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दोहे


गीत गुनगुना के आज, छेड़ो दिल के तार .
दिल में घर बसा लो तुम, मुझे बना लो यार .


मधुर मधुर मदमानिनी, मान मुनव्वल मीत .
मंद मंद मोहक महक, मन मोहे मन मीत .


मधुर प्रीत मन में बसा, जग से कर ले प्यार .
जीवन होता सफल है, जग बन जाये यार .


नन्हा मुझे न जानिये, आज भले हूं बीज .
प्रस्फुटित हो पनपूंगा, दूंगा आम लजीज .


पढ़ लिख कर सच्चा बनो, किसको है इंकार .
दुनियादारी सीख लो, जीना गर संसार .


संसारी संसारे में रहे लिप्त संसार .
खुद भूला, भूला खुदा, भूले नहि परिवार .


फक्कड़ मस्त महान कवि, ऐसे संत कबीर .
फटकार लगाई सबको, बात सरल गंभीर .


नाम हरी का सब जपो, कहें सदा यह सेठ .
ध्यान भला कैसे लगे, खाली जिनके पेट .


सच की अर्थी ढ़ो रहा, ले कांधे पर भार .
पहुंचाने शमशान भी, मिला न कोई यार .


देश को नोचें नेता, बन चील गिद्ध काग .
बोटी बोटी खा रहे, कैसा है दुर्भाग .


लालच में है हो गया, मानव अब हैवान .
अपनों को भी लीलता, कैसा यह शैतान .


रावण रावण जो दिखे, राम करे संहार .
रावण घूमें राम बन, कलयुग बंटाधार .


मर्याद को राखकर बेच मान अभिमान .
कलयुग का है आदमी, धन का बस गुणगान .


मैं मैं मरता मर मिटा, मिट्टी मटियामेट .
मिट्टी में मिट्टी मिली, मद माया मलमेट .


छल कपट लूट झूठ सब, चलता जीवन संग .
सच पर अब जो भी चले, लगे दिखाता रंग .


कवि कुलवंत सिंह

गीत कौन सा मैं गाऊँ ?


गीत कौन सा मैं गाऊँ ?
जग ये जैसे रो रहा है
मातम घर घर हो रहा है .
गीत कौन सा मैं गाऊँ ?
कैसे दुनिया को बहलाऊँ ?
देने सुत को एक निवाला
बिक जाती राहों में बाला .
कौन धान की हांडी लाऊँ ?
भर भर पेट उन्हें खिलाऊँ ?
खेल अनय का हो रहा है
न्याय चक्षु बंद सो रहा है .
कौन प्रभाती राग सुनाऊँ ?
इस धरा पर न्याय जगाऊँ ?
दो कौड़ी बिकता ईमान
’क्यू’ में खड़ा हुआ इंसान .
कौन ज्योति का दीप जलाऊँ ?
मानस को अंतस दिखलाऊँ ?
सत्य सुबकता कोने में
झूठ दमकता पैसे में
कौन कोर्ट का निर्णय लाऊँ ?
झूठ सच का अंतर बतलाऊँ ?
कवि कुलवंत सिंह



गूंजता सुमधुर स्वर धरा नभ


गूंजता सुमधुर स्वर धरा नभ
छेड़ा किसने स्वप्निल तान .
पल्लवित पुलकित पावन प्रकृति
सुना रही क्या मधुरिम गान .

व्याकुल तन था अंतस अधीर
जीवन प्रस्तर नीरव भान .
सुचि सुर संयत शीतल समीर
आ आ कर भरे हृदय प्राण .

व्यथित विकल विकराल वेदना
कुंठित दुख का नही निदान .
संगीत लहर विमल अनुभूति
जाग्रत प्राण सहज मुस्कान .

पावन अंचल मन प्रांगण मौन
संचित पावक गात म्लान .
झरनों सी झर झर धाराएँ
बिखरे सुर मृदु स्वप्न समान .

धधक धधक कर जल रही अग्नि
फूट फूट नयनों से धार .
बह बह सुर संगीत अलौकिक
हंस हंस भरते जीवन सार .

आतप तापित गरल प्रवाहित
शापित कलुषित उलझी राह .
सरगम सरिता श्वास जगाती
भरती जग जीने की चाह .

कवि कुलवंत सिंह

गज़ल


गोद में रख सर मैं जिसकी सो रहा था
विष वही मेरे बदन में बो रहा था .

मैने अपना प्यार जिस रिश्ते को सौंपा
मार जिंदा अब मुझे वह ढ़ो रहा था .

वह बना हैवान जिस दौलत की खातिर
अब उसी दौलत में दब कर रो रहा था .

कब्र मेरी चुपके से उसने बनाई
मैं उसे अपना समझ कर सो रहा था .

मैने अपनी जां लड़ा जिसको बचाया
मेरा खूँ कर हाथ अब वह धो रहा था .

कवि कुलवंत सिंह

तांडव


मांगता नहीं प्रभु तुमसे कुछ
हैं नहीं कुछ मेरे अरमान .
बिना दिये सामर्थ्य दीन को
नहीं कराना कभी विषपान .

विषपान नही कर सकता नर
रावण को देते अमृत दान .
न्याय तुम्हारा कैसा हे शिव ?
पी खून हुये दैत्य बलवान .

कलयुग में हैं भेजे तुमने
धरा पे क्या सारे हैवान
पाताल, नरक कर के खाली
तुमको क्या मिल गया भगवान .

हर कूचे में बसते रावण
एक राम का नही है काम .
आज जरूरत प्रलय नृत्य की
छोड़ के आओ अपना धाम .

नेत्र तीसरा खोलो पल भर
कर दो समूल दैत्य संहार
ले करवट फिर से धरा उठे
होने लगे शिव शिव गुंजार .

कवि कुलवंत सिंह

गज़ल - निभाते ही रहे


गज़ल

हम उसूलों की तरह रिश्ते निभाते ही रहे.
गाज बन कर हम पे वह बिजली गिराते ही रहे.

हम उन्हे अपना समझ दिल में बसाते ही रहे
मानकर दुश्मन वो हमको तो सताते ही रहे.

चुप थे हम इज्जत कभी उनकी न मिट्टी में मिले
जान कर कमजोर वह हमको डराते ही रहे.

हो गईं बेकार सारी कोशिशें अच्छाई की
रात दिन वह विष पे विष हमको पिलाते ही रहे.

उनकी राहों में सदा हमने बिखेरे फूल थे
फूल को पत्थर समझ आँखे दिखाते ही रहे.

रात सन्नाते में चाकू घोंपकर सीने हमारे
सामने सबके हमें अपना बताते ही रहे.

खेल खेला वह नियति ने दी सजा पापी को उसने
मान कर हमको नियति बरसों जलाते ही रहे.

कवि कुलवंत सिंह

संहार सृष्टि सृजन का मूल


संहार सृष्टि सृजन का मूल

आह ! प्रकृति का कैसा विधान
संहार सृष्टि सृजन का मूल;
नवजीवन बन बहती धारा
बीज जब मिल जाता धूल

द्रव्य विलीन हो उर्जा निर्मित
प्रतिपादित नव ज्ञान सिद्धांत;
प्रकृति नियम का ही संचालन
फिर भी मानव क्यों हुआ भ्रांत

कुछ खोकर ही है कुछ पाना
नियति का विराट स्वर अनुगूंज;
नव उपवन नव सृष्टि सजाने
आवश्यक है शिव तांडव गूंज

कण-कण में है बसा हुआ वह
दर्शन मिले मिटा अहंकार;
अगम अगोचर अलख अपारा
संपूर्ण ब्रह्मांड है विस्तार

सुख दुख जीवन की धाराएं
आंसू बन बह जाती धार;
परम पिता में होकर विलीन
दो जीवन को सत्य आधार

कवि कुलवंत सिंह

दशानन


क्यूँ दशानन रावण को सब कहते हैं
उसके धड़ पर दस मुख ही क्यों रहते हैं
नही समझ में हमको कभी भी आता था
न ही हमको कोई यह समझाता था

पहन मुखौटा शातिर लोग रहते हैं
चेहरे पे चेहरे लगा कर मिलते हैं
देखा, जाना, सुना, पढ़ा और समझा था
कई दफा इस बात को खुद परका था

फिर हुआ सामना मेरा इक हैवान से
जब मैने की तुलना उसकी इनसान से
हुआ दंग मैं देख कर उसके चेहरे
एक नही था, कई-कई थे उसके चेहरे


जब मिलता था वह किसी भी शख्स से
खूब योजना बना के चलता दिमाग से
हर बार दिखाता था वह अपना नया रंग
चेहरा नया, नया रूप और नया ढ़ंग

इक-इक, दो-दो नही, कई थे उसके रंग
हर इक पर इक रंग जमाता, होता जिसके संग
जिस पर उसका जो भी इक रंग था चढ़ता
वह उसको उस रंग का था ही समझता


लेकिन जिसने भी जाना उसको करीब से
देख के होता दंग चढ़े इतने रंग तरतीब से

बात एक थी और बड़ी हैरानी की
देनी होगी दाद उसकी शैतानी की
जिस पर अपना जो भी रंग था वह जमाता
किसके संग, बात कौन सी, कौन मुखौटा

याद सभी कुछ उसको रह्ता था तरतीब से
जब जब भी मिलता था वह किसी को फिर से
करता था वह बात वही और वही मुखौटा
रहती थी उसे बात याद हो कोई मुखौटा

जिससे मिलता वह लगा कर जो चेहरा
लगता सरल इंसां को वह असली चेहरा
देख देख हैरान मैं उसके कितने चेहरे
हर चेहरे पर नये चटकते रंग भरे

फिर बात समझ में आई, यह रावण का भाई
’काली विद्या’ इसने भी है कहीं से पाई
रावण के भी तो थे दस दस चेहरे
दस मुख से था मतलब शायद दस चेहरे

दशानन का तब मैने यह मतलब जाना
दस मुँह से दस लोगों से दस बातें करना
दस चेहरों की क्षमता को रखने वाला
इसीलिए कहते रावण को दस मुख वाला

मुझको भी दिखलाया इक दिन उसने रंग
किया मौत का तांडव उसने मेरे संग
देख के उसके करतब था यमराज लजाया
मैं ही हूँ प्रह्लाद भक्त वह जान न पाया

हिरण्यकश्यप सा उसने था जाल बिछाया
तड़पा कर मुझे मारने का जतन लगाया
भूल गया वह भक्तों का रक्षक भगवान
जन्म मृत्यु पर है नही उसका विधान

अंत एक दिन उस राक्षस का होना था
तड़प तड़प कर उसको भी तो मरना था
लेकिन धरती पर उसने जो छोड़े अंश
घूम रहे हैं दुनिया में वह बन कर कंस

कैसे मिले छुटकारा इस धरती को इनसे
जिससे सच्चे लोगों का फिर जीवन हरषे

कवि कुलवंत सिंह

गज़ल


याद बन कर मेरे दिल में आज फिर तू छा गई ।
बन के आंसू आज इन आंखों को मेरी भा गई ।।

बालपन से सुन रहा हूं सच सदा है जीतता,
आज लगता मेरी सचचाई ही मुझको खा गई ।

जिसके कदमों में कभी मैने निसारी अपनी जां,
उसकी ही करतूत से अब मेरी शामत आ गई ।

जिंदगी है खूबसूरत, रंग इसमें बेपनाह,
अपनी पर जब आई यह तो कहर मुझ पर ढा गई ।

मै हथेली रेत भर कर खुश हुआ सब मिल गया,
छीनने को वो भी मुझसे सारी दुनिया आ गई ।

फूल बन कर जिंदगी थी खिलखिलाना चाहती,
खिल न पाई जिंदगी और दरद सारा पा गई ।

कवि कुलवंत सिंह

संत्रास - निर्वाण



सहरा की धूप में जो जल रहा था,
वेदना के गरल से जो गल रहा था,
काल के निर्मोह हाथों पल रहा था,
सुधा का प्याला उसे तुमने पिलाया ।
मौत के आगोश से तुमने बचाया ॥

जीवन का संघर्ष जिसको छल रहा था,
भरी जवानी में भी जो ढ़ल रहा था,
स्वयं का जीवन जिसको खल रहा था,
अंधकार में उर्मिल बन कर तुम आयीं ।
जीवन में जलनिधि बन कर तुम छायीं ॥

दुश्मन का कुचक्र हर पल चल रहा था,
चुपचाप वह हाथ अपने मल रहा था,
गिराया हर बार जब भी संभल रहा था,
करुणा को द्रावित कर आनंद बनाया ।
गहन वेदना को तुमने मधु रस पिलाया ॥

नयनों से अविरल कितना नीर बहाया,
शून्य गगन में निर्जन मन बिखरा पाया,
दग्ध दुख अभिशापित कर हृदय बसाया,
तप्त उर को अंक भर तुमने सहलाया ।
नयनों में भर छवि उसे अपना बनाया ॥

सुख की निर्मल छाया का भान कराया ।
गीत प्रीत का मीत बना कर उसे सुनाया ॥

कवि कुलवंत सिंह

जीवन को गीत बनाएँ


जीवन को इक गीत बनाएँ
सुर ताल से इसे सजाएँ ।
खुशबू से इसको महकाएँ
अधरों से सदा गुनगुनाएँ ।

खुशियों की हो छांव घनेरी
आशा निखरी धूप सुनहरी ।
कल कल बहती नदिया गहरी
उपवन भरी छटा हो छहरी ।

जीवन को इक गीत बनाएँ
आँखों में सपने बसाएँ ।
उड़ने को आकाश दिलाएँ
सरगम से मोती बिखराएँ ।


कवि कुलवंत सिंह

युद्ध धर्म



शत्रु सीमा पर खड़ा ललकारता
तू हाथ बाँध ईश को पुकारता ।
वीरता की यह नही पहचान है
हटना युद्ध धर्म से अपमान है ।

त्याग, तप, जप का यहाँ क्या काम है
संहार - शत्रु वीरों की शान है ।
लावा जो हृदय में है दहक रहा
बहने दो ज्वालामुखी भभक रहा ।

बिगुल नही तुमने बजाया, सच है
समर कब तुमने था चाहा, सच है ।
तू हाथ जोड़ अब दिखा न दीनता
इस समर को जीतना ही वीरता ।

अर्थ, स्वार्थ, काम जहां अविराम है,
संघर्ष कुलिष ही वहां परिणाम है ।
उठती हैं जब रण में चिनगारियाँ
याद करो अपनी तुम सरदारियाँ ।

निरीह बन गीत विनय के गा नही
सरल, सरस, अनुनय अब अपना नही ।
हाथ ले अंगार चल अब उस दिशा
प्राण मोह त्याग, मिटा काली निशा ।

अग्नि सी धधक, उबाल रख रक्त में
शत्रु दमन कर उसे गिरा गर्त में ।
वीर बन शक्ति रख, हो सदा विजयी
आग बन राख कर, हो सदा विजयी ।

कवि कुलवंत सिंह


काल रात्रि



कब हटेगी कालिमा इस रात की ।
कब दिखेगी लालिमा अब प्रात की ॥

आज सूरज क्यों उदित होता नही ।
अरुण प्राची आज मुसकाता नही ॥

रात्रि से भयभीत है मानव धरा ।
काल के आगोश से कितना डरा ॥

इस निशा का अंत कब होगा भला ।
क्रूर निशि ने यूँ लगे पकड़ा गला ॥

बन भुजंग है डस रही विभावरी ।
लील लेगी जग को बन निशाचरी ॥

यूँ लगे संहार जग का पास है ।
सृष्टि के अवसान का आभास है ॥

सुरसा सा मुँह बाये है यामिनी ।
अब न कर दे राख बन कर दामिनी ॥

ध्वंस है अनिवार्य लगता इस क्षपा ।
अंतहीन रजनी से डरती प्रभा ॥


रात = रात्रि = निशा = निशि = विभावरी = यामिनी = क्षपा = रजनी

कवि कुलवंत सिंह



ग़ज़ल


मै जब भी हूँ किसी इंसां के करीब जाता ।
अल्लाह तेरा बस तेरा ही वजूद पाता ॥

कितने ही चांद सूरज अंबर में हैं विचरते,
हर कोई ऐसा लगता, चक्कर तेरा लगाता ।

देख जो मैने फूलों को खिलते औ महकते
तुम्हारी बंदगी में, सर है झुका ही जाता ।

देखा जो मैने चिडिय़ॊं को उड़ते औ चहकते,
जर्रा यहां का हर, तेरी याद है दिलाता ।

रख ले मुझे हमेशा अपनी शरण में मौला,
दिल बार बार तुझको आवाज़ है लगाता ।

कवि कुलवंत सिंह

पुकारता मुझको बार बार


अधीर हृदय सुनता झंकार
बसी पायलों मे मधु पुकार;
नख शिखा कर यौवन शृंगार
पुकारता मुझको बार बार ।

चेतना का मधुरिम संकेत
हृदय बसा सुकोमल आनंद;
ले कल्पना की मुक्त उड़ान
रूपसी संग भ्रमण सानंद ।

उज्जवल झरनों सी मुस्कान
लहराती शीतल मधुर गान;
प्रेम अनुभूति लेकर हिलोर
छेड़ती अंतस अभिनव तान ।

निस्सीम नभ सी प्रीत अनंत
असीम व्योम तल मृदु उल्लास;
संचित निधि तन अतुल सौगात
लहराती अंचल वपु विलास ।

निखरता स्वर्ण सा दमक गात
पुलकित झोंका अल्हड़ बयार;
ओढ़ चुनर धानी लता भासा
प्रकृति संग करती नयन चार ।

छंद में बंध कमनीय पास
सुंदरता की विभूति अपार;
संबल बन यौवन अनुभूति
जीवन हर्षित सुखद गुंजार ।

खन - खन बिखरी हंसी अभिराम
जड़ में सहज चेतन का भान;
चंचल नयना चपल वाचाल
मूक निमंत्रण मौन रसपान ।

बिखराती मलय देह सुकांत
अलस उषा निरखती अविराम;
मंद मलंद मोहक गति पांव
प्रकृति चकित रुक करती विश्राम ।

सुशोभित अनुकृति सुघड़ निहार
कानन कुसुम विस्मृति मुस्कान;
वाणी सुमधुर सप्त सुर गान
कोकिल कण्ठ, लय वीणा तान ।

संयम तोड़ रहा वृहत बांध
उमड़ अनुराग तरंग अबाध;
पुकारता मुझको बार - बार
कुसुमित वैभव यौवन निर्बाध ।

कवि कुलवंत सिंह

गज़ल


नहीं है सांझ अपनी औ सवेरा ।
न आया रास मुझको शहर तेरा ॥

वहां पूरा मुहल्ला घर था अपना,
यहां इक रूम का कोना है मेरा ।

वहाँ कस्बे में था आंगन लगा घर,
यहाँ सूरज न ही है चांद मेरा ।

यहाँ बसते हैं लगता चील कौवे,
हमेशा नोंचते हैं मांस मेरा ।

हुई है खत्म लगता जात आदम,
बना हर घर यहाँ भूतों का डेरा ।

जिधर देखो उधर हैवान दिखते,
कहाँ खोजूँ मैं इंसां का बसेरा ।

गुजारा हो नहीं सकता यहां पर,
मुझे लगता नही यह शहर मेरा ।

कवि कुलवंत सिंह

गज़ल


शैदाई समझ कर जिसे था दिल में बसाया ।
कातिल था वही उसने मेरा कत्ल कराया ॥

दुनिया को दिखाने जो चला दर्द मैं अपने,
हर घर में दिखा मुझको तो दुख दर्द का साया ।

किसको मैं सुनाऊँ ये तो मुश्किल है फसाना
दुश्मन था वही मैने जिसे भाई बनाया ।

मैं कांप रहा हूँ कि वो किस फन से डसेगा,
फिर आज है उसने मुझसे प्यार जताया ।

आकाश में उड़ता था मैं परवाज़ थी ऊँची,
पर नोंच मुझे उसने जमीं पर है गिराया ।

गीतों में मेरे जिसने कभी खुद को था देखा,
आवाज मेरी सुन के भी अनजान बताया ।

कांधे पे चढ़ा के उसे मंजिल थी दिखाई,
मंजिल पे पहुँच उसने मुझे मार गिराया ।

शैदाई= चाहने वाला, पर = पंख, परवाज = उड़ान

कवि कुलवंत सिंह

एटम और भगवान


कण कण में बसता भगवान
जन जन में रहता भगवान,
माया तेरी बड़ी निराली
एटम में दिखता भगवान ।

इलेक्ट्रान है छोटा कितना
सुई नोक का खरब है जितना,
एटम में जब छलांग लगाए
ऊर्जा का इक अंश निकलता ।

स्फुरण, प्रस्फुरण यह दिखाते
स्पेक्ट्रम से पहचान बताते,
नगण्य कहो तुम इनको कितना
अनेक प्रभाव यह दिखलाते ।

एटम खुद है छोटा इतना
नाभिक का तो फिर क्या कहना,
लेकिन इसे विखंडित करके
मिलती ऊर्जा चाहो जितना ।

विकिरण के स्वरूप तो देखो
एल्फा, बीटा, गामा, परखो,
यह भी ऊर्जा अपनी रखते
खूब संबाल कर इनको रखो ।

कवि कुलवंत सिंह

पुकार


सहिष्णुता की वह धार बनो
पाषाण हृदय पिघला दे ।
पावन गंगा बन धार बहो
मन निर्मल उज्ज्वल कर दे ।

कर्मभूमि की वह आग बनो
चट्टानों को वाष्प बना दे ।
धरती सा तुम धैर्य धरो
शोणित दीनों को प्रश्रय दे ।

ऊर्जित अपार सूर्य सा दमको
जग में जगमग ज्योति जला दे ।
पावक बन ज्वाला सा दहको
कर दमन दाह कंचन निखरा दे ।

अति तीक्ष्ण धार तलवार बनो
भूपों को भयकंपित रख दे ।
पीर फकीरों की दुआ बनों
हर दरिद्र का दर्द मिटा दे ।

शौर्य पौरुष सा दिखला दो
दमन दबी कराह मिटा दे ।
अंबर में खीचित तड़ित बनो
जला जुल्मी को राख कर दे ।

सिंहों सी गूंज दहाड़ बनो
अन्याय धरा पर होने न दे ।
बन रुधिर शिरा मृत्युंजय बहो
अन्याय धरा पर होने न दे ।

अपमान गरल प्रतिकार करो
आर्त्तनाद कहीं होने न दे ।
बन प्रलय स्वर हुंकार भरो
शासक को शासन सिखला दे ।

पद दलितों की आवाज बनो
मूकों का चिर मौन मिटा दे ।
कर असि धर विषधर नाश करो
सत्य न्याय सर्वत्र समा दे ।

सृष्टि सृजन का साध्य बनो
विहगों को आकाश दिला दे ।
बन शीतल मलय बहार बहो
हर जीवन को सुरभित कर दे ।

कवि कुलवंत सिंह

कवि कुलवंत सिंह के काव्य संग्रहों 'चिरंतन' एवं 'हवा नूँ गीत' का विमोचन


मुम्बई में लगा साहित्याकरों का जलसा




किरण देवी सराफ ट्रस्ट के सहयोग से कवि कुलवंत सिंह की काव्य पुस्तकों "चिरंतन" एवं "हवा नूँ गीत" (पूर्व काव्य संग्रह निकुंज का गुजराती अनुवाद - श्री स्पर्श देसाई द्वारा) का विमोचन समारोह कीर्तन केंद्र सभागृह, विले पार्ले, मुंबई में २१ अगस्त, २००८ को संपन्न हुआ। पुस्तकों का विमोचन प्रसिद्ध उद्योगपति एवं समाजसेवी श्री महावीर सराफ के कर कमलों द्वारा संपन्न हुआ । कार्यक्रम की अध्यक्षता की - 'महाराष्ट्र हिंदी साहित्य अकादमी' के अध्यक्ष श्री नंद किशोर नौटियाल जी ने। विशिष्ट अतिथि के रूप में महानगर के अनेक गणमान्य एवं साहित्य के शीर्षस्थ योद्धा पधारे।
जिनमें प्रमुख थे - नवनीत के पूर्व मुख्य संपादक श्री गिरिजाशंकर त्रिवेदी, कुतुबनुमा की संपादिका श्रीमती राजम नटराजम, फिल्म कथाकार श्री जगमोहन कपूर, अंजुमन संस्था के अध्यक्ष एवं प्रमुख शायर खन्ना मुजफ्फरपुरी, प्रमुख शायर श्री जाफर रजा, श्रीमती देवी नागरानी, श्रुति संवाद के अध्यक्ष श्री अरविंद राही, ह्यूमर क्लब के अध्यक्ष श्री शाहिद खान, कथाबिंब के संपादक श्री अरविंद, संयोग साहित्य के संपादक श्री मुरलीधर पांडेय, श्री देवदत्त बाजपेयी एवं अन्य अनेक गणमान्य गीतकार, कवि एवं शायर। जिन्होंने नवोदित कवि एवं गीतकार श्री कुलवंत सिंह के लिए अपने अनेकानेक आशीषों की झड़ी लगा दी ।

कार्यक्रम में पुस्तक पर समीक्षा प्रस्तुत की डा. श्रीमती तारा सिंह एवं श्री अनंत श्रीमाली ने। कार्यक्रम का संचालन या मंचो के प्रसिद्ध संचालक श्री राजीव सारस्वत ने। कार्यक्रम का प्रारंभ हंसासिनी माँ सरस्वती पर माल्यार्पण एवं दीप
प्रज्जवलन से किया गया । माँ सरस्वती का आवाहन पण्डित जसराज जी के शिष्य श्री नीरज कुमार ने कुलवंत सिंह द्वारा रचित वंदना को अपने कण्ठ से अभिनव स्वर प्रदान कर की । पुस्तकों के विमोचन के उपरांत कवि कुलवंत सिंह के गीतों पर संगीतमय प्रस्तुति की - श्री सुरेश लालवानी ने। शिप्रा वर्मा ने भी एक गीत को सुर प्रदान किये।

इस अवसर पर कुलवंत सिंह की रचनाओं पर टिप्पणी करते हुए अध्यक्ष श्री नौटियाल जी ने कहा कि कुलवंत की कुछ रचनाएँ भले ही काव्य के पारखियों की दृष्टि में उतनी खरी न उतरें; लेकिन ऐसी ही एक पंक्ति का जिक्र करते हुए
'हो भूख से बेजार जब उतारता कोई स्वर्ण मुद्रिका जल रही चिता के हाथ' जब उन्होंने इसे अपनी पसंदीदा कविताओं में दर्ज कराया तो यह पंक्ति पढ़ते हुए उनकी आखें सजल हो उठीं। राजम नटराजम ने कुलवंत की एक विता 'पदचिन्ह' की इन पंक्तियों को पढ़ते हुए - 'बचपन में मैने गौतम बुद्ध को पढ़ा था, उनका साधूपन भाया था / सोचा था / मैं भी, तन से न सही, मन से अवश्य साधू बनूंगा / समझ नही आता, आज लोग मुझे बेवकूफ क्यों कहते हैं'; टिप्पणी की कि काश यह बेवकूफपना हम सभी में बना रहे। एक माँ इस तरह बेवकूफ बन कर ही एक बच्चे का लालन पालन करती है। एक पिता अपने बच्चे के लिए इसी बेवकूफपने के तहत अपनी भविष्यनिधि से बच्चे का वर्तमान बनाता है । अपने अति व्यस्त कार्यक्रम से समय निकालकर श्री आलोक भट्टाचार्य भी अपना आशिर्वाद देने पहुँचे। इस अवसर
पर प्रसिद्ध कथाकारा डा श्रीमती सूर्यबाला जी ने भी अपना संदेश भेजा । गुजराती अनुवाद के सर्वेसर्वा श्री स्पर्श देसाई ने अपने अनुभवों को व्यक्त करते हुए दो छोटी कविताएं गुजराती में पढ़ीं । कार्यक्रम के अंत में कवि कुलवंत ने माँ सरस्वती सहित सभी आगंतुको का हार्दिक दिल से धन्यवाद किया ।