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Saturday, May 03, 2008

बुधिया-9


डूबने के लिए सबको समंदर मिले
ज़रूरी नहीं ..
कभी कभी आँसुओं से भी
काम चलाना पड़ता है !
आख़िर स्वाद तो
दोनों का एक सा है ना !
लड़का नहीं लड़की होगी ..
कहकर निकला था वो
फिर नहीं लौटा!
प्रसव और विरह
दोनों वेदनाओं को
एक साथ झेला बुधिया ने !

माँग फिर सजी,
मेहन्दी रची
ससुराल वही था
पर पति दूसरा !
उसका अर्धविक्षिप्त पागल-सा देवर
बुरी बालाओं से बचने
पहन लिया उसने ताबीज़
नहीं,ताबीज़ नहीं..
महज़ ताबीज़ का नाम!

सुहागरात के दिन
पति को थपकियाँ दे कर सुलाया !
फिर बच्ची को दूध पिलाकर
ताकती रही खुला आसमान !
आस में..
वो दूर चमकता तारा आ गिरे
वापस उसकी झोली में !


खुश है बुधिया..
अब देख सकती है
गोद भराई की रस्म,
गा सकती है बधाये,
जा सकती है सुहागलों में
और हाथ भी फेर सकती है
किसी के नवजात बच्चे पर !
विधवा का कलंक मिट गया है अब
विधवा नही है वो !

खूब समझती है वो
उजड़े,बिखरे रंगों का मतलब
उसे सहेजना है
नन्हे सपनों को..
सजाना है उन्हें कोरे कैनवास पर,
भरना है नये रंग !
वो शक्ति है
पर शिव की तरह
रोककर रखती है सारा हलाहल
अपने कंठ में !
उसे ज़हर नहीं..
दूध पिलाना है
नन्हे सपने को !

प्याज़ काटते समय
वो झूठ-मूठ नहीं रोती !
पहली बारिश में नहाती
छोटी बच्ची को देख
सोचती है कुछ...
फिर उसे पकड़ने के बहाने
खूब भीगती है खुद भी !
उसकी आँखों में झाँकती है
और फूटकर रोती है..
अचानक अपने पति को देख
बिलख पड़ती है !
फिर संभलती है...
और सबको समेटकर
छुपा लेती है अपने आँचल में !
बस यूँ ही...
एकटक छत को ताकती
वो डबडबाई आँखें
सपनों के दुनिया में
कब चली जाती हैं..
पता ही नही चलता !

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20 कविताप्रेमियों का कहना है :

masoomshayer का कहना है कि -

bahut dino baad koyee kavita padh ke ankh nam huyee hai is sagar kee lahar kee boondon ko shabd kaise doon shabd nahee mango peeth pas layo thapthpa deta hoon

Anil

Seema Sachdev का कहना है कि -

खूब समझती है वो
उजड़े,बिखरे रंगों का मतलब
उसे सहेजना है
नन्हे सपनों को..
सजाना है उन्हें कोरे कैनवास पर,
भरना है नये रंग !
वो शक्ति है
पर शिव की तरह
रोककर रखती है सारा हलाहल
अपने कंठ में !
उसे ज़हर नहीं..
दूध पिलाना है
नन्हे सपने को !

प्याज़ काटते समय
वो झूठ-मूठ नहीं रोती

बुधिया का यह रूप ,कितने भयंकर सच्च को आपने शब्दों मे समेट दिया , आप कड़वे सच्च को बड़ी आसानी से बयान कर गए |बधाई .....सीमा सचदेव

रश्मि प्रभा का कहना है कि -

itna sashakt parivesh chitran.....
bahut taarif ke yogya hai,
aapko badhaai.

शोभा का कहना है कि -
This comment has been removed by the author.
शोभा का कहना है कि -

विपुल जी
कविता अच्छी है. थोडी लम्बी अधिक है.

mehek का कहना है कि -

bahut marmik chitran badhai

pallavi trivedi का कहना है कि -

डूबने के लिए सबको समंदर मिले
ज़रूरी नहीं ..
कभी कभी आँसुओं से भी
काम चलाना पड़ता है !
आख़िर स्वाद तो
दोनों का एक सा है ना !

बहुत बहुत मर्मस्पर्शी चित्रण. बधाई इस सुन्दर कविता के लिए!

ajay का कहना है कि -

बहुत ही सुंदर रचना
काफी मार्मिक कविता है
खास कर ये पंक्तिया
"खूब समझती है वो
उजड़े,बिखरे रंगों का मतलब
उसे सहेजना है
नन्हे सपनों को..
सजाना है उन्हें कोरे कैनवास पर,
भरना है नये रंग!"

Harihar का कहना है कि -

सुहागरात के दिन
पति को थपकियाँ दे कर सुलाया !
फिर बच्ची को दूध पिलाकर
ताकती रही खुला आसमान !
आस में..
वो दूर चमकता तारा आ गिरे
वापस उसकी झोली में !

मजबुरियों मे घिरी करुणता !
अच्छा चित्रण है

सजीव सारथी का कहना है कि -

budhia ki kadi men ek aur moti

anju का कहना है कि -

विपुल जी
बुधिया रचना बहुत ही मार्मिक और दिल को छु जाने वाली रचना लिखी गई है
इसमें आपने तमाम प्रस्तिथियों को बहुत ही अच्छे तरीके से पेश किया है
शब्दों का चयन
और बातो के कहने का thang बहुत पसंद आया
दिल को छु जाने वाली कविता
बधाई आपको

sahil का कहना है कि -

एकबार फ़िर वही करामाती,अंदाज.शानदार
आलोक सिंह "साहिल"

tanha kavi का कहना है कि -

फिर से कुछ भी कहने की मैं जरूरत नहीं समझता......पिछली आठ बारों से एक हीं बात कह-कह कर थक चुका हूँ :)

flawless poetry ....

बधाई स्वीकारो।

-विश्व दीपक ’तन्हा’

SUNIL DOGRA जालि‍म का कहना है कि -

सुहागरात के दिन
पति को थपकियाँ दे कर सुलाया !
फिर बच्ची को दूध पिलाकर
ताकती रही खुला आसमान !
आस में..
वो दूर चमकता तारा आ गिरे
वापस उसकी झोली में

आपकी बुधिया श्रृंखला बहुत ही मार्मिक है...लेकिन यह कविता पिछली आठों से अलग है.. बधाई.

Kavi Kulwant का कहना है कि -

दिल भर आया

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

तालियों की आवाज आयी !!!!!!!

दिल भार गया तो होठ ना चले हाथ चल पडे..

pooja anil का कहना है कि -

विपुल जी ,

बुधिया सिर्फ़ एक कविता नहीं है, ऐसा लगता है कि आप इसका एक एक क्षण स्वयं अनुभूत करके उसे शब्दों में पिरो देते हैं , और शायद वही अनुभूति सभी पाठकों को, इस कविता को पढ़ते हुए बुधिया से जोड़ देती है .
बहुत ही मार्मिक ..........

^^पूजा अनिल

रंजू ranju का कहना है कि -

एक और अच्छी कड़ी जुड़ गई बुधिया श्रृंखला में बहुत ही दिल को छू जाने वाली रचना है यह विपुल जी ..

रेनू जैन का कहना है कि -

बहुत मर्मस्पर्शी लिखा है आपने.... आँखें नम हो गयी. हमारे यहाँ 'विधवा' शब्द को कलंक मानना कब बंद होगा?

abhi का कहना है कि -

विपुल,
तुम्हारी कविता ने फ़िर चौंका दिया,हर बार तुम्हारी कविता हमारे समाज का नया रूप दिखाती है.
इस कविता में बुधिया को विधवा के श्राप से तो मुक्ति मिली परन्तु उसकी दूसरी शादी पागल के साथ ;एक खुशी के साथ दूसरा दुःख का अच्छा समन्वय किया है. तुम्हारी कविता की प्रारंभिक पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगी -"डूबने के लिए सबको समंदर मिले
ज़रूरी नहीं ..
कभी कभी आँसुओं से भी
काम चलाना पड़ता है !"

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