गांव सिर्फ खेत-खलिहान या भोलापन नहीं हैं,
गांव में एक उम्मीद भी है,
गांव में है शहर का रास्ता
और गांव में मां भी है...
शहर सिर्फ खो जाने के लिए नहीं है..
धुएं में, भीड़ में...
अपनी-अपनी खोह में...
शहर सब कुछ पा लेना है..
नौकरी, सपने, आज़ादी..
नौकरी सिर्फ वफादारी नहीं,
झूठ भी है, साज़िश भी...
उजले कागज़ पर सफेद झूठ...
और जी भरकर देह हो जाना भी..
देह बस देह नहीं है...
उम्र की मजबूरी है कहीं,
कहीं कोड़े बरसाने की लत है...
सच कहूं तो एक ज़रूरत है..
और सच, हा हा हा..
सच एक चुटकुला है....
भद्दा-सा, जो नहीं किया जाता
हर किसी से साझा...
बिल्कुल मौत की तरह,
उदास कविता की तरह....
और कविता...
...................
सिर्फ शब्दों की तह लगाना
नहीं है कविता,..
वाक्यों के बीच
छोड़ देना बहुत कुछ
होती है कविता...
जैसे तुम...
निखिल आनंद गिरि






