फटाफट (25 नई पोस्ट):

कृपया निम्नलिखित लिंक देखें- Please see the following links

28 दिसम्बर 2008 को हिन्द-युग्म मनाएगा वार्षिकोत्सव (मुख्य अतिथि- राजेन्द्र यादव)


हिन्द-युग्म के साथ सीखिए ब्लॉग बनाना और हिन्दी में टाइप करना।
मिलिए ख्याति प्राप्त साहित्यकारों से, सुनिए काव्य पाठ
॰॰॰॰ और भी बहुत कुछ



भाषा प्रेमियो,

Vivran Dekhane ke liye is poster par click karen
विवरण देखने के लिए ऊपर के चित्र पर क्लिक करें
जैसाकि हमने २७ अक्टूबर २००८ को उद्घोषणा की थी कि इस साल के अंत में हम चार पाठकों को 'हिन्द-युग्म पाठक सम्मान २००८' से सम्मानित करेंगे। यद्यपि यह सम्मान तो पिछले साल से ही दिया जा रहा है, लेकिन इस बार हमने तय किया था कि इस सम्मान को एक समारोह में चोटी के साहित्यकारों के हाथों दिलवायेंगे।

तो मित्रो, हम उपस्थित उन चार पाठकों के नाम लेकर जिन्हें आने वाले २८ दिसम्बर के कार्यक्रम 'हिन्द-युग्म वार्षिकोत्सव २००८' में गणमान्य साहित्यकारों के हाथों यह पुरस्कार दिया जाना है। साथ में बहुत सी गतिविधियाँ और होंगी जिसकी रूपरेखा लेकर हम उपस्थित हुये हैं।

वर्ष २००८ में जिन चार पाठकों ने हिन्द-युग्म को सबसे अधिक पढ़ा, वे हैं-

आलोक सिंह 'साहिल'
दीपाली मिश्रा
पूजा अनिल, और
सुमित भारद्वाज

इन चारों पाठकों के हस्ताक्षर हिन्द-युग्म के सभी मंचों की अधिकाधिक प्रविष्टियों पर उपलब्ध हैं। उपर्युक्त चार पाठकों को २८ दिसम्बर २००८ को धर्मवीर संगोष्ठी कक्ष ( तृतीय तल, हिन्दी भवन, आई टी ओ, दिल्ली) में प्रशस्ति-पत्र, स्मृति चिह्न और पाँच-पाँच पुस्तकों का बंडल दिया जायेगा।

((स्मृति चिह्न और पुस्तकों का बंडल प्रयास-ट्रस्ट की ओर से दिया जायेगा)

जिन गणमान्य लोगों के सानिध्य में यह कार्यक्रम होगा, उनके नाम हैं-

मुख्य अतिथि- राजेन्द्र यादव (प्रख्यात साहित्यकार तथा 'हंस' के संपादक)

Vivran Dekhane ke liye is poster par click karen
विवरण देखने के लिए ऊपर के चित्र पर क्लिक करें
अतिथिगण-
1. प्रोफेसर भूदेव शर्मा [90 के दशक में अमेरिका और उसके आस-पास हिन्दी साहित्य का प्रचार-प्रसार करने में अग्रणी, विश्वविवेक के पूर्व संपादक, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त गणितज्ञ (क्लार्क अटलांटा विश्वविद्यालय, अटलांटा में गणित के पूर्व प्राध्यापक), World Assn. for Vedic Studies (WAVES) के संस्थापक तथा भूतपूर्व अध्यक्ष, हिन्दू-यूनिवर्सिटी ऑफ अमेरिका (ऑरलाण्डो) के पूर्व कुलपति, अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी संस्था 'हिन्दी-निधि' के संस्थापक और वर्तमान में जे॰पी॰ सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान, नोएडा में गणित के प्रोफेसर]

2. डॉ॰ सुरेश कुमार सिंह [सदस्य कपार्ट, ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार, डायरेक्टर-एडमिनिस्ट्रेशनः BBS मैनेजमेंट और फॉर्मेसी संस्थान, ग्रेटर नोएडा, उ॰प्र॰]

3. अनामिका [केदार सम्मान 2007 से सम्मानित स्त्रीवादी लेखिका, समकालीन चार शीर्ष कवयित्रियों में शुमार]

4. अभिषेक कश्यप [प्रसिद्ध युवा कहानीकार, नया-ज्ञानोदय के पूर्व सह संपादक और एक राजनैतिक-पत्रिका राज-सरोकार के मुख्य सह-संपादक]

5. पंकज सुबीर [युवा कथाकार, ग़ज़ल शिक्षक]

कार्यक्रम के संचालकः डॉ॰ श्याम सखा श्याम (हरियाणा के वरिष्ठ साहित्यकार तथा साहित्यिक-त्रैमासिक ‘मसि-कागद’ के संपादक)।

पाठकों को सम्मानित करने के अतिरिक्त एक विशेष आयोजन 'सरल हिन्दी (यूनिकोड) टाइपिंग और ब्लॉग-मेकिंग' का पॉवर पॅवाइंट प्रीजेंटेशन भी होगा, जिसे प्रस्तुत करेंगे हिन्द-युग्म के संपादक-नियंत्रक शैलेश भारतवासी।

इसके अतिरिक्त आप हिन्द-युग्म के निम्नलिखित कवियों के काव्य-पाठ का रस भी ले सकेंगे।

कवि- नाज़िम नक़वी, गौरव सोलंकी, शोभा महेन्द्रू, पावस नीर, रूपम चोपड़ा, निखिल आनंद गिरि, मनुज मेहता


हिन्द-युग्म इससे पहले भी बहुत से सेमिनारों में, विश्वविद्यालय की कक्षाओं में, सम्मेलनों में लोगों को यूनिकोड टाइपिंग और ब्लॉग-मेकिंग का प्रशिक्षण दे चुका है। हर महीने लगभग सैकड़ों लोगों को शैलेश टेलीफोन पर ही इस तरह का परामर्श देते रहते हैं।

तो यदि आपको टाइपिंग में समस्या आती हो, ब्लॉग बनाने को इच्छुक है तो इस आयोजन के हिस्सेदार ज़रूर बनें। चूँकि सभागार में सीटें सीमित हैं, इसलिए इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए अपना पंजीकरण ज़रूर करा लें। ताकि आपके लिए हम हर तरह का इंतज़ाम कर सकें।

दर्शकों के लिए एक और अच्छी ख़बर है। जो दर्शक पंजीकरण के साथ उस कार्यक्रम में उपलब्ध होंगे, उन्हें दरवेश भारती (ग़ज़ल के छंदशास्त्री) की ओर से 'ग़ज़ल के बहाने (पुष्प-१)' पुस्तिका निःशुल्क दी जायेगी। इस पुस्तिका में ग़ज़ल के छंद-विधान का आरम्भिक ज्ञान है। पंजीकृत हो चुके पाठकों को इस पुस्तिका की आने वाली सभी कड़िया मुफ्त में डाक द्वारा भेजी जायेगी।


Vivran Dekhane ke liye is poster par click karen
तो फिर आप क्या सोच रहे हैं? आपके पास सुनहरा अवसर है- जाने-माने कलमकारों से मिलने का, हिन्द-युग्म पर जिन्हें पढ़ते हैं उनसे रूबरू होने का, उनका काव्य-पाठ सुनने का, 'हिन्दी टाइपिंग कैसे करें?', 'ब्लॉग कैसे बनायें; इत्यादि पर परामर्श लेने का, ग़ज़ल का छंद-विधान की पुस्तिका जीवनभर मुफ़्त पाने का। तो चूकिए मत। नीचे का फॉर्म भर दीजिए। और हाँ! याद रखिए कि आपको रविवार २८ दिसम्बर २००८ को दोपहर २ बजे से शाम ६ बजे तक हिन्द-युग्म के साथ होना है। स्थान होगा- पहुँचने में सुगम, जाना-माना हिन्दी भवन। आइए आपका स्वागत करने को युग्म-परिवार बेताब है।

कार्यक्रम के उपरांत जलपान (रिफ्रेशमेंट) की सुविधा भी उपलब्ध होगी।

ऊपर ले मानचित्र से 'हिन्दी-भवन पहुँचने का रास्ता' न स्पष्ट हो रहा हो, तो यहाँ क्लिक करें

हमारी मदद करें___

1॰ इस कार्यक्रम की सूचना उन्हें ज़रूर दें, जिन्हें हिन्दी भाषा से अनुराग है, कला से अनुराग, देश से अनुराग है, साहित्य से अनुराग है।
2॰ यदि आप ब्लॉग करते हैं तो आप यह सूचना अपने ब्लॉग पर भी लगा सकते हैं। तरीका बहुत आसान है। इस पोस्ट के नीचे टिप्पणियों (कमेंट) के बाद देखें, लिखा मिलेगा- 'स्थाई कड़ियाँ'॰॰॰॰
उसके ठीक नीचे एक हाइपरलिंक है 'Creat a Link' से। बस उस पर क्लिक करें। एक नई खिड़की (विंडो) खुलेगी, उसमें आपको इसे ब्लॉग करने का विकल्प दिखेगा। एक से अधिक ब्लॉग हैं आपके पास तो ब्लॉग चुनने का विकल्प भी दिखेगा। अपने पसंदीदा ब्लॉग को चुनकर पब्लिश करने (प्रकाशित करने) का बटन दबा दें।
3. अपने ब्लॉग/वेबसाइट/ऑरकुट स्क्रैपबुक/माईस्पैस/फेसबुक में 'हिन्द-युग्म वार्षिकोत्सव २००८' का पोस्टर लगायें। नीचे से कोड कॉपी करें-



किस प्रकार से बनी है ये ग़ज़ल और क्‍या होते हैं रुक्‍न अरकान और क्‍या होता है वज्‍न


उर्दू में काव्‍य के व्‍याकरण को अरूज़ कहा जाता है जिस तरह से हिंदी में पिंगल शास्‍त्र है । हिंदी का पिंगल जो कि वास्‍तव में संस्‍कृत का पिंगल है वो दुनिया का सबसे पुराना काव्‍य व्‍याकरण माना जाता है । किंतु उसमें मात्राओं की गणना आदि की इतनी अधिक दुश्‍वारियां हैं कि उसके कारण काफी कठिन होता है छंद लिखना । अरबी व्‍याकरण जो अरूज़ के नाम से उर्दू में ग़ज़ल के लिये लिया गया वो वास्‍तव में यूनानी अरूज़ से काफी प्रभावित है । क्‍योंकि ख़लील बिन अहमद जिन्‍होंने अरबी अरूज़ को जन्‍म दिया लगभग आठवीं सदी में वे यूनानी ज़ुबानके जानकार थे ।इसी उर्दू पिंगल को अरूज़ कहा जाता है और इसके जानने वाले को अरूज़ी कहा जाता है । हालंकि उर्दू ग़ज़ल में बारे में मैं पहले भी कह चुका हूं कि ये तो वास्‍तव में घ्‍वनियों को ही खेल है । इसलिये कई लोग जिनको अरूज़ के बारे में ज़रा भी जानकारी नहीं है वे केवल रिदम या लय पर ही ग़ज़ल लिख लेते हैं और अक्‍सर पूरी तरह से बहर में ही लिख्‍ते हैं । ऐसा इसलिये क्‍योंकि ग़ज़ल में तो ध्‍वनियां ही हैं । अगर आप ताल पकड़ पाओ तो सब हो जाएगा । फिर भी बहर का ज्ञान होना इसलिये ज़रूरी है कि कई बार छोटी छोटी मात्राएं रिदम में आ जाती हैं मगर वास्‍तव में वैसा होता नहीं है । कई बार हम गा कर पढ़ देते हैं और आलाप में मात्राएं पी जाते हैं । इससे भी दोष ढंक जाता है पर रहता तो है ।
आज हम बात करते हैं रुक्‍नों की जिनके बारे में हमने पहले चर्चा नहीं की है । रुक्‍न के बारे में केवल मैंने इतना ही बताया है कि रुक्‍न मात्राओं के गुच्‍छे होते हैं । मात्राओं का वो समूह जिसको उच्‍चारण करते समय एक साथ पढ़ा जाता है उसको रुक्‍न कहते हैं । ग़जल की बहर निकालने में सबसे मुश्किल काम अगर कुछ है तो वो ये ही है । आप यदि ठीक प्रकार से रुक्‍न निकाल पाते हैं तो फिर आपके लिये बहर निकालना आसान काम है । मगर बात वही है कि रुक्‍न निकाले किस प्रकार जायें । मैंने पहले भी कहा है कि जो लोग गाते रहते हैं गुनगुनाते रहते हैं । वे लोग भले ही बिना बहर का ज्ञान हुए ग़ज़ल लिखें लेकिन उनकी ग़ज़लें बहर में ही होती हैं । ऐसा इसलिये क्‍योंकि गाने वाले को पता होता है कि मीटर क्‍या है । दरअसल में सीधे शब्‍दों में कहें तो जो मीटर है वही बहर भी है । जो मीटर में नहीं है वो बहर में भी नहीं हो सकता है । दोनों में एक फर्क ये है कि मीटर पर लिखने वाला एकाध ग़लती कर सकता है लेकिन जो बहर पर लिख रहा है उसके साथ ग़लती होने की संभावना ही नहीं होती है । तिस पर भी ये कि यदि बहर का ज्ञान होने के साथ संगीत का भी ज्ञान हो तो फिर तो सोने पर सुहागे वाली ही बात हो जाती है । जैसे मैं अपनी ही कहूं कि मैंने भले ही संगीत सीखा नहीं हो लेकिन मैं कॉलेज के दिनों में एक आर्केस्‍ट्रा में गाया भी करता था और कांगो तथा जैज़ ड्रम भी बजाया करता था । बाद में जब ग़ज़ल से जुड़ा तो मेरे लिये काम कुछ आसान था । क्‍योंकि रिदम मेरे अंदर पहले से था और अब तो केवल बहर को ही समझना था । रिदम पर लिखने के साथ उसको तोलना भी ज़रूरी है और ये तोल ही वज्‍़न कहलाती है । शे'र को बहर की तराज़ू में तौलना यानि कि उसका वज्‍़न करना है इसीको तक़तीई करना भी कहते हैं इसको आप सीधी भाषा में तख्‍ती करना भी कह सकते हैं । मतलब अपने शे'रों को बहर के तराज़ू पर एक एक कर के कसना और फिर उनमें दोष निकालना । ध्‍यान दें दोष दो प्रकार का होता है एक तो व्‍याकरण को दोष और दूसरा विचारों का दोष । व्‍याकरण का दोष तो अरूज के ज्ञान से चला जाता हे पर विचारों के लिये तो वही बात है करत करत अभ्‍यास .....।

बात हो रही थी रुक्‍नों की कि किस प्रकार रुक्‍नों को तोड़ा जाता है । पिछली कक्षा में भी मैंने कुछ ऐसी ही बात की थी । मगर आज हम उस अध्‍याय को विस्‍तार देने की कोशिश करते हैं । रुक्‍न का बहुवचन अरकान होता है । गज़ल में अगर मात्रा निकालना आ गया तो फि़र समझो काफी काम हो गया है । मैंने पहले भी कहा है कि ग़ज़ल में मात्राओं से मिलकर बनते हैं रुक्‍न रुक्‍न से मिलकर बनते हैं मिसरे मिसरों से मिलकर बनता है शे'र और शे'रों से मिलकर बनती है हमारी नाज़ुक सी ग़ज़ल । तो मिल मिलाकर खेल अक्षरों और शब्‍दों का ही है । ध्‍यान दें मात्रा, मात्रा से रुक्‍न, रुक्‍न से मिसरे, मिसरों से शे'र और शे'रों से ग़ज़ल । अब इसमें अगर पूर्णता लानी है तो समझ लें कि आपको उस जगह पर शुद्धत लानी होगी जहां से ग़ज़ल की शुरुअत होती है । अर्थात मात्राओं से । मात्रा लघु या दीर्घ जो भी हो उसको उसी क्रम में आना है । कई लोगों के मेल मिले हैं और कई लोग मात्रा गिनना जानना चाहते हैं । मेरा अनुरोध है कि पहले हम ग़ज़ल के बारे में जानकारी प्राप्‍त कर लें उसके बाद हम तकतीई करना सीखेंगें तो आसानी होगी । एक दो कक्षाओं में हम और देखेंगें कि ग़ज़ल का वज्‍़न किस प्रकार निर्धारित होता है और उसके बाद हम खुद ही वज्‍न निकालना प्रारंभ करेंगें ।

मात्राओं को गिनने का मामला समझ में न आये तो बहुत उलझा है, समझ में आ जाये तो बहुत आसान है


ग़ज़ल की कक्षाएं किसी मुकाम पर पहुंचें उसके पहले ही ऐसा कुछ हो जाता है कि काफिला रुक जाता है। इस बार भी ऐसा ही कुछ हुआ है सब कुछ शुरू होने को ही था कि पूज्‍यनीय दादीजी का स्‍वर्गवास हो गया । और उसके बाद फिर हमारे प्रदेश में चुनाव आ गये । पत्रकारिता से जुड़ा होने के कारण चुनाव को लेकर व्‍यस्‍तता हो ही जाती है तिस पर ये कि मुख्‍यमंत्री का चुनाव हमारे ही जिले की एक सीट से होने के कारण हमारा जिला खबरों में बना रहा। अब जाकर कहीं थोड़ा सा आराम मिला है। शैलेश जी का मेल मिला तो याद आया कि अरे आज से तो कक्षाएं प्रारंभ करने का वादा था। मेरे कवि मित्र ब्‍लाग पर पोस्‍ट में जो वर्ड वेरिफिकेशन लगा है उसके कारण काम मुश्किल हो गया है। शैलेश जी ने बताया कि ये ब्‍लागर की ओर से ही लगाया गया है। दरअस्‍ल में मेरे जैसे लोग जो कि विंडोज लाइव रायटर पर काम करते हैं उनके लिये ये परेशानी वाला काम है क्‍योंकि हम लोग तो ब्‍लागर पर साइन ही नहीं करते, जो कुछ भी करना होता है वो वही रायटर में लिख कर पोस्‍ट लगा देते हैं। खैर चलिये हम काम प्रारंभ करते हैं। ग़ज़ल की कक्षाओं को हमने कहीं पर छोड़ा था वहीं से हमको सिरा पकड़ना है । मुझे नहीं मालूम कि कहां पर क्‍या छूटा था और क्‍या हो चुका था मगर प्रयास रहेगा कि सिरा ठीक प्रकार से पकड़ लिया जाये।

आज ही अपने एक मित्र डॉ कैलाश गुरू स्‍वामी का फोन आया कहने लगे कि पंकज एक अच्‍छा शेर निकला है सुनो
अल्‍लाह दस्‍ते नाज़ की नाज़ुक सी उंगलियां
उस पर गुलाबे इत्र की ख़ुश्‍बू का बोझ है
स्‍वामी जी ने सुबह को इस मलमल के समान नाजुक और महीन शेर से ख़ुशनुमा बना दिया। हालंकि इस प्रकार के शेर और ये कहन अब विलुप्‍त होते जा रहे हैं। अब ग़ज़ल कुछ कठोर होती जा रही है। ग़ज़ल से नफ़ासत और नज़ाकत दोनों ही समाप्‍त होती जा रही हैं ।
आज हम एक ऐसे विषय से प्रारंभ करते हैं जो कि पहले हमने केवल चर्चाओं में लिया है उस पर कभी बात विस्‍तार से कुछ नहीं कहा। एक समस्‍या जो कि कई सारे लोगों के सामने आती रही है वो ये है कि मात्राओं को गिना किस प्रकार जाये। दूसरा ये कि दीर्घ मात्रा को लघु और कभी दीर्घ ही माना जाता है ऐसा कैसे होता है। दरअस्‍ल ग़ज़ल में गिनने का तरीका कुछ अलग है यहां पर दो लघु मिलकर एक दीर्घ बन जाते हैं और कभी ऐसा भी होता है कि दोनों नहीं मिलते अलग-अलग ही रहते हैं। यहां पर कभी ऐसा होता है कि एक दीर्घ को कभी तो दीर्घ में ही गिना जाता है और कभी ऐसा होता है कि उसको लघु मान लिया जाता है। ये दरअस्‍ल में मात्रओं के उच्‍चारण के कारण होता है। ग़ज़ल को जब बनाया गया तो इसको आम बोल-चाल के वाक्‍यों से ही बनाया गया है। इसीलिये हम देखते हैं कि ग़ज़ल में बातचीत का लहज़ा जितना अधिक होता है वो ग़ज़ल उतनी ही लोकप्रिय होती है। कहीं-कहीं ग़ज़ल का अर्थ कहा जाता है ''महबूबा से बातचीत'' और इसीलिये ग़ज़ल में मात्राओं की गणना इसी आधार पर की जाती है कि उन मात्राओं को उच्‍चारण कैसे किया गया था। उच्‍चारण करते समय अगर किसी दीर्घ मात्रा पर हम रुके अर्थात उस पर वज़न दिया तो वो दीर्घ ही रही। किन्‍तु यदि किसी दीर्घ पर हम नहीं रुके जल्‍दी से उसको पढ़कर गुज़रे तो वो लघु में गिन ली जाती है। कुल मिलाकर ये बात ग़ज़ल के प्रकरण में महत्‍वपूर्ण है कि ग़ज़ल सुनाते समय ही आनंद देती है। क्‍योंकि लिखने वाले को पता होता है कि कहां मात्रा गिरी है और कहां पर नहीं ।
ग़ज़ल की अगर बात करें तो मतले के पहले मिसरे में जो वज्‍न आ गया, उसके बाद पूरी की पूरी ग़ज़ल में वही का वहीं वज्‍न आना है। अब आप उसको बदल नहीं सकते हैं। अगर आपने बदला तो मिसरा बहर से बाहर हो जायेगा। मात्राओं का जो क्रम आपने पहले मिसरे में तय कर लिया वह ग़ज़ल की बहर हो गई है। ये जो मात्राओं का विन्‍यास है। उसी को बहर कहा जाता है। ये विन्‍यास भी पूर्व निर्धारित हैं। जैसे कि एक मिसरा है '' सजा कर ज़ुल्‍फ़ में तारे पहन कर चांदनी निकलो'' अब इसमें मात्राओं का विन्‍यास क्‍या है ये देखें । स 1, जा 2, कर 2, ज़ुल्‍ 2 ( अगर आप देखें तो यहां पर एक भंग आता है अर्थात आप यहां पर रुक जाते हैं इसका मतलब ये है कि आपका रुक्‍न पूरा हो गया 1222) फिर फ 1, में 2 ता 2 रे 2 (यहां पर हम फिर रुकते हैं अर्थात पुन: रुक्‍न पूरा हो गया रुक्‍न का अर्थ होता है मात्राओं का एक समूह 1222) प 1 हन 2 कर 2 चां 2 ( यहां पर तीसरा रुक्‍न पूरा हो गया है क्‍योंकि आप यहां रुक गये हैं 1222 ) द 1 नी 2 निक 2 लो (और ये था अंतिम रुक्‍न 1222 ) । इसका मतलब ये है कि आपके मिसरे का वज्‍न है 1222-1222-1222-1222 अब आपको आगे इसी मिसरे पर काम करना है । ये जो मिसरा मैंने दिया है ये कुमार विश्‍वास के मुक्‍तक 'कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है' की वज़न पर है। दरअसल में कुमार विश्‍वास जी के वो सारे मुक्‍तक पूरी तरह से बहर में हैं और इसीलिय सुनने में आनंद देते हैं। उसी मुक्‍तक को गायें तो आपको मात्राओं का खेल समझ में आयेगा। गाते समय याद रखें कि जो चार लाइनें मैंने लिखी हैं नीचे मिसरे को वैसे ही पढ़ें अर्थात ''कोई दीवा'' पढ़कर रुक जायें फिर ''ना कहता है'' पढ़कर रुक जायें विश्राम के बाद आगे का रुक्‍न पढ़ें ''कुई पागल'' और फिर रुक कर पढ़ें '' स मझ ता है '' । दस पंद्रह बार पढ़ें आपको मात्राओं का खेल समझ में आ जायेगा।
कु ई दी वा ( कोई का को लघु में गिना जा रहा है क्‍योंकि उसका उच्‍चारण कुई आ रहा है )
न कह ता है ( ना लघु में गिना जा रहा है क्‍योंकि पढ़ते समय केवल न की ध्‍वनि आ रही है )
कु ई पा गल (कुई पागल )
स मझ ता है
आज के लिये इतना ही ये केवल और केवल प्राथमिक जानकारी है। अगर समझ में नहीं आये तो चिंता न करें हम आगे इसको विस्‍तार से समझने की कोशिश करेंगे। जो लोग गुनगुना लेते हैं गा लेते हैं उनके लिये ये समझना आसान होगा। चलिये मिलते हैं अगली कक्षा में ।