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दोहा गाथा सनातन: 25 रचें मच्छ दोहा मधुर


मच्छ दोहा: ७ गुरु + ३४ लघु = ४१ मात्राएँ

जिस दोहे के चारों चरणों या दोनों पदों में ७ गुरु तथा ३४ लघु कुल ४१ मात्राएँ होती हैं, उसे मच्छ दोहा कहा जाता है.

उदाहरण:

१. जहि मन पवन न संचरई, रवि-ससि नाहि पवेस.
तहि बढ़ चित्त बिसाम करु, सरहे कहिय उवेस.-सरहपा, संवत ६८०

२.हिय निर्गुन नयननि सगुन, रसना नाम सुनाम.
भनहुँ परट, संपुट लखत, तुलसी ललित ललाम. -तुलसीदास

३. परम धरम निर्मल करम, भरम न मन में पाल.
अमर-अजर सब कुछ नहीं, जगत काल के गाल. -आचार्य रामदेव लाल 'विभोर'

४. ह्रदय-कमल पर छा गए, कमलनयन जदुनाथ,
जीवन कमल अमल किये, कमल-कमल का साथ. -डॉ. राजेश दयालु 'राजेश'

५. हँसत बोल, बोलति हँसी, हँसि बोलत नन्दलाल.
लखि-लखि दृग, सुनि-सुनि स्रवन, गुनि-गुनि जोय निहाल. -डॉ. राजेश दयालु 'राजेश'
नंदलाल में 'न' के पर चन्द्रबिंदी, लघुमात्रा है.

६. चटक-मटक कि तड़क-भड़क, अटक-भटक कि निहार.
मैं तुझ पर बलिहार हूँ, किसी कि सभी प्रकार. -डॉ. राजेश दयालु 'राजेश'

७. कम्पित कदम कदम्ब तक, पहुँचे-संकुचे मौन.
छमछम चुप, धड़कन मुखर, परबस सुनता कौन. -सलिल (संकुचे में 'च' पर चन्द्रबिंदी, लघु मात्रा)

दोहा में गुरु मात्रा के घटने के साथ-साथ उनका रचना-कर्म कठिन होता जाता है. यदि बिना मात्रा के अक्षर मात्र से बनानेवाले शब्दों का प्रयोग अधिक से अधिक करें तो इन दोहों को रचना सहज होगा.
सभी सहभागी, जो किसी कारण से कम सक्रिय हैं इन प्रकारों ओके सिद्ध करने से न चूकें. जो दोहाकार इन प्रकारों को रच पता है उसे पूर्व के दोहे रचना सुगम हो जाता है.

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