़ते हैं जहाँ शैतान को पत्थर
तेरे कूचे को वो मक्का कर दूं

रटता है दिल हर पल इक नाम
सैयाद के हवाले ये तोता कर दूं

ज़िंदगी के लिबास में मौत की बेवा
पूछती है निकाह पक्का कर दूं

दर्द-4


ज़िन्दगी एक वेश्या है
मोहब्बत के बदनाम मोहल्ले में
नाउम्मीदी के कोठे पर
अतीत का तकिया लगाकर
बिस्तर पर लेटी
हर रात..
राह तकती है दर्द की!
वो आता है
मुस्कुराहट के कम्बल में
खुद को दुनिया से छिपाता...
अधूरी हसरतों के फोडों से
भरा है उसका शरीर,
पके हुये बाल,
थुलथुला बदन,
चेहरे पर
झूठी कसमों की झुर्रियां
कुछ ज्यादा ही बताती हैं
उसकी उम्र!
समय से पहले ही
बूढा हो गया है दर्द!


रात को भूखा होता है दर्द...
आकर खाता है
सपनों की कुछ रोटियां
फिर आंसुओं का पानी पीकर
पेट पर हाथ फेरता है
और चढा देता है
चाहत की कुंडी..
बन्द कर देता है किवाड..
जिससे खुशियां
परेशान ना कर सकें उसे!

दर्द को निहारकर
मुस्कुराती है
ज़िन्दगी की वेश्या...
बन्द होता है मजबूरियों का बल्ब..
फिर रात भर
नोंचता है उसे दर्द
और सुबह
जाते जाते..
चुपचाप रख जाता है टेबल पर
यादों के चन्द सिक्के !


दर्द-3


उदास था दर्द
मैने पूछा तो कहने लगा
शाम को चलेंगे कहीं..
अफिस से सीधा ले गया
मुझे घने जंगल में
मैनें कहा..
भाई! जम जाऊँगा
जनवरी की सर्दी में
हंस पड़ा
फिर चुन लाया
यादों की दो-चार लकड़ियाँ
खूब तापी हमने आग..
भूख लगी तो निकाला उसने
नाकामियों का गुड़..
जो रात गहराई
तो वर्तमान की जेब से
बाहर आई अतीत की बोतल
फिर अधूरी हसरतों की शराब पीकर
रात भर नाचें हम!
कौआ उड़,तोता उड़ खेलते हुए
खूब मारा मैने दर्द को
वो हंसते हुए पिटता रहा
बड़ा खुश था अब दर्द..
अचानक कराह उठा
दर्द की दाढ में दर्द था!
कहने लगा
कोई पुरानी मुस्कान
फँस गयी है दाँतों में!
फिर जेब से निकाली
यथार्थ की तीली
और कुरेदता हुआ
सो गया चुपचाप..

दर्द


बुधिया और चाँद के बाद अब दर्द पर नयी श्रंखला की शुरुआत कर रहा हूँ पहले सा स्नेह अपेक्षित है...

दर्द-1

मेरा दर्द जब भला चंगा था
तो मैं नाकारा था
कुछ नहीं करने देता था मुझे !
देखो..
समय की धूल से
अस्थमा हो गया है दर्द को
अब दर्द जब खांसता है..
तो उसे देता हूं मैं
यादों की इनहेलर!
और बदले में
मांग लेता हूं उससे
एक प्यारी सी कविता..

दर्द-2

सुबह सोकर उठा
तो सिरहाने
कुर्सी पर बैठा
काफी पीता मिला दर्द
बोला- गुड मार्निंग !
शिष्टाचारवश मुझे भी करनी पडी
उसके अच्छे दिन की कामना
फिर पूछ लिया-कैसे हो?
तो ज़ोर से हंस पडा वो
फिर गम्भीर हो गया
और मेरा हाथ
अपने हाथों में लेकर
बडी कृतज्ञता से बोला-
अच्छा हूं...

नीला आसमान


नसों में घुसा इंजेक्शन
खींच ली सारी पीड़ा
उडेल दी..
प्रिया धरती पर
सहम गयी वो
फूटते रहे ज्वालामुखी
कहते आसमान से
रुक जाओ..
पटकता ही रहा
सिर पहाड़ों पर
सूज कर बंद हुई आँखों से
निकाल देना था उसे
शरीर का सारा पानी!

आपे से बाहर था
उसे देख..
भाग गए तारे
छुप गया सूरज
अंधेरे मे कहीं जाकर!
चाँद ने रोका..
खाई ज़ोर की ठोकर
जा भिड़ा सूरज में
जल कर
सफेद पड़ गया बेचारा
माथा फट गया..
चोट के निशान
चेहरे पर हैं अभी तक!

पगला ही गया..
जब हाथ आया
बिजली का कोड़ा!
मारता रहा खुद को
नंगे बदन,रात भर
छलनी कर दिया जिस्म
टपकता रहा लहू..

उसे मार डालना था
दर्द को
दर्द चीख रहा था
गिड़गिड़ा रहा था
कि बस..
चमकती रही बिजली
वो मारता रहा
अपने दर्द को कोडे
बेहोश होने तक!

पता है..
तबसे आसमान ने
फेर लिया है मुँह
पीठ किए बैठा है
धरती की ओर!
रोज़ सिकाई करता है
सूरज धूप से
देखो
उस रात की मार से
अभी तक
नीला पड़ा है जिस्म!

लडकियां


पिछले दिनो एक लडकी से तार्किक-चर्चा(बहस कहना उपयुक्त नहीं होगा)हुई|विषय था लडके और लडकिय़ों में से कौन अच्छा है। बहस के दौरान उस लडकी ने लडकियों का पक्ष बडॆ दमदार तरीके से रखा। ईमानदारी से कहूं तो मैनें खुद को थोडा-सा कमज़ोर भी महसूस किया। बहस में मज़ा तो आया ही साथ में कुछ नया सोचने को भी मिला। क्या-क्या बातें हुई आप सब से बांटना चाहता हूं।
इस कविता के जरिये पहले उस लडकी ने जो कुछ कहा उसे मतलब लडकियों का पक्ष रख रहा हूं। बाद में कभी अपनी बात करूंगा। कविता पढने वाले सारे लडकों से आग्रह है ज़रा बारीकी से विश्ललेषण कर टिप्पणी द्वारा कुछ ठोस बिन्दू मुहैया करायें जिससे मैं अपना मतलब लडकों का पक्ष मजबूती से रख सकूं। और लडकियां भी सूचित करें कि उनकी बात उन तक पहुंची कि नहीं।
जिसकी बात कह रहा हूं उसका नाम नहीं लिखूं तो गलत होगा। भाव हैं इन्दौर की आई.पी.एस. एकेडेमी में एम.सी.ए. अंतिमवर्ष की छात्रा प्रीति चौधरी के और शब्द मेरे।



ट्रैफिक के शोर से तंग आकर
कभी पेनकिलर नहीं खातीं
सन्नाटॆ की चीखों से लडना भी
खूब आता है उन्हें
जो अच्छा लगता है..
उसे देखकर बनाती हैं मुंह
क्योंकि
अनचाहा मतलब निकलने का डर
बहुत बडा होता है !
अक्सर लगते रहे हैं उन पर
दिल तोडने के इल्ज़ाम
मगर..
दिल तोडने का बेहिसाब दर्द
उन्हीं के हिस्से आता है!
कुछ जताने में फिसड्डी..
बदल जातीं हैं रिश्ते बनने के बाद।
ज्यादा ध्यान रहते हैं अब
बर्थ-डे और शादी की साल-गिरह..
फोन ना करने की शिकायत
बन जाती है
ज्यादा ध्यान रखने की बीमारी !

आंखें बन्द करके ही
देख लेती हैं सबकुछ
उन्हे नहीं होती ज़रूरत
अपने पर्स में
किसी भी तसवीर की !
कभी इतनी स्वार्थी
कि चिढ होती है
और कभी इतनी उदार
कि गुस्सा आ जाये देखकर..
सीता भी वो है और शूर्पणखा भी!
अधिकतम भी वही और न्यूनतम भी !
सिर्फ सांस लेना ज़िन्दगी नहीं होती
जानती हैं वो..
और यह भी
कि सिर्फ प्यार करना भी नहीं!
बिना एम.बी.ए. की
जन्मजात मैनेजर होतीं हैं
सच्ची लडकियां !


हम सबके लिये
खुदा होते हैं मां-बाप
मगर शादी के बाद
बदल लेती हैं..
वो अपना खुदा भी !
और फिर..
खुदा की खुशी के लिये
सपनों के मुंह में कपडा ठूंसकर
हंसते हुए..
कत्ल कर देतीं हैं उनका !
जैसे परिन्दा
खुद ही काट ले अपने पर
और आंसू का
एक कतरा भी ना गिरे !

बिना आंसू बहाए रोना
खूब सिखाया है भगवान ने
और मौका भी देता है
कला आज़माने का।
वैसे..
आंसू बहाकर भी रोतीं है वो अक्सर
क्योंकि जानती हैं
रोना सिर्फ दुख जतलाने के लिये नहीं होता।
रोने के बाद
पूरी करनी होती है चिंटू की स्वेटर,
गलाने होते हैं बाबूजी के चने,
और सास के सिर में मेंहदी लगाकर
चेहरा भी धोना होता है
ताकि आफिस से लौटा पति
देख सके..
हमेशा की तरह हंसमुख बीवी!

सचमुच..
रोना ज़रूरी होता है उनके लिये
शायद इसीलिये बचपन से ही
रोतली होती हैं लडकियां!

हां...
दुनिया का आधार हैं वो।
जानता हूं
कईयों को हो सकता है एतराज़
विश्वास ना हो
तो छीन कर देखो कवि से
उसकी मां और प्रेमिका !
जो हुआ ऐसा...
इतिहास से मिट जायेंगे बडे-बडॆ नाम
और लुप्त हो जायेगा
दुनिया का अस्सी-प्रतिशत साहित्य।

कमाल है !


अजब ये मोहब्बत का जाल है,
फंसकर भी मछली निहाल हैं !

तुझमें दिखता हूँ आईना बनेगी?
चाँद का चाँद से सवाल है !

गीली हुई सूखी तस्वीर फिर
तेरी सहेली का ऐसा ख़याल है !

संभाला नमक तू रुसवा ना हो
क़ैद आँसू नमक हलाल हैं !

ग़मज़दा शेर पर उनकी 'वाह'
सितम ढाने का हुनर कमाल है!

लम्बा है सफर ढोनी हैं यादें,
ये शायर नहीं महज़ हम्माल है !

आख़िर क्यों होते हैं ये धमाके!


मिशन पूरा हुआ
मगर लोग नाराज़ हैं
पूछ रहे हैं एक-दूसरे से
आख़िर क्यों होते हैं ये धमाके!
फिर दहली है मुंबई
अब जगह-जगह जलाईं जाएँगी मोमबत्तियाँ,
एक दूसरे को भेजे जाएँगे एस.एम.एस.
ड्रामेबाजी करेंगे न्यूज़ चैनल,
सब गालियाँ बकेंगे आतंकियों को,
वीर रस के कवि सृजित करेंगे
कुछ नये ओजपूर्ण छन्द!
बैठे-बिठाए ही मिल जाएगा विषय
अगले "काव्य-पल्लवन" के लिए!
चित्रकला प्रतियोगिता के लिए
नयी "थीम" की खोज भी पूरी होगी!
अख़बारों में छपेंगे कुछ ज़ोरदार आलेख
दो अतिरिक्त पन्ने भी आएँगे शायद!
इस सबके बाद..
पसर जाएगा सन्नाटा
अगला धमाका होने तक!
और तब
फिर से पूछेंगे लोग...
आख़िर क्यों होते हैं ये धमाके!

अमेरिका में नहीं दोहरा सके कभी ९/११
यहाँ पटाखों की तरह फूटते हैं बम!
देश को माँ बोलते हैं
हम कपूतों की माँ की अस्मत लूटकर
भाग जाते हैं वो
और जिन्हे पकड़ पाते हैं
उन्हे जेल में रख,मेहमान बनाकर
ससम्मान
रोटियाँ खिलते हैं हम!
इतना भी साहस नही
फाँसी दे सकें उन्हे!
अरे! जानवर भी संवेदनशील होते हैं
अपनी माँ के लिए!
नपुंसक से बड़ा कोई शब्द होता है क्या ?
नहीं हो..तो सृजित करो!
फिर से पूछ रहे हैं लोग
आख़िर क्यों होते हैं ये धमाके!

न्यायालय ने हटा लिया है
सिमी से औपचारिक और महान "प्रतिबंध"
खुलेआम तरफ़दारी करते हैं
हमारे राष्ट्रीय नेता!
वो सोचते हैं कट जाएँगे उनके वोट!
चिढ़ आती है,खीझ और शर्म भी
मगर लोग नहीं मानते..
पूछ रहे हैं
आख़िर क्यों होते हैं ये धमाके!

आतंकियों को पकड़-पकड़ कर
मानवाधिकार देते हैं हम
"पोटा" पर बस बहस ही कर सकते हैं!
"विचार और मनन"
यही जीवन है हमारा|
इसी के लिए पैदा हुए हैं
अफ़सोस..
ईमानदारी से नही करते यह भी!
हम असफल हैं
क्योंकि आतंकियों से लड़ती है
सिर्फ़ पुलिस और इंटेलीजेंस!
हम नहीं..
हम तो ढूँढते रहते हैं वो फिल्मी हीरो
जो घुस जाए होटल में अकेला,
मार डाले सारे आतंकियों को
और सबको छुड़ा लाए!
ढूँढ रहे हैं उसे
अपने पड़ोस में,मोहल्ले में,शहर में,प्रदेश में,
सब जगह!
बस..
आईने में ही नहीं झाँकते कभी!
डरते हैं
और डरते डरते पूछते हैं..
आख़िर क्यों होते हैं ये धमाके!

बिल्कुल छोटी सी बात है
गोलियाँ मारीं हैं उन्होने
हमें,हमारे घर में घुसकर|
शर्म तक नहीं आती!
हाँ..बेहिसाब गर्व ज़रूर होता है
धोनी की टीम की
राष्ट्रीय महत्व वाली "ऐतेहासिक विजयों" पर!
समय आ गया है
कुछ करो..
माना कि देश कुछ नहीं
तुम क्रिकेट के लिए जागो!
देखो..
रद्द कर दिया है
इंग्लैंड ने अपना दौरा!

क्षणिकाएँ


1 आरक्षण

अमावस्या से पंचमी:ग़रीबी रेखा
पंचमी से दशमी:मध्यम वर्ग
दशमी से चौदस:उच्च वर्ग
और पूनम के लिए
टाटा,बिड़ला,अंबानी|
इस तरह तय हुआ..
चाँद का आरक्षण!


2 बढ़ता चाँद


उफ्फ!
ये फूले गाल ..
चेहरे पर बढ़ती उजलाहट
और भरा हुआ तन!
पूनम को विदा होगी|
शादी होने ही वाली है
चाँद की!


3 घटता चाँद

रोज़ हारता है उसे
बेचता है थोड़ा-थोड़ा
जुआरी है
चाँद का पति!


4 काजल


उसके फूटकर रोने से
बह जाता है काजल!
काला हो जाता है तन
लेकिन विज्ञान
कुछ और ही बताता है
अमावस का कारण!


5 तारे

प्यार की कब्र है चाँद..
बिखरे हैं उस पर
तारों के अनगिनत फूल!
आज..
एक चमकीले तारे में दिखा मुझे
वो फूलों सा चेहरा!


6 धूल


चलना ज़िद है या मजबूरी
नहीं जानता!
लेकिन इस पंखे की
पंखुड़ियों पर
जमी है..
बेहिसाब धूल!


7 बात

सुनो..
मैं जब मर जाऊँगा
तब तो मेरी बात मानोगी ना ?
अपनी कब्र पर
खुदवा दूँगा मैं
"यहाँ रोना मना है!"


8 बेवफा


जो वफ़ा का वादा ही ना करे
उसे बेवफा नही कहते
काश..
तुम बेवफा होतीं!


9 ग़रीबी

उसने कहा था
तुम्हारे आँसू
मोतियों-से कीमती हैं!
कम्बख़्त..
ग़रीबी दूर कर गयी!


10 ख़ुदकुशी

पागल था!
बटुआ खो गया
तो ख़ुदकुशी कर ली
कहते हैं.
उसमें किसी की
तस्वीर रखी थी!


11 मामला

पुराने यादों से
कल तबीयत बिगड़ गयी!
मामला दर्ज़ है
उपभोक्ता फोरम में
इल्ज़ाम है..
नहीं बताई उसने
यादों की एक्सपायरी डेट!

बुधिया-9


डूबने के लिए सबको समंदर मिले
ज़रूरी नहीं ..
कभी कभी आँसुओं से भी
काम चलाना पड़ता है !
आख़िर स्वाद तो
दोनों का एक सा है ना !
लड़का नहीं लड़की होगी ..
कहकर निकला था वो
फिर नहीं लौटा!
प्रसव और विरह
दोनों वेदनाओं को
एक साथ झेला बुधिया ने !

माँग फिर सजी,
मेहन्दी रची
ससुराल वही था
पर पति दूसरा !
उसका अर्धविक्षिप्त पागल-सा देवर
बुरी बालाओं से बचने
पहन लिया उसने ताबीज़
नहीं,ताबीज़ नहीं..
महज़ ताबीज़ का नाम!

सुहागरात के दिन
पति को थपकियाँ दे कर सुलाया !
फिर बच्ची को दूध पिलाकर
ताकती रही खुला आसमान !
आस में..
वो दूर चमकता तारा आ गिरे
वापस उसकी झोली में !


खुश है बुधिया..
अब देख सकती है
गोद भराई की रस्म,
गा सकती है बधाये,
जा सकती है सुहागलों में
और हाथ भी फेर सकती है
किसी के नवजात बच्चे पर !
विधवा का कलंक मिट गया है अब
विधवा नही है वो !

खूब समझती है वो
उजड़े,बिखरे रंगों का मतलब
उसे सहेजना है
नन्हे सपनों को..
सजाना है उन्हें कोरे कैनवास पर,
भरना है नये रंग !
वो शक्ति है
पर शिव की तरह
रोककर रखती है सारा हलाहल
अपने कंठ में !
उसे ज़हर नहीं..
दूध पिलाना है
नन्हे सपने को !

प्याज़ काटते समय
वो झूठ-मूठ नहीं रोती !
पहली बारिश में नहाती
छोटी बच्ची को देख
सोचती है कुछ...
फिर उसे पकड़ने के बहाने
खूब भीगती है खुद भी !
उसकी आँखों में झाँकती है
और फूटकर रोती है..
अचानक अपने पति को देख
बिलख पड़ती है !
फिर संभलती है...
और सबको समेटकर
छुपा लेती है अपने आँचल में !
बस यूँ ही...
एकटक छत को ताकती
वो डबडबाई आँखें
सपनों के दुनिया में
कब चली जाती हैं..
पता ही नही चलता !

चाँद-3


नाज़ुक से अश्क
कठोर धरातल
टकराहट...
सपनों की सिसकियाँ
सुबकती चाहत!

बिखरे आँसू,टूटे कण
जैसे हारे हुए सैनिक
सुनसान रण...

चाँद की परछाईं ,
अश्कों का क़ैदखाना
हंसता चाँद बंदी है
बंदी चाँद!

अश्कों की नमी
ठंड लगी
वफ़ा का कंबल नदारद
एक दिन,दो दिन
दो साल,चार साल
जीवन भर?
अब क़ैदखाना नहीं
अश्कों का ताबूत!
टूटी साँस..
उम्मीद का कफ़न
चाँद की लिपटी लाश!
और फिर जनाज़ा...
स्याह रात से भोर तक!

भोर..
ज़िम्मेदारियों का सूरज
तीखी किरणें,
झूठा प्रकाश
उड़ते अश्क
चाँद आज़ाद !

चाँद...
ईमानदार कैदी
दिन भर मुक्त
और रात?
ठंड,ठिठुरन
मौत
और फिर जनाज़ा
स्याह रात से भोर तक !

बुधिया-8


इंदौर के निकट धार रोड पर स्थित कलारिया नामक ग्राम में एक वृद्धा की हत्या कर दी गयी! १७-४- ००८ के नई दुनिया के मुख्य पृष्ठ पर मैने खबर पढ़ी| विस्तार से यह कविता बताएगी!


पता था उन्हे...
चिल्ला नही सकती
एक सौ दो साल की बुधिया
आधी रात,बरामदे से,
खटिया सहित उठाया
फिर ले गये
नहर के उस पार...
सुनसान खेत में!

वाह !
चाँदी के मोटे कड़े
खरी चाँदी !
बहुत खींचे..
फिर काट डाले पैर
कम्बख़्त पैर नहीं बिकते...
कड़े बिक जाएँगे
बेरहमी से नोंचे गये
सोने के कुंडल,
कान सहित!
नाक से नथनी...
चमड़ी के साथ आई!
कलाइयाँ..
कुछ पाँच फुट
दूर पड़ी थीं सुबह
कंगन कैसे छोड़ देते वो?
माला समझदार थी...
आराम से निकल गयी
वरना गला सिलना पड़ता
जलाने के पहले!
खून बहता रहा
बहता ही रहा....
सुबह अधखुले पोपले मुँह में
लहू भरा मिला
गंगाजल की जगह!
कटे पैरों का माँस...
रात भर नोंचते रहे कीड़े!
कलाईयों में चीटियाँ लग गयीं थीं!
बेहोश हो गये लोग
उसकी लाश देखकर
उफ्फ़!
कैसे जलाया होगा उसे ?
अख़बार मे पढ़ा मैने
लगा..
जीवन की सड़क पर घूमते
सुअर हैं हम!
गंदा खाते हैं..
वही पसंद है हमे,
वही बिखरा है
हमारे चारों ओर..
भरा पड़ा है पूरी दुनिया में
हमारे दिमाग़ों में भी!
बस..
अब कोई ट्रक आएगा
कुचल देगा हमें
अंतड़ियाँ बाहर निकल आएँगी..
राम-राम कहते
बाजू से निकल जाएँगे सब!
पिचले हुए अंग...
बिखरे होंगे सड़क पर
कुछ लाल-लाल सा
चिपचिपाता रहेगा
कुछ दिनों!
कुछ और भी गाड़ियाँ
रौंदती हुई..
निकल जाएँगी !
चिलचिलाती धूप में..
रूह चिपक जाएगी
पिघले कोलतार से
चिपकी ही रहेगी...हमेशा!
हाँ.. ऐसा ही होगा...
सुअर हैं हम!
यूँ ही सड़कों पर घूमते..
बददिमाग़ और नाकारा सुअर !

चाँद-भाग 2


धरती माँ की दो बेटी
एक खुद की दूसरी सौतेली
खुद की बेटी उपजाउ मैदान
हुई जवान
दहेज में दिए
हरे भरे पेड़,भरपूर फसलें
सूरज ससुराल
एकदम खुशहाल!

सौतेली बेटी
बंजर रेगिस्तान
प्रेम की बारिश को तरसती
मनहूस सा चेहरा..
एकदम चुपचुप
ममता से अंजान
हुई जवान
दहेज में दिए
रेत के टीले,
झाड़-झंगड़,
चूहे-छछूंदरें
गुस्सा ससुराल..
सूरज विकराल!

सूरज उसे रोज जलाता
दहेज के ताने सुनाता
वो चुपचाप जलती रहती
हर पल रोती रहती
गालियाँ सुनती,कराहती
पर मर ना पाती..
प्यारे बाबा की याद आ जाती!

बाबा..
चाँद बाबा!
हर रात आते हैं
बेटी के छालों पर,
चाँदनी का मरहम लगाते हैं!
सहलाते हैं,समझाते हैं
लोरी गा कर सुलाते हैं..

बाबा दूर हैं,
मजबूर हैं..
बाबा के प्यार में वो भूल जाती है
सारी पीड़ा,सारे दुख!
छोटी बच्ची की तरह..
हँसती है,खिलखिलाती है
और फिर सो जाती है
कल फिर जलने के लिए
दहेज की आग में !

बुधिया-भाग 7


बेटा बहू रज़ाई में दुबके हैं
बुधिया कंबल ओढ़े खांस रही है
बाहर बरामदे से,
नीले आसमान को ताक रही है!

रधुआ..
दवाई करवाता है
तो एहसान जताता है
बुडढी जल्दी मरे ये दुआ मनाता है!
उसे जल्दी से जल्दी
कुछ पैसे बचाने हैं
अबकी सावन पर..
राधा को दो कंगन बनवाने हैं!

बुडढी को बस खुद की चिंता है
ना जाने क्या चाहती है?
हमेशा खाँसती रहती है..
राधा को दिन भर सताती है!

आँखें कमज़ोर हैं..
नाटक करती है!
अरे!राधा की साड़ी में
एक फाल तो लगा सकती है!
कामचोर है..
बस पड़ी रहती है
बर्तन धोने की कहो
तो कितना कलपती है!

बुधिया को याद है
जब रधुआ छोटा था
पल्लू पकड़ कर,
हर बात मनवाता था
रोज़ खाने के बाद
गुड की ढेली माँगता था!
अब वो लाचार है..
रोटी को तरसती है
खाना मिले ना मिले
गुड की ढेली की जगह,
तिरस्कार और गाली ज़रूर मिलती है!

वो छोटा था..
अंगुली पकड़ कर
चलना सिखाती थी
देखो..
अब दौड़ लगाता है!
माँ को मढिया तक ले जाने में
कितना झल्लाता है!
नवरात्री में उपास रखता है
कन्या भोज कराता है
एक माँ को दुखी करके
दूजी को खुश करना चाहता है!

बहू पेट से है
मनौती मानी कि लड़का हो
कुल आगे बढ़े
बुढ़ापे का सहारा हो..

भगवान सब देखता है
उन्हे लड़का हुआ है
राधा सोचती है
बुढ़ापा सुधार गया है
भोली है..नादान
देखो!कह रही है..
लड़का बिल्कुल बाप पर गया है!

क्षणिकाएँ


1

चाँद,क्यों सहते हो तुम
शायरॉं के इतने ज़ुल्म!
कुछ सीखो!
दहेज की सताई
ख़ुदकुशी करने वाली लड़की से
और...

2

आज आईने से गायब था
मेरा अक्स!
शायद आँसुओं में घुलकर
बह गया कहीं!
मिले तो बताना ..

3

आधी रात को
चाँद आया कुछ तारों के साथ
मुझे धमकाया और जला गया
वो सारे पन्ने..
जिनमें लिखा था मैने उसे
बेवफा!

4

उसकी हर चीज़ प्यारी है मुझे
मैं नहीं रोता,कभी नहीं!
डर है,
गम कम हो जाएगा!

5

ठंड से बचने के लिए
ओढ़ लिया मैने कंबल
यादों के लिए भी एक होता,
तो क्या खूब होता!

6

पैसे रखने को बटुआ खोला
तो तस्वीर में मां मुस्कुरा दी!
सालों पहले
तड़प कर मरी थी कैंसर से..

7

पाठ चल रहा है,
सिर्फ़ शुद्ध घी का दीपक
पवनपुत्र को स्वीकार है..
कल सर्वे था,पता चला,
गाँव का हर तीसरा बच्चा
कुपोषण का शिकार है!

8

यहाँ धर्म की लकड़ी जलाकर
इंसानी बर्तनों में
जज़्बात उबाले जाते हैं!
देखो..मेरा प्यारा भारत
चूल्हा बन गया है !


क्षणिकाएँ

चाँद - भाग 1


बुधिया की पूरी श्रंखला को आपने प्यार दिया और सराहा | इसी से प्रेरित हो कर आज एक नयी श्रंखला "चाँद" की शुरुआत करने जा रहा हूँ |
तो पेश है आज इसी की पहली कड़ी....


अंतहीन समुद्र
आँखें बंद
नीरव,शांत
पूनम की रात,
चंद्रिका से दीपित
कोमल गात!

लेटा समंदर,
थका-हारा सा!
हिलती लहरों पर चाँदनी का स्पर्श..
जैसे थपकी दे माँ
सो जा..
नींद की चौकीदारी,
आकाश में
चाँद की गश्त!

अचानक पवन गतिमान,
बादलों में छिपा चाँद
चौंका समंदर!
बैचैन घबराया सा
दौड़ पड़ा..
पथरीली ज़मीन पर
बदहवास हो कर
पागल..!

पैर छिल गये उसके,
लहूलुहान हो गया
कराहता रहा,
रोता रहा,
बड़ी देर तक
हिचकियाँ गूँजती रहीं
अनंत आकाश में..!
और फिर
सो गया वो
बिना थपकियों के
यूँ हीं..