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Monday, December 01, 2008

२३वीं यूनिकवि एवं यूनिपाठिका प्रतियोगिता के परिणाम


नवम्बर २००८ की यूनिकवि प्रतियोगिता में प्रतिभागी कवियों की संख्या जिस तरह पहले के महीनों के बराबर पहुँची है, इससे यह सिद्ध हो गया है कि कविता के प्रति न तो लेखकों का रुझान कम हुआ है और न पाठकों का। भावनाओं से लवरेज़ पाठक हों या कवि, कविता की मुलायम गोद में समाने को आतुर रहते हैं। अक्टूबर २००८ माह की प्रतियोगिता के बाद कुछ एक प्रतिक्रियाकारों ने यह सवाल उठाया था प्रतिभागिता इतनी कम कैसे? उसका कारण शायद अक्टूबर में पड़ने वाले ढेरों त्योहार और उसके कारण छुट्टी पर अपने-अपने गाँव चले गये पाठक और कवि हैं।

नवम्बर माह की यूनिकवि प्रतियोगिता में कुल ४३ कवियों ने भाग लिया। इस बार हमने निर्णय को तीन चरणों में सम्पन्न कराया। पहले चरण में २ जजों द्वारा दिये गये अंकों के औसत के आधार पर कुल २६ कविताओं को दूसरे चरण के लिए चयनित किया गया। जहाँ इस कविताओं को २ निर्णायकों की पैनी अनुभवशीलता से गुजरना था। इस प्रकार तीसरे दौर के लिए १६ कविताएँ बचीं।

अंतिम जज ने दीपक मिश्रा की कविता 'हमारी ज़मीन' को यूनिकविता चुना और बताया कि इस रचनाकार में बहुत संभावनाएँ हैं। कवि दीपक मिश्रा हिन्द-युग्म के लिए बहुत नये हैं। दीपक की एक कविता 'परिणाम' सितम्बर माह की यूनिकवि प्रतियोगिता में भी प्रकाशित हुई थी। हिन्द-युग्म में अब तक २३ यूनिकवि चुने गये हैं, जिसमें कि ३ यूनिकवियों का संबंध उ॰प्र॰ से है और एक अद्भुत संयोग है कि तीनों का संबंध लखनऊ शहर से है। हिन्द-युग्म की पहली यूनिकवयित्री अनुराधा श्रीवास्तव लखनऊ में जन्मी और पली-बढ़ी, पिछले महीने के यूनिकवि डॉ॰ मनीष मिश्रा तो लखनऊ में कार्यरत (वैज्ञानिक) हैं और हमारे नवीनतम यूनिकवि दीपक मिश्रा लखनऊ में अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर चुके हैं।

पुराने पाठक तो इनसे पहले से भी परिचित हैं। नये पाठकों के लिए इसका परिचय पुनर्प्रकाशित किया जा रहा है।

यूनिकवि- दीपक मिश्रा

ये एक पिता हैं, जिसकी पुत्री के लिए पिता ही सबसे बड़ा नायक है , या एक पति जिसकी पत्नी हमेशा उसे राम की तरह आदर्श पुरूष के रूप में देखना चाहती है, या फिर लखनऊ से मास्टर ऑफ़ कंप्यूटर की डिग्री लेने के बाद बैंक में इन्फोर्मेशन टेक्नोलॉजी क्षेत्र में काम करने वाला एक उप मुख्य प्रबंधक, जोकि पश्चिमी सभ्यता और अंधाधुंध बाजारीकरण की वजह से भारतीय लोगों को अपनी भारतीय विचारधारा से अलग जाता देख कर आहत है और अपनी भावनाएँ व्यक्त करने के लिए फोटोग्राफी और कविता का सहारा लेता है। जिंदगी की आपाधापी से समय निकाल कर, सीमेंट के इस जंगल जिसे दिल्ली कहते हैं, से दूर कहीं प्रकृति की गोद में भाग जाना चाहता है?

पुरस्कृत कविता- हमारी ज़मीन

अब ये जरूरी हो गया है
कि बंद आखें खोलकर
सपनो की नर्म मुलायम धरती से निकल कर
सच्चाई की कठोर जमीन
और उस पर उगे तीखे काँटों को स्वीकार करें
और वास्तविकताओं में जीना सीखे
अब तक हम अपने आदर्शों
और सपनो में डूबे रहे
और कांटे हमें चुभते रहे
अपने बुने सपनों
और खून की चंद बूदों के डर से
हम सिमटते और सिमटते चले गए
और कांटे बढ़ते , और बढ़ते चले गए
हम ये कभी जान नहीं पाए
कि सिमटने से कांटे कभी नष्ट नहीं होते
कोई युग पुरूष कहीं से नहीं आता
और दूसरों की समस्याओं को
कोई दूसरा नहीं सुलझा पाता

इन काँटों ने
हमारे जीने की जमीन समेट दी है
इन काँटों ने
हवाओं में जहर घोल दिया है
और इन काँटों ने
मां के पेट में पल रहे
बच्चे को भी चुभाना शुरू कर दिया है

अब तो
हर जीने की इच्छा रखने वाले को
अपने हाथो में एक खड़क उठानी होगी
रक्त की नदी में नहाना होगा
हवाओं में फैले जहर को ख़त्म करने के लिए
नीलकंठ बनना होगा
हाँ ये जरूरी है
नीलकंठ बनना ही होगा

तभी हो सकेगी एक क्रांति
वो क्रांति जो हमारे बच्चो को देगी
एक साफ हवा
उछल कर किलकारी मरने की आजादी
और दूर तक फैली जमीन
जिस पर बहुत से लोग
एक साथ हँस सके, एक साथ रो सकें
एक साथ नाच सके, एक साथ गा सकें
एक साथ रह सकें
हाँ वही दूर तक फैली जमीन



प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ६, ७॰२
औसत अंक- ६॰६
स्थान- चौथा


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ५, ६, ६॰६ (पिछले चरण का औसत
औसत अंक- ५॰८६६७
स्थान- दूसरा


पुरस्कार और सम्मान- रु ३०० का नक़द पुरस्कार, प्रशस्ति-पत्र और रु १०० तक की पुस्तकें।

यूनिकवि की कुछ कविताएँ नवम्बर माह के अन्य तीन सोमवारों को भी प्रकाशित होंगी, अतः शर्तानुसार रु १०० प्रत्येक कविता के हिसाब से रु ३०० का नग़द इनाम दिया जायेगा।

हिन्द-युग्म प्रत्येक माह कम से कम १० कवियों को उपहार-स्वरूप पुस्तकें देकर इनका प्रोत्साहन करता आया है। इस बार हम जिन अन्य ९ कवियों को कवि गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल' का काव्य-संग्रह 'पत्थरों का शहर’ की एक-एक प्रति भेंट करेंगे, वे हैं

संजय सेन सागर
राजा दुबे
भुवन वेनू
सुशील कुमार
हरकीरत कलसी 'हकीर'
आचार्य संजीव 'सलिल'
प्रकाश बादल
दीप्ति दुबे
शामिख़ फ़राज़
सीमा सचदेव
नीति सागर

हमने ११ नाम इसलिए चुने हैं क्योंकि अंतिम २ रचनाकारों की कविताएँ भी प्रकाशित होंगी। उपर्युक्त सभी कवियों की कविताएँ १-१ करके हिन्द-युग्म पर प्रकाशित होंगी। इन सभी कवियों से निवेदन है कृपया अपनी कविता ३१ दिसम्बर २००८ से पहले अन्यत्र प्रकाशित न करें/ करवायें।

पिछले महीने हिन्द-युग्म ने उद्घोषणा की थी कि यह वार्षिक पाठक सम्मान देगा। शायद इसका ही असर है कि हिन्द-युग्म के सभी मंचों पर पाठकों की आवाजाही शुरू हो गई। और इसमें सबसे आगे रहीं हिन्द-युग्म से हाल में ही जुड़ी नीति सागर।

यूनिपाठिका- नीति सागर

यूनिपाठिका नीति सागर का जन्म झाँसी में हुआ। इंटरमीडिएट की पढ़ाई झाँसी में ही पूरी करने के बाद इनका विवाह हो गया। विवाहोपरांत जीवाजी यूनिवर्सिटी से इन्होंने बी॰ए॰ तथा एम॰ए॰(हिन्दी) किया। फिलहाल एल.एल.बी. की पढ़ाई कर रही हैं। इन्होंने हाई स्कूल के विद्यार्थियों को ३ वर्ष तक हिन्दी पढ़ाया भी है। लिखने में इनकी रुचि हमेशा से ही रही हैं, बहुत सी रचानएँ लिख भी चुकी हैं। हिन्द-युग्म से कुछ समय पहले ही जुड़ी हैं।

पुरस्कार और सम्मान- रु ३०० का नक़द पुरस्कार, प्रशस्ति-पत्र और रु २०० तक की पुस्तकें।

दूसरे से चौथे स्थान के पाठक के रूप में हमने क्रमशः हरकीरत कलसी 'हकीर' , मोहम्बद अहसन और दिगम्बर नासवा को चुना है, जिन्हें हम हिन्द-युग्म की ओर से कुछ पुस्तकें भेंट करेंगे। नवम्बर माह के मनु बेतक्खल्लुस ने भी पढ़ना और कमेंट करना शुरू किया है, लेकिन रोमन में, जबकि हम देवनागरी में की गईं टिप्पणियों को प्रोत्साहित करते हैं।

हम निम्नलिखित कवियों का भी धन्यवाद करते हैं, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर इसे सफल बनाया और यह निवेदन करते हैं कि दिसम्बर २००८ की यूनिकवि एवम् यूनिपाठक प्रतियोगिता में भी अवश्य भाग लें।

रचना श्रीवास्तव
महेश चन्द्र गुप्ता 'ख़लिश'
शारदा अरोरा
दीपाली मिश्रा
ममता पंडित
तपन शर्मा
सुधीर सक्सेना 'सुधि'
कमलप्रीत सिंह
चतुरानन झा
राहुल गांगुल
पुनीत मिश्रा
अभिषेक शर्मा
नीरद जनवेनू
पीयूष पंडया
अरूण मित्तल 'अद्भुत'
दिगम्बर नासवा
यश दीप
सुजाता दुवा
गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल'
अनुराग शर्मा
मुहम्मद अहसन
मिथिलेश सिंह
गोपाल कृष्ण दास
गोविंद शर्मा
कुमार कौशल
मोहित कटारिया
महेश कुमार वर्मा
योगेश गाँधी
अनिरूद्ध सिंह चौहान
जय कुमार
पंकज झा

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17 कविताप्रेमियों का कहना है :

Anonymous का कहना है कि -

bahut bahut mubarak ho, Deepak ji aapko.
--Shamikh Faraz
shamikh.faraz@gmail.com

manu का कहना है कि -

यूनी कवि एवं यूनी पाठिका को बधाई.......
प्रश्न कम और उत्तर अधिक लिए हुए एक बेहतरीन रचना..
हाँ ...ये ज़रूरी है ...नील कंठ बनना होगा...

व्याकुल ... का कहना है कि -

अब तो
हर जीने की इच्छा रखने वाले को
अपने हाथो में एक खड़क उठानी होगी
रक्त की नदी में नहाना होगा
हवाओं में फैले जहर को ख़त्म करने के लिए
नीलकंठ बनना होगा
हाँ ये जरूरी है
नीलकंठ बनना ही होगा
बहुत खूब janab....samay ki vyastata ke karan ab mein kavita lekhan ko samay nahi de pata ..magar jab bhi aap jaise laviyon ki rachnaon ko padhta hun..MAN MACHL UTHTA HAI KUCH KRNE KO..KUCH LIKHNE KO....KUCH KAR DIKHNE KO..AKSAR IS AAPADHAPI MEIN MEIN NIPAT AKELA SOCHTA HUN KI..KYA KAVITAON KE BAIGER BHI JIVAN KOI JIWAN HAI..KYA KAVIYON KI KALPNAON KA SANSAAR KEWAL UNHI TAK SIMIT HAIN...NAHI, KAVITA TO EK MADHYAM HAI JAN CHETNA KA, jan sanchar ka, jo apne madhyam se hmare aanha par jami dhul hatati hai...aur aisi kavitayen hamesha hamare dilo mein jiwit rahengi jab tak aap jaise kavi iska man badhte rahenge .AAPKO UNI KAVI HONE PAR BAHUT BADHAI...

व्याकुल ... का कहना है कि -

अब तो
हर जीने की इच्छा रखने वाले को
अपने हाथो में एक खड़क उठानी होगी
रक्त की नदी में नहाना होगा
हवाओं में फैले जहर को ख़त्म करने के लिए
नीलकंठ बनना होगा
हाँ ये जरूरी है
नीलकंठ बनना ही होगा
बहुत खूब janab....samay ki vyastata ke karan ab mein kavita lekhan ko samay nahi de pata ..magar jab bhi aap jaise laviyon ki rachnaon ko padhta hun..MAN MACHL UTHTA HAI KUCH KRNE KO..KUCH LIKHNE KO....KUCH KAR DIKHNE KO..AKSAR IS AAPADHAPI MEIN MEIN NIPAT AKELA SOCHTA HUN KI..KYA KAVITAON KE BAIGER BHI JIVAN KOI JIWAN HAI..KYA KAVIYON KI KALPNAON KA SANSAAR KEWAL UNHI TAK SIMIT HAIN...NAHI, KAVITA TO EK MADHYAM HAI JAN CHETNA KA, jan sanchar ka, jo apne madhyam se hmare aanha par jami dhul hatati hai...aur aisi kavitayen hamesha hamare dilo mein jiwit rahengi jab tak aap jaise kavi iska man badhte rahenge .AAPKO UNI KAVI HONE PAR BAHUT BADHAI...

Popular India का कहना है कि -

यूनिकवि दीपक जी व यूनिपाठिका निति सागर सहित प्रतियोगिता में भाग लेने वाले सभी पाठकों व कवियों को बहूँ-बहुत धन्यवाद.
दीपक जी की कविता ठीक लगी. शुभकामनाएं.
बहुत अच्छी पंक्ति है :
अब ये जरूरी हो गया है
कि बंद आखें खोलकर
सपनो की नर्म मुलायम धरती से निकल कर
सच्चाई की कठोर जमीन
और उस पर उगे तीखे काँटों को स्वीकार करें
और वास्तविकताओं में जीना सीखे

धन्यवाद.

आपका
महेश

संजय सेन सागर का कहना है कि -

दीपक जी को बहुत- बहुत बधाई साथ ही साथ हिंद युग्म की एक और सफलता पर मुबारकबाद ..आप इसी तरह आगे बढते जाये!!

sanjay का कहना है कि -

दीपक जी को बहुत- बहुत बधाई साथ ही साथ हिंद युग्म की एक और सफलता पर मुबारकबाद ..आप इसी तरह आगे बढते जाये!!

Harkirat Haqeer का कहना है कि -

यूनी कवि को बहुत- बहुत बधाई ...कविता ठीक लगी.

संजीव सलिल का कहना है कि -

सचाइयों को स्वीकारने और एकता बनाये रखकर मंजिल पाने का आव्हान करती सामयिक एवं सशक्त रचना के लिए बधाई.
आचार्य संजीव 'सलिल'

tanu का कहना है कि -

दीपक जी और नीति जी दोनों को बधाई... अन्य प्रतियोगियों को भी शुभकामनायें...
कविता अच्छी लगी... लेकिन निम्न पंक्तियों के बाद ही कविता समाप्त हो जाती तो भी मुझे लगता है कि काफी था....

हवाओं में फैले जहर को ख़त्म करने के लिए
नीलकंठ बनना होगा
हाँ ये जरूरी है
नीलकंठ बनना ही होगा...

manu का कहना है कि -

""अब ना फ़िर ये दूर होगा मातृ भाषा से कभी,
"बे-तक्ख्ल्लुस" बे ख़बर था पेस्ट ओ कापी से अभी..""

neeti sagar का कहना है कि -

मैं हिन्दयुग्म के सभी सदस्यों का धन्वाद करती हूँ!साथ ही उन कवियों का भी जिनकी रचनाओं पर मैं tippdi देती aai हूँ!अगर मेरी किसी tippdi से कोई कवि मन aahat हुआ हो to मैं kshamaa chaahugi!धन्वाद~

Atul का कहना है कि -

इस कविता ने बताया कि हिंद युग्म पर कविता इश्क , आंसू , दर्द से आगे भी है

neelam का कहना है कि -

हम भी अतुल जी की बात से पूरा इत्तफाक रखतेहैं,
हमारी भी बधाई स्वीकारें
दीपक जी

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

यूनिकवि एवं यूनिपाठिका को बधाई.......

भूपेन्द्र राघव । Bhupendra Raghav का कहना है कि -

दीपक जी व नीति सागर जी को बहुत बहुत बधाई...

दीपक जी कविता अत्यंत सार्थक और दूरदर्शिता लिये हुए है..

sangeeta sethi का कहना है कि -

दीपकजी इतनी अछि रचना के लिए साधुवाद स्वीकार करें | पहले तो ये बताईये कि इतनी tough जॉब के बावजूद आप लेखन कैसे कर लेते हैं | बैंक officers को तो देर रात तक काम करना पड़ता है |ऐसे में क्या एनर्जी बच पाती है |

संगीता

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