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एक उदास कविता...जैसे तुम


गांव सिर्फ खेत-खलिहान या भोलापन नहीं हैं,

गांव में एक उम्मीद भी है,

गांव में है शहर का रास्ता

और गांव में मां भी है...


शहर सिर्फ खो जाने के लिए नहीं है..

धुएं में, भीड़ में...

अपनी-अपनी खोह में...

शहर सब कुछ पा लेना है..

नौकरी, सपने, आज़ादी..


नौकरी सिर्फ वफादारी नहीं,

झूठ भी है, साज़िश भी...

उजले कागज़ पर सफेद झूठ...

और जी भरकर देह हो जाना भी..


देह बस देह नहीं है...

उम्र की मजबूरी है कहीं,

कहीं कोड़े बरसाने की लत है...

सच कहूं तो एक ज़रूरत है..


और सच, हा हा हा..

सच एक चुटकुला है....

भद्दा-सा, जो नहीं किया जाता

हर किसी से साझा...

बिल्कुल मौत की तरह,

उदास कविता की तरह....

और कविता...

...................

सिर्फ शब्दों की तह लगाना

नहीं है कविता,..

वाक्यों के बीच

छोड़ देना बहुत कुछ

होती है कविता...

जैसे तुम...

 
निखिल आनंद गिरि

ठूंठ पीढ़ियां, बेबस माली...


जिन पेड़ों ने फल नहीं दिए,
उन्हें भी सींचा गया था सलीके से
भरपूर खाद-पानी और देखभाल के साथ..
हवा भी उतनी ही मिली थी उन्हें,
जितनी बाक़ी पेड़ों के नसीब में थी....
उम्मीद के लंबे अंतराल ने दिया
माली को ठूँठ पेड़ों का दुख..

ये दुख नहीं बना चर्चा का विषय
बुद्धू बक्से के बुद्धिजीवियों के बीच
या किसी भी अखबार के पन्ने पर,

पीढ़ी दर पीढ़ी उगते रहे ठूंठ
और घेरते रहे जगह,
फलदार पेड़ों के बरक्स....

फलदार पेड़ों को क्या था..
झूमकर लहराते रहे अपनी किस्मत पर....
ठूंठ पेड़ों से बिना उलझे,
मुंह घुमाकर समझते रहे,
कि हर ओर हरी है दुनिया....

उधर मालियों ने फिर भी सींचा,
नए बीजों को, नई उम्मीद से...
जब तक नीरस नहीं हुई पूरी पीढ़ी...

फिर बेबस मालियों ने सोचा उपाय
ठूंठ पेड़ों से कुछ काम निकाला जाये..
गर्दन में फंसाकर फंदे,
वो झूल गए इन्हीं पेड़ों पर...
और थोड़े-से फलदार पेड़ देखते रहे
अपनी तयशुदा मौत का पहला भाग...

काश! फलदार पेड़ों ने किया होता प्रतिरोध
ज़रा-सा भी,
तो ठूंठ पेड़ों में फल तो नहीं आते,
मगर वो समय रहते शर्म से
टूटकर गिर ज़रूर जाते,

कि ज़िंदा रहते माली
ताकि,
फलदार पेड़ों की भी हरी रहती डाली....

 
निखिल आनंद गिरि

वो मुझे सांप बना देना चाहते हैं...


ये बदहवासी से ठीक पहले के क्षण हैं,
मेरी पीठ पर पटके जा रहे हैं कोड़े
कि मेरी रीढ़ टूट जाए...
वो मुझे सांप बना देना चाहते हैं,
कि मैं रेंगता रहूं उम्र भर...
उनकी बजाई बीन पर...
ये बदहवासी से ठीक पहले की घड़ी है..

मेरी आंखों के आगे अंधेरा छाने वाला है...
इस एक पल को जीना चाहता हूं मैं...
करना चाहता हूं सौ तरह की बातें तुमसे...
खोलना चहता हूं मौन की मोटी गठरी..
तुम कहां हो??

मैं चीख रहा हूं ज़ोर-ज़ोर से...
शायद आवाज़ कहीं पहुंचेगी...
कोड़े खाने के फायदे हैं बहुत..
ये चीख मुझे गूंगा कर देगी देखना.....
मेरे पांवों में बांध रखी हैं,
समय ने कस कर बेड़ियां...

मैं भूलने लगा हूं
अपने बूढ़े पिता का चेहरा...
ये बदहवासी के पहले की आखिरी घड़ी है....
मां याद है मुझे,
पसीना पोंछती मां,
बेटों की डांट खाती मां...
तुम कहां हो,

तुम्हें छूना चाहता हूं एक बार..
हाथ भूल गए हैं स्पर्श का स्वाद...
मैं पीछे मुड़कर दबोच लेना चाहता हूं कोड़ा,
मगर ऐसा कर नहीं सकता..

मैं बदहवास होने लगा हूं अब...
मुझ पर और कोड़े बरसाए जाएं..
मुझे प्यास लग रही है,
मैं चखना चाहता हूं आंसू का स्वाद..

ये बदहवासी के आंसू हैं...
रोप दिए जाएं सौ करोड़ लोगों की छाती में..
कि झुकने न पाए उनकी रीढ़
बीन बजाते संपेरों के आगे...

कहां-कहां ढूंढोगे मुझे..
मैं हर सीने में हूं..
दुआ करो कि खाद-पानी मिले मेरे आंसूओ को,
याद रखना संपेरों,
मेरे आंसू उग आए
तो निर्मूल हो जाओगे तुम....
…………………………………………………………..

निखिल आनंद गिरि

फूल-सी लड़की के लिए...


वो बचपन की पहेली,

हम जिसे अब तक नहीं समझे..

तुम्हारा मुंह चिढ़ाती है,

ज़रा तुम भी चिढ़ाओ ना..

उठो, जल्दी से आओ ना...


वो एक तस्वीर अलबम की,

जिसमें मैं खड़ा आधा-अधूरा सा,

तुम्हें फुर्सत नहीं अपनी शरारत से...

तुम्हें तस्वीर का हिस्सा बनाने में,

मैं खींचता तो हूं...

मगर तस्वीर थोड़ा और पहले

खिंच ही जाती है....

मैं फिर खड़ा हूं,

सब खड़े हैं, हंसते चेहरे...

तुम कहां हो....

हथेली को बढ़ाओ ना...

उठो जल्दी से आओ ना...


मैं कितनी देर तक हंसता रहा था...

गुलाबी फ्रॉक वाली एक लड़की

लाल घूंघट में...

शरम से लाल होकर छिप रही थी..

मुस्कुराती थी....

...............

अचानक...

कौन था...जिसने की चोरी

सांसों की गठरी..

मैं कुछ क्यों कर नहीं पाया....

अचानक..

चार कंधों पर....

ये लंबी नींद की चादर.....

मैं कुछ क्यों कर नहीं पाया....


अभी गहरी उदासी में...

तुम्हें तो मुस्कुराना था...

अभी तो उम्र की कई सीढ़ियों के

पार जाना था...


मैं रोना चाहता हूं,

उस नए मेहमान की खातिर,

जिसे भरनी थी किलकारी

सभी की गोदियां चढ़कर...

खिलौने, दूध की बोतल

पटक कर तोड़ देनी थीं...

सुनाए कौन अब वो तोतली बोली,

दिल कैसे बहल जाए, बताओ ना...

उठो जल्दी से आओ ना...


अभी तो इक महकती

फूल-सी लड़की को

सारी रात जगकर...

मेरी आंखों में तकना था....

हंसना था, महकना था..

ज़िद तारों की करनी थी...

मेरे कंधे पे चढ़कर

चांद की ठुड्डी पकड़नी थी...

......................

मैं अब भी बंद आंखों से,

तुम्हारी राह तकता हूं...

मैं सोया हूं बहाने से....

ज़रा चुपके, सिरहाने से....

मेरा तकिया हिलाओ ना....

मैं सोया हूं, जगाओ ना...

मेरी छोटी बहन पूजा,

मेरी अच्छी बहन पूजा,

उठो जल्दी से आओ ना...

...................................
निखिल आनंद गिरि
(साल 2010 का पहली कविता....एक छोटी बहन थी जो डिलीवरी से पहले ही डॉक्टरों और ससुरालवालों की लापरवाही का शिकार हो गई...उससे जुड़ी यादों को सहेजने की कोशिश )

ज़िंदगी तुमको सौंपनी थी मगर...


तुम जब मुड़े थे,
मुड़ गया था समय...
अपनी धुरी से...
मेरे इंद्रधनुष छूट गए तुम्हारे पास...
और एक चमकीली हंसी भी...
मेरे चेहरे पर सूरज ने मल दी उदासी,
जो धूप के हर टुकड़े में पूरी नज़र आती है...
तुम ये कभी देख नहीं पाए शायद...
कि जो छूट गया वो तुम थे,
जो मेरे पास रहा, वो भी तुम ही थे...

पत्थर समय से टकराकर,
मज़बूत हो गए हैं हम,
और ज़रा-सा चालाक भी...
कंधे जो हल्के थे कभी,
अपने ही बोझ तले झुक गए हैं...
जो भी देखता है कहता है,
बड़े हो गए हैं हम...

जब हम बड़े होते हैं,
हमारे साथ बड़ी होती है उम्र...
और धुंधली होती है याद..
बीत चुके उम्र की...
हमारे साथ बड़ा होता है खालीपन....
छूट चुके रिश्तों का...
और बड़ा होता है खारापन,
आंसूओं का...
चुप्पियां बड़ी होती हैं,
और उनमें छिपा दर्द भी..
ये तमाम शहर बड़े होते हैं हमारे साथ...
हमारे-तुम्हारे शहर...
शहरों की दूरियां घटती हैं,
रिश्तों की नहीं घटती...

और उम्मीद भी तो बड़ी होती है....
कि किसी दिन तेज़ आंधी में,
जब लचक रहा होगा मन,
हम पकड़ सकेंगे उम्र का दूसरा सिरा...
उम्र न सही एक ख़ास दिन ही सही,
बड़ा दिन..

मुझे उधार दो कुछ रद्दी ख्वाहिशें,
और एक पुरानी छुअन भी,
हमारी उदासियों का कोरस जो तुम्हारे पास है...
कि इस दिन को सजाया जाए..

उम्र जो छूट गई तुम्हारे मुड़ने से...
उसका कोई नाम नहीं....
दिन जो बड़ी जतन से सजा है आज..
उसका कोई नाम तो हो...
कोई तो नाम रखो इस दिन का...

ज़िंदगी तुमको सौंपनी थी मगर,
लो ये बड़ा दिन तुम्हारे नाम किया...

निखिल आनंद गिरि

समय केले का छिलका है....


चाँद का पानी पीकर,
लोग कर रहे होंगे गरारे...
और झूम रही होगी
जब सारी दुनिया...

मशीन होते शहर में,
कुछ रोबोट-से लोग
ढूँढते होंगे,
ज़िंदा होने की गुंजाइश।

किसी बंद कमरे में,
बिना खाद-पानी के
लहलहा रहा होगा दुःख...

माँ के प्यार जितनी अथाह दुनिया के
बित्ते भर हिस्से में,
सिर्फ नाच-गाकर
बन सकता है कोई,
सदी का महानायक
फिर भी ताज्जुब नहीं होता।

प्यार ज़रूरी तो है
मगर,
एक पॉलिसी, लोन या स्कीम
कहीं ज़्यादा ज़रूरी हैं....

सिगरेट के धुँए से
उड़ते हैं दुःख के छल्ले
इस धुँध के पार है सच
देह का, मन का...

समय केले का छिलका है,
फिसल रहे हैं हम सब...
दुनिया प्रेमिका की तरह है,
एक दिन आपको भुला देगी...

निखिल आनंद गिरि