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Monday, October 07, 2013

जहां मैं गूंजता हूं



दीवारें हैं..

खामोशी हैं...

सन्नाटा है....

...और कुछ साए

एक समन्दर-सा है, वक़्त का

मैं तैरता हूं

घर है मेरा

जहां मैं गूंजता हूं

 
मेरी ही आंखें

दीवारों पर उभर आती हैं

घूरती हैं

 
मेरा ही अक्स

हर कहीं उभर आता है

 
मैं गुज़रता हुआ

मैं ठहरा हुआ

दीवारों की चंद गलियों में

मैं डोलता हुआ

 
घर है मेरा

जहां मैं गूंजता हूं....

Monday, September 23, 2013

सपने उम्मीद से ...


मौसम बदल रहा है
कहीं बादल फट रहे हैं
कहीं ज़मीं खिसक रही है
कहीं जलजला...तो कहीं सैलाब
परिंदे तक परेशां हैं...
कुछ पता लगा..
धरती उम्मीद से है..

संगम में अखाड़ों ने स्नान किया
घाट पर साधुओं का जमघट रहा
बाद में कुछ बात हुई... क्या बात हुई
साधुओं के बीच घमासान हुई
ख़बर का पता नहीं
पर हां धर्म अब उम्मीद से है...

नमाज़ियों ने वजु किया
जूहर का नमाज़ पढ़ा
मस्ज़िद में गहमा-गहमी रही
मुद्दा उठा... कुछ बात हुई...
सुना इबादती आपस में ही भिड़ गए
ख़ून-ख़राबा हुआ...
अब मज़हब भी उम्मीद से है...

मुज़फ्फ़रनगर में पैदा हुए
एक वैज्ञानिक पिता की किशोरवय बेटी
सूक्ष्मदर्शी से आंखें लगाए
घर में ही बने प्रयोगशाला में बैठी हुई है
थोड़ी देर में शायद उसने कुछ देखा
और चिल्लाई – पापा अमीबा फैल रहा है... शायद उम्मीद से है...

दो सपने आपसे में ही भिड़ गए
एक ने ख़ंज़र उठाया दूसरे को लहू-लुहान कर दिया
देखते-ही-देखते सपनों की भीड़ जमा हो गई
सब ने उसे तड़प-तड़प कर मरता हुआ देखा
फिर क्या था...
दंगा होना ही था
सपना देखने वाला शख्स हड़बड़ा कर उठ बैठा
पेशानी से गिरते हुए पसीने को पोंछते हुए
मुस्कुराने लगा
क्योंकि उसे लगने लगा है कि
उसके सपने उम्मीद से हैं...

जायज़ या नाजायज़
हालात, वक़्त की पैदाइश है
नया वक़्त, पुराने वक़्त के साथ
दांव-पेंच के खेल सीख रहा है
सीखने के इस खेल में 
कोई जीत रहा है, कोई हार रहा है
लड़ने वालों को
हमेशा की तरह सिफ़र ही हाथ लगे
फिर भी गुत्थम-गुत्थी नहीं रूकी
वक़्त के दोनों पहलू
आपस में ही उलझे पड़े हैं

क्या वक़्त उम्मीद से है ????