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Friday, April 20, 2012

लिखना बाकी है


शब्दों के नर्तन से शापित
अंतर्मन शिथिलाया
लिखने को तो बहुत लिखा
पर कुछ लिखना बाकी है

रुग्ण बाग में पंछी घायल
रक्त वमन जब बहता
विभत्स में शृंगार रसों की
लुकाछिपी खेलाई
विद्रोही दिल रोता रहता
दर्द बहुत ही सहता
फिर भी लफ्जों को निचोड़ कर
बदबू ही फैलाई
खाद समझ नाले से मैंने
कीचड़ तो बिखराया
किन्तु हाय! गन्ध फूलों की
बिखराना बाकी है।

साफ करूंगा वस्त्र भाव के
बचपन में कुछ सोंचा
किन्तु आज तक मैले कपड़े
धूल हटा ना पाया
दुर्गंध भरे, बिखरे बालों
को कितना भी नोचा
निर्मल करे सुभाये ऐसा
कुछ भी लिख ना पाया
ज्योत जलाने चला भले ही
अंधकार में डूबा
अब तक घने तिमिर की परतें
खुल जाना बाकी है।

कागद ने खुश होकर नभ के
रहस्य खूब उभारे
स्याही में डूबा तो, अचरज
पंछी खुद को पाया
ले आई आकाश में कलम
दुबका डर के मारे
उड़ ना पाया मुक्त हवा में
गड्ढे में घुस आया
बहुत किया डबरे में छपछप
थक कर यों पछताया
सागर से उठती लहरों को
छू लेना बाकी है

-हरिहर झा

Wednesday, March 21, 2012

एक रोआई वाला सपना


आज मरने के अट्ठारह साल बाद

बाबा, भईया को सपना दिखाए हैं

कि नहीं मिल रहा आजकल उनको

टाईम से खाना पानी.



उस सपने को 1 साल हो गया है

तब से माँ, जग जाती है रोज सबेरे

बिना नागा

चढ़ाती है बाबा की फोटो पर फूल

बना के पहली रोटी

रख देती है, तुलसी के चौरा पर

चिरई कऊआ के खाने के लिए

बाबूजी गाँव के पच्छिम वाले पीपल पर फिर से कलसा टांग आए हैं.....



बचपन में इतिहास वाले गुरूजी बताते थे

कि एक राजा के चार बेटे थे

एक बेटे ने राजा बनने के लिए

सब भाईयों को मार डाला

राजा को कैद कर लिया

राजा पानी बिना मर गया....

उस दिन कहानी सुन कर बड़ी रोआई बरी थी।



किरिन फूट गई है

माँ धर आई है तुलसी चौरा पर रोटी

बाबूजी कलसे में पानी भर आए हैं

बाबूजी खाने बैठे हैं

भईया पानी दे रहे हैं


का जाने काहे

आज सबेरे ही सबेरे, बहुत रोआई बर रही है।