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Thursday, May 21, 2009

आईना


तुम बिन
सपाट सूनापन
याद कण कण
में पसर जाना,
सजा कर
लपटे जुल्फों की ,
इठलाना बलखाना
संवर जाना ,
बेतरतीब कर के
रूह की सिलवटें मेरी,
दुपट्टे का सर से
उतर जाना,
चमक ले चांद से,
अपने चहरे पर,
तुम और भी
संवर जाना ,
हिचकना कैसा
ये तो है चलन
जमाने का,
चुरा नूर ओरों का ,
खुद और भी
निखर जाना ,
मुझे ना आजमाना
मैं सच का सौदाई हूँ,
अक्स तेरा ही मिटेगा
जो उतरी मेरी कलई
मेरा क्या ,
मैं तो आईना हूँ ,
और
मेरा मुकद्दर है
गिरना,
छनकना,
टूटकर बिखर जाना’
सनद
*
अश्क, आहे, लहू होते वसीयत में,
आईनों का अस्थिसंचय नहीं होता

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8 कविताप्रेमियों का कहना है :

रंजना का कहना है कि -

waah ! waah ! waah !

Adwiteey...bahut bahut sundar rachna....

Aanand aagaya padhkar.Aabhar.

rachana का कहना है कि -

बहुत ही सुंदर पढ़ के अच्छा लगा
अश्क, आहे, लहू होते वसीयत में,
आईनों का अस्थिसंचय नहीं होता
क्या लिखा है शब्द नहीं लिखने को

बीच में ,और * कैसे आगया
क्या कुछ सोच के डाला है ?

सादर
रचना

mohammad ahsan का कहना है कि -

चमक ले चांद से,
अपने चहरे पर,
तुम और भी
संवर जाना ,
yahaan par 'tum' nahi ho ga. ya 'khud' ho ga ya 'tumhara'.
rachna kamzor hai m'amuli bhaav wali ,chand ek lines ko chhod kar.

तपन शर्मा का कहना है कि -

वाह!!
अश्क, आहे, लहू होते वसीयत में,
आईनों का अस्थिसंचय नहीं होता

Harihar का कहना है कि -

मुझे ना आजमाना
मैं सच का सौदाई हूँ,
अक्स तेरा ही मिटेगा
जो उतरी मेरी कलई
मेरा क्या ,
मैं तो आईना हूँ ,

वाह विनय जी ! बहुत अच्छा लिखा है।
अपना चेहरा देख कर लोग आईने पर गुस्सा
नेकालते हैं ।

Anonymous का कहना है कि -

सजा कर
लपटे जुल्फों की ,
इठलाना बलखाना
संवर जाना ,
बेतरतीब कर के
रूह की सिलवटें मेरी,
दुपट्टे का सर से
उतर जाना,

KYA BAAT HAI ! WAAH SHUBHANALL !
'''SHAHNAAZ'''

manu का कहना है कि -

ये सच कहा है विनय जी....
आईने का कोई भी अस्थी-संचयन नहीं होता...
सच का सौदाई जो है....

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

कवितओं के मामले में आपको चूजी होने की ज़रूरत है।

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