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दोहा गाथा सनातन: ४९ दोहे अमृत-धार संजीव 'सलिल'


दोहा गाथा सनातन: ४९

दोहे अमृत-धार

 
संजीव 'सलिल'
*
मंत्र ऋचा श्रुति श्लोक हैं, दोहे अमृत-धार.
राग-विराग सिंगार हैं, प्रेम-भक्ति पतवार.

दोहा गाथा की इस समापन कड़ी में दोहा गीतिका की चर्चा अप्रासंगिक न होगी. ऐसे दोहे जिनके सम पदों की तुक सामान हो, एक साथ प्रस्तुत किये जाएँ तो वे दोहा गीतिका बनाते हैं. दोहे के समपदों में पदांत तथा तुकांत समय होने पर भाव सौंदर्य तथा नाद सौंदर्य का संगम रस तथा शिल्प को हृद्ग्राही बनाता है. दोहा गीतिका के दोहे किसी विषय विशेष पर केन्द्रित भी हो सकते हैं और अलग-अलग विषयों से सम्बंधित भी हो सकते हैं.

दोहा रचना उर्दू ग़ज़ल की बहर के अनुरूप हो तो उसे दोहा ग़ज़ल कहा जायेगा.

माटी ने शत-शत दिए, माटी को आकार.
यह माटी सुरभित सुमन, वह माटी है खार..

माटी में सीकर मिले, निराकार-साकार.
अविनाशी माटी कहे, हे नश्वर आभार.

कनकाभित कुंदन हुआ, जग-वन्दित हर बार.
बिना जले निज आभ से, देता जग उजियार..

जो अच्छे इंसान हैं, जो काबिल फनकार.
ऊपरवाले तुझे क्यों है उनकी दरकार?

कुंदन देता संदेसा, दिल को दिल का प्यार.
गले मिले हँस पूछता, कैसे हैं सरकार?

निराकार को लगन श्रम' कौशल दे आकर.
स्वप्न तभी सार्थक 'सलिल', जब हों वे साकार..

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तुमको मालूम ही नहीं, शोलों की तासीर.
तुम क्या जानो ख्वाब की, कैसे हो ताबीर?.

बहरे मिलकर सुन रहे, गूंगों की तक़रीर.
बिलख रही जम्हूरियत, सिसक रही है पीर..

फेंक द्रौपदी ही रही, फाड़-फाड़ निज चीर.
भीष्म द्रोण कृप कृष्ण संग, घूरें पांडव वीर..

सपनों को साकार कर, धरकर मन में धीर.
हर बाधा-संकट बने, पानी की प्राचीर..

दहशतगार्डों की हुई, है जब से तकसीर.
वतन परस्ती हो गयी, खतरनाक तकसीर..

हिम्मत मत हारें करें, सब मिलकर तदबीर.
प्यार-मुहब्बत ही रहे, मजहब की तफसीर..

हिंद और हिन्दी करें, दुनिया को तनवीर.
बेहतर से बेहतर बने, दुनिया की तस्वीर..

हाय सियासत रह गयी, सिर्फ दगा-तज्वीर.
खिदमत भूली कौम की, बातों की तब्जीर..

तरस रहा मन दे 'सलिल', वक़्त एक तब्शीर.
शब्दों के आगे झुके, ज़ालिम की शमशीर..

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दोहा गाथा सनातन की यह लेख माला ४९ पाठों तथा १६ गोष्ठियों कुल ६५ कड़ियों में विश्व की किसी भी भाषा के काव्य शास्त्र की सर्वाधिक लम्बी लेखमाला होने का रिकोर्ड बना चुकी है. आप सब पाठकों और सहभागियों को ही इसका श्रेय है.

इस लेखमाला के माध्यम से अंतर्जाल (इंटरनेट) पर पहली बार कई छंदों के रचना-विधान का उल्लेख हुआ. छंदहीन काव्य की बाढ़ के इस दौर में भावी पीढी को अंतर्जाल पर हिंदी गीति काव्य से परिचित करने का यह सारस्वत अनुष्ठान हिंद युग्म के संचालक मंडल विशेषकर श्री शैलेश भारतवासी के सहयोग के बिना सम्भव नहीं था. इसका पूरा श्रेय युग्म के संचालकों और सहभागियों को है. इसमें जो भी कमियाँ और त्रुटियाँ रही हों उनके लिए मैं आप सबसे क्षमाप्रार्थी हूँ.

नव वर्ष पर आप सबका अभिनन्दन -

शुभकामनायें सभी को, आगत नवोदित साल की,
शुभ की करें सब साधना, चाहत समय खुशहाल की।

शुभ 'सत्य' होता स्मरण कर, आत्म अवलोकन करें,
शुभ प्राप्य तब जब स्वेद-सीकर राष्ट्र को अर्पण करें।

शुभ 'शिव' बना, हमको गरल के पान की सामर्थ्य दे,
शुभ सृजन कर, कंकर से शंकर, भारती को अर्घ्य दें।

शुभ वही 'सुन्दर' जो जनगण को मृदुल मुस्कान दे,
शुभ वही स्वर, कंठ हर अवरुद्ध को जो ज्ञान दे।

शुभ तंत्र 'जन' का तभी जब हर आँख को अपना मिले,
शुभ तंत्र 'गण' का तभी जब साकार हर सपना मिले।

शुभ तंत्र वह जिसमें, 'प्रजा' राजा बने, चाकर नहीं,
शुभ तंत्र रच दे 'लोक' नव, मिलकर- मदद पाकर नहीं।

शुभ चेतना की वंदना, दायित्व को पहचान लें,
शुभ जागृति की प्रार्थना, कर्त्तव्य को सम्मान दें।

शुभ अर्चना अधिकार की, होकर विनत दे प्यार लें,
शुभ भावना बलिदान की, दुश्मन को फिर ललकार दें।

शुभ वर्ष नव आओ! मिली निर्माण की आशा नयी,
शुभ काल की जयकार हो, पुष्पा सके भाषा नयी।

शुभ किरण की सुषमा, बने 'मावस भी पूनम अब 'सलिल',
शुभ वरण राजिव-चरण धर, क्षिप्रा बने जनमत विमल।

शुभ मंजुला आभा उषा, विधि भारती की आरती,
शुभ कीर्ति मोहिनी दीप्तिमय, संध्या-निशा उतारती।

शुभ नर्मदा है नेह की, अवगाह देह विदेह हो,
शुभ वर्मदा कर गेह की, किंचित नहीं संदेह हो।

शुभ 'सत-चित-आनंद' है, शुभ नाद लय स्वर छंद है,
शुभ साम-ऋग-यजु-अथर्वद, वैराग-राग अमंद है।

शुभ करें अंकित काल के इस पृष्ट पर, मिलकर सभी,
शुभ रहे वन्दित कल न कल, पर आज इस पल औ' अभी।

शुभ मन्त्र का गायन- अजर अक्षर अमर कविता करे,
शुभ यंत्र यह स्वाधीनता का, 'सलिल' जन-मंगल वरे।

*


दोहा गाथा सनातन: ४८


दोहा गाथा सनातन: ४८

इस श्रंखला के समापन पूर्व अंक में हम दोहा पर आधारित त्रिपदिक छंदों से साक्षात् करते हैं. त्रिपदिक छंदों की परंपरा भी संस्कृत से हिंदी में आयी है. त्रिपदिक छंदों के तीन चरणों की तुक के आधार पर ५ वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है. १. तीनों चरणों की तुक समान हो, २. प्रथम-द्वितीय चरणों की तुक सामान हो, ३. प्रथम-तृतीय चरणों की तुक समान हो, ४. द्वितीय-तृतीय चरणों की तुक असमान हो तथा ५. प्रथम-द्वितीय चरणों की तुक समान हो, ६. तीनों चरणों की तुक असमान हो.

दोहा के सम विषम चरण क्रमशः १३-११ मात्राओं के होते हैं. इनके विविध संयोजनों से निम्नानुसार त्रिपदियाँ बनती हैं.

१. तीनों चरण तेरह मात्री हों:

स्वागत में नव वर्ष के
अपने मन की उदासी
पल में छू मंतर हुई.

२. तीनों चरण ग्यारह मात्री हों:

पञ्च शरों की मार.
इंगित का व्यापार.
बौराया संसार.

३. प्रथम-तृतीय तेरह मात्री तथा द्वितीय चरण ग्यारह मात्री हों:

मैं तुम यह वह ही नहीं,
मन्मथ की मनुहार.
फागुन में सबको रुची.

४.प्रथम-तृतीय ग्यारह मात्री तथा द्वितीय चरण तेरह मात्री हों:

करें ठुमक इसरार
ढोलक, टिमकी, मंजीरा
नाचो गाओ यार.

५. प्रथम-द्वितीय तेरह मात्री तथा तृतीय चरण ग्यारह मात्री हों:

नैन मिले लड़ झुके उठ
देख नैन में बिम्ब निज
कर बैठे इकरार.

६. प्रथम-द्वितीय ग्यारह मात्री तथा तृतीय चरण तेरह मात्री हों:

मादक रूप निखार
या दहके अंगार
किंशुक कुसुम किलक रहे.

७. द्वितीय-तृतीय तेरह मात्री तथा प्रथम चरण ग्यारह मात्री हों:

यह जीवन वरदान
आदिकाल से आज तक
पुस्तक के बल पर हुआ.

८. द्वितीय-तृतीय ग्यारह मात्री तथा प्रथम चरण तेरह मात्री हों:

काल नहीं कुछ देखता
कुटिया है या ताज?
विगतागत या आज?

इस तरह दोहा पर आधारित कुल त्रिपदियों की संख्या ६ X ८ = ४८ होती है. यदि विविध पदों में में एक मात्रा कम या अधिक होने की छूट ली जाये तो छंदों की संख्या सहस्त्रों में पहुँच जाएगी. हिंदी गीति काव्य में छंदों का आधार पूरी तरह गणितीय है.

आजकल साहित्यकारों में इन आधारों पर छंद रचना कर उनके आविष्कारक होने का दावा करने की होड़ लगी है किन्तु यह सब हिंदी पिंगल की सनातन सम्पदा है. अनावश्यक विस्तार से बचने के लिए हमने उक्त के साथ एक-एक उदाहरण दिए हैं किसी पाठक की रूचि हो तो वह पृथक संपर्क कर अधिक जानकारी अथवा ४८ प्रकारों के उदाहरण प्राप्त कर सकता है.

अगली समापन किस्त में हम दोहा गीतिका या दोहा गजल की चर्चा करेंगे.

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दोहा गाथा सनातन: ४७ यति दस-आठ, आठ-छः पर है त्रिभंगी में --आचार्य संजीव 'सलिल'


दोहा गाथा सनातन: ४७

यति दस-आठ, आठ-छः पर है त्रिभंगी में

आचार्य संजीव 'सलिल'

यति दस-आठ, आठ-छः पर है त्रिभंगी में,

चरणान्त गुरु औ' जगण वर्जित है.

चार चरणों का छंद, मोहे मन रसिकों का,

पाई न उधार करी कीर्ति अर्जित है.

छन्द लय रस बिम्ब भाव कथ्य भाषा को,

साधना-सँवारना 'सलिल' न सहज है.

शब्द-ब्रम्ह की कृपा से सिद्ध होता है छंद,

शारदा के चरणों की छंद पग-रज है..

त्रिभंगी एक मात्रिक छंद है.

इस छंद में दस-आठ तथा आठ-छः पर यति होती है.

बत्तीस मात्रा के हर चरण के अंत में गुरु आवश्यक है.

यह छंद चार चरणों का होता है तथा इसमें जगण (ज भा न = लघु गुरु लघु) वर्जित होता है.

उदाहरण:

१.
रसराज-रसायन, तुलसी-गायन,

श्री रामायण मंजु लसी.

शारद शुचि-सेवक, हंस बने बक-

जन-कर-मन हुलसी हुलसी..

रघुवर-रस-सागर, भर लघु गागर,

पाप-सनी मति गई धुल सी.

कुंजी रामायण के परायण,

से गयी मुक्ति-राह खुल सी..

२.
रस-सागर पाकर, कवि ने आकर,

अंजलि भर रस-पान किया.

ज्यों-ज्यों रस पाया, मन भरमाया,

तन हर्षाया, मस्त हिया..

कविता सविता सी, ले नवता सी,

प्रगटी जैसे जला दिया.

सारस्वत पूजा, करे न दूजा,

करे 'सलिल' ज्यों अमिय पिया..

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दोहा गाथा सनातन: 42 दोहा की बहिना चौपाई


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दोहा गाथा सनातन: ४२

दोहा की बहिना चौपाई

दोहा की बहिना चौपाई, गुरु मात्रा पदांत में लाई.
चरण हमेशा सोलह मात्री, रचिए चौपाई सुखदात्री..

दोहा की बड़ी बहिन चौपाई मात्रिक सम छंद है जिसके हर पद में दो चरण तथा प्रत्येक चरण में सोलह मात्राएँ होती हैं.

चौपाई के हर चरण के अंत में 'जगण' तथा 'तगण' का निषेध है अर्थात गुरु मात्रा होना अनिवार्य है. हर चरण के अंत में 'यति' (विराम) होती है.

गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरित मानस में दोहा और चौपाई का साम्राज्य दृष्टव्य है.

उदाहरण:

१.
बिनु सत्संग विवेक न होई, राम-कृपा बिनु सुलभ न सोई.
सत संगति मुद मंगल मूला, सोई फल सिधि सब साधन फूला.. - तुलसीदास

२.
मीन विलग जल से जब होती, तडप-तडप निज जीवन खोती.
बुझे शीघ्र जल दीपक-बाती, जब न सनेह भरी रह पाती..ओमप्रकाश बरसैंया 'ओमकार'


३.
नेतागण हैं सिक्का खोटा, जैसे बेपेंदी का लोटा.
लूट-बेच खा रहे देश को, जोड़ रहे धन क्या हमेश को? - सलिल

चौपाई में हर रस का रंग देखा जा सकता है. समर्थ कवि के लिए यह छंद सरस्वती का वरदान है.

महाकाव्यों और खंडकाव्यों में इस छंद की महत्ता देखी जा सकती है.

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दोहा गाथा सनातन: ३६ नंदा दोहा को मिला, बरवै 'सलिल' सुनाम.


दोहा गाथा सनातन: ३६

नंदा दोहा को मिला, बरवै 'सलिल' सुनाम.

झूम-झूम कर गा रहे जिसे खास औ' आम.
नंदा दोहा को मिला, बरवै 'सलिल' सुनाम..

विषम चरण में जब रखें, मात्रा बारह मीत.
सात रहें सम में 'सलिल', यह बरवै की रीत..

दोहा की ही तरह दो पद, चार चरण तथा लय के लिए विख्यात छंद नंदा दोहा या बरवै लोक काव्य में प्रयुक्त होता रहा है.

बरवै छंद के प्रणेता अकबर के नव रत्नों में से एक महाकवि अब्दुर्रहीम खानखाना 'रहीम' कहे जाते हैं. किंवदन्ती है कि रहीम का कोई सेवक अवकाश लेकर विवाह करने गया. वापिस आते समय उसकी विरहाकुल नवोढा पत्नी ने उसके मन में अपनी स्मृति बनाये रखने के लिए दो पंक्तियाँ लिखकर दीं.

रहीम का साहित्य-प्रेम सर्व विदित था सो सेवक ने वे पंक्तियाँ रहीम को सुनाईं. सुनते ही रहीम चकित रह गए. पंक्तियों में उन्हें ज्ञात छंदों से अलग गति-यति का समायोजन था. सेवक को ईनाम देने के बाद रहीम ने पंक्ति पर गौर किया और मात्रा गणना कर उसे 'बरवै' नाम दिया. बरवै के विषम चरण (प्रथम, तृतीय) में तेरह तथा सम चरण ( द्वितीय, चतुर्थ) में सात मात्राएँ रखने का विधान है. विषम चरण में दोहा की तरह तेरह मात्राओं के स्थान पर बारह मात्राएँ (भोजपुरी में बरवै मात्राएँ) होने से यह छंद बरवै कहलाया. मूल पंक्ति में 'बिरवा' शब्द प्रयोग में आया था. शायद यह भी बरवै नाम का कारण बना. मूल पंक्तियाँ इस प्रकार है:

प्रेम-प्रीति कौ बिरवा, चले लगाइ .
सींचन की सुधि लीज्यौ, मुरझि न जाइ..

रहीम ने इस छंद का प्रयोग कर 'बरवै नायिका भेद' नामक ग्रन्थ की रचना की.

रहीम के समकालिक महाकवि तुलसीदास को भी बरवै छंद प्रिय था. 'बरवै रामायण' तुलसीदास की अमर काव्यकृति है. ( सन्दर्भ: डॉ. सुमन शर्मा, मेकलसुता, अंक ११, पृष्ठ २३२)

बरवै को 'ध्रुव' तथा' कुरंग' नाम भी मिले.
( छ्न्दाचार्य ओमप्रकाश बरसैंया 'ओंकार' कृत छंद-क्षीरधि' पृष्ठ ८८)
उदाहरण:
१.
गरब करहु रघुनन्दन, जनि मन मांह.
देखहु अपनी मूरति, सिय की छांह.. -तुलसीदास

२.
मन-मतंग वश रह जब, बिगड़ न काज.
बिन अंकुश विचलत जब, कुचल समाज.. -ओमप्रकाश बरसैंया 'ओंकार'

३.
'सलिल' लगाये चन्दन, भज हरि नाम.
पण्डे ठगें जगत को, नित बेदाम..

४.
हाय!, हलो!! अभिवादन, तनिक न नेह.
भटक शहर में भूले, अपना गेह..

५.
पाँव पड़ें अफसर के, भूले बाप.
रोज पुण्य कह करते, छिपकर पाप..

किसी समय बरवै रचना साहित्यिक कुशलता और प्रतिष्ठा का पर्याय था.

आप भी इसमें दक्षता प्राप्त करें.

विजया दशमी की शुभकामनाएँ.

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दोहा गाथा सनातन : ३५


दोहा गाथा सनातन : ३५

उल्लाला रचना सहज

उल्लाला रचना सहज, चरण समाहित चार.
तेरह मात्रा सभी में, दो पद लिए निखार..

तेरह मात्री दो पदी, मात्रा बंधन मुक्त.
उल्लाला लिखना 'सलिल' , भाव सरित उन्मुक्त..

उल्लाला छंद में दो पदों में चार चरण होते हैं.

हर चरण में तेरह मात्राएँ होती हैं.

पदों के अंत में लघु-गुरु मात्रा-बंधन न होने से इनकी रचना सरल होती है.

उदाहरण:

१.
राष्ट्र-हितैषी धन्य हैं, निर्वाहा औचत्य को.
नमन करुँ उनको सदा, उनके शुचि साहित्य को..

२.
पूज्य पिता को खो दिया, मैं अनाथ हूँ नाथ अब.
सूनी लगती सृष्टि यह, जगमग कहते जिसे सब..-सलिल

३.
कौन किसी का है सगा, पल में देते छोड़ क्यों?
हम माटी के खिलौने, हरि रच देते तोड़ क्यों??

आप उल्लाला रचें और मैं कल २२ सितम्बर को प्रातः ३.४० पर अपने पूज्य पिताश्री के निधन से उपजे शोक को पचाने का प्रयास करता हूँ.

विलंब हेतु क्षमाप्रार्थी हूँ.

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दोहा गाथा सनातन : 34 दोही दोहे की बहिन


दोहा गाथा सनातन : ३४

दोही दोहे की बहिन

दोहा के विविध प्रकारों से परिचित होने के साथ-साथ हमने सोरठा, रोला तथा कुंडली से भी परिचय प्राप्त किया.

दोहा कुल के अन्य छंदों की चर्चा प्रारंभ करते हुए आज हम 'दोही' का परिचय प्राप्त करते हैं.

दोही भी है द्विपदी, विषम चरण है भिन्न.
पंद्रह मात्राएँ रखें, किन्तु न लय विच्छिन्न.

सम चरणों के अंत में, लघु रखिये चुपचाप.
ग्यारह मात्राएँ लिए, दोही में रस व्याप.

'दोही'के दोनों पदों के विषम चरणों में पंद्रह तथा सम चरणों में ग्यारह मात्राएँ होती हैं.
प्रत्येक पद में १५+११ = २६ मात्राएँ इस एक दोही में तरह कुल ५२ मात्राएँ होती हैं.

उदाहरण:

१.
दर न रहे जाता मनुज जो, दर-दर बिना बुलाय.
आदर मान मिले न नर को, लख मुँह लोग फुलाय..
-डॉ, ॐप्रकाश बरसैया 'ओंकार', छंद क्षीरधि

२.
विरद सुमिरि सुधिकरत नित ही, हरि तुव चरन निहार.
यह भव जलनिधिते मुहि तुरत, कब प्रभु करिहहु पार..

३.
प्रभु तुम ही हो असरन-सरन, औ' मैं हूँ मानव मात्र.
तुम करुणासागर हो देव, हम करुणा के पात्र.. -सलिल

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दोहा गाथा सनातन: 33 वर्जित है चंडालिनी


दोहा के जिन २३ प्रकारों की चर्चा अब तक की गयी है उन पर गजाधर कवि ने 'छंद मंजरी' में निम्न छंद दिया है_

भ्रमर१ सुभ्रामर२ शरभ३ श्येन४ मंडूक५ बखानहु।

मरकत६ करभ७ सु और नरहि८ हंसहि९ परमानहु।

गनहु गयंद१०सु और पयोधर११ बल१२ अवरेखहु

वानर१३ त्रिकल१४ प्रतच्छ कच्छ्पहु१५ मच्छ१६ विसेखहु

शार्दूल१७ अहिबरहु१८ व्याल१९युत वर विडाल२० अरु

अश्व२१ गनि उद्दाम उदर२२ अरु सर्प२३ शुभ तेइस विधि दोहा करनि।

*

वर्जित है चंडालिनी, दोहा रचना मीत.
विषम चरण-आरम्भ में, जगण न रखिये रीत..

आज हम चंडालिनी दोहा की चर्चा करेंगे.

दोहा के मानक नियमों में विषम चरण (पहला, तीसरा) के आदि (प्रारंभ) में 'जगण' ( जभान = १+२+१) का प्रयोग एक चरण में वर्जित है. चंडालिनी दोहा इस नियम को तोड़ता है इसलिए इसका लिखना ही मना किया गया है.

अनेक कवियों ने विषम चरण के आरम्भ में दो शब्दों में 'जगण' वाले दोहे रचे हैं और उन्हें सही कहा गया है.

उदाहरण:

१. महाकवि बिहारी

जु ज्यों उझकि झंपति वदन, झुकति विहँसि सतरात.
तुल्यो गुलाल झुठी-मुठी, झझकावत पिय जात..

२. वृन्द

भले-बुरे सब एक संग, जों लौ बोलत नाहि.
जान पडत हैं काक-पिक, ऋतु वसंत के मांहि.

३. डॉ. अनंतराम मिश्र 'अनंत'

भीतर तो अवसन्न है, बाहर दिखे प्रसन्न.
सुखी नहीं हैं आजकल, लोग मात्र संपन्न..

वर्जित चंडालिनी दोहा निम्न है:

१. ॐप्रकाश बरसैंया 'ओमकार'

बिना विचारे जो स्वबल, बढ़के उछले दूर.
अशक्ति से अरमान सब, होते चकनाचूर.

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दोहा गाथा सनातन: 31 छयालिस लघु गुरु एक ले, दोहा उदर सुनाम


दोहा गाथा सनातन में अब तक हम दोहोंके २१ प्रकारों से परिचित हो चुके हैं. आज तथा अगली कड़ी में दो ऐसे प्रकारों की चर्चा है जो दोहा के सम चरणान्त में गुरु-लघु की सामान्यतः मान्य शर्त का पालन नहीं करते. इन में गुरु मात्रा क्रमशः १ तथा ० होती है.

आइये, हम परिचित हों उदर दोहा से-

लघु-गुरु छियालिस-एक मिल, दोहा रचते मीत.
गुरु-लघु सम चरणान्त की, खंडित होती रीत..

'उदर' न देखे रात-दिन, चाहे केवल तृप्ति.
नियम-भंग हो भले ही, चाहे नहीं अतृप्ति..

छ्यालिस लघु गुरु एक ले, दोहा उदर सुनाम.
सुषमा सुरभि बिखेरता, अपनी ललित-ललाम..

सूत्र: उदर १ गुरु + ४६ लघु = ४७ अक्षर

उदाहरण:

१.
घट-घट नित अघटित घटित, लख धक्-धक् मन मगन.
चपल चकित चित चुप 'सलिल', निरख लगन की अगन.- सलिल

२.
भरत-भरत रुचिकर लवण, उदर रहत नित तरल.
अधिक चखत उलटत सभी, लवण बनत जब गरल. -आचार्य रामदेव लाल 'विभोर'

३.
कदम-कदम अनवरत चल, अनथक नत रख नयन.
कर मधु रस वर्षण 'सलिल', मनहर कह मृदु बयन..

पाठकगण उदर दोहा की रचना करने का प्रयास करें.

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दोहा गाथा सनातन : 30 दोहा नामित 'श्वान'


दो गुरु लघु हों चवालिस, दोहा नामित 'श्वान'

सूत्र: २ गुरु + ४४ लघु = कुल ४६ अक्षर

परिभाषा:

दो गुरु लघु हों चवालिस, दोहा नामित 'श्वान'
लिखना नहीं सरल 'सलिल', लिखकर कर पहचान..

दो गुरु दो गुण 'श्वान' के, जाग्रति औ' ईमान.
शेष चवालिस लघु मिला, रच दोहा गुणवान.

२ गुरु तथा ४४ लघु मात्राओं के संयोजन से बने दोहे को 'श्वान' कहा जाता है.

इस दोहे में मात्र दो मात्राएँ होती हैं जिन्हें द्वितीय तथा चतुर्थ चरण के अंत में अर्थात प्रथम व द्वितीय पद के अंत में रखा जाता है, शेष सभी अक्षर लघु होने से यह दोहा पढने में सरल किन्तु रचने में जटिल होता है.

ब्रज तथा भोजपुरी में ऐसे दोहे अल्प हैं किन्तु हिन्दी की खड़ी बोली में लगभग नहीं हैं.

इस अनुष्ठान के सहभागी अंतिम ५-६ प्रकार के दोहे हिन्दी की खड़ी बोली में रचकर इस अभाव को दूर करें.

उदाहरण:

१.
समय-समय रस बिन बहुत, समय-समय रसखान.
मचल-मचल सब कुछ चखत, घर-घर घुसकर श्वान.
- आचार्य रामदेव लाल 'विभोर'

२.
जगदव गत हिय-पतन-कृति, कलित प्रकृति-दृग कोर.
बिटप-बिटप पर लद सुमन, कि सित लसित हर ओर. -डॉ. राजेश दयालु 'राजेश'

३.
कदम-कदम पर अगम जग, जगमग-जगमग देख.
बहक-फिसल मत, बच 'सलिल', अजब-गजब विधि-लेख..-सलिल

४.
अमल-विमल हर-हर लहर, कलकल सलिल-निनाद.
विधि-हरि-हर प्रमुदित विहँस, हरकर हर अवसाद. -सलिल

५.
अनिल अनल क्षिति जग 'सलिल', सकल सृजन-शुभ मूल.
कण-कण निरख-परख सतत, मत कह कमतर धूल..

६. तन-मन-धन सब कुछ 'सलिल', गुप-चुप रहकर वार.
अजर-अमर निज वतन-रज, हँसकर सर पर धार..

७.
छन-छन छन-छनन छन, थिरक-थिरक घनश्याम.
लिपट-लिपटकर चमक सँग, खिल-खिल पड़ें सुनाम..

श्वान दोहे को सिद्ध करने के बाद हम आगामी श्रृंखलाओं में दो ऐसे दोहों की चर्चा करेंगे जो पदांत में गुरु-लघु नियम का पालन नहीं करते.

विगत कक्षा के पत्राचार में श्री श्याम सखा 'श्याम' ने एक अर्धाली का उल्लेख किया था. दोहा गाथा का आरम्भ करते समय हमने दोहों के इतिहास तथा दोहा द्वारा इतिहास या व्यक्तियों के जीवन में परिवर्तन की चर्चा का क्रम छेड़ा था जो पाठकों के रुच न लेने पर क्रमशः बंद कर दिया. यदि यह क्रम चलता रहता तो शायद यह दोहा भी उसमें आता...अस्तु,

संत कबीरदास जी से तो हर हिन्दीभाषी परिचित है. कबीर की साखियाँ सभी ने पढी हैं. कबीर पशे से जुलाहे थे किन्तु उनकी आध्यात्मिक ऊँचाई के कारण मीरांबाई जैसी राजरानी भी उन्हें अपना गुरु मानती थीं. जन्मना श्रेष्ठता, वर्णभेद तथा व्द्द्वाता पर घमंड करनेवाले पंडित तथा मौलाना उन्हें चुनौतियाँ देते रहते तथा मुँह की खाकर लौट जाते. ऐसे ही एक प्रकांड विद्वान् थे पद्मनाभ शास्त्री जी.
उन्होंने कबीर को शास्त्रार्थ के लिए ललकारा तथा कबीर को नीचा दिखने के लिए उनकी शिक्षा-दीक्षा पर प्रश्न किया. कबीर ने बिना किसी झिझक के सत्य कहा-

चारिहु जुग महात्म्य ते, कहि के जनायो नाथ.
मसि-कागद छूयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ.

अर्थात स्वयं ईश्वर ने उन्हें चारों युगों की महत्ता से अवगत कराया और शिक्षा दी. उन्होंने न तो स्याही-कागज को छुआ ही, न ही हाथ में कभी कलम ली.

पंडित जी ने सोच की कबीर ने खुद ही अनपढ़ होना स्वीकार लिया सो वे जीत गए किन्तु कबीर ने पंडितजी से पूछा कि उन्होंने जो ज्ञान अर्जित किया है वह पढ़कर समझा या समझकर पढ़ा?

पंडित जी चकरा गए, तुंरत उत्तर न दे सके तो दो दिन का समय माँगा लेकिन दो दिन बाद भी उत्तर न सूझा तो कबीर से समझकर पढ़नेवाले तथा पढ़कर समझनेवाले लोगों का नाम पूछा ताकि वे दोनों का अंतर समझ सकें. कबीर ने कहा- प्रहलाद, शुकदेव आदि ने पहले समझा बाद में पढ़ा जबकि युधिष्ठिर ने पहले पढ़ा और बाद में समझा. पंडित जी ने उत्तर की गूढता पर ध्यान दिया तो समझे कि कबीर सांसारिक ज्ञान की नहीं परम सत्य के ज्ञान की बात कर रहे थे. यह समझते ही वे अपना अहम् छोड़कर कबीर के शिष्य हो गए.

हम भाई श्याम सखा 'श्याम' के आभारी हैं कि उन्होंने इस प्रसंग की चर्चा का अवसर प्रदान किया.

शेष फिर...

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दोहा गाथा सनातन: 29 विडाल दोहा


ब्यालिस लघु गुरु तीन ले,रचिए दोहा नित्य.
नाम 'विडाल' मिला इसे, दे आनंद अनित्य.

दोहाकार प्रवीण जो, लिखते वही विडाल.
मात्र तीन गुरु वर्ण ले, कहते बात कमाल..

वर्ण बयालीस लघु लगें, सच जी का जंजाल.
जिस दोहे में हों सजे, उसका नाम विडाल..

सूत्र: विडाल दोहा = ३ गुरु + ४२ लघु = कुल ४५ मात्राएँ

उदाहरण:

१.
नटखट मन अटपट चलन, अरुण नयन मद-मस्त.
जन-जन-मन विचलित करे, कर सद्गति-पथ ध्वस्त. -आचार्य रामदेव लाल 'विभोर'

२.
लहिय न बढ़ि बरि अरुनि-तिय, जिय हनि बड़वरि हानि.
कहँ सिरमनि तिन हित धरी, जिन सिरमनि कुल कानि. -डॉ. राजेश दयालु 'राजेश'

३.
निश-दिन शत-शत नमन कर, सुमिर-सुमिर गणराज.
चरण-कमल धरकर ह्रदय, प्रणत- सदय हो आज. -सलिल

४.
डगमग-डगमग सतत चल, डग-डग मग कर पार.
पग-पग पर पद चिन्ह नव, प्रमुदित विकल निहार.. -सलिल

५.
निरख-परख जड़ जगत नित, अमित-अजित बन आत्म.
कण-कण तृण-तृण लख कहे, सकल जगत परमात्म.. -सलिल

६.
सरल-तरल रह सलिल सम, अजित अपरिमित शक्ति.
सतत अवतरित हो अगर, अविचल प्रभु-पद भक्ति.. -सलिल

७.
अनिल अनल जल धरणि नभ, सकल चर-अचर भूल.
'सलिल' वतन-रज सर चढा, बरबस सब अनुकूल..

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दोहा गाथा सनातन: 28 व्याल भाल कवि का रखे, ऊंचा


व्याल भाल कवि का रखे, ऊँचा ''सलिल'' सदैव।
जो रच पाता है इसे, कीर्ति उसे दें दैव॥

चालिस लघु गुरु चार ले, रचिए दोहा डूब।
व्याल नाम से पुकारें, रसानंद हो खूब॥

व्याल दोहा सूत्र: ४ गुरु + ४० लघु = ४४

चार गुरु मात्राओं और ४० लघु मात्राओं के संयोजन से बने दोहे को लघु दोहा कहते हैं.

१.
तिरसठ बनकर चलत यदि, पग-पग मिलत असीस।
दर-दर पर ठोकर सहत, बन-बन कर छत्तीस। । -आचार्य रामदेव लाल 'विभोर'

२.
कुंडल-दुति दमकति परति, इमि नँद सुवन कपोल।
नील गगन जनु नखत गन, बहु रँग करत किलोल।। -श्याम रसमयी

३.
चमक-दमक, चुप-मुखर रह, गरज-बरस नभ-नाथ।
थकित-श्रमित, असफल-भ्रमित, धरा न लगती हाथ।। -सलिल

४.
नटवर गिरिधर हरि किशन, मुदित मगन रसराज।
विहँस-विहँस कर-कमल पग, कमल पखारें आज।। -सलिल

५.
दरद हरन कर सकल विधि, नरम नरमदा मात।'
सलिल' विमल भव तर सके, प्रमुदित अविकल गात।। -सलिल

६.
पल-पल निशि-दिन सुमिर मन, नटवर गिरिधर नाम।
तन-मन-धन जड़ जगत यह, 'सलिल' न आते काम॥

७।कलियुग में हर जन भ्रमित, बदल रहे नर- नार।
करम-धरम नहिं मन बसत, बदलत रहत बिचार।।-शन्नो

शन्नो जी के उक्त दोहा क्र. ७ में तीसरे पद में मूलतः 'ना' का प्रयोग किया गया है और यह अहिवर दोहा है किन्तु 'ना' के स्थान पर 'नहिं' का प्रयोग करने पर एक गुरु मात्रा घाट जाती है और यही दोहा 'व्याल' हो जाता है.

व्याल दोहे के चार चरणों में चार गुरु मात्राओं में से दो पदांत में होती है, शेष दो कहीं भी रखी जा सकती हैं. चालीस लघु अक्षरों का प्रयोग कर कुछ सार्थक कहना सहज नहीं है. उक्त उदाहरणों को देखकर पाठक प्रयास करें.
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दोहा गाथा सनातन : 26 शार्दूल दोहा लिखें, आएगा आनंद


वीर पराक्रमी सिंह-सम, शार्दूल की आन.
छतिस गुरु छै लघु करें, मात्राएँ गुणगान..

शार्दूल दोहा लिखें, आएगा आनंद.
छतिस गुरु छै लघु मिला, सिद्ध कीजिये छंद..

शार्दूल दोहा में छत्तीस लघु तथा छै गुरु मिलकर कुल ४२ मात्राएँ होती हैं, इस प्रकार के दोहे खड़ी हिंदी में कम ही रचे गए हैं. भोजपुरी, अवधि या बृज में इस प्रकार के दोहे अन्य प्रकारों से कम किन्तु खड़ी हिंदी से अधिक हैं कुछ शार्दूल दोहों का आनंद लीजिये-

शार्दूल ६ गुरु ३६ लघु = ४२ मात्राएँ

१.
जइण रमिय बहुतेण सहु, परिसेसिय बहु गब्बु.
अजकल सिहु णवि जिमि विह्तु, जब्बणु रूठ वि सब्बु. -पवन कवि, १०वीं सदी

२.
अमिय हलाहल रस भरे, स्वेत-स्याम रतनार.
जियत-मरत झुकि-झुकि परत, जिहि चितवत इक बार. -रसलीन

३.
कहत सबै कवि कमल से, मो मत नैन पषानु.
नतरुक कत इन बिय लगत, उपजत बिरह-कृसानु. -बिहारी

४.
जगर-मगर दीपक जलत, स्वर्णिम लगत प्रकाश.
जीवन धन पग-पग चलत, मिळत मिलन की बास. -आचार्य रामदेव लाल 'विभोर'

५.
मन से मिलकर मगन मन, गुपचुप करता बात.
अधर-मधुप हर्षित-तृषित, अधर खिले जलजात.-
सलिल

६.
कण-कण तृण-तृण जोड़कर, 'सलिल' न करना मोह.
निज तन-मन-धन निमिष में, तजकर करते द्रोह.. -सलिल

७.
तन मन वचन नयन 'सलिल', फिर-फिर आकर याद.
पग-पग पर पग रोकते, मत रुकना फरियाद.. -सलिल

शार्दूल दोहा रचकर आप अपनी दोहांकारी को कसौटी पर कसने का अवसर मत गंवाइये.

देखें, किसने कितना सीखा?

दोहा गाथा सनातन: 25 रचें मच्छ दोहा मधुर


मच्छ दोहा: ७ गुरु + ३४ लघु = ४१ मात्राएँ

जिस दोहे के चारों चरणों या दोनों पदों में ७ गुरु तथा ३४ लघु कुल ४१ मात्राएँ होती हैं, उसे मच्छ दोहा कहा जाता है.

उदाहरण:

१. जहि मन पवन न संचरई, रवि-ससि नाहि पवेस.
तहि बढ़ चित्त बिसाम करु, सरहे कहिय उवेस.-सरहपा, संवत ६८०

२.हिय निर्गुन नयननि सगुन, रसना नाम सुनाम.
भनहुँ परट, संपुट लखत, तुलसी ललित ललाम. -तुलसीदास

३. परम धरम निर्मल करम, भरम न मन में पाल.
अमर-अजर सब कुछ नहीं, जगत काल के गाल. -आचार्य रामदेव लाल 'विभोर'

४. ह्रदय-कमल पर छा गए, कमलनयन जदुनाथ,
जीवन कमल अमल किये, कमल-कमल का साथ. -डॉ. राजेश दयालु 'राजेश'

५. हँसत बोल, बोलति हँसी, हँसि बोलत नन्दलाल.
लखि-लखि दृग, सुनि-सुनि स्रवन, गुनि-गुनि जोय निहाल. -डॉ. राजेश दयालु 'राजेश'
नंदलाल में 'न' के पर चन्द्रबिंदी, लघुमात्रा है.

६. चटक-मटक कि तड़क-भड़क, अटक-भटक कि निहार.
मैं तुझ पर बलिहार हूँ, किसी कि सभी प्रकार. -डॉ. राजेश दयालु 'राजेश'

७. कम्पित कदम कदम्ब तक, पहुँचे-संकुचे मौन.
छमछम चुप, धड़कन मुखर, परबस सुनता कौन. -सलिल (संकुचे में 'च' पर चन्द्रबिंदी, लघु मात्रा)

दोहा में गुरु मात्रा के घटने के साथ-साथ उनका रचना-कर्म कठिन होता जाता है. यदि बिना मात्रा के अक्षर मात्र से बनानेवाले शब्दों का प्रयोग अधिक से अधिक करें तो इन दोहों को रचना सहज होगा.
सभी सहभागी, जो किसी कारण से कम सक्रिय हैं इन प्रकारों ओके सिद्ध करने से न चूकें. जो दोहाकार इन प्रकारों को रच पता है उसे पूर्व के दोहे रचना सुगम हो जाता है.

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दोहा गाथा सनातन: 23 - त्रिकल दोहा


परिभाषा:

मात्राएँ यदि तीस लघु, नौ गुरु मिलें सुजान।
उस दोहे को 'त्रिकल' कहें, 'सलिल' काव्य-विद्वान।।

नौ गुरु के सँग तीस लघु, मात्राएँ लें देख।
'सलिल' 'त्रिकल' दोहा रचें, शुद्ध बने अभिलेख।।


दोहे के इस प्रकार में 9 गुरु + 30 लघु = कुल 39 अक्षर होते हैं, जिनकी कुल मात्राएँ 9 x 2 = 18 + 30 = 48 होती हैं।

उदाहरण:

1. सुख-दुःख दो पद, रात-दिन, चरण चतुर्युग चार।
तेरह-ग्यारह विषम-सम, दोहा विधि अनुसार।। -सलिल

2. तन-मन यदि परवश हुआ, गँवा मान-सम्मान।
जीवन-मरण समान तब, सुमिर आत्म-अभिमान।। -सलिल

3. विषम चरण के अंत में, रखिये 'सनर' अवश्य।
'जतन' अंत सम चरण का, सार्थक कर कवि-कथ्य।। - सलिल

4. घट-घट भरी उदासियाँ, पनघट-पनघट प्यास।
गुमसुम-गुमसुम खेत हैं, पगडंडियाँ उदास।। -डॉ. रामसनेही लाल शर्मा 'यायावर'

5. गज त्यौं सुमिरौं हरि तुम्हें, हम सुमिरें केहि काज?
हम गजगामिन हेतु हरि, तुमहुँ बनत जब ग्राह।। -अम्बिकाप्रसाद 'दिव्य'

6. कटि तनु भरे सुजंघ जुग, सब तन भरे उमंग।
खिलत जवानी पाइ मनु, खिलत रहत से अंग।। -रामचरित उपाध्याय

7. अगल-बगल, मुद-थल जुगल, अति कल इहिं बल पाय।
ताकत तिरिछेयी अहैं, सूधे को न बनाय।। - डॉ. राजेश दयालु 'राजेश'

8. नचत स्याम थिरकत पगनि, दलि दुःख-दल करि कुंठ।
दीन्यौ इक इक हिलनि मैं, एक-एक बैकुंठ।। - डॉ. राजेश दयालु 'राजेश'


उक्त दोहों में गुरु-लघु मात्राओं के संयोजन में चरणों या पदों का कोई प्रतिबन्ध नहीं है। किसी भी चरण या पद में मात्राएँ आवश्यकता के अनुसार हो सकती हैं किन्तु पूरे दोहे में 9 गुरु व 30 लघु मात्राएँ होना अनिवार्य है।

विविध काल के दोहकारों के उक्त उदाहरणों में मात्राओं के संयोजन की विविधता देखें किन्तु शब्दावली या भाषा सम-सामयिक ही रखें ताकि पाठक पढ़कर समझ और रस ले सकें।

आगामी लेख मालाओं में दोहों में गुरु मात्रा की संख्या क्रमशः कम होंगी और ऐसे दोहों की रचना के लिए छंद और भाषा पर अधिक अधिकार आवश्यक है। दोहा संग्रहों में भी ऐसे दोहे कम ही मिलते हैं। प्रयास यही है कि पर्याप्त संख्या में उदाहरण दिए जा सकें ताकि विविधता पर दृष्टि जा सके. पाठक भी ऐसे दोहे भेजें तो उन्हें भेजनेवाले के नाम सहित सम्मिलित किया जाएगा।

आगामी अंश में 8 गुरु + 32 लघु मात्राओं के कच्छप दोहे पर चर्चा होगी। पाठक स्वयं के अथवा अन्यों के लिखे त्रिकल और कच्छप दोहे दोहाकार के नाम सहित भेजें।

दोहा गाथा सनातन- 22- दोहा रचना मान है


वानर अथवा पान है, दोहा का नव भेद।
पढें समझ रचिए इसे, मन में रहे न खेद।।
दस गुरु अट्ठाईस लघु, वानर सा व्यवहार।
रंग मान के पान सा, जग होता बलिहार।।

मत पूछो यह किस तरह, बीती उसकी रात।
बदल-बदलकर करवटें, उसने किया प्रभात।। -प्रो. देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र'

दोहा युग की चेतना, जनगण-मन का मीत।
मिलन-विरह, सुख-दुःख, सृजन, परिवर्तन की रीत।। -सलिल

अगनित मुनि औ' देव हैं, अगनित दानव-यक्ष।
अगनित सागर रत्न हैं, अगनित पक्ष-विपक्ष।। -रामस्वरूप बृजपुरिया

मौसम, खुशियाँ, तितलियाँ, बतरस, मिलन, मिठास।
कल तक सब त्यौहार थे, आज हुए इतिहास।। - राधेश्याम शुक्ल

बदल गए सब रूप अब, बदल गए सब रंग।
सरबन अब अपनी कथा, ले जा अपने संग।। -सोम ठाकुर

नहर फाँदकर शिखर पर, लिखकर अपना नाम।
चुप नौ-दो-ग्यारह हुई, आँख मूँदकर शाम।। - श्रीकृष्ण शर्मा

दोहा गाथा सनातन- 21 - दोहा में कस-बल बहुत


दोहा में कस-बल बहुत, लेकिन लघु आकार.
रचता नव इतिहास यह, साक्षी है संसार.

ग्यारह गुरु छब्बीस लघु, चल या बल दो नाम.
बिम्ब भाव रस-त्रिवेणी, दस दिश व्यापा नाम..

रजकण की महिमा अनत, अतुल धरम-विस्तार.
धरती के परमाणु की, महिमा अपरम्पार.. -शंकर सक्सेना

महुआ महका, पवन में सुरभित मंजुल राग.
सदा सुहागन वन्य श्री, वर ऋतुराज सुहाग.. - संजीव 'सलिल'

जनगण-मन को मुग्धकर, करे ह्रदय पर राज्य.
नव रस का यश कलश है, दोहों का साम्राज्य.. - संजीव 'सलिल'

परिवर्तन तो है नियम, उस पर क्या आवेश.
जब भी बदला है समय, बदल गया परिवेश.. -चंद्रसेन 'विराट'

दीरघ अनियारे सुगढ़, सुन्दर विमल सुलाज.
मकर छबी, बाढह मनो, मैन सुरूप जहाज.. - सूरदास मदन मोहन

चम-चम विद्युद्दाम हैं, तड़क रहे ललकार.
या अनंत-फ़ण कर उठे, उठ ऊपर फुंकार.. -डॉ.अनंतराम मिश्र 'अनंत'

दोहा गाथा सनातन: 20- दोहा पावन पयोधर


दोहा पावन पयोधर, दे मन को आनंद.
बारह-चौबिस गुरु-लघु, छत्तीस मात्रिक छंद..

जिस दोहे में बारह गुरु तथा चौबिस लघु कुल ३६ मात्राएँ हों उसे पयोधर कहते हैं।

उमस, घुटन, सीलन भरी, लोग खड़े निर्वात।
खूब गरजते मेघ तुम तब होती बरसात।। - डॉ. भारतेंदु मिश्र
भाषा अम्बर भाव् शशि, पिंगल है ऋतुचक्र।
तारक उपमा, जलद रस, तडित्छटा गण वक्र।।
रीति-नीति, युग-बोध नव, पुरा-पुरातन सत्य।
शिव-सुन्दर कर कह रहा, दोहा छंद अनित्य।।

द्वैताद्वैत, सगुण-निगुण, ज्ञान-प्रेम दिन-रात।
विविध मतों का तिमिर हर, दोहा करे प्रभात।।
सबा-सलिल शीतल-विमल, मिले नर्मदा-तीर।
सफल सदा हो साधना, नर हो ऋषि-गुरु-पीर।।

अगली कड़ी में मिलिए 'बल' दोहा से-

दोहा गाथा सनातन: 19 दोहा छंद-दिनेश


गीति काव्य रस-गगन में, दोहा छंद-दिनेश.
अन्य छंद शशि-तारिका, वे सुर द्विपदि सुरेश..- गयंद
धर्म नीति आचार का, दोहा अमिट प्रमाण.
मिलन-विरह, बदलाव फिर, ध्वंस-पुनर्निमाण....- गयंद
द्वैताद्वैत, सगुण-निगुण, ज्ञान-प्रेम, दिन-रात.
विविध मतों का मन मिला, दोहा करे प्रभात...-गयंद
दोहा मात्रिक छंद है, तेईस विविध प्रकार.
तेरह-ग्यारह दोपदी, चरण समाहित चार....- गयंद
विषम चरण के आदि में, जगण विवर्जित मीत,
दो शब्दों में 'जगण' की, अनुमति दोहा-रीत...- गयंद
एक घटे गुरु-दो बढ़ें लघु- हो नया प्रकार.
कुल अड़तालीस मात्रा, दोहा विधि अनुसार....- गयंद
तेरह गुरु-बाईस लघु, वर्ण रहें पैंतीस.
रच गयंद कवि सुखी हों, मन में रहे न टीस..-गयंद

गयंद दोहे में तेरह गुरु तथा २२ लघु, इस तरह कुल ३५ वर्ण होते हैं. गयंद के उक्त उदाहरण देखें और अभ्यास करें. गयंद को मदुकल भी कहते हैं.

दोहा के विविध प्रयोगों के अर्न्तगत यह भी जान लें की दोहा शुभ कामना देने का माध्यम भी है. २ जून को दोहा-कक्षा के होनहार छात्र मनु बेतखल्लुस और उनकी जीवनसंगिनी उमा जी के परिणय की वर्ष-ग्रंथि है. दोहा हमारा दूत बन कर उन्हें शुभ-कामना दे रहा है-

प्रथा सनातन-पुरातन, चिर नवीन शुभ रीत.
पुरुष-प्रकृति का मिलन ही, सत्य-चिरन्तन प्रीत.
द्वैत मिटा, अद्वैत वर, दो तन-मन हों एक.
उमा और मनु शिवा-शिव, रचें सृष्टि निज नेक..
दोहा-गाथा को मिला मनु जी का सहयोग.
दोहा की खोजी बहर, यही शारदा-भोग..
चन्द्र-चन्द्रिका सम सदा, पूरक बन रह साथ.
उमा और मनु सौ बरस, जियें उठाये माथ.
हिन्दयुग्म-दोहा रहे, दोनों को आशीष.
सलिल-साधना स्नेह लाख, हों कृपालु जगदीश..

अगले सत्र में पयोधर और बल दोहा से परिचय प्राप्त करेंगे हम सब.

दोहा गाथा सनातन: 18- शब्द-सूर्य अज्ञान तम


सूर्य अस्त हो या उदय, देता है संदेश.
तम पी जग उजियार दे, मिलती खुशी अशेष..
शब्द-सूर्य अज्ञान तम, का करता है नाश.
नेह-नर्मदा बन 'सलिल', तब छू मन-आकाश..

दोहा के उद्भव, विकास, प्रभाव, सृजन, प्रकार तथा उपयोग पर दोहा गाथा में लगातार हम चर्चा कर रहे हैं. पत्र, सन्देश, प्रतिक्रिया, नव छंद निर्माण के पश्चात् इस सत्र में देखिये दोहा का एक नया प्रयोग

दोहा संग्रह की दोहा समीक्षा
(कृति विवरण: होते ही अंतर्मुखी, दोहा संग्रह, दोःकर: स्वामी श्यामानंद सरस्वती 'रौशन', पृष्ठ ११२, सजिल्द, बहुरंगी आकर्षक आवरण, १५० रु., आकार डिमाई, विद्या भगत प्रकाशन, रानी बाग, दिल्ली ३४.)

विश्व वांग्मय में नहीं, दोहा जैसा छंद.
छंदराज यह सूर्य सम, हरता तिमिर अमंद..
जन-जीवन पर्याय यह, जन-मानस का मित्र.
अंकित करता शब्दशः आँखों देखे चित्र..
होते ही अंतर्मुखी, दोहा रचिए आप.
बहिर्मुखी हो देखिये, शांति गयी मन-व्याप..
स्वामी श्यामानंद ने, रौशन शारद-कोष.
यह कृति देकर किया है, फिर दोहा- जयघोष..
सारस्वत वरदान सम, दोहा अद्भुत छंद.
समय सारथी सनातन, पथ दर्शक निर्द्वंद..
गीति-गगन में सोहता, दोहा दिव्य दिनेश.
अन्य छंद सुर किन्तु यह, है सुर-राज सुरेश..
सत्-चित-आनंद मन बसे, सत्-शिव-सुन्दर देह.
शेष अशेष विशेष है, दोहा निस्संदेह..
दो पद शशि-रवि, रात-दिन, इडा-पिंगला जान.
बना स्वार्थ परमार्थ को, बन जा मन मतिमान..
स्वामी श्यामानंद को है सरस्वती सिद्ध.
हर दोहा-शर कर रहा, अंतर्मन को बिद्ध..
होते ही अंतर्मुखी, रौशन हुआ जहान.
दीखता हर इन्सान में बसा हुआ भगवान्..
हिंदी उर्दू संस्कृत पिंगल में निष्णात.
शब्द-ब्रम्ह आराधना, हुई साध्य दिन-रात..
दोहा-लेखन साधना, करें ध्यान में डूब.
हर दोहा दिल को छुए, करे प्रभावित खूब..
पढिये-गुनिये-समझिये, कवि के दोहे चंद.
हर दोहे की है अलग, दीप्ति-उजास अखंड..
''दोहा कहना कठिन है, दुष्कर है कवि-कर्म.
कितनों को आया समझ, दोहे का जो मर्म..''--पृष्ठ १७
''दोहा कहने की कला, मत समझो आसान.
धोखा खाते हैं यहाँ, बड़े-बड़े विद्वान्..'' -''--पृष्ठ १७
सरल-शुद्ध शब्दावली, सरस उक्ति-माधुर्य.
भाव, बिम्ब, लय, कथ्य का, दोहों में प्राचुर्य..
''दोहे में मात्रा गिरे, है भारी अपराध.
यति-गति हो अपनी जगह, दोहा हो निर्बाध..''--पृष्ठ १७
प्रेम-प्यार को मानते, हैं जीवन का सार.
स्वामी जी दे-पा रहे, प्यार बिना तकरार..
''प्यार हमारा धर्म है, प्यार दीन-ईमान.
हमने समझा प्यार को, ईश्वर का वरदान..''--पृष्ठ २२
''उपमा सच्चे प्रेम की, किससे दें श्रीमान?
प्रेम स्वयं उपमेय है, प्रेम स्वयं उपमान..''--पृष्ठ २१
दिखता रूप अरूप में, है अरूप खुद रूप.
द्वैताद्वैत भरम मिटा, भिक्ष्क लगता भूप..
''रूप कभी है छाँव तो, रूप कभी है धूप.
जिससे प्रगत रूप है, उसका रूप अनूप''--पृष्ठ २४
स्वामी जी की संपदा, सत्य-शांति-संतोष.
देशप्रेम, सत् आचरण, संयम सुख का घोष..
देख विसंगति-विषमता, कवि करता संकेत.
सोचें-समझें-सुधारें, खुद को खुद अभिप्रेत..
''लोकतंत्र में भी हुआ, कैसा यह उपहास?
इंग्लिश को कुर्सी मिली, हिंदी को वनवास..''--पृष्ठ २७
''राजनीति के क्षेत्र में सबके अपने स्वार्थ.
अपने-अपने कृष्ण हैं, अपने-अपने पार्थ..''--पृष्ठ ३८
''ले आया किस मोड़ पर सुन्दरता का रोग.
देह प्रदर्शन देखते आंखें फाड़े लोग..''--पृष्ठ ४३
''कैसे इनको मिल गया, जनसेवक का नाम?
खून चूसना ही अगर, ठहरा इनका काम..''--पृष्ठ ५३
शायर सिंह सपूत ही, चलें तोड़कर लीक.
स्वामी जी काव्य पढ़, उक्ति लगे यह ठीक..
''रोती रहती है सदा, रात-रात भर रात,
दिन से होती ही नहीं, मुलाकात की बात..''--पृष्ठ ६२
कवि कहता है- ''व्यर्थ है, सिर्फ किताबी ज्ञान.
करना अपने ढंग से, सच का सदा बखान..'
''भौंचक्के से रह गए द्वैत और अद्वैत.
दोनों पर भारी पड़ा, केवल एक लठैत..''--पृष्ठ ६४
''मँहगा पड़ता है सदा, माटी का अपमान.
माटी ने माटी किया, कितनों का अभिमान..''--पृष्ठ ८३
'गंता औ' गन्तव्य का, जब मिट जाता द्वैत.
बने आत्म परमात्म तब, शेष रहे अद्वैत..
''चलते-चलते ही मिला, मुझको यह मन्तव्य.
गंता भी हूँ मैं स्वयम, और स्वयं गन्तव्य..''--पृष्ठ ११०
दोहे श्यामानंद के, 'सलिल' स्नेह की धार.
जो पड़ता वह डूबता, डूबा लगता पार..
अलंकार, रस, बिम्ब, लय, भाव भरे भरपूर.
दोहों को पढ़ सीखिए, दोहा छंद जरूर..
दोहा-दर्पण दिखाता, 'सलिल'-स्नेह ही सत्य.
होते ही अंतर्मुखी, मिटता बाह्य असत्य..
रचिए दोहे और भी, रसिक देखते राह.
'सलिल' न बूडन से डरे, बूडे हो भव-पार..

सम-सामयिक श्रेष्ठ दोहा संग्रहों में से एक यह कृति हर दोहप्रेमी को रचेगी.
कोइ प्रश्न या शंका न होने से गोष्ठियों का क्रम भंग किया जाता है. प्रश्नों के उत्तर सम्बंधित पाठ की टिप्पणी अथवा अगले पाठ में दिए जाते रहेंगे.
अगले पाठ में दोहे के कुछ और प्रकारों से परिचित होंगे.. तब तक नमन.