फटाफट (25 नई पोस्ट):

Wednesday, June 24, 2009

गूंजता सुमधुर स्वर धरा नभ


गूंजता सुमधुर स्वर धरा नभ
छेड़ा किसने स्वप्निल तान .
पल्लवित पुलकित पावन प्रकृति
सुना रही क्या मधुरिम गान .

व्याकुल तन था अंतस अधीर
जीवन प्रस्तर नीरव भान .
सुचि सुर संयत शीतल समीर
आ आ कर भरे हृदय प्राण .

व्यथित विकल विकराल वेदना
कुंठित दुख का नही निदान .
संगीत लहर विमल अनुभूति
जाग्रत प्राण सहज मुस्कान .

पावन अंचल मन प्रांगण मौन
संचित पावक गात म्लान .
झरनों सी झर झर धाराएँ
बिखरे सुर मृदु स्वप्न समान .

धधक धधक कर जल रही अग्नि
फूट फूट नयनों से धार .
बह बह सुर संगीत अलौकिक
हंस हंस भरते जीवन सार .

आतप तापित गरल प्रवाहित
शापित कलुषित उलझी राह .
सरगम सरिता श्वास जगाती
भरती जग जीने की चाह .

कवि कुलवंत सिंह

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

21 कविताप्रेमियों का कहना है :

रंजना का कहना है कि -

आपकी कलम को नमन.....

अप्रतिम अद्वितीय रचना....मन को मुग्ध कर गयी....वाह !!!

ओम आर्य का कहना है कि -

kahane ko shabda nahi hai ...itana surmay ......itana madhur ......bilkul saras gaan

Ambarish Srivastava का कहना है कि -

व्याकुल तन था अंतस अधीर
जीवन प्रस्तर नीरव भान .
सुचि सुर संयत शीतल समीर
आ आ कर भरे हृदय प्राण .

व्यथित विकल विकराल वेदना
कुंठित दुख का नही निदान .
संगीत लहर विमल अनुभूति
जाग्रत प्राण सहज मुस्कान .

मंत्रमुग्ध करने वाला सरस गान |
बधाई !

डा.राष्ट्रप्रेमी का कहना है कि -

आतप तापित गरल प्रवाहित
शापित कलुषित उलझी राह .
सरगम सरिता श्वास जगाती
भरती जग जीने की चाह .
कुलवन्त जी खोजने से कलुषित वातावरण में भी जीने की राह मिल ही जाती है.

neeti sagar का कहना है कि -

व्यथित विकल विकराल वेदना
कुंठित दुख का नही निदान .
संगीत लहर विमल अनुभूति
जाग्रत प्राण सहज मुस्कान ....बहुत दिनों बात ऐसी रचना पड़ने को मिली,,अच्छी रचना,,,बहुत-२ बधाई!

मुहम्मद अहसन का कहना है कि -

उच्च कोटि की रचना . बहुत बधाई
मुहम्मद अहसन

©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah) का कहना है कि -

बहुत ही सुन्दर रचना ।

Disha का कहना है कि -

बहुत ही सुन्दर रचना ।

SWAPN का कहना है कि -

madhur rachna.

neelam का कहना है कि -

aapki is tarah ki rachnaayen jaishankar prashaad ji ki kaamayni v aanso jaisi amulya kratiyon ki yaad dilaa jaati hain

Nirmla Kapila का कहना है कि -

व्यथित विकल विकराल वेदना
कुंठित दुख का नही निदान .
संगीत लहर विमल अनुभूति
जाग्रत प्राण सहज मुस्कान
कुलवंत जी अद्भुत रचना के लिये बहुत बहुत बधाई

sada का कहना है कि -

गूंजता सुमधुर स्वर धरा नभ
छेड़ा किसने स्वप्निल तान .
पल्लवित पुलकित पावन प्रकृति
सुना रही क्या मधुरिम गान .

बहुत ही सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति बधाई ।

विश्व दीपक ’तन्हा’ का कहना है कि -

कुलवंत जी,
बहुत दिनों के बाद आपने ऐसी कोई रचना लिखी है। मुझे इस तरह की कविता हमेशा हीं अच्छी लगी है।

बधाई स्वीकारें।

चलिए अब थोड़ा कविता का पोस्टमार्टम करता हूँ :) -

"आ आ कर भरे हृदय प्राण" -इसमें शायद "मे" छूट गया है।

इसी तरह "छेड़ा किसने स्वप्निल तान" में "छेड़ा" की जगह "छेड़ी" होना चाहिए।

"भरती जग जीने की चाह"- यहाँ पर "जग" का क्या अर्थ है- दुनिया या जगना.. अगर जगना है तो "जगाती" इस पंक्ति में पहले हीं आ चुका है और अगर दुनिया है तो यहाँ भी "में" की कमी है।

मेरे ये सारे प्रश्न शायद सही न हों,लेकिन मुझे जो लगा वो मैने लिख दिया। कृप्या जवाब देंगे।

-विश्व दीपक

Pyaasa Sajal का कहना है कि -

हर लिहाज से बहतरीन कविता है। प्रवाह कमाल का है,अर्थ बेहद खूबसूरत और शब्द और भाषा तो बेमिसाल।

yatin का कहना है कि -

सुंदर

kavi kulwant का कहना है कि -

आप सभी प्रिय मित्रों का हार्दिक धन्यवाद

मुकेश कुमार तिवारी का कहना है कि -

कुलवंत जी,

सुन्दर कविता, भावों से ओत-प्रोत ।

बधाई,

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

Shamikh Faraz का कहना है कि -

व्यथित विकल विकराल वेदना
कुंठित दुख का नही निदान .
संगीत लहर विमल अनुभूति
जाग्रत प्राण सहज मुस्कान
कुलवंत जी बहुत बहुत बधाई

Manju Gupta का कहना है कि -

Alankar yukt rachana hai.
Badhayi.

अर्चना तिवारी का कहना है कि -

मंत्रमुग्ध कर गयी...बहुत ही सुन्दर रचना

अर्चना तिवारी का कहना है कि -

गूंजता सुमधुर स्वर धरा नभ
छेड़ा किसने स्वप्निल तान .
पल्लवित पुलकित पावन प्रकृति
सुना रही क्या मधुरिम गान .

कुलवंत जी अद्वितीय,उच्च कोटि की रचना

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)