अच्युतानंद मिश्र

अच्युतानंद मिश्र मूलतः कवि हैं। इनकी रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। कविता के साथ-साथ आलोचना में भी सक्रिय। हाल ही में इनकी एक आलोचना पुस्तिका 'नक्सलबारी आन्दोलन और हिंदी कविता' प्रकाशित हुई है।
रात को 
अच्युतानंद मिश्र मूलतः कवि हैं। इनकी रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। कविता के साथ-साथ आलोचना में भी सक्रिय। हाल ही में इनकी एक आलोचना पुस्तिका 'नक्सलबारी आन्दोलन और हिंदी कविता' प्रकाशित हुई है।
पुरानी कमीज के धागों की तरह
उघड़ता रहता है जिस्म
छोटुआ का
छोटुआ पहाड़ से नीचे गिरा हुआ
पत्थर नहीं
बरसात में मिटटी के ढेर से बना
एक भुरभुरा ढेपा* है
पूरी रात अकड़ती रहती है उसकी देह
और बरसाती मेढक की तरह
छटपटाता रहता है वह
मुँह अंधेरे जब छोटुआ बड़े-बड़े तसलों पर
पत्थर घिस रहा होता है
तो वह इन अजन्मे शब्दों से
एक नयी भाषा गढ़ रहा होता है
और रेत के कणों से शब्द झड़ते हुए
धीरे-धीरे बहने लगते हैं
नींद स्वप्न और जागरण के त्रिकोण को पार कर
एक गहरी बोझिल सुबह में
प्रवेश करता है छोटुआ
बंद दरवाजों की छिटकलियों में
दूध की बोतलें लटकाता छोटुआ
दरवाजे के भीतर की मनुष्यता से बाहर आ जाता है
पसीने में डूबती उसकी बुश्शर्ट
सूरज के इरादों को आंखें तरेरने लगती हैं
और तभी छोटुआ
अनमनस्क सा उन बच्चों को देखता है
जो पीठ पर बस्ता लादे चले जा रहे हैं
क्या दूध की बोतलें,अखबार के बंडल
सब्जी की ठेली ही
उसकी किताबें हैं...
दूध की खाली परातें
जूठे प्लेट, चाय की प्यालियां ही
उसकी कापियां हैं...
साबुन और मिट्टी से
कौन सी वर्णमाला उकेर रहा है वह ...
तुम्हारी जाति क्या है छोटुआ
रंग काला क्यों है तुम्हारा
कमीज फटी क्यों है
तुम्हारा बाप इतना पीता क्यों है
तुमने अपनी कल की कमाई
पतंग और कंचे खरीदने में क्यों गंवा दी
गांव में तुम्हारी माँ,बहन और छोटा भाई
और मां की छाती से चिपटा नन्हका
और जीने से उब चुकी दादी
तुम्हारी बाट क्यों जोहते हैं...
क्या तुम बीमार नहीं पड़ते
क्या तुम स्कूल नहीं जाते
तुम एक बैल की तरह क्यों होते जा रहे हो...
बरतन धोता हुआ छोटुआ बुदबुदाता है
शायद खुद को कोई किस्सा सुनाता होगा
नदी और पहाड़ और जंगल के
जहां न दूध की बोतलें जाती हैं
न अखबार के बंडल
वहां हर पेड़ पर फल है
और हर नदी में साफ जल
और तभी मालिक का लड़का
छोटुआ की पीठ पर एक धौल जमाता है -
साला ई त बिना पिए ही टुन्न है
ई एत गो छोड़ा अपना बापो के पिछुआ देलकै
मरेगा साला हरामखोर
खा-खा कर भैंसा होता जा रहा है
और खटने के नाम पर
माँ और दादी याद आती है स्साले को
रेत की तरह ढहकर
नहीं टूटता है छोटुआ
छोटुआ आकाश में कुछ टूंगता भी नहीं
न माँ को याद करता है न बहन को
बाप तो बस दारू पीकर पीटता था
छोटुआ की पैंट फट गई है
छोटुआ की नाक बहती है
छोटुआ की आंख में अजीब सी नीरसता है
क्या छोटुआ सचमुच आदमी है
आदमी का ही बच्चा है ...
क्या है छोटुआ
पर
पहाड़ से लुढकता पत्थर नहीं है छोटुआ
बरसात के बाद
मिट्टी के ढेर से बना ढेपा है वह
धीरे-धीरे सख्त हो रहा है वह
बरसात के बाद जैसे मिट्टी के ढेपे
सख्त होते जाते हैं
सख्त होता जा रहा वह
इतना सख्त
कि गलती से पाँव लग जाएँ
खून निकल आए अंगूठे से ...
*ढेपा- ढेला
कवि- अच्युतानंद मिश्र

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