डूबने के लिए सबको समंदर मिले
ज़रूरी नहीं ..
कभी कभी आँसुओं से भी
काम चलाना पड़ता है !
आख़िर स्वाद तो
दोनों का एक सा है ना !
लड़का नहीं लड़की होगी ..
कहकर निकला था वो
फिर नहीं लौटा!
प्रसव और विरह
दोनों वेदनाओं को
एक साथ झेला बुधिया ने !
माँग फिर सजी,
मेहन्दी रची
ससुराल वही था
पर पति दूसरा !
उसका अर्धविक्षिप्त पागल-सा देवर
बुरी बालाओं से बचने
पहन लिया उसने ताबीज़
नहीं,ताबीज़ नहीं..
महज़ ताबीज़ का नाम!
सुहागरात के दिन
पति को थपकियाँ दे कर सुलाया !
फिर बच्ची को दूध पिलाकर
ताकती रही खुला आसमान !
आस में..
वो दूर चमकता तारा आ गिरे
वापस उसकी झोली में !
खुश है बुधिया..
अब देख सकती है
गोद भराई की रस्म,
गा सकती है बधाये,
जा सकती है सुहागलों में
और हाथ भी फेर सकती है
किसी के नवजात बच्चे पर !
विधवा का कलंक मिट गया है अब
विधवा नही है वो !
खूब समझती है वो
उजड़े,बिखरे रंगों का मतलब
उसे सहेजना है
नन्हे सपनों को..
सजाना है उन्हें कोरे कैनवास पर,
भरना है नये रंग !
वो शक्ति है
पर शिव की तरह
रोककर रखती है सारा हलाहल
अपने कंठ में !
उसे ज़हर नहीं..
दूध पिलाना है
नन्हे सपने को !
प्याज़ काटते समय
वो झूठ-मूठ नहीं रोती !
पहली बारिश में नहाती
छोटी बच्ची को देख
सोचती है कुछ...
फिर उसे पकड़ने के बहाने
खूब भीगती है खुद भी !
उसकी आँखों में झाँकती है
और फूटकर रोती है..
अचानक अपने पति को देख
बिलख पड़ती है !
फिर संभलती है...
और सबको समेटकर
छुपा लेती है अपने आँचल में !
बस यूँ ही...
एकटक छत को ताकती
वो डबडबाई आँखें
सपनों के दुनिया में
कब चली जाती हैं..
पता ही नही चलता !








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20 कविताप्रेमियों का कहना है :
bahut dino baad koyee kavita padh ke ankh nam huyee hai is sagar kee lahar kee boondon ko shabd kaise doon shabd nahee mango peeth pas layo thapthpa deta hoon
Anil
खूब समझती है वो
उजड़े,बिखरे रंगों का मतलब
उसे सहेजना है
नन्हे सपनों को..
सजाना है उन्हें कोरे कैनवास पर,
भरना है नये रंग !
वो शक्ति है
पर शिव की तरह
रोककर रखती है सारा हलाहल
अपने कंठ में !
उसे ज़हर नहीं..
दूध पिलाना है
नन्हे सपने को !
प्याज़ काटते समय
वो झूठ-मूठ नहीं रोती
बुधिया का यह रूप ,कितने भयंकर सच्च को आपने शब्दों मे समेट दिया , आप कड़वे सच्च को बड़ी आसानी से बयान कर गए |बधाई .....सीमा सचदेव
itna sashakt parivesh chitran.....
bahut taarif ke yogya hai,
aapko badhaai.
विपुल जी
कविता अच्छी है. थोडी लम्बी अधिक है.
bahut marmik chitran badhai
डूबने के लिए सबको समंदर मिले
ज़रूरी नहीं ..
कभी कभी आँसुओं से भी
काम चलाना पड़ता है !
आख़िर स्वाद तो
दोनों का एक सा है ना !
बहुत बहुत मर्मस्पर्शी चित्रण. बधाई इस सुन्दर कविता के लिए!
बहुत ही सुंदर रचना
काफी मार्मिक कविता है
खास कर ये पंक्तिया
"खूब समझती है वो
उजड़े,बिखरे रंगों का मतलब
उसे सहेजना है
नन्हे सपनों को..
सजाना है उन्हें कोरे कैनवास पर,
भरना है नये रंग!"
सुहागरात के दिन
पति को थपकियाँ दे कर सुलाया !
फिर बच्ची को दूध पिलाकर
ताकती रही खुला आसमान !
आस में..
वो दूर चमकता तारा आ गिरे
वापस उसकी झोली में !
मजबुरियों मे घिरी करुणता !
अच्छा चित्रण है
budhia ki kadi men ek aur moti
विपुल जी
बुधिया रचना बहुत ही मार्मिक और दिल को छु जाने वाली रचना लिखी गई है
इसमें आपने तमाम प्रस्तिथियों को बहुत ही अच्छे तरीके से पेश किया है
शब्दों का चयन
और बातो के कहने का thang बहुत पसंद आया
दिल को छु जाने वाली कविता
बधाई आपको
एकबार फ़िर वही करामाती,अंदाज.शानदार
आलोक सिंह "साहिल"
फिर से कुछ भी कहने की मैं जरूरत नहीं समझता......पिछली आठ बारों से एक हीं बात कह-कह कर थक चुका हूँ :)
flawless poetry ....
बधाई स्वीकारो।
-विश्व दीपक ’तन्हा’
सुहागरात के दिन
पति को थपकियाँ दे कर सुलाया !
फिर बच्ची को दूध पिलाकर
ताकती रही खुला आसमान !
आस में..
वो दूर चमकता तारा आ गिरे
वापस उसकी झोली में
आपकी बुधिया श्रृंखला बहुत ही मार्मिक है...लेकिन यह कविता पिछली आठों से अलग है.. बधाई.
दिल भर आया
तालियों की आवाज आयी !!!!!!!
दिल भार गया तो होठ ना चले हाथ चल पडे..
विपुल जी ,
बुधिया सिर्फ़ एक कविता नहीं है, ऐसा लगता है कि आप इसका एक एक क्षण स्वयं अनुभूत करके उसे शब्दों में पिरो देते हैं , और शायद वही अनुभूति सभी पाठकों को, इस कविता को पढ़ते हुए बुधिया से जोड़ देती है .
बहुत ही मार्मिक ..........
^^पूजा अनिल
एक और अच्छी कड़ी जुड़ गई बुधिया श्रृंखला में बहुत ही दिल को छू जाने वाली रचना है यह विपुल जी ..
बहुत मर्मस्पर्शी लिखा है आपने.... आँखें नम हो गयी. हमारे यहाँ 'विधवा' शब्द को कलंक मानना कब बंद होगा?
विपुल,
तुम्हारी कविता ने फ़िर चौंका दिया,हर बार तुम्हारी कविता हमारे समाज का नया रूप दिखाती है.
इस कविता में बुधिया को विधवा के श्राप से तो मुक्ति मिली परन्तु उसकी दूसरी शादी पागल के साथ ;एक खुशी के साथ दूसरा दुःख का अच्छा समन्वय किया है. तुम्हारी कविता की प्रारंभिक पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगी -"डूबने के लिए सबको समंदर मिले
ज़रूरी नहीं ..
कभी कभी आँसुओं से भी
काम चलाना पड़ता है !"
आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)