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Wednesday, June 23, 2010

ज़िंदगी तुमको सौंपनी थी मगर...


तुम जब मुड़े थे,
मुड़ गया था समय...
अपनी धुरी से...
मेरे इंद्रधनुष छूट गए तुम्हारे पास...
और एक चमकीली हंसी भी...
मेरे चेहरे पर सूरज ने मल दी उदासी,
जो धूप के हर टुकड़े में पूरी नज़र आती है...
तुम ये कभी देख नहीं पाए शायद...
कि जो छूट गया वो तुम थे,
जो मेरे पास रहा, वो भी तुम ही थे...

पत्थर समय से टकराकर,
मज़बूत हो गए हैं हम,
और ज़रा-सा चालाक भी...
कंधे जो हल्के थे कभी,
अपने ही बोझ तले झुक गए हैं...
जो भी देखता है कहता है,
बड़े हो गए हैं हम...

जब हम बड़े होते हैं,
हमारे साथ बड़ी होती है उम्र...
और धुंधली होती है याद..
बीत चुके उम्र की...
हमारे साथ बड़ा होता है खालीपन....
छूट चुके रिश्तों का...
और बड़ा होता है खारापन,
आंसूओं का...
चुप्पियां बड़ी होती हैं,
और उनमें छिपा दर्द भी..
ये तमाम शहर बड़े होते हैं हमारे साथ...
हमारे-तुम्हारे शहर...
शहरों की दूरियां घटती हैं,
रिश्तों की नहीं घटती...

और उम्मीद भी तो बड़ी होती है....
कि किसी दिन तेज़ आंधी में,
जब लचक रहा होगा मन,
हम पकड़ सकेंगे उम्र का दूसरा सिरा...
उम्र न सही एक ख़ास दिन ही सही,
बड़ा दिन..

मुझे उधार दो कुछ रद्दी ख्वाहिशें,
और एक पुरानी छुअन भी,
हमारी उदासियों का कोरस जो तुम्हारे पास है...
कि इस दिन को सजाया जाए..

उम्र जो छूट गई तुम्हारे मुड़ने से...
उसका कोई नाम नहीं....
दिन जो बड़ी जतन से सजा है आज..
उसका कोई नाम तो हो...
कोई तो नाम रखो इस दिन का...

ज़िंदगी तुमको सौंपनी थी मगर,
लो ये बड़ा दिन तुम्हारे नाम किया...

निखिल आनंद गिरि

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20 कविताप्रेमियों का कहना है :

डा.राष्ट्रप्रेमी का कहना है कि -

मुझे उधार दो कुछ रद्दी ख्वाहिशें,
और एक पुरानी छुअन भी,
हमारी उदासियों का कोरस जो तुम्हारे पास है...
कि इस दिन को सजाया जाए..

उम्र जो छूट गई तुम्हारे मुड़ने से...
उसका कोई नाम नहीं....
दिन जो बड़ी जतन से सजा है आज..
उसका कोई नाम तो हो...
कोई तो नाम रखो इस दिन का...

ज़िंदगी तुमको सौंपनी थी मगर,
लो ये बड़ा दिन तुम्हारे नाम किया...

निखिल जी कहां कोई किसी को जिन्दगी सौंप पाता है, कवि मन है जो रोता हुआ भी गाता है.

sukti का कहना है कि -

जुस्तजू जिसकी थी उसको तो न पाया हमने....
इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हमने....

आपकी कविता यही याद दिला गई..अच्छी लगी..

ranjana का कहना है कि -

bahut komal, man ki gahrai se likhi hui kavita man ko gahrai tak chu gayi...subhkamnayen

Deepali Sangwan का कहना है कि -

tum jab mude the.. Behtareen shuruaat ki hai nazm ki
kuch waqt se kuch aise hi khayal par meri ek nazm ruki hai.. Main aisa kuch kyun nahi soch paayi..

मुझे उधार दो कुछ रद्दी ख्वाहिशें,
और एक पुरानी छुअन भी,
mujhe yeh misre bahut bahut umda lage. Nazm acchi kahi.. Badhai

स्वप्निल कुमार 'आतिश' का कहना है कि -

मेरे चेहरे पर सूरज ने मल दी उदासी,
जो धूप के हर टुकड़े में पूरी नज़र आती है..

mere sir pe padne hazaro chhaanh ..is misre ke naam ... :)

हमारे साथ बड़ा होता है खालीपन....
छूट चुके रिश्तों का

sau take sahi baat

उम्र न सही एक ख़ास दिन ही सही,
बड़ा दिन..

han shayad saal ka sabse bada din .. suna hai saal me do baar aata hai aisa din ..jab wo aam dino bki apeksha lambe hote hain .. han ..par is lambe din ko "bada din " koi khaas hi bana sakta hai .. is bade lambe din ki khasiyat main mehsoos kar chuka hun .. :)

उम्र जो छूट गई तुम्हारे मुड़ने से...
उसका कोई नाम नहीं....

luvlyyyyyy .... :)

ज़िंदगी तुमको सौंपनी थी मगर,
लो ये बड़ा दिन तुम्हारे नाम किया...

mere liye ye baat bahut jyada khaas rahi ..personally mere dil ke bahut kareeb aayi nazm .. behad shuqriya...

मनोज कुमार का कहना है कि -

इस कविता में बहुत बेहतर, बहुत गहरे स्तर पर एक बहुत ही छुपी हुई करुणा और गम्भीरता है।

manu का कहना है कि -

जाने क्यूँ...
हमें लगा था कि बस हम ही परेशान हैं....


:)
अच्छा लगा ......!

आपको भी परेशान देखकर...

manu का कहना है कि -

:)

sumita का कहना है कि -

अपने ही बोझ तले झुक गए हैं...
जो भी देखता है कहता है,
बड़े हो गए हैं हम...
बड़ी सटीक बात कही है सुन्दर रचना के जरिये..बहुत-बहुत बधाई !!

डा. अरुणा कपूर. का कहना है कि -

उम्र जो छूट गई तुम्हारे मुड़ने से...
उसका कोई नाम नहीं....
दिन जो बड़ी जतन से सजा है आज..
उसका कोई नाम तो हो...
कोई तो नाम रखो इस दिन का...

उत्तम रचना से रुबरु कराया है आपने!

विश्व दीपक का कहना है कि -

निखिल जी,
बड़े दिन से आप बस दो दिन पीछे रह गए, दर-असल २१ जून को साल का सबसे बड़ा दिन था :)

jokes apart
बहुत कुछ कह गए इस कविता में आप। कविता की शुरुआत बहुत खूब हुई.. ऐसी हुई कि पहली पंक्ति पढने के बाद कोई पूरी कविता पढे बिना नहीं रह सकता।

पहले पैराग्राफ और अंतिम पैराग्राफ़ के बीच जीवन-दर्शन की बातें भी कर ली आपने। मतलब कि वो बातें सबके लिए एक समान हीं हैं.. हर कोई उन बातों से इत्तेफ़ाक रखता है कि कैसे उम्र के बढने से यादें घटने लगती हैं और ज़िंदगी का खारापन बढने लगता है।

किसी को खोने का दर्द कैसा होता है, इसे कहने के लिए शब्द कम हो जाते हैं फिर भी आपने उस दर्द, उस खलिस को जितने भी शब्द दिए हैं, सारे न्याय-संगत और प्रासंगिक हैं। और अंत में अपनी ज़िंदगी को अपना एक दिन नाम कर देना, भावनाओं की पराकाष्ठा है। इस विषय में और क्या कहा जा सकता था - मुझे यह मालूम नहीं, इसलिए मेरे हिसाब से आप सफल हुए हैं।

बधाई स्वीकारें।
-विश्व दीपक

विपुल का कहना है कि -

बेहतरीन कविता। कविता कहलाये जाने की सभी शर्तों को पूरी करती हुई!

" अपने हालात का कुछ अन्दाज़ा नहीं,
दोस्तों से सुना है परेशान हूं मैं!"

बहुत खूब निखिल जी...!

हरकीरत ' हीर' का कहना है कि -

दिन जो बड़ी जतन से सजा है आज..
उसका कोई नाम तो हो...

ये बड़ा दिन तो जंचा नहीं .....(नाम )

अब इतने भी बड़े मत होइए ....हमें और भी रचनाये पढनी हैं.... प्यारी सी .....आपकी .....!!

चण्डीदत्त शुक्ल का कहना है कि -

नए प्रतीक. बहुत खूब. छू गई दिल को

Prem Chand Sahajwala का कहना है कि -

निखिल जी,
मैं छंद-मुक्त कविता बहुत कम पसंद करता हूँ. बड़ा choosy हूँ. लगता है कि कविता को झेल रहा हूँ. पर कोई कोई कविता इतनी नायाब होती है कि अपनी बात myth लगने लगती है. आप की कविता सचमुच बेहद नायाब है. हालांकि ऐसा ज़रूर महसूस हुआ कि कविता बहुत मेहनत से construct की हुई सी लगती है. इस से उस का स्तर कम नहीं हुआ, पर लगता है, यह आप की शुरुआत है, न कि चरम. अभी तो Mount Everest तक आप को जाना है. फिलहाल आप की यह कविता पढ़ कर मुझे अपना एक शेर याद आ गया:

जिंदगी के कागज़ पर दस्तखत उमर के हैं,
सांझ के धुंधलके पर कुछ निशाँ सहर के हैं.

मेरी प्रतिक्रिया में कोई बात बुरी न मानना.

निर्मला कपिला का कहना है कि -

मुझे उधार दो कुछ रद्दी ख्वाहिशें,
और एक पुरानी छुअन भी,
हमारी उदासियों का कोरस जो तुम्हारे पास है...
कि इस दिन को सजाया जाए..
तारीफ? शब्दों मे तो हो नही सकती। भावनाओं का तेज प्रवाह इसे भी कोई नाम नही दिया जा सकता
ज़िंदगी तुमको सौंपनी थी मगर,
लो ये बड़ा दिन तुम्हारे नाम किया..
जज़्बात, एहसास, प्यार ,गिले, शिकवे ,उदासी और एक समर्पण का भाव इस कविता की विशेशता है। बहुत बहुत बधाई।

M VERMA का कहना है कि -

पत्थर समय से टकराकर,
मज़बूत हो गए हैं हम,
और फिर यह मजबूती कायम रखने के क्रम में चालाकी का प्रादुर्भाव भी तो होता है
अच्छी रचना

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

मनु जी, विपुल, हरकीरत जी...
इस कविता के बहाने ही सही, बड़े दिन बाद दिखे तो सही....

अमृत उपाध्याय का कहना है कि -

''मुझे उधार दो कुछ रद्दी ख्वाहिशें,
और एक पुरानी छुअन भी,
हमारी उदासियों का कोरस जो तुम्हारे पास है...''

बेहतरीन है जनाब...

himani का कहना है कि -

खुली जो आंख तो वो था.. न वो जमाना था दहकती आग थी तन्हाई थी फसाना था गमों ने बांट लिया मुझे यूं आपस में के जैसे मैं कोई लूटा हुआ खजाना था ये क्या के चंद ही कदमों पे थक के बैठ गए तुम्हें तो साथ मेरा दूर तक निभाना था

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