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Sunday, May 11, 2008

माँ, माँ और माँ





आज मातृत्व दिवस है, हिन्द-युग्म के कवियों ने कई बार माँ को अपनी कविताओं से श्रद्धाँजलि दी है। इस बार 4 पाठक-कवियों ने अपनी अभिव्यक्ति भेजी है। सभी को इस दिवस पर हार्दिक बधाइयाँ।


माँ

रोज की तरह आज भी
छत की मुंडेर पर धोती फैलाकर
किसी कोने में खुद को निचोड़ती
बच्चों की चिंता में
दिनभर
सूखती रहती है माँ।

हवा के झोंके से गिरकर
घर की बाहरी दीवार पर गड़
खूंटे से अटकी
धोती सी लहराती
बच्चों के प्यार में दिनभर
झूलती रहती है माँ।

शाम ढले
आसमान से उतर-कर धोती में लिपटते
अंधेरों को झाड़ती
तारों की पोटली बनाकर
सीड़ियाँ उतरती
देर तक हांफती रहती है माँ।


चुनती है जितना उतना ही रोती
गमों के सागर में यादों के मोती
जाने क्या बोलती न जागी न सोती
रातभर
भींगती रहती है माँ

-देवेन्द्र कुमार पाण्डेय, वाराणसी (उ॰ प्र॰)



माँ

जब धूप पसर जाती
रसोईघर के बाहर
मैं वहां बैठ
अ से अम्मा
लिखा करता
माँ धुएँ के कोहरे में
गुनगुनाती
आटा गूंथती
रोटियां बेलती
और साथ ही बनाती
आटे की छोटी-छोटी गोलियां
फिर उन्हें
आँगन में फैला देती
एक-दो-तीन
कई चिडियां आती
चहचहाती
गोलियां चुगती
सजीव हो जाते
बेलन, कलछी, चिमटा
अग्नि नृत्य करती
चूल्हे की मुंडेर पर
रसोईघर जलसाघर हो जाता
.
अब न घर में माँ हैं
न शहर में चिडियां
बस केवल
आटे की गोलियां बची है
जब कभी तन्हा होता हूँ
कुछ गोलियां बिखेर देता हूँ
और माँ
चिडियां बन
मन के आँगन में
उतर आती है

-विनय के जोशी, उदयपुर (राजस्थान)




माँ

तुम कहाँ हो?
क्या मेरी भी याद आती है
आज तुम जहाँ हो?

याद होगा तुम्हें
तवे पर की रोटी का खिलाना
सोते में मीठी लोरी का सुनाना
गुनगुनाना जगन्नाथ के गीत को
और मुसीबत में भी मुस्कराना

क्या याद है तुम्हें वो दिन
जब ठंड से ठिठुरते बालक के कपड़ों को
गोबर से सने हाथों से संवारती थी
याद है मुझे
मनमानी करने पर तुम गुस्सा हो जाती थी

कितना स्वाद था तुम्हारे हाथों से बने
खट्टी मीठी छाछ में
क्या वापस दिला पाएगा
वो सब सुख ये बेदर्दी ज़माना?

तब तुम जागती थी सारी रात
मेरे पेट में गुड़-गुड़ होने पर
क्या नींद आती होगी तुम्हें
वहाँ मखमली चादर पर सोने पर?

होने पर हताश
तुमने ही तो दिया था दिलासा
क्या भूल पाओगी एक पल को
वहाँ तारों के बीच होने पर?

आओ न माँ
फिर से एक बार आओ न
अपने नन्हें को
फिर से सुला जाओ न
सुना जाओ फिर से वही लोरी
ले आओ एक बार फिर से
दूध की कटोरी

खोटा हूँ तो क्या
बेटा तो तुम्हारा हूँ
कहने को सभी हैं
मगर बेसहारा हूँ मैं

कर लूंगा गुजारा
नहीं रहूंगा बेसहारा
तेरी गोद में आँचल से
सिर छिपा कर
सुख से सो जाऊंगा मैं

- नागेन्द्र पाठक, नई दिल्ली




प्रणाम करूँ तुझको माता

हे जननी जीवन दाता
प्रणाम करूँ तुझको माता
तू सुख समृद्धि से संपन्न
निर्मलपावन है तेरा मन
तुझसे ही तो है ये जीवन
तुझसे ही भाग्य लिखा जाता
प्रणाम करूँ तुझको माता

माँ की गोदि पावन-आसन
हम वार दें जिस पर तन मन धन
तू देती है शीतल छाया
जब थक कर पास तेरे आता
प्रणाम करूँ तुझको माता
इस विशाल भू मंडल पर
माँ ही तो दिखलाती है डगर
माँ ऐसी माँ होती न अगर
तो मानव थक कर ढह जाता
प्रणाम करूँ तुझको माता
हर जगह नहीं आ सकता था
भगवान हमारे दुख हरने
इस लिए तो माँ को बना दिया
जगजननी जग की सुख दाता
प्रणाम करूँ तुझको माता
धरती का स्वर्ग तो माँ ही है
इस माँ की ममता के आगे
बैकुण्ठ धाम, शिव लोक तो क्या
ब्रह्म लोक भी छोटा पड़ जाता
प्रणाम करूँ तुझको माता
ऐसी पावन सरला माँ का
इक पल भी नहीं चुका सकते
माँ की हृदयाशीष बिना
मानव मानव नहीं रह पाता
प्रणाम करूँ तुझको माता
क्यों मातृ दिवस इस माँ के लिए
इक दिन ही नाम किया हमने
इक दिन तो क्या इस जीवन में
इक पल भी न उसका दिया जाता
प्रणाम करूँ तुझको माता
माँ बच्चों की बच्चे माँ के
भूषण होते हैं सदा के लिए
न कोई अलग कर सकता है
ऐसा अटूट है ये नाता
प्रणाम करूँ तुझको माता
माँ को केवल इक दिन ही दें
भारत की ये सभ्यता न थी
माँ तो देवी मन मंदिर की
हर पल उसको पूजा जाता
प्रणाम करूँ तुझको माता
बच्चों के दर्द से रोता है
इतना कोमल माँ का दिल है
बच्चों की क्षुधा शांत करके
खाती है वही जो बच जाता
प्रणाम करूँ तुझको माता
सच्चे दिल से इस माता को
इक बार नमन करके देखो
माँ के आशीष से जीवन भी
सुख समृद्धि से भर जाता
प्रणाम करूँ तुझको माता

-सीमा सचदेव, बेंगलूरू (कर्नाटक)


हिन्द-युग्म की अब तक की प्रकाशित कविताएँ में से 'माँ' से किसी भी तरह से जुड़ी कविताएँ पढ़ने के लिए नीचे 'खोजें ' पर क्लिक करें।


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19 कविताप्रेमियों का कहना है :

देवेन्द्र पाण्डेय का कहना है कि -

--------और मॉ चिडि़या बन मन के आगन में उतर आती है।--वाह।

सीमा सचदेव का कहना है कि -

मातरि दिवस के शुभ अवसर पर माँ के लिए कवितायें पढ़कर मन श्रद्धा और प्यार मी डूब गया |मई हिन्दयुग्म को कैसे धन्यवाद दू की आज के दिन मैं अपनी माँ को कविता के माध्यम से नमन कर सकी, यह मेरी माँ के लिए सबसे बड़ा उपहार होगा .....सीमा सचदेव

mamta का कहना है कि -

तीनों ही कवितायें बहुत ही सुंदर ।

रंजू भाटिया का कहना है कि -

सभी रचनाये बहुत ही सुंदर लगी ..माँ लफ़ज़ ही सुंदर है तो इस पर लिखा भी बेहद प्यारा लगेगा

ममता पंडित का कहना है कि -
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ममता पंडित का कहना है कि -

सभी कविताएं बहुत अच्छी लगी, हर रचना माँ एक अलग रूप प्रस्तुत करती है | माँ शब्द अपने में इतना बढ़ा है की उस पर ग्रन्थ लिखे जा सकते हैं ,ये कुछ पंक्तियाँ जो मैंने कही पढी थी, रचनाकार का नाम याद नही है |

तन को बांधा है मैया , पर क्या बाँध सका इस मन को
मेरी चंचलता ही देगी , गान तुम्हारे सूनेपन की
मैं सपनो के पंख लगाकर, विहर रहा हूँ नील गगन मैं
आशों का नवल क्षितिज मैं , देख रहा हूँ किरण किरण में
कल सूरज बनकर निकलूंगा, पाकर पावन प्यार तुम्हारा
माँ की ममता की छाया ही, शैशव का है सबल सहारा

Pooja Anil का कहना है कि -

सर्वप्रथम मातृत्व दिवस पर सभी माताओं को हार्दिक शुभकामनाएँ

ह्रदय-निर्मला, मधुर भाषिणी
माते पूज्य, मस्तक वासिनी ,
नमन तुम्हारे चरणों में ,
ओ´ वात्स्ल्य्मयी ,
हरि आनंद रूपा स्वामिनी .

सभी ने बहुत ही दिल से माँ को याद किया है , अपनी अपनी भावनाओं को शब्दों में बांधकर रख दिया है ,देवेन्द्र जी, विनय जी, नागेन्द्र जी और सीमा जी को माँ के लिए इतनी सुंदर कविताएँ लिखने के लिए बधाई

^^पूजा अनिल

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

बहुत अच्छी रचना है सब |
ख़ास कर ये पंक्तियाँ मुझे भेद गयी -

रोज की तरह आज भी
छत की मुंडेर पर धोती फैलाकर
किसी कोने में खुद को निचोड़ती
बच्चों की चिंता में
दिनभर
सूखती रहती है माँ।


सभी को बधाई |

-- अवनीश तिवारी

शोभा का कहना है कि -

देवेन्द्र जी
बहुत सुन्दर लिखा है-
शाम ढले
आसमान से उतर-कर धोती में लिपटते
अंधेरों को झाड़ती
तारों की पोटली बनाकर
सीड़ियाँ उतरती
देर तक हांफती रहती है माँ।

विनय जी
कमाल की अभिव्यक्ति है-
अब न घर में माँ हैं
न शहर में चिडियां
बस केवल
आटे की गोलियां बची है
जब कभी तन्हा होता हूँ
कुछ गोलियां बिखेर देता हूँ
और माँ
भाव विभोर कर दिया आपने। बहुत-बहुत बधाई।

नागेन्द्र जी
बहुत अच्छी अभिव्यक्ति -
तब तुम जागती थी सारी रात
मेरे पेट में गुड़-गुड़ होने पर
क्या नींद आती होगी तुम्हें
वहाँ मखमली चादर पर सोने पर
बधाई

सीमा जीसच्चे दिल से इस माता को
इक बार नमन करके देखो
माँ के आशीष से जीवन भी
सुख समृद्धि से भर जाता

Rajee Kushwaha का कहना है कि -

मैं 'हिन्दयुग्म'के इन पृष्ठों पे आचानक आया हूं---मुझे नही मालूम था कि हिन्दी को इतनी कामयाबी मिल चुकी है. यह तीनों कविताएं ही बहुत सुन्दर है. मगर हमें 'सीमा' की कविता बहुत ही अच्छी लगी है. उसने जिस आसानी से मॉं के रूप को प्रस्तुत किया है वह एक मॉं ही कर सकती है. मै "सीमा" का शुक्रगुजार भी हूं कि उसने 'हिन्दयुग्म' से परिचय करवाया. हम भी अपनी "हिन्दोस्तानी" में लिखी कविताएं भेजना चाह्ते है--कैसे और किसको भेजें. "हिन्दोस्तानी" से मेरा मतलब है'देवनागरी- लिपि' और हिन्दी, पंजाबी, डोगरी, उर्दु, राजस्थानी और 'पहाडी' भाषाओं के शब्द--जो कि हिन्दी को सरल और मीठा बनाते है. मैं पहली कविता के लिए अपनी एक कविता भेज चुका हूं---नाम है "खुद्कुशी कर्नी है 'गर तो खुदकुशी कर लिजीए--------" आशा है प्राकाशित होगी. मेरी शुभ कामनाए सभी के लिए. धन्याबाद. "राजी कुशवाहा"

तपन शर्मा Tapan Sharma का कहना है कि -

कुशवाहा जी, आप हिन्दयुग्म में हर माह होने वाली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं व काव्यपल्लवन के द्वारा आप समूह लेखन में भी हिस्सा ले सकते हैं। जिसके लिये आपने पहली कविता भेजी है जो इसी महीने पोस्ट करी जायेगी।
समूह लेखन का विषय हर माह भिन्न होता है।
प्रतियोगिता के बारे में यहाँ पढ़ें:
http://merekavimitra.blogspot.com/2008/05/blog-post_01.html
और आप हर कविता पर अपनी टिप्पणी कर के यूनिपाठक प्रतियोगिता में भी भाग ले सकते हैं।
धन्यवाद।

Sajeev का कहना है कि -

यूं तो माँ पर जो भी लिखा जाए कम है.....आज के इस विशेष दिन पर ऐसा आयोजन बहुत बढ़िया रहा, विनय जी की कविता में गजब का जादू है....

भूपेन्द्र राघव । Bhupendra Raghav का कहना है कि -

मैं सभी कविताओं को एक ही प्रवाह में पढता चला गया... जैसे तीनो माँ एक ही है.. और वास्तव में एक ही निकलीं .. प्रत्येक शब्द शब्द में माँ परिलक्षित हो रही है..

बहुत बहुत बधाई सभी रचनाकारो को और माँ को कोटि कोटि नमन

रेनू जैन का कहना है कि -

शाम ढले
आसमान से उतर-कर धोती में लिपटते
अंधेरों को झाड़ती
तारों की पोटली बनाकर
सीड़ियाँ उतरती
देर तक हांफती रहती है माँ।

बहुत खूबसूरत ....
वैसे तीनों ही रचनाएं बहुत सुन्दर हैं... बिलकुल माँ की तरह...

Shanno Aggarwal का कहना है कि -

बहुत सुन्दर रचना! माँ क्या-क्या नहीं करती है बच्चे के लिए इससे अच्छी अभिव्यक्ति और क्या हो सकती है.

Shanno Aggarwal का कहना है कि -

विनय जी, सीमा जी,
कितने सरल अंदाज़ में एक माँ के प्यार की सरलता और सचाई व्यक्त की है आपने अपनी कवितायों में. बहुत ही अच्छी लगी.

Jyoti का कहना है कि -

Maa...........Kya Kahe Shabda Hi Nahi Hai

Anonymous का कहना है कि -

Hindyugam per aaye comments ka to Dhayn Hai. Ma ka Dhyan Kaha.
Raj Bhai

Unknown का कहना है कि -

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