फटाफट (25 नई पोस्ट):

कृपया निम्नलिखित लिंक देखें- Please see the following links

नमो चक्रधर


हिमालय से
सरके
हिमप्रस्तर
मौन मानुष
हिमनद
पिघल कर
सतत प्रवाही
माँ हो गए
तह अंगीकार विकार
सतह अमृत सिंचन
जलधि हिय समा
हवा की पालकी संग
कण कण तुषार
फिर हिमालय हो गए
सर्वत्र
यही परिलक्षित
अणु से आकाशगंगा
अनंत
अनिवारित चक्राधीन

दिनकर कभी अस्त नहीं होता


मौज का महल ध्वस्त नहीं होता
नूरे मुन्तजिर पस्त नहीं होता

शब् धरती की अपनी करनी है
दिनकर कभी अस्त नहीं होता

ज़ुल्म कही भी हो व्यथित होता है
सुखनवर कभी व्यस्त नहीं होता

झुकता रहा सज़दे में हरबार मगर
कही सर तो कही दस्त नहीं होता

फकीरी नहीं होती हमसफ़र जिसकी
शाह होता है मगर मस्त नहीं होता

बेतरतीब अश'आर पेश है, हर कोई
वियाकरण का अभ्यस्त नहीं होता

पूजा


सूरज की
पहली रश्मि को
न्यौतता,
बांस के
सिरे पर बंधा,
तिनकों का झाडू,
दिनान्कुरण पर
सशब्द,
गली में लहराता
एक दिन
दो नन्हे हाथों को
बोलते सुना,
"गंदा झाडू
भारी झाडू
मै ना पकडू
तिनका झाडू"
रख तर्जनी
होंटों पर
बोली माँ,
ना बेटा
झाडू नहीं
पतवार है ये
हमारी नैया
खेता है ,
मोरपंख हो
या तिनका
सब में
कान्हा
रहता है |

रात भर


चढी घटा नयन नभ पर
बरसात होगी रात भर
अश्क आहे सिसकियों की
महफ़िल जमेगी रात भर
यादों की सौगात लाये
आंसू पाहुन आँखों में
सांझ के मेहमान है
ये रहेंगे रात भर
कच्ची धूप आषाढ़ की
मखमली सी चांदनी
बचपन की यादें मचलती
जुगनुओं सी रात भर
धूप धूप हुई मंजिलें
अंगारे निश्चय हुए
पलकें सोई चेन से
जागे सपने रात भर
लक्ष्याग्रह हुआ बिछौना
आग आग यादें हुई
सुखा फूल गुलाब का
जलता रहा रात भर
उम्र का बहका सा दरिया
भटका किया जंगल जंगल
अक्स तेरा लक्ष्य था
बहते रहे रात भर
पूरब में सूरज की कोंपल
अंतिम प्रहर है उम्र का
रामजी की गाडी मनवा मुसाफिर
साँसे हमसफ़र रात भर

मेमने की तलाश


मेमने की तलाश
सिंहकक्ष में,
नेष्ट से श्रेष्ट
तक यात्रा
उत्तरोत्तर उत्साह
त्वरण देती है,
सिंहासन पर आसीन
मुख पर ,
आत्मीय भावों की प्राप्ति
बहुत ..........
बहुत बडी
उपलब्धि होती है |
उंगली पर लगी
स्याही गदगद ,
विभोर है मतपेटी,
तनी है मुहर !
उदास केवल
मतपत्र ,
वही एक नश्वर ,
शेष सभी शाश्वत |
पिटता,
मुडता,
और उदरस्थ
मतपत्र मेमना !
डकारता संचार तंत्र ,
चटकारे लेते अखबार ,
स्वाद पर परिचर्चा ,
चरम विश्वास का |
आरम्भ पतन का |
और
एक बार फिर ,
अंकुरण
अंतहीन
चमत्कार की तलाश का |
इस बार कुछ एसा हो,
सर्वे भवन्तु सुखिनः !
उतरता ज्वार
सिंहासन आभारी
गगनोन्मुख हस्त दृग,
नहीं देख पाते,
मेमने के पदचिन्ह,
जो सिंह मांद में
प्रवेश के है,
निकलने के नहीं |

आईना


तुम बिन
सपाट सूनापन
याद कण कण
में पसर जाना,
सजा कर
लपटे जुल्फों की ,
इठलाना बलखाना
संवर जाना ,
बेतरतीब कर के
रूह की सिलवटें मेरी,
दुपट्टे का सर से
उतर जाना,
चमक ले चांद से,
अपने चहरे पर,
तुम और भी
संवर जाना ,
हिचकना कैसा
ये तो है चलन
जमाने का,
चुरा नूर ओरों का ,
खुद और भी
निखर जाना ,
मुझे ना आजमाना
मैं सच का सौदाई हूँ,
अक्स तेरा ही मिटेगा
जो उतरी मेरी कलई
मेरा क्या ,
मैं तो आईना हूँ ,
और
मेरा मुकद्दर है
गिरना,
छनकना,
टूटकर बिखर जाना’
सनद
*
अश्क, आहे, लहू होते वसीयत में,
आईनों का अस्थिसंचय नहीं होता

भूख





झिलमिलाती प्रकाश झूमरे,
कर्कस संगीत लहरे ,
दर्जनों इत्रों से निर्मित बदबू ,
सभ्य चहरो के मुखौटे ,
मुखौटों पर भी नकली हंसी ,
तस्तरी विश्रामघाट आसीन
उदर-श्मशान-राही व्यंजन ,
रंग बिरंगे वस्त्र ,
उजले-तन काले-मन ,
बिखरे हुए थे उस स्नेहभोज में |
ग्रास झपट पात्र भरते
चरते विचरते
टूट पड़े थे उस गिद्ध भोज में |
उपेक्षित सा मैं
हाथ में प्लेट
खोजी नजरे,
वस्त्र बचाता
नाचता-लचकता
असहाय खडा था उस
नृत्य भोज में |
भक्षी एक दुसरे को देख
गुर्रा नही मुस्करा रहे थे
यही अंतर सभ्यता
मशाल जलाये था
उस खोज भोज में |

तभी ..
एक परिचित मिले :
उखडे उखडे से क्यूँ घूम रहे हो
क्या खो गया जिसे तुम ढूंढ रहे हो
मैंने कहा :
भोज समर के योद्धाओं के मुख पर
तृप्ति का अनुनाद ढूंढ रहा हूँ
और छप्पन भोगो की महफ़िल में
एक अदद स्वाद ढूंढ रहा हूँ
कुछ और कहता उससे पहले
बोल पड़ी एक द्वार भिखारन :
बाबू
क्या कभी
कुछ पल
भूखे रहे हो ?
भूख जो महज
एक शब्द है तुम्हारे लिए
उसे सहे हो ?
जब भूख की आंधी आती है तो,
अच्छा-बुरा
ईमान-धरम
अपना-पराया
सब कुछ उड़ा ले जाती है |
टूट जाते है सब बंधन
कड़ी बस एक
पेट और मुहँ की
शेष रह जाती है |
बच्चो के पेट की ठंडक खातिर
अपना जिस्म जलाना पङता है |
खुद का तन नुचवाने को
गिद्धों को बुलाना पड़ता है |
उस रात की फिर
सहर नहीं होती,
हर रात
कहर होती है |
छोटो की भूख मिटाने को
माँ, जब बड़की को
बेच कर आती है |
तुम्हे क्या मालूम
भूख के मारे
कैसे जीते है |
पेट पर कपडा बांध
राख घोल कर पीते है |
बाबू चाहे जितना खोजो
स्वाद न तुन्हें मिल पायेगा |
ढूढ़ सको तो भूख को ढूंढो
स्वाद खुद चला आयेगा |
*
विनय के जोशी

वह सुबह कभी तो आयेगी






नेह निर्झर
सूख चुका अब
जन अरण्य
उब चुका अब
अब ना मचलता
लहरों के संग
अब ना संवरता
मौसम के संग
नही बहलता
प्रेम गीत से
अविचल हर
हार जीत से
कोकिल कण्ठ
कर्कस क्रन्दन
रिक्त हदय
यांत्रिक स्पन्दन
श्रृध्दा धाम की
शाम उदास
आरती गौण
नगाडे खास
राम तुम्हारे
द्वार लाचार
रावण विराजे
बैखौफ दरबार
वक्र भाल
कदम बेताल
हाल बेहाल
पेट पाताल
उंगली पर तिलक
मुख पर चमक
मत रमत
चयन युघ्द
रण शरण
निरीह रियाया
कभी तो जीत पायेगी
आर ही आर
लडी जा रही लडाई
कभी तो पार जायेगी
सत्ता स्वार्थ का
तिमिर चीर
वह सुबह
कभी तो आयेगी

*
विनय के जोशी

बंधन





प्यार तुम्हारा
दौलत सारे जंहा की
मुट्ठी में ,
अब वही
रेत सा,
उँगलियों के
झरोखों से
रिसा जाता है
लगाव तुम्हारा,
नाचता पारद
करतल पर,
अब वही
कपूर बन
हवा में
घुला जाता है.
वो एक अहसास
कि तुम गैर नहीं
और मैं तुम्हारे
बगैर नहीं,
उम्र की आग में
राख हुआ जाता है.
प्यार - मनुहार
अर्पण-समर्पण
गैर-बगैर
सभी सतही बातें है
वो तो कुछ और ही है
जो बांधे है तुमसे
अबूझ
अनकहा
अपरिभाषित
परे है जो,
वेदना-सवेदना
प्रेषण-संप्रेषण
प्रणय-परिणय
प्राप्य-अप्राप्य परिधि से
सांस हो तुम,
जो शारीर को
शव से भिन्न करती है
पल पल साथ
फिर भी विस्मृत,
लेकिन जब घुटन होती है तो,
तो...... तुम्हे
खीच कर सीने में
भरने को मन करता है
*
विनय के जोशी

क्षणिकाएँ





(1)
सहमी सी
डरी सी
हारी सी
निकली थी घर से
नुक्कड़ पर
कई विकल्प खड़े थे,
उसने सच्चाई और साहस
चुन लिए और वह
जीत गई
*
(२)
हम
ग़म के घरोंदे बन
एकाकी बैठे थे
तुमने छुआ
खुशियों की तितलियाँ
बिखर गई |
*
(३)
अपनों से
बिछडने की रेखा
ह्रदय पर गहरी पड़ी है
पर नवजात की मुस्कान
हर बार,
दीवारों पर टंगी
तस्वीरों पर
भारी पड़ी है
*
(४)
श्वेत - श्याम
सपने थे मेरे
फिर एक निशा
तुम आये - मेरे सपने में
और सभी रंगीन हो गए
*
(५)
उल्लासित बेटी
स्वेच्छा प्रणय पर,
-पर माँ की पलकों पर
नमी आ गई.
पूछा जो किसी ने ... क्यूँ ?
तो सिसकी ले बोली
मुझे अपनी माँ
याद आ गई .
*
(६)
फिर
एक बार
शाकाहारी होने की
कसमें खाई
और भेड़ों के
निर्णायक वोटों से
भेड़िये जीत गए
*

दर्द की फसल




एक तडफ......
एक याद......
जो बसी है
सांसों की मानिन्द
सीने में
क्या भर सकेगा
वक्त का मरहम
इस ज़ख्म को
या........
उम्र भर यूं ही
तन्हाई में
तडपना होगा
आती है प्रतिध्वनी
दिल के खण्डहर से
कि कहां गये
वो दिन
जब........
सम्पूर्ण विश्व
एक मासूम मुस्कराहट
में सिमट आता था
.......अब तो
हृदय एक शीला है
तुम्हारी याद शीलालेख
जिसे उकेरा है
बिछडने के दंश ने
काश............
लौट सकता वो वक्त
जो ठहर गया था
तुम्हारी झुकी पलकों के साथ
मेरे कदमों पर.....
बस उन्ही नजरों ने
बांधा है मेरी राह को वरना
कांटे इतने ना थे कि
तुम तक पहुच ना सकू
बांध लिये थे सीने पर
मैने खुद ही
अपने हाथ वरना
फासले इतने ना थे कि
तुम्हे छु ना सकू
अब तो अश्रु सरिता
पर बंधा है
यादों का बांध
एकाकी रहट से
दर्द की फसल
लहलहा रही है...........

पलकों पर ठहरी है रात की खुशबू





पलकों पर ठहरी है रात की खुशबू
अनकही अधूरी हर बात की खुशबू

साँसों की थिरकन पर चूड़ी का तरन्नुम
माटी के जिस्म में बरसात की खुशबू

पतझड़ पलट गया दहलीज तक आकर
जीत गई अंकुरित ज़ज्बात की खुशबू

अहसास ऐ मुहब्बत परत परत मर गया
जिंदा रही पहली मुलाकात की खुशबू

पलकें झुका के कैफियत कबूल की मगर
ज़वाबों से आती रही सवालात की खुशबू

जुल्फों की कैद में कुछ अरसा ही रहे
उम्र भर आती रही हवालात की खुशबू

कली रो पड़ी हूर के गजरे में संवर कर
भूल ना पाई पडौसी पात की खुशबू

लापता वियाकरण अश'आर से मगर
हर लफ्ज से है "विशेष" बात की खुशबू

होली : सांध्य चिंतन





फागुन में तुझ पिया
शिथिल है सब अंग
गहने तन पर यूँ पडे
चंदन लिपटे भुजंग
*
सहरा सागर एक से
अवसाद और उमंग
मरे सिपाही के लिये
क्या शांति क्या जंग
*
होली रंगोली स्याह हई
इद्रधनुष अपंग
तुझ बिन मन साधू भया
भगवा हुए सब रंग
*
एक अकेले जीव को
नोंचे कई प्रसंग
रसना विजया जब धरी
गगन मन हुआ पतंग
*
होली दीवाली एक सी
सुदामा के संग
धुल धुसरित मुख घूमते
बच्चे नंगधडंग
*
मन फागुन में मस्त है
साठा तन है दंग
गिरि गुफा में नाचता
साधु कोई मलंग
*
तन तांडव करता रहा
ले डमरु ले चंग
नाचा मन का मौर जब
बजने लगा मृदंग
*
सपने टूटे सांझ पडे
मोह हुए सब भंग
कुछ रंग तरसे अंग को
कुछ अंग तरसे रंग

विहग विचार


दसियों कबूतर
एक दूसरे को
ठेलते
रेत में
ना जाने क्या
चुगते रहते !
मै उदास,
आंगन में
दाने बिखेर
कबु आओ....कबु आओ
करता घंटों मनुहार
पर नही आते
कपोत आगार

जीवन सहरा में
बचपन किसी
नख़लिस्तान सा
छूट गया
पर नही बदली
नियति
तर्जनी के
प्रथम पोर पर
अंगुष्ठ दबाये
वाम करतल पर ठुड्डी
क्षितिज पर दृग
उर में बैचेनी
कोहनी तले कागज़
प्रतिक्षारत
तृण कातर
आमंत्रण लाचार
कबहु आओ....कबहु आओ
पर नही उतरते
मन आंगन में
विहग विचार

बोनसाई







क्या पेड भी
कभी करते है अपराध..... ?
अगर नहीं तो
क्यूँ बना दिये जाते है बोनसाई....?
ना पिपिलिका थपकियां
ना कोयल की लौरियां
ना पतझड का वस्त्रदान
ना बंसंत का धूपस्नान
ना छाह ना राह
ना टोही ना बटोही
ना प्रेमासिक्त पुकार
ना वृषभ हुँकार
ना गर्द ना गर्दी
ना गर्मी ना सर्दी
ना श्रमिक ना कलेवा
ना गडरिये ना सिंदूरदेवा
ना तमगे सा आईना
दाढी बनवाता गंवई ना
ना शिखर गरूड चिंतन
ना धरा संत मंथन
प्रकृति कभी
गलत ना रचती
जो कुछ है वह सही है
स्वर्ग का तो पता नहीं
कद्दावरों का
नर्क है तो बोनसाई है।
लुभाते भाते सबको
पर किस्मत
सलौनी नहीं होती
कद छोटा होता है
पर महसूसियत
बोनी नहीं होती

पंखुडी गुलाब की





फूल संग माथे चढी
पंखुडी गुलाब की।
बिछडी तो कदमों पडी
पंखुडी गुलाब की।
*
जोड लिये फागुन में
ओर नये नाते
गुलाल रंग रंग गई
पंखुडी गुलाब की।
*
चांदनी सी रंगत ओ
सीप सी है पलके
अधरों पर धर दिन्ही
पंखुडी गुलाब की।
*
याद तेरी जा पिघली
पलकों के किनारे
ओंस भीगी बिरहन हुई
पंखुडी गुलाब की।
*
अधर धरी बांसुरिया
मालकौस गाये
जल रही किताबों में
पंखुडी गुलाब की।
*
धनुष देह श्वेत केश
झुर्रियां कपोल पर
समय हाथी रौंद गया
पंखुडी गुलाब की।
*
लकडी डाली हाथ जोडे
यार सभी चल दिये
देह संग भस्म हुई
पंखुडी गुलाब की।
*
विनय के जोशी

कविता कब होती है





अरुण मयूख की
पहली छुअन से
खिले किसलय तो
कविता होती है
*
घन गरजे
मयूरा नाचे
मयूरी चूगे आंसू तो
कविता होती है |
*
क्या है तकली,
पूनी, सूत, कूकड़ी,
पूछे स्नातक तो
कविता होती है |
*
प्यासे प्रेमी सहारा में
तू पी, तू पी कर,
मर जाए तो
कविता होती है |
*
शहीद की माँ ,
जख्मी की माँ के
पोछे आंसू तो
कविता होती है |
*
छंद मुक्त या
छंद युक्त, मन
पिरोये मोती तो
कविता होती है |
*

बसंत आमंत्रण


कर्ण कुण्डल घूंघर बाल
कपोल ताम मदमद चाल
मन बसंत तन ज्वाला
नैत्र क्षैत्र डोरे लाल ।

पनघट पथ ठाडे पिया
अरण्य नाद धडके जिया
तन तृण तरंगित हुआ
करतल मुख ओढ लिया ।

आनन सुर्ख मन हरा
उर में आनंद भरा
पलकों के पग कांपे
घूंघट पट रजत झरा ।

चितवन ने चोरी करी
चक्षु ने चुगली करी
पग अंगुठा मोड लिया
अधरों पर उंगली धरी ।

कंत कांता चिबुक छुई
पूछी जो बात नई
जिव्हा तो मूक भई
देह न्यौता बोल गई ।

मेरा कद


एक सुबह उठा
तो मेरा कद खो गया
मैं हतप्रभ
अब कैसे काम चलेगा
मैं बौना या सामने वाला
कैसे पता लगेगा
अपने कद की तुलना में
औरों के कद
आंक रखे थे
स्वार्थ के पैमाने पर
सबको नाप रखे थे
कौन मेरे पीछे और
किसके पीछे मैं
पूँछ हिलाऊँगा
इसका बोध खो गया
हे भगवान
एक ही रात में
क्या से क्या हो गया
कद का यह भ्रमजाल
मेरा उसका आपका नहीं
सबका है पेश है एक शब्दचित्र
जिसमें नाम फकत मेरा है
शहर से दूर था वह कॉलेज
जिसमें मैं पढ़ता था
कुछ पैदल कुछ
साइकिलों पर आते
मैं पैदल..........
हसरत से देखता साइकिल को
परीक्षा के दिन
एक सेठ पुत्र ने
साइकिल पर बिठा दिया
परीक्षा से महत्वपूर्ण
साइकिल की सवारी होगई
जीवन में पहली बार लगा
मेरा भी कुछ कद है
फिर नौकरी की साइकिल खरीदी
अच्छा लगा
स्कूटर बगल से गुजरता तो
मायूस हो जाता
कद कुछ कम हो जाता
बुढापे मे मोपेड खरीदी
तीस की गति पर
हवाई जहाज का आनंद लिया
पैदल और साइकिल सवारों को देख
नाक-भौं सिकोड़ता
चलने का शउर नहीं
बार-बार ब्रेक लगाना पड़ता है
कद बढ़ने का भ्रम जारी रहा
फिर एक दिन पौत्री ने कहा
दादाजी मम्मी को बैंक से लोन मिला है
घर में कार लायेंगे और
आपको भी खूब घुमायेंगे
पुत्र की भक्ति
पुत्रवधू की श्रद्धा
या दादाजी पर दया
कुछ भी हो
कार की कल्पना ने
कुल मिलाकर मेरा कद
कुछ और बढ़ा ही दिया
और अब चतुर्थ आश्रम
चला चली की तैयारी
कन्धों की सवारी की प्रतिक्षा
लोग कह रहे हैं
पांव विमान से बाहर है
इन्हें ढँकों.......
मेरा कद ......?

माँ कभी बीमार नही होती


क्या पता
सोती भी है या नही ,
जब मैं सोता ,
वह जगी होती ,
जब मैं जगता , वह
झाडू - पानी -सफाई कर ,
फूंकनी ले ,
चुल्हे के पडौस में
बैठी होती ,
कभी घट्टी पर ,
कभी गौशाला में ,
गुदडियों को सुई चुभोती ,
ढिबरी में तेल भर
उजाला करती ,
दिन भर
कुछ ना कुछ करती ही रहती ,
मुझे बुखार आता ,
दद्दू खटियां पर पडे रहते ,
बाबा खांसते- खांसते दुहरा जाते....
पर , माँ कभी बीमार नही होती
फ़िर भी.........
फिर भी ना जाने
जल्दी .....
मर क्यूं जाती है ?