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Saturday, December 27, 2008

दोहा गोष्ठी 2 : मैं दोहा हूँ



दोहा मित्रो,

मैं दोहा हूँ आप सब हैं मेरा परिवार.
कुण्डलिनी दोही सखी, 'सलिल' सोरठा यार.


दोहा गोष्ठी २ में उन सबका अभिनंदन जिन्होंने दोहा लेखन का प्रयास किया है। उन्हें समर्पित है एक दोहा-

करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान.
रसरी आवत-जात ते, सिल पर पड़त निसान.


हारिये न हिम्मत... लिखते और भेजते रहें दोहे। अब तक दोहा दरबार में सर्व श्री भूपेन्द्र राघव, दिवाकर मिश्र, मनु, तपन शर्मा, देवेन्द्र, शोभा, सुर, सीमा सचदेव, निखिल आनंद गिरी आदि ने दोहा भेज कर उपस्थति दी है, जबकि अर्श, विश्व दीपक 'तनहा', पूजा अनिल, अनिरुद्ध चौहान, साहिल आलोक सिंह, संगीता पुरी, रविकांत पाण्डेय, देवेन्द्र पाण्डेय, विवेक रंजन श्रीवास्तव आदि पत्र प्रेषित कर द्वार खटखटा रहे हैं। इस दोहा गोष्ठी में हम सब कुछ कालजयी दोहाकारों के लोकप्रिय-चर्चित दोहों का रसास्वादन कर धन्य होंगे।

दोहा है इतिहास:


दसवीं सदी में पवन कवि ने हरिवंश पुराण में 'कउवों के अंत में 'दत्ता' नामक जिस छंद का प्रयोग किया है वह दोहा ही है.

जइण रमिय बहुतेण सहु, परिसेसिय बहुगब्बु.
अजकल सिहु णवि जिमिविहितु, जब्बणु रूठ वि सब्बु.


११वीं सदी में कवि देवसेन गण ने 'सुलोचना चरित' की १८ वी संधि (अध्याय) में कडवकों के आरम्भ में 'दोहय' छंद का प्रयोग किया है। यह भी दोहा ही है.

कोइण कासु विसूहई, करइण केवि हरेइ.
अप्पारोण बिढ़न्तु बद, सयलु वि जीहू लहेइ


मुनि रामसिंह के 'पाहुड दोहा' संभवतः पहला दोहा संग्रह है। एक दोहा देखें-

वृत्थ अहुष्ठः देवली, बाल हणा ही पवेसु.
सन्तु निरंजणु ताहि वस्इ, निम्मलु होइ गवेसु


कहे सोरठा दुःख कथा:

सौरठ (सौराष्ट्र गुजरात) की सती सोनल (राणक) का कालजयी आख्यान को पूरी मार्मिकता के साथ गाकर दोहा लोक मानस में अम्र हो गया। कथा यह कि कालरी के देवरा राजपूत की अपूर्व सुन्दरी कन्या सोनल अणहिल्ल्पुर पाटण नरेश जयसिंह (संवत ११४२-११९९) की वाग्दत्ता थी। जयसिंह को मालवा पर आक्रमण में उलझा पाकर उसके प्रतिद्वंदी गिरनार नरेश रानवघण खंगार ने पाटण पर हमला कर सोनल का अपहरण कर उससे बलपूर्वक विवाह कर लिया. मर्माहत जयसिंह ने बार-बार खंगार पर हमले किए पर उसे हरा नहीं सका। अंततः खंगार के भांजों के विश्वासघात के कारन वह अपने दो लड़कों सहित पकड़ा गया। जयसिंह ने तीनों को मरवा दिया। यह जानकर जयसिंह के प्रलोभनों को ठुकराकर सोनल वधवाण के निकट भोगावा नदी के किनारे सती हो गयी। अनेक लोक गायक विगत ९०० वर्षों से सती सोनल की कथा सोरठों (दोहा का जुड़वाँ छंद) में गाते आ रहे हैं-

वढी तऊं वदवाण, वीसारतां न वीसारईं.
सोनल केरा प्राण, भोगा विहिसऊँ भोग्या.


दोहा की दुनिया से जुड़ने के लिए उत्सुक रचनाकारों को दोहा की विकास यात्रा की झलक दिखने का उद्देश्य यह है कि वे इस सच को जान और मान लें कि हर काल कि अपनी भाषा होती है और आज के दोहाकार को आज की भाषा और शब्द उपयोग में लाना चाहिए। अब निम्न दोहों को पढ़कर आनंद लें-

कबिरा मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर.
पाछो लागे हरि फिरे, कहत कबीर-कबीर.

असन-बसन सुत नारि सुख, पापिह के घर होय.
संत समागम राम धन, तुलसी दुर्लभ होय.

बांह छुड़ाकर जात हो, निबल जान के मोहि.
हिरदै से जब जाइगो, मर्द बदौंगो तोहि. - सूरदास

पिय सांचो सिंगार तिय, सब झूठे सिंगार.
सब सिंगार रतनावली, इक पियु बिन निस्सार.

अब रहीम मुस्किल पडी, गाढे दोऊ काम.
सांचे से तो जग नहीं, झूठे मिले न राम.


अंत में एक काम छात्रों के लिए- अपनी पसंद का एक दोहा लिख भेजिए, दोहाकार का नाम और आपको क्यों पसंद है जरूर बताएं। यह काम करनेवाले अपनी शंकाओं का समाधान पहले पाने के पात्र होंगे।

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10 कविताप्रेमियों का कहना है :

pooja anil का कहना है कि -

"काल करे सो आज कर ,आज करे सो अब,
पल में परलय होएगी , बहुरि करेगा कब?"

मुझे ये दोहा बड़ा पसंद है, दोहाकार का नाम तो पता नहीं, किंतु समय की महत्ता का जो वर्णन जन सामान्य की भाषा में किया गया है, वह अति उत्तम और ग्राह्य है .

"गुरूजी ने पकड़े कान तो, बुद्दि पर हुआ प्रहार,
ज्ञान अनमोल गुरू दे रहे, यही बड़ा उपकार."

सादर वंदना,
पूजा अनिल

manu का कहना है कि -

रूठे तो अच्छा किया दिखा दिया यह आज,
जो अपना होता वही अपनों से नाराज

आचार्य का ही ये दोहा है जिसके बाद मैं इस कक्षा में आज पहली बार ना ना करते भी खींचा चला आया हूँ ...
बेहद असरदार

तपन शर्मा का कहना है कि -

बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर,
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर...

काल करे सो आज कर... वाला दोहा भी मुझे प्रिये। सुने तो और भी होंगे.. पर यही कुछ दो-चार दोहे होते हैं जो हम बोलते रहते हैं इसलिये याद रह जाते हैं....

rashmi का कहना है कि -

"rahiman dhaga prem ka mat todo chtakay,
tute to fir na jude,jude to ghanth pad jaye"

ye doha kavi rahim ka likha hua hai,ye doha rishto ki sachchai ko byan karti hai,jo tutne ke bad man ke kahi na kahi khatas chod jati hai

सीमा सचदेव का कहना है कि -

मेरा प्रिय दोहा है :-
रहिमन धागा प्रेम का ,मत तोरो चटकाय

टूटे ते फिर ना जुरे , जुरे गांठ परि जाय

pooja anil का कहना है कि -

प्रणाम आचार्यजी ,

कृपया एक शंका का समाधान करें, सुझायें ,
दोहा, छंद, श्लोक में अन्तर क्या, बतलायें .

धन्यवाद
पूजा अनिल

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Jayesh Sindhi का कहना है कि -

गुरू गुरू सब कोई कहे बिन गुरू मिले न ज्ञान कृपा होय गुरू देव की तो भक्ति मॉ आवे रंग.. जय गुरू देव

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