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Friday, December 12, 2008

मात्राओं को गिनने का मामला समझ में न आये तो बहुत उलझा है, समझ में आ जाये तो बहुत आसान है


ग़ज़ल की कक्षाएं किसी मुकाम पर पहुंचें उसके पहले ही ऐसा कुछ हो जाता है कि काफिला रुक जाता है। इस बार भी ऐसा ही कुछ हुआ है सब कुछ शुरू होने को ही था कि पूज्‍यनीय दादीजी का स्‍वर्गवास हो गया । और उसके बाद फिर हमारे प्रदेश में चुनाव आ गये । पत्रकारिता से जुड़ा होने के कारण चुनाव को लेकर व्‍यस्‍तता हो ही जाती है तिस पर ये कि मुख्‍यमंत्री का चुनाव हमारे ही जिले की एक सीट से होने के कारण हमारा जिला खबरों में बना रहा। अब जाकर कहीं थोड़ा सा आराम मिला है। शैलेश जी का मेल मिला तो याद आया कि अरे आज से तो कक्षाएं प्रारंभ करने का वादा था। मेरे कवि मित्र ब्‍लाग पर पोस्‍ट में जो वर्ड वेरिफिकेशन लगा है उसके कारण काम मुश्किल हो गया है। शैलेश जी ने बताया कि ये ब्‍लागर की ओर से ही लगाया गया है। दरअस्‍ल में मेरे जैसे लोग जो कि विंडोज लाइव रायटर पर काम करते हैं उनके लिये ये परेशानी वाला काम है क्‍योंकि हम लोग तो ब्‍लागर पर साइन ही नहीं करते, जो कुछ भी करना होता है वो वही रायटर में लिख कर पोस्‍ट लगा देते हैं। खैर चलिये हम काम प्रारंभ करते हैं। ग़ज़ल की कक्षाओं को हमने कहीं पर छोड़ा था वहीं से हमको सिरा पकड़ना है । मुझे नहीं मालूम कि कहां पर क्‍या छूटा था और क्‍या हो चुका था मगर प्रयास रहेगा कि सिरा ठीक प्रकार से पकड़ लिया जाये।

आज ही अपने एक मित्र डॉ कैलाश गुरू स्‍वामी का फोन आया कहने लगे कि पंकज एक अच्‍छा शेर निकला है सुनो
अल्‍लाह दस्‍ते नाज़ की नाज़ुक सी उंगलियां
उस पर गुलाबे इत्र की ख़ुश्‍बू का बोझ है
स्‍वामी जी ने सुबह को इस मलमल के समान नाजुक और महीन शेर से ख़ुशनुमा बना दिया। हालंकि इस प्रकार के शेर और ये कहन अब विलुप्‍त होते जा रहे हैं। अब ग़ज़ल कुछ कठोर होती जा रही है। ग़ज़ल से नफ़ासत और नज़ाकत दोनों ही समाप्‍त होती जा रही हैं ।
आज हम एक ऐसे विषय से प्रारंभ करते हैं जो कि पहले हमने केवल चर्चाओं में लिया है उस पर कभी बात विस्‍तार से कुछ नहीं कहा। एक समस्‍या जो कि कई सारे लोगों के सामने आती रही है वो ये है कि मात्राओं को गिना किस प्रकार जाये। दूसरा ये कि दीर्घ मात्रा को लघु और कभी दीर्घ ही माना जाता है ऐसा कैसे होता है। दरअस्‍ल ग़ज़ल में गिनने का तरीका कुछ अलग है यहां पर दो लघु मिलकर एक दीर्घ बन जाते हैं और कभी ऐसा भी होता है कि दोनों नहीं मिलते अलग-अलग ही रहते हैं। यहां पर कभी ऐसा होता है कि एक दीर्घ को कभी तो दीर्घ में ही गिना जाता है और कभी ऐसा होता है कि उसको लघु मान लिया जाता है। ये दरअस्‍ल में मात्रओं के उच्‍चारण के कारण होता है। ग़ज़ल को जब बनाया गया तो इसको आम बोल-चाल के वाक्‍यों से ही बनाया गया है। इसीलिये हम देखते हैं कि ग़ज़ल में बातचीत का लहज़ा जितना अधिक होता है वो ग़ज़ल उतनी ही लोकप्रिय होती है। कहीं-कहीं ग़ज़ल का अर्थ कहा जाता है ''महबूबा से बातचीत'' और इसीलिये ग़ज़ल में मात्राओं की गणना इसी आधार पर की जाती है कि उन मात्राओं को उच्‍चारण कैसे किया गया था। उच्‍चारण करते समय अगर किसी दीर्घ मात्रा पर हम रुके अर्थात उस पर वज़न दिया तो वो दीर्घ ही रही। किन्‍तु यदि किसी दीर्घ पर हम नहीं रुके जल्‍दी से उसको पढ़कर गुज़रे तो वो लघु में गिन ली जाती है। कुल मिलाकर ये बात ग़ज़ल के प्रकरण में महत्‍वपूर्ण है कि ग़ज़ल सुनाते समय ही आनंद देती है। क्‍योंकि लिखने वाले को पता होता है कि कहां मात्रा गिरी है और कहां पर नहीं ।
ग़ज़ल की अगर बात करें तो मतले के पहले मिसरे में जो वज्‍न आ गया, उसके बाद पूरी की पूरी ग़ज़ल में वही का वहीं वज्‍न आना है। अब आप उसको बदल नहीं सकते हैं। अगर आपने बदला तो मिसरा बहर से बाहर हो जायेगा। मात्राओं का जो क्रम आपने पहले मिसरे में तय कर लिया वह ग़ज़ल की बहर हो गई है। ये जो मात्राओं का विन्‍यास है। उसी को बहर कहा जाता है। ये विन्‍यास भी पूर्व निर्धारित हैं। जैसे कि एक मिसरा है '' सजा कर ज़ुल्‍फ़ में तारे पहन कर चांदनी निकलो'' अब इसमें मात्राओं का विन्‍यास क्‍या है ये देखें । स 1, जा 2, कर 2, ज़ुल्‍ 2 ( अगर आप देखें तो यहां पर एक भंग आता है अर्थात आप यहां पर रुक जाते हैं इसका मतलब ये है कि आपका रुक्‍न पूरा हो गया 1222) फिर फ 1, में 2 ता 2 रे 2 (यहां पर हम फिर रुकते हैं अर्थात पुन: रुक्‍न पूरा हो गया रुक्‍न का अर्थ होता है मात्राओं का एक समूह 1222) प 1 हन 2 कर 2 चां 2 ( यहां पर तीसरा रुक्‍न पूरा हो गया है क्‍योंकि आप यहां रुक गये हैं 1222 ) द 1 नी 2 निक 2 लो (और ये था अंतिम रुक्‍न 1222 ) । इसका मतलब ये है कि आपके मिसरे का वज्‍न है 1222-1222-1222-1222 अब आपको आगे इसी मिसरे पर काम करना है । ये जो मिसरा मैंने दिया है ये कुमार विश्‍वास के मुक्‍तक 'कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है' की वज़न पर है। दरअसल में कुमार विश्‍वास जी के वो सारे मुक्‍तक पूरी तरह से बहर में हैं और इसीलिय सुनने में आनंद देते हैं। उसी मुक्‍तक को गायें तो आपको मात्राओं का खेल समझ में आयेगा। गाते समय याद रखें कि जो चार लाइनें मैंने लिखी हैं नीचे मिसरे को वैसे ही पढ़ें अर्थात ''कोई दीवा'' पढ़कर रुक जायें फिर ''ना कहता है'' पढ़कर रुक जायें विश्राम के बाद आगे का रुक्‍न पढ़ें ''कुई पागल'' और फिर रुक कर पढ़ें '' स मझ ता है '' । दस पंद्रह बार पढ़ें आपको मात्राओं का खेल समझ में आ जायेगा।
कु ई दी वा ( कोई का को लघु में गिना जा रहा है क्‍योंकि उसका उच्‍चारण कुई आ रहा है )
न कह ता है ( ना लघु में गिना जा रहा है क्‍योंकि पढ़ते समय केवल न की ध्‍वनि आ रही है )
कु ई पा गल (कुई पागल )
स मझ ता है
आज के लिये इतना ही ये केवल और केवल प्राथमिक जानकारी है। अगर समझ में नहीं आये तो चिंता न करें हम आगे इसको विस्‍तार से समझने की कोशिश करेंगे। जो लोग गुनगुना लेते हैं गा लेते हैं उनके लिये ये समझना आसान होगा। चलिये मिलते हैं अगली कक्षा में ।

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12 कविताप्रेमियों का कहना है :

नीरज गोस्वामी का कहना है कि -

गुरुवर प्रणाम...आप आए बहार आयी...बहुत दिलचस्प चर्चा शुरू की है आपने...कई बार किसी की ग़ज़ल पढ़ते वक्त अंदाजा नहीं लगता की इसकी बहर क्या है...सब अभ्यास का खेल है...करते रहो और सीखते रहो...जितना सीखो लगता है अभी बहुत बाकी है...सतपाल जी ने भी एक श्रृंखला शुरू की साहित्य शिल्पी और और आप ने यहाँ...याने ग़ज़ल सीखने वालों की सचमुच में इन दिनों चांदी है... वाह.
नीरज

sahil का कहना है कि -

are waah gurudev,kakshayein fir se shuru ho gai jaankar khushi hui,haalanki ye gajal naamak vidha mere liye kisi DEAGON se kamtar nahin,par fir bhi...........
ALOK SINGH "SAHIL"

संजीव सलिल का कहना है कि -

आचार्य संजीव 'सलिल', सम्पादक दिव्य नर्मदा शोध साहित्यिकी
सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम
संजिव्सलिल.ब्लागस्पाट.कॉम संजिव्सलिल.ब्लॉग.सीओ.इन

आत्मीय!
वंदे मातरम.
आपके ग़ज़ल के पाठों से शुरू ले जुड़ा हूँ. बीच-बीच में कुछ कहता भी रहा. आपने मात्राओं की चर्चा कर बहुत अच्छा किया. नए रचनाकारों को यहीं भ्रम और कठिनाई होती है. हिन्दी और उर्दू में मात्रा गणना के नियमों में क्या फर्क है? इस पर रौशनी ज़ुरूर डालिए. लघु को गुरु और गुरु को लघु जिन शेरों में उपयोग किया गया हो उनके कुछ नमूने देना उपयोगी होगा. एक ही पंक्ति को हिन्दी और उर्दू के नियमों से गिनने पर अन्तर कैसे आता है यह भी उदाहरण सहित बताइये.

आपके शानदार और जानदार काम के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया.

रविकांत पाण्डेय का कहना है कि -

गुरूदेव ने कक्षाएँ शुरू कर दी, अत्यंत हर्ष की बात है। पोस्ट पढ़कर सुखद अनुभूति हुई।

sumit का कहना है कि -

गुरू जी,
शैलेश जी से फोन पर बात की तो उन्होने बताया था आपकी दादी जी का स्वर्गवास हो गया था
मै आपकी दादी जी की आत्मा की शान्ति के लिए भगवान से प्राथना करता हूँ।
आज की कक्षा मे कुछ ज्यादा समझ नही पाया, शायद अभी मुम्बई हादसे का दर्द दिल मे है

सुमित भारद्वाज

"अर्श" का कहना है कि -

गुरूजी सदर प्रणाम,
आपकी दादी के आत्मा के शान्ति के लिए भगवान से प्रार्थना करता हूँ . हाँ मुझे पता है इस हादसे के बारे में मेरी आपसे बात हुई थी , आपका पोस्ट मैंने पढ़ी बहोत ही बढ़िया है ये तो सहेजने के लायक है ,मात्रावों के बारे में बहोत ही बढ़िया जानकारी दी आपने ...

आभार

अर्श

"अर्श" का कहना है कि -

गुरु जी माफ़ कीजियेगा दादी जी की आत्मा की शान्ति के लिए भगवान से प्रार्थना करता हूँ ...

तपन शर्मा का कहना है कि -

अभी तो कुछ खास समझ नहीं आया... हाँ उदाहरण जब ज्यादा होंगे तब समझ में आने लगेगा.. जो भी गज़ल मिलेगी, अब तो उसमें मात्रायें खोजी जायेंगी। अब तक काफिये और रदीफ में लगे रहते थे।
अगली कक्षा का इंतज़ार रहेगा

Yogesh का कहना है कि -

गुरुजी,

गज़ल की कक्षायें दोबारा से शुरू हो गयी, जान कर अति प्रसन्नता हुई।
मात्राओ को गिन्ना अभी तो बहुत अच्छे से नही आता, हां मगर अब मेरी सारी गज़लों मे काफ़िया बिल्कुल सही बैठता है। अभ्यास के साथ मात्राओ को भी गिन्ना सीख जाऊँगा।
बस कभी कभी शब्दों और विचारों की कमी खलती है। उसके लिये भी कोई उपाय बतायें।

गौतम राजरिशी का कहना है कि -

गुरूजी को चरण-स्पर्श!

गज़ल-कक्षा पुनः शुरू हुई और बेचैन मन को शांति मिली..

इस लघु-दिर्घ के खेल पे एक शक था कि दिर्घ तो अक्सर जरूरत के मुताबिक गिर कर लघु हो जाता है,किन्तु क्या ये छूट है लघु उठ कर दिर्घ बन जाय?जैसे "दीवार" या "दीवाना" के साथ जैसे हम कर सकते हैं,क्या अन्य शब्दों के साथ भी कर सकते हैं क्या?मसलन "हुआ" , "किया" , लिया"-क्या इन शब्दों के साथ "दीवार’ जैसी स्वतंत्रता है?

©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah) का कहना है कि -

गुरुजी,
आपकी कक्षाओं का अधययन करके निम्नलिखित गज़ल लिखी है । आपका आभार होगा यदि आप इसमें पाई गई कमियों को बतायें ताकि मैं अपनी गज़लों में निखार ला सकुँ ।

लगे इल्ज़ाम सौ-सौ, कोई भी सुनवाई न हुई,
उन्हे तो कत्ल करके भी कभी रुसवाई न मिली !

हुए कुर्बान उनपे हम बिना ही शर्त के यारो,
उन्होने ज़ख्म सहलाने की ज़हमत भी नहीं करी,

ये माना बार-बार गल्तियाँ दोहराई हैं मैंने,
खुदा का बँदा हूँ मुझमें खुदाई तो नहीं भरी !

नहीं डरना है वाजिब चोट से मिलता है दर्द ग़र,
हुए रौशन अँधेरे बिन दीया जलने के हैं कभी,

कोई जाने ये कैसे कौन अपना है, पराया है,
कोई प्यारी सी शै खो दें, होता इल्म है तभी

डा0अनिल चड्डा
anilkr112@gmail.com

Suman Dubey का कहना है कि -

गुरुजी,प्रणाम आपके पाठशाला की नयी विद्याथी हू मात्राओं को गिनने का सबक अच्छा है

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