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रोज़ दलाली करने जाता दफ्तर कौन...


दे जाता है इन शामों को सागर कौन...
चुपके से आया आंखों से बाहर कौन?

भूख न होती, प्यास न लगती इंसा को
रोज़ दलाली करने जाता दफ्तर कौन?

उम्र निकल गई कुछ कहने की कसक लिए,
कर देती है जाने मुझ पर जंतर कौन?

संसद में फिर गाली-कुर्सी खूब चली,
होड़ सभी में, है नालायक बढ़कर कौन?

रिश्तों के सब पेंच सुलझ गए उलझन में,
कौन निहारे सिलवट, झाड़े बिस्तर कौन...

सब कहते हैं, अच्छा लगता है लेकिन,
मुझको पहचाने है मुझसे बेहतर कौन?

मां रहती है मीलों मुझसे दूर मगर,
ख्वाबों में बहलाए आकर अक्सर कौन..

जीवन का इक रटा-रटाया रस्ता है,
‘निखिल’ जुनूं न हो तो सोचे हटकर कौन?

निखिल आनंद गिरि

एक उदास कविता...जैसे तुम


गांव सिर्फ खेत-खलिहान या भोलापन नहीं हैं,

गांव में एक उम्मीद भी है,

गांव में है शहर का रास्ता

और गांव में मां भी है...


शहर सिर्फ खो जाने के लिए नहीं है..

धुएं में, भीड़ में...

अपनी-अपनी खोह में...

शहर सब कुछ पा लेना है..

नौकरी, सपने, आज़ादी..


नौकरी सिर्फ वफादारी नहीं,

झूठ भी है, साज़िश भी...

उजले कागज़ पर सफेद झूठ...

और जी भरकर देह हो जाना भी..


देह बस देह नहीं है...

उम्र की मजबूरी है कहीं,

कहीं कोड़े बरसाने की लत है...

सच कहूं तो एक ज़रूरत है..


और सच, हा हा हा..

सच एक चुटकुला है....

भद्दा-सा, जो नहीं किया जाता

हर किसी से साझा...

बिल्कुल मौत की तरह,

उदास कविता की तरह....

और कविता...

...................

सिर्फ शब्दों की तह लगाना

नहीं है कविता,..

वाक्यों के बीच

छोड़ देना बहुत कुछ

होती है कविता...

जैसे तुम...

 
निखिल आनंद गिरि

चांद छुट्टी पर रहा होगा उस रात...


तितर-बितर तारों के दम पर,
चमचम करता होगा रात का लश्कर,
चांद छुट्टी पर रहा होगा उस रात...

एक दो कमरों का घर रहा होगा,
एक दरवाज़ा जिसकी सांकल अटकती होगी,
अधखुले दरवाज़े के बाहर घूमते होंगे पिता
लंबे-लंबे क़दमों से....
हो सकता है पिता न भी हों,
गए हों किसी रोज़मर्रा के काम से
नौकरी करने....
छोड़ गए हों मां को किसी की देखरेख में...
दरवाज़ा फिर भी अधखुला ही होगा...

मां तड़पती होगी बिस्तर पर,
एक बुढ़िया बैठी होगी कलाइयां भींचे....
बाहर खड़ा आदमी चौंकता होगा,
मां की हर चीख पर...

यूं पैदा हुए हम,
जलते गोएठे की गंध में...
यूं खोली आंखे हमने
अमावस की गोद में...
नींद में होगी दीदी,
नींद में होगा भईया..
रतजगा कर रही होगी मां,
मेरे साथ.....चुपचाप।।
चमचम करती होगी रात।।।

नहीं छपा होगा,
मेरे जन्म का प्रमाण पत्र...
नहीं लिए होंगे नर्स ने सौ-दो सौ,
पिता जब अगली सुबह लौटे होंगे घर,
पसीने से तर-बतर,
मुस्कुराएं होंगे मां को देखकर,
मुझे देखा भी होगा कि नहीं,
पंडित के फेर में,
सतइसे के फेर में....

हमारे घर में नहीं है अलबम,
मेरे सतइसे का,
मुंहजुठी का,
या फिर दीदी के साथ पहले रक्षाबंधन का....
फोटो खिंचाने का सुख पता नहीं था मां-बाप को,

मां को जन्मतिथि भी नहीं मालूम अपनी,
मां को नहीं मालूम,
कि अमावस की इस रात में,
मैं चूम रहा हूं एक मां-जैसी लड़की को...

उसकी हथेली मेरे कंधे पर है,
उसने पहन रखे है,
अधखुली बांह वाले कपड़े...
दिखती है उसकी बांह,
केहुनी से कांख तक,

एक टैटू भी है,
जो गुदवाया था उसने दिल्ली हाट में,
एक सौ पचास रुपए में,
ठीक उसी जगह,
मेरी बांह पर भी,
बड़े हो गए हैं जन्म वाले टीके के निशान,
मुझे या मां को नहीं मालूम,
टीके के दाम...

निखिल आनंद गिरि
(मेरा जन्मदिन भी है, मेरी कविता भी है....आपकी बधाई का इंतज़ार है....)

जी रहे हैं मौत के हालात में...


अब यक़ीं आया उन्हें इस बात में
जल गया सारा शहर उस रात में

बोरियां भर-भर के ले आये ज़हर
बांटता था अमरिका ख़ैरात में...

जब कभी रोना हुआ चुपचाप से,
हो गए आकर खड़े, बरसात में

भीड़ में, दफ्तर में, मुर्दे हर जगह
जी रहे हैं, मौत के हालात में....

थालियों में रोटियां थी, ख्वाब थे,
बेड़ियां जकड़ी हुई थीं हाथ में....

धूप में भी प्यास की मजबूरियां,
प्यार की ये शर्त भी थी साथ में...

था वो पत्थरदिल, खुदा मैं कह गया
कुछ समझ आता नहीं जज़्बात में

निखिल आनंद गिरि

ठूंठ पीढ़ियां, बेबस माली...


जिन पेड़ों ने फल नहीं दिए,
उन्हें भी सींचा गया था सलीके से
भरपूर खाद-पानी और देखभाल के साथ..
हवा भी उतनी ही मिली थी उन्हें,
जितनी बाक़ी पेड़ों के नसीब में थी....
उम्मीद के लंबे अंतराल ने दिया
माली को ठूँठ पेड़ों का दुख..

ये दुख नहीं बना चर्चा का विषय
बुद्धू बक्से के बुद्धिजीवियों के बीच
या किसी भी अखबार के पन्ने पर,

पीढ़ी दर पीढ़ी उगते रहे ठूंठ
और घेरते रहे जगह,
फलदार पेड़ों के बरक्स....

फलदार पेड़ों को क्या था..
झूमकर लहराते रहे अपनी किस्मत पर....
ठूंठ पेड़ों से बिना उलझे,
मुंह घुमाकर समझते रहे,
कि हर ओर हरी है दुनिया....

उधर मालियों ने फिर भी सींचा,
नए बीजों को, नई उम्मीद से...
जब तक नीरस नहीं हुई पूरी पीढ़ी...

फिर बेबस मालियों ने सोचा उपाय
ठूंठ पेड़ों से कुछ काम निकाला जाये..
गर्दन में फंसाकर फंदे,
वो झूल गए इन्हीं पेड़ों पर...
और थोड़े-से फलदार पेड़ देखते रहे
अपनी तयशुदा मौत का पहला भाग...

काश! फलदार पेड़ों ने किया होता प्रतिरोध
ज़रा-सा भी,
तो ठूंठ पेड़ों में फल तो नहीं आते,
मगर वो समय रहते शर्म से
टूटकर गिर ज़रूर जाते,

कि ज़िंदा रहते माली
ताकि,
फलदार पेड़ों की भी हरी रहती डाली....

 
निखिल आनंद गिरि

वो मुझे सांप बना देना चाहते हैं...


ये बदहवासी से ठीक पहले के क्षण हैं,
मेरी पीठ पर पटके जा रहे हैं कोड़े
कि मेरी रीढ़ टूट जाए...
वो मुझे सांप बना देना चाहते हैं,
कि मैं रेंगता रहूं उम्र भर...
उनकी बजाई बीन पर...
ये बदहवासी से ठीक पहले की घड़ी है..

मेरी आंखों के आगे अंधेरा छाने वाला है...
इस एक पल को जीना चाहता हूं मैं...
करना चाहता हूं सौ तरह की बातें तुमसे...
खोलना चहता हूं मौन की मोटी गठरी..
तुम कहां हो??

मैं चीख रहा हूं ज़ोर-ज़ोर से...
शायद आवाज़ कहीं पहुंचेगी...
कोड़े खाने के फायदे हैं बहुत..
ये चीख मुझे गूंगा कर देगी देखना.....
मेरे पांवों में बांध रखी हैं,
समय ने कस कर बेड़ियां...

मैं भूलने लगा हूं
अपने बूढ़े पिता का चेहरा...
ये बदहवासी के पहले की आखिरी घड़ी है....
मां याद है मुझे,
पसीना पोंछती मां,
बेटों की डांट खाती मां...
तुम कहां हो,

तुम्हें छूना चाहता हूं एक बार..
हाथ भूल गए हैं स्पर्श का स्वाद...
मैं पीछे मुड़कर दबोच लेना चाहता हूं कोड़ा,
मगर ऐसा कर नहीं सकता..

मैं बदहवास होने लगा हूं अब...
मुझ पर और कोड़े बरसाए जाएं..
मुझे प्यास लग रही है,
मैं चखना चाहता हूं आंसू का स्वाद..

ये बदहवासी के आंसू हैं...
रोप दिए जाएं सौ करोड़ लोगों की छाती में..
कि झुकने न पाए उनकी रीढ़
बीन बजाते संपेरों के आगे...

कहां-कहां ढूंढोगे मुझे..
मैं हर सीने में हूं..
दुआ करो कि खाद-पानी मिले मेरे आंसूओ को,
याद रखना संपेरों,
मेरे आंसू उग आए
तो निर्मूल हो जाओगे तुम....
…………………………………………………………..

निखिल आनंद गिरि

फूल-सी लड़की के लिए...


वो बचपन की पहेली,

हम जिसे अब तक नहीं समझे..

तुम्हारा मुंह चिढ़ाती है,

ज़रा तुम भी चिढ़ाओ ना..

उठो, जल्दी से आओ ना...


वो एक तस्वीर अलबम की,

जिसमें मैं खड़ा आधा-अधूरा सा,

तुम्हें फुर्सत नहीं अपनी शरारत से...

तुम्हें तस्वीर का हिस्सा बनाने में,

मैं खींचता तो हूं...

मगर तस्वीर थोड़ा और पहले

खिंच ही जाती है....

मैं फिर खड़ा हूं,

सब खड़े हैं, हंसते चेहरे...

तुम कहां हो....

हथेली को बढ़ाओ ना...

उठो जल्दी से आओ ना...


मैं कितनी देर तक हंसता रहा था...

गुलाबी फ्रॉक वाली एक लड़की

लाल घूंघट में...

शरम से लाल होकर छिप रही थी..

मुस्कुराती थी....

...............

अचानक...

कौन था...जिसने की चोरी

सांसों की गठरी..

मैं कुछ क्यों कर नहीं पाया....

अचानक..

चार कंधों पर....

ये लंबी नींद की चादर.....

मैं कुछ क्यों कर नहीं पाया....


अभी गहरी उदासी में...

तुम्हें तो मुस्कुराना था...

अभी तो उम्र की कई सीढ़ियों के

पार जाना था...


मैं रोना चाहता हूं,

उस नए मेहमान की खातिर,

जिसे भरनी थी किलकारी

सभी की गोदियां चढ़कर...

खिलौने, दूध की बोतल

पटक कर तोड़ देनी थीं...

सुनाए कौन अब वो तोतली बोली,

दिल कैसे बहल जाए, बताओ ना...

उठो जल्दी से आओ ना...


अभी तो इक महकती

फूल-सी लड़की को

सारी रात जगकर...

मेरी आंखों में तकना था....

हंसना था, महकना था..

ज़िद तारों की करनी थी...

मेरे कंधे पे चढ़कर

चांद की ठुड्डी पकड़नी थी...

......................

मैं अब भी बंद आंखों से,

तुम्हारी राह तकता हूं...

मैं सोया हूं बहाने से....

ज़रा चुपके, सिरहाने से....

मेरा तकिया हिलाओ ना....

मैं सोया हूं, जगाओ ना...

मेरी छोटी बहन पूजा,

मेरी अच्छी बहन पूजा,

उठो जल्दी से आओ ना...

...................................
निखिल आनंद गिरि
(साल 2010 का पहली कविता....एक छोटी बहन थी जो डिलीवरी से पहले ही डॉक्टरों और ससुरालवालों की लापरवाही का शिकार हो गई...उससे जुड़ी यादों को सहेजने की कोशिश )

ज़िंदगी तुमको सौंपनी थी मगर...


तुम जब मुड़े थे,
मुड़ गया था समय...
अपनी धुरी से...
मेरे इंद्रधनुष छूट गए तुम्हारे पास...
और एक चमकीली हंसी भी...
मेरे चेहरे पर सूरज ने मल दी उदासी,
जो धूप के हर टुकड़े में पूरी नज़र आती है...
तुम ये कभी देख नहीं पाए शायद...
कि जो छूट गया वो तुम थे,
जो मेरे पास रहा, वो भी तुम ही थे...

पत्थर समय से टकराकर,
मज़बूत हो गए हैं हम,
और ज़रा-सा चालाक भी...
कंधे जो हल्के थे कभी,
अपने ही बोझ तले झुक गए हैं...
जो भी देखता है कहता है,
बड़े हो गए हैं हम...

जब हम बड़े होते हैं,
हमारे साथ बड़ी होती है उम्र...
और धुंधली होती है याद..
बीत चुके उम्र की...
हमारे साथ बड़ा होता है खालीपन....
छूट चुके रिश्तों का...
और बड़ा होता है खारापन,
आंसूओं का...
चुप्पियां बड़ी होती हैं,
और उनमें छिपा दर्द भी..
ये तमाम शहर बड़े होते हैं हमारे साथ...
हमारे-तुम्हारे शहर...
शहरों की दूरियां घटती हैं,
रिश्तों की नहीं घटती...

और उम्मीद भी तो बड़ी होती है....
कि किसी दिन तेज़ आंधी में,
जब लचक रहा होगा मन,
हम पकड़ सकेंगे उम्र का दूसरा सिरा...
उम्र न सही एक ख़ास दिन ही सही,
बड़ा दिन..

मुझे उधार दो कुछ रद्दी ख्वाहिशें,
और एक पुरानी छुअन भी,
हमारी उदासियों का कोरस जो तुम्हारे पास है...
कि इस दिन को सजाया जाए..

उम्र जो छूट गई तुम्हारे मुड़ने से...
उसका कोई नाम नहीं....
दिन जो बड़ी जतन से सजा है आज..
उसका कोई नाम तो हो...
कोई तो नाम रखो इस दिन का...

ज़िंदगी तुमको सौंपनी थी मगर,
लो ये बड़ा दिन तुम्हारे नाम किया...

निखिल आनंद गिरि

समय केले का छिलका है....


चाँद का पानी पीकर,
लोग कर रहे होंगे गरारे...
और झूम रही होगी
जब सारी दुनिया...

मशीन होते शहर में,
कुछ रोबोट-से लोग
ढूँढते होंगे,
ज़िंदा होने की गुंजाइश।

किसी बंद कमरे में,
बिना खाद-पानी के
लहलहा रहा होगा दुःख...

माँ के प्यार जितनी अथाह दुनिया के
बित्ते भर हिस्से में,
सिर्फ नाच-गाकर
बन सकता है कोई,
सदी का महानायक
फिर भी ताज्जुब नहीं होता।

प्यार ज़रूरी तो है
मगर,
एक पॉलिसी, लोन या स्कीम
कहीं ज़्यादा ज़रूरी हैं....

सिगरेट के धुँए से
उड़ते हैं दुःख के छल्ले
इस धुँध के पार है सच
देह का, मन का...

समय केले का छिलका है,
फिसल रहे हैं हम सब...
दुनिया प्रेमिका की तरह है,
एक दिन आपको भुला देगी...

निखिल आनंद गिरि

बनमानुस...


एक दुनिया है समझदार लोगों की,
होशियार लोगों की,
खूब होशियार.....
वो एक दिन शिकार पर आए
और हमें जानवर समझ लिया...
पहले उन्होंने हमें मारा,
खूब मारा,
फिर ज़बान पर कोयला रख दिया,
खूब गरम...
एक बीवी थी जिसके पास शरीर था,
उन्होंने शरीर को नोंचा,
खूब नोचा...
जब तक हांफकर ढेर नहीं हो गए,
हमारे घर के दालानों में....

हमारी बीवियों ने मारे शरम के,
नज़र तक नहीं मिलाई हमसे
उल्टा उन्हीं के मुंह पर छींटे दिए,
कि वो होश में आएं
और अपने-अपने घर जाएं...
ताकि पक सके रोटियां
खूब रोटियां...

वो होश में आए तो,
जो जी चाहा किया...
हमे फिर मारा,
उन्हें फिर नोंचा...
हमारी रोटियां उछाल दी ऊंचे आकाश में....
खूब ऊंचा....
वो हंसते रहे हमारी मजबूरी पर,
खूब हंसे...


भूख से बिलबिला उठे हम....
जलता कोयला निकल गया मुंह से...
जंगल चीख उठा हमारी हूक से....
पहाड़ कांप उठे हमारी सिहरन से....
नदियों में आ गया उफान,
खूब उफान....

उनके हाथ में हमारी रोटियां थीं,
उनकी गोद में हमारी मजबूर बीवियां थीं...
उनकी हंसी में हमारी चीख थी, भूख थी....
हमने पास में पड़ा डंडा उठाया
और उन्हें हकार दिया,
अपने दालानों से....
वो नहीं माने,
तो मार दिया.....

जंगल से बाहर की दुनिया
यही समझती रही,
हम आदमखोर हैं, बनमानुस...
जंगली कहीं के....
वाह रे समझदार...
वाह री सरकार.....

निखिल आनंद गिरि

ख़ास वक्त है, रोना मना है...


आओ इक तारीख सहेजें,
आओ रख दें धो-पोंछ कर,
ख़ास वक्त है....
कलफ़ लगाकर, कंघी कर दें...
आओ मीठी खीर खिलाएं,
झूमे-गाएं..
लोग बधाई बांट रहे हैं,
चूम रहे हैं,चाट रहे हैं...
किसी बात की खुशी है शायद,
खुश रहने की वजह भी तय है,
वक्त मुकर्रर
9 अगस्त,
घड़ियां तय हैं
24 घंटे...

हा हा ही ही
हो हो हो हो
हंसते रहिए,
ख़ास वक्त है,
रोना मना है...

खुसुर-फुसुर लम्हे करते हैं,
बीते कल की बातें,
पुर्ज़ा-पुर्ज़ा दिन बिखरे हैं,
रेशा-रेशा रातें....

उम्र की आड़ी-तिरछी गलियों का सूनापन,
बढ़ता है, बढ़ता जाता है...
एक गली की दीवारों पर नज़र रुकी है...
दीवारों पर चिपकी इक तारीख़ है ख़ास,
एक ख़ास तारीख पे कई पैबंद लगे हैं...
हूक उठ रही दीवारों से,
उम्र की लंबी सड़क चीख से गूंज रही है...

जश्न में झूम रहे लोगों की की चीख है शायद,
जबरन हंसते होठों की मजबूरी भी है,
उघड़े रिश्ते,भोले चेहरों का आईना,
कभी सिमट ना पाई जो, इक दूरी भी है...

वक्त खास है,
आओ चीखें-चिल्लाएं हम...
जश्न का मातम गहरा कर दें...
इसको-उसको बहरा कर दें...
आओ ग़म की पिचकारी से होली खेलें,
फुलझड़ियां छोड़ें...
आओ ना, क्यों इतनी दूर खड़े हो साथी,
सब खुशियों में लगा पलीता,
हम-तुम वक्त की मटकी फोड़ें...

ख़ास वक्त है,
इसे हाथ से जाने न देंगे,
जिन घड़ियों ने जान-बूझकर
कर ली हैं आंखें बंद,
उनकी यादें भी भूले से
आने न देंगे...

सांझ ढले तो याद दिलाना
आधा चम्मच काला चांद,
वक्त की ठुड्डी पर हल्का-सा,
टीका करेंगे...
तन्हा चीखों का तीखापन,
फीका करेंगे....

हा हा ही ही
हो हो हो हो
हंसते रहिए,
ख़ास वक्त है,
रोना मना है...

निखिल आनंद गिरि
(आज कवि का जन्मदिन भी है, तो आप बधाई दे सकते हैं...)

जब बांध सब्र का टूटेगा, तब रोएंगे....


जब बांध सब्र का टूटेगा, तब रोएंगे....
अभी वक्त की मारामारी है,
कुछ सपनों की लाचारी है,
जगती आंखों के सपने हैं...
राशन, पानी के, कुर्सी के...
पल कहां हैं मातमपुर्सी के....
इक दिन टूटेगा बांध सब्र का, रोएंगे.....

अभी वक्त पे काई जमी हुई,
अपनों में लड़ाई जमी हुई,
पानी तो नहीं पर प्यास बहुत,
ला ख़ून के छींटे, मुंह धो लूं,
इक लाश का तकिया दे, सो लूं,....
जब बांध.....

उम्र का क्या है, बढ़नी है,
चेहरे पे झुर्रियां चढ़नी हैं...
घर में मां अकेली पड़नी है,
बाबूजी का क़द घटना है,
सोचूं तो कलेजा फटना है,
इक दिन टूटेगा......

उसने हद तक गद्दारी की,
हमने भी बेहद यारी की,
हंस-हंस कर पीछे वार किया,
हम हाथ थाम कर चलते रहे,
जिन-जिनका, वो ही छलते रहे....
इक दिन...

जब तक रिश्ता बोझिल न हुआ,
सर्वस्व समर्पण करते रहे,
तुम मोल समझ पाए ही नहीं,
ख़ामोश इबादत जारी है,
हर सांस में याद तुम्हारी है...
इक दिन...

अभी और बदलना है ख़ुद को,
दुनिया में बने रहने के लिए,
अभी जड़ तक खोदी जानी है,
पहचान न बचने पाए कहीं,
आईना सच न दिखाए कहीं!
जब बांध ....

अभी रोज़ चिता में जलना है,
सब उम्र हवाले करनी है,
चकमक बाज़ार के सेठों को,
नज़रों से टटोला जाना है,
सिक्कों में तोला जाना है...
इक दिन....

इक दिन नीले आकाश तले,
हम घंटों साथ बिताएंगे,
बचपन की सूनी गलियों में,
हम मीलों चलते जाएंगे,
अभी वक्त की खिल्ली सहने दे...
जब बांध..

मां की पथरायी आंखों में,
इक उम्र जो तन्हा गुज़री है,
मेरे आने की आस लिए..
उस उम्र का हर पल बोलेगा....

टूटे चावल को चुनती मां,
बिन बांह का स्वेटर बुनती मां,
दिन भर का सारा बोझ उठा,
सूना कमरा, सिर धुनती मां....

टूटे ऐनक की लौटेगी
रौनक, जिस दिन घर लौटूंगा...
मां तेरे आंचल में सिर रख,
मैं चैन से उस दिन सोऊंगा,
मैं जी भर कर तब रोऊंगा.....

तू चूमेगी, पुचकारेगी,
तू मुझको खूब दुलारेगी...
इस झूठी जगमग से रौशन,
उस बोझिल प्यार से भी पावन,
जन्नत होगी, आंचल होगा....
मां! कितना सुनहरा कल होगा.....

इक दिन टूटेगा बांध सब्र का, रोएंगे....


निखिल आनंद गिरि

सबकी किस्मत में नहीं होते ख़ुदा....


वो जो एक कमरा था बित्ते भर का,
और हम-तुम भी थे इत्ते भर के..
बंद कमरे में हंसी देर तलक,
चुप-सी दीवारें भी सुनती ही रहीं.....

एक मैं था कि तेरे कहने पर,
शाम तक गाता रहा खुश होकर,
तुम किसी बुत की तरह सुनती रहीं,
लफ्ज़ों के बीच सांसों के मानी....

वक्त ने पढ़ लिए थे छुप-छुप कर,
एक ख़त था जो तुम्हारी खातिर,
फिर हवाओं ने भी चुगली की थी,
मेरा सब लुट गया था, तुम चुप थे...

याद है एक सुबह बस का सफ़र,
फिर हवाओं ने साज़िश की थी,
पूरी कायनात मेरे बस में थी,
तुमने कांधे पे सर रखा था जब...

वो सहेली कि जिसकी खातिर,
मेरे जज़्बात रोज़ क़त्ल हुए,
मुझसे हंस-हंस के अब भी कहती है,
सबकी किस्मत में नहीं होते ख़ुदा,

एक वो दिन की मछलियों का शहर,
मुझपे कहर जैसा टूट कर बरसा,
इस क़दर तुम नज़र से गिरते रहे,
बह गया आंसुओं में सारा शहर....

आज हाथों में आईना लेकर,
ख़ुद को पहचानने की कोशिश है,
नया चेहरा है, नये मंज़र हैं,
तुम नहीं हो कहीं भी, दूर तलक...

पुरानी यादों के कैनवास से,
एक-एक कर मिटा दिए सब रंग,
23 जून..
बस यही तारीख़ है कि मिटती नहीं,
मेरी जां लेगी देखना इक दिन............

निखिल आनंद गिरि

खैर, माँ तो माँ ही है ना....


आज बहुत दिनों बाद लौटा हूँ घर,
एक बीत चुके हादसे की तरह मालूम हुआ है
की मेरी बंद दराज की कुछ फालतू डायरियां
(ऐसा माँ कहती है, तुम्हे बुरा लगे तो कहना,
कविता से हटा दूंगा ये शब्द....)
बेच दी गयी हैं कबाडी वाले को....
मैं तलाश रहा हूँ खाली पड़ी दराज की धूल,
कुछ टुकड़े हैं कागज़ के,
जिनकी तारीख कुतर गए हैं चूहे,
कोइ नज़्म है शायाद अधूरी-सी...
सांस चल रही है अब तक...

एक बोझिल-सी दोपहर में जो तुमने कहा था,
ये उसी का मजमून लगता है..
मेरे लबों पे हंसी दिखी है...
ज़ेहन में जब भी तुम आती हो,
होंठ छिपा नहीं पाते कुछ भी....
खैर, मेरे हंस भर देने से,
साँसे गिनती नज़्म के दिन नहीं फिरने वाले..
वक़्त के चूहे जो तारीखें कुतर गए हैं,
उनके गहरे निशाँ हैं मेरे सारे बदन पर..

क्या बतलाऊं,
जिस कागज़ की कतरन मेरे पास पड़ी है,
उस पर जो इक नज़्म है आधी...
उसमे बस इतना ही लिखा है,
"काश! कि कागज़ के इस पुल पर,
हम-तुम मिलते रोज़ शाम को...
बिना हिचक के बिना किसी बंदिश के साथी...."

नज़्म यहीं तक लिखी हुई है,
मैं कितना भी रो लूं सर को पटक-पटक कर,
अब ना तो ये नदी बनेगी,
ना ये पुल जिस पर तुम आतीं...
माँ ने बेच दिया है अनजाने में,
तुम्हारे आंसू में लिपटा कागज़ का टुकडा...
पता है मैंने सोच रखा था,
इक दिन उस कागज़ के टुकड़े को निचोड़ कर....
तुम्हारे आंसू अपनी नदी में तैरा दूंगा,
मोती जैसे,
मछली जैसे,
कश्ती जैसे,
बल खाती-सी..

खैर, माँ तो माँ ही है ना..
बहुत दिनों के बाद जो लौटा हूँ तो इतनी,
सज़ा ज़रूरी-सी लगती है...

निखिल आनंद गिरि

प्यार ने पैदा किए हैं वैज्ञानिक


न चाहते हुए भी,
जब से मासूम पीठों पर,
किताबों का गट्ठर लदा होगा.....
मासूम चेहरों ने बना ली होगी,
बस्ते में अलबम रखने की जगह....

कई बार कच्चे रास्तों पर,
ढेला खाती होगी
आम की फुनगी,
और गिरते टिकोले बढ़ाते होंगे,
प्यार का वज़न...

बिना किसी वजह के,
जब डांट खाते होंगे
बड़े होते बेटे,
प्यार का अहसास,
पहली बार देता होगा थपकी.....

जब नहीं हुआ करते थे मोबाईल,
नहीं पढे जाते थे झटपट संदेश,
आंखें तब भी पढ़ लेती होंगी,
कि किससे होना है दो-चार...
और हो जाता होगा मौन प्यारयययय

ये भी संभव है कि,
अनपढ़ मांएं या बेबस बहनें,
अक्सर याद करती होंगी चेहरा,
तो रोटियों के नक्शे बिगड़ जाते होंगे...

या फिर दाढ़ी बनाते पिता ही,
पानी या तौलिया मांगते वक्त,
अनजाने में पुकारते होंगे कोई ऐसा नाम,
जो शुरु नहीं होता,
मां के पहले अक्षर से....

एक सहज प्रक्रिया के लिए रची गयी रोज़ नयी तरकीबें,
प्यार ने पैदा किये हैं कितने वैज्ञानिक...

ये सरासर ग़लत है कि,
कवि,शायर या चित्रकार ही,
प्यार की बेहतर समझ रखते हैं.....

दरअसल,
जिसके पास मीठी उपमाएं नहीं होतीं
वो भी कर रहा होता है प्यार,
चुपके-चपके....

निखिल आनंद गिरि

रिश्तों की एक पुड़िया मेरे पास है........


आओ फिर सादे कागज़ पर चांद लिखें,
आओ फिर आकाश उड़ा दें कागज़ को,
शाम हुई है, चांद को उगना होता है....

वो होंगे और जो दूरी पे रोया करते है,
हम तो थामते हैं तेरे लब अक्सर,
देखो फिर बज उठा मोबाईल मेरा...

रिश्तों की एक पुड़िया मेरे पास है
चाहो तो चख लो,रख लो या फेंको तुम
तुमको कैसा स्वाद लगा, बतलाओ तो

आसमां आज बहुत सफे़द-सा है,
इक कफ़न-सा शहर पे पसरा है
शहर की मौत पे अब जा के यकीं आया है....

मैं मुगालते मे ही रहा हूं, कई बरसों तक
कि जिंदा लाशें भी चलती हैं ज़मीं पर अक्सर,
आज आंखों से कुछ रिसा है तो यक़ीन हुआ

इतनी हसरत ही नहीं कि कभी पूजा जाऊं,
एक उम्मीद भर है कि कभी भूले से,
तुमको मिल जाऊं तो कह दो कि "जानती हूं इसे...."

--निखिल आनंद गिरि

तुम्हारा चेहरा मुझे ग्लोब-सा लगने लगा है...


तुम कैसे हो?
दिल्ली में ठंड कैसी है?
....?
ये सवाल तुम डेली रूटीन की तरह करती हो,
मेरा मन होता है कह दूं-
कोई अखबार पढ लो..
शहर का मौसम वहां छपता है
और राशिफल भी....

मुझे तुम पर हंसी आती है,
खुद पर भी..
पहले किस पर हंसू,
मैं रोज़ ये पूछना चाहता हूं
मगर तुम्हारी बातें सुनकर जीभ फिसल जाती है,
इतनी चिकनाई क्यूं है तुम्हारी बातों में...
रिश्तों पर परत जमने लगी है..
अब मुझे ये रिश्ता निगला नहीं जाता...
मुझे उबकाई आ रही है...
मेरा माथा सहला दो ना,
शायद आराम हो जाये...

कुछ भी हो,
मैं इस रिश्ते को प्रेम नहीं कह सकता...
अब नहीं लिखी जातीं बेतुकी मगर सच्ची कविताएं...
तुम्हारा चेहरा मुझे ग्लोब-सा लगने लगा है,
या किसी पेपरवेट-सा....
भरम में जीना अलग मज़ा है...

मेरे कागज़ों से शब्द उड़ न जाएं,
चाहता हूं कि दबी रहें पेपरवेट से कविताएं....
उफ्फ! तुम्हारे बोझ से शब्दों की रीढ़ टेढी होने लगी है....

मैं शब्दों की कलाई छूकर देखता हूं,
कागज़ के माथे को टटोलता हूं,
तपिश बढ-सी गयी लगती है...
तुम्हारी यादों की ठंडी पट्टी
कई बार कागज़ को देनी पड़ी है....

अब जाके लगता है इक नज़्म आखिर,
कच्ची-सी करवट बदलने लगी है...
नींद में डूबी नज्म बहुत भोली लगती है....
जी करता है नींद से नज़्म कभी ना जागे,
होश भरी नज़्मों के मतलब,
अक्सर ग़लत गढे जाते हैं....

निखिल आनंद गिरि

मॉल है या कि अजायबघर है..


शहर से दूर जहां कोई कॉलोनी भी नहीं..
सिवाय दौड़ती कारों के रौशनी भी नहीं..
सुना है एक नया मॉल बन गया है वहां,
सुना है लोग वहां पांव से नहीं जाते,
रोज़ परफ़्यूम छिड़ककर किसी अजीज़ के साथ,
लोग पहुंचते हैं उस बियाबां में....

एक से एक अजूबे हैं वहां,
मॉल है या कि अजायबघर है..
आदमीनुमा एक रोबोट-सा शख्स,
हर किसी को सलाम करता है,
एक सीढ़ी है जो कि ख़ुद-ब-ख़ुद,
पांव धरते ही चला करती है....

लोग आपस में बात करते हैं,
हंस के,लेकिन इसी खयाल के साथ,
आ न जाये लबों पे उनके कहीं,
घर-गली की कोई देसी बोली...

और सुना है कि उसी जन्नत में,
मूवी टिकटें भी मिला करती हैं...
नीम अंधेरे में या इंटरवल में,
लोग चबाते हैं मकई के दाने..

तीन घंटे की सख़्त मोहलत में,
अंधेरे होते हैं रौशन दम तक..
हॉल की आखिरी "रो" में दो दिल,
एक पॉपकॉर्न की गवाही में,
उरूजे-इश्क तक पहुंचते हैं...

शहर से दूर उस बियाबां में,
जो लोग पांव से नहीं चलते,
उड़ के आते है इस दुकान तलक,
और लुटाते हां दम तलक मोती,
चार पल के सुकून की खातिर...

सुना है जिस जगह है मॉल खड़ा,
वहां शमशान हुआ करता था,
सोचता हूं कि कुछ नहीं बदला,
एक शमशान की छत के ऊपर,
अब भी कई किस्से दफ़न होते हैं,
कभी तो मूवी के बहाने से,
मकई के चंद महंगे दाने से.....

निखिल आनंद गिरि

यात्रा का यह पड़ाव.....


रंग जीवन के हैं फीके,
प्रश्न चेहरों पर सभी के,
हर जगह उत्तर नदारद,
मील के पत्थर नदारद,
चाल को शिथिल बनाता,
समय-सिंधु का बहाव...
शून्य...को प्रस्थान करता
यात्रा का यह पड़ाव.....

प्रश्न घर में, प्रश्न बाहर,
हंसी मुख पे, चोटिल अंतर
नित नये विश्वास घायल,
स्वप्न का आकाश ओझल...
भंवर से आकर किनारे,
डगमगा जाती है नाव,
शून्य...को प्रस्थान करता
यात्रा का यह पड़ाव.....


बीते कल को कौन संभाले,
आज खड़ा गलबंहिया डाले,
सब अपने हिस्से के साथी,
क्या अंधियारा, कैसे उजाले...
अभी निशां भी नहीं मिटे हैं,
दस्तक देते हैं नये घाव,
शून्य...को प्रस्थान करता
यात्रा का यह पड़ाव.....

कच्ची उम्र की लड़कियां


कभी-कभी होता है यूं भी,
कि घर से कच्ची उम्र में ही भाग जाती हैं लड़कियां,
और पिता कर देते हैं,
जीते-जी बेटी की अंत्येष्टि...
हो जाता है परिवार का बोझ हल्का..

और कभी यूं भी कि,
बेटियां करती हैं इश्क
और पिता देते हैं मौन सहमति
ताकि बच सके शादी का खर्च,
बेटियां मन ही मन देती हैं
पिता को धन्यवाद...
और पिता भी दब जाता है
बेटी के एहसान तले....

कच्ची उम्र में मर्ज़ी से
ब्याह रचाने वाली लड़कियां,
सदी का सबसे महान इतिहास लिख रही हैं
इतिहास जिसका रंग न लाल है न गेरुआ,
इतिहास जिनमें उनका प्रेमी एक है,
पति भी एक
और भविष्य भी एक ही है....
उनकी आंखों में सबके लिए प्यार है
आमंत्रण रहित..

आप चाहें तो आज़मा लें,
अंजुरी-भर प्यार का आचमन
सिखा देगा जीवन को
अपना शर्तों पर जीने का शऊर...

कच्ची उम्र की लड़कियां
जो पैदा होती हैं
दो-तीन कमरे वाले घरों में,
दूरदर्शन या विविध भारती के शोर में
नीम अंधेरे में,
लैंप की मीठी रौशनी में
पढ़ती हैं,
कुछ रूटीन किताबें
और पवित्र चिट्ठियां..
शादी कर उतारती हैं पिता का बोझ,
बनती हैं माएं...

सच कहूं,
उनकी छाती में दूध होता है अमृत-सा,
अपना बहाव ख़ुद तय कर सकने वाली ये लड़कियां,
मुझे लगती हैं गंगा मईया...
जो कभी दूषित नहीं हो सकती...

इतिहास उन्हें कभी नहीं भूल सकता,
जिन्होंने अपनी मजबूर मांओं के साथ,
एक ही तकिये पर सिर रखकर सोते हुए,
रचा है नयी सदी का नया इतिहास
धानी रंग में...

निखिल आनंद गिरि