फटाफट (25 नई पोस्ट):

Friday, June 25, 2010

तुन बन स्‍मृति ढक लेते हो


प्रतियोगिता की तेरहवीं कविता मनसा आनंद मानस की है। मानस लम्बे समय से हिन्द-युग्म पर सक्रिय हैं, मगर पहली बार यूनिकवि प्रतियोगिता के माध्यम से प्रकाशित हो रहे हैं। एक किसान घर में पेदा हुये, तो जाहिर है कहीं पेड़ पोधो से जुडाव तो होगा ही। फिर जीवन में ऊचे-नीचे, तल देखे, ओशो से जुडने के बाद ही सही मायने में पता चला की इनका होना क्‍या है। अब जीवन में कुछ माधुर्य कुछ सु्गंध ओर ताजगी का अहसास कर रहे हैं। दिल्ली में रहते हैं और अपना निजी व्यवसाय चलाते हैं।

कविता: तुम बन स्‍मृति ढक लेते हो,

तुम बन स्‍मृति ढक लेते हो,
मेरे होने के एक कुहासे को।

एक अपरिचित से अस्पृश्यता भी, रह-रह कर जब छू जाती है।
एक स्‍फटिक, प्रतिबिम्‍ब स्वेत पटल, दर्पण में आ कुछ कहता है।
हम ढूँढ़े तुम्‍हें उन चेहरों में, नित बनते रोज बिगड़ते है ।
धुँधली राहे अंजान डगर, क्‍यों मूक पथिक बन जीते है ।
फैले जीवन के रंगों को,
क्‍यों धुंधला करते जाते हो।
तुम बन स्‍मृति ढक लेते हो.....

न मेरा होना पास रहा, न अंहकार का साथ रहा।
सुरमई चाँदनी बैल में, कर अंधकार उपहास रहा।
जो अपना-अपना कहते थे, कोसों न उनका साथ रहा।
भय मुझको फिर क्‍यों लगता है, जब तेरा सर पर हाथ रहा।
तू छू कर एक रहस्‍य को,
फिर क्‍यों जीवित कर जाते हो।
तुम बन स्‍मृति ढक लेते हो........

थमता न साँसों का स्पन्दन, घुट-घुट कर हम जीते हे।
संकुचित दुर्गों की परिधि यों में, हम जड़वत हो कर मरते है।
जग कहता है जिसको अमृत, वो विष के प्‍याले पीते है।
टूटे-बिखरे टुकड़ो से भी हम,पैबन्‍द जीवन का क्‍यों सीते है।
था जीवन जो प्‍यालों भरा, अब वो भी रितते दिखते है।
पलकों पे सोते सपनों को,
तुम कब जीवत कर पाते हो।
तुम बन स्‍मृति ढक लेते हो.......

जब तुम होते हो पास मेरे, कोई आकर मुझे जगाता है।
कितने तारों की छाती पर यूँ चाँद दमकता पाता है।
इस आस पूछती रहती है, क्‍यों बैठ पपीहा गाता है।
उन्‍माद फैलता तृप्‍ति का, आलोकिक करता जाता है।
सुरमई चांदनी बेला में,
तुम मधुरस बन छा जाते हो।
तुन बन स्‍मृति ढक लेते हो।
मेरे होने के एक कुहासे को.....

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

9 कविताप्रेमियों का कहना है :

डा.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी का कहना है कि -

जग कहता है जिसको अमृत, वो विष के प्‍याले पीते है।
टूटे-बिखरे टुकड़ो से भी हम,पैबन्‍द जीवन का क्‍यों सीते है।
था जीवन जो प्‍यालों भरा, अब वो भी रितते दिखते है।
जीवन का कटु यथार्थ चित्रित किया है.

M VERMA का कहना है कि -

थमता न साँसों का स्पन्दन, घुट-घुट कर हम जीते हे।
संकुचित दुर्गों की परिधि यों में, हम जड़वत हो कर मरते है।
श्वासों का स्पन्दन ही तो है जो जीजिविषा प्रदान करती है वर्ना तो ....
सुन्दर कविता

Unknown का कहना है कि -

थमता न साँसों का स्पन्दन, घुट-घुट कर हम जीते हे।
संकुचित दुर्गों की परिधि यों में, हम जड़वत हो कर मरते है।

सुंदर शब्दों का संगम!

सदा का कहना है कि -

गहरे भावों के साथ बेहतरीन शब्‍द रचना ।

निर्मला कपिला का कहना है कि -

स आस पूछती रहती है, क्‍यों बैठ पपीहा गाता है।
उन्‍माद फैलता तृप्‍ति का, आलोकिक करता जाता है।
सुरमई चांदनी बेला में,
तुम मधुरस बन छा जाते हो।
तुन बन स्‍मृति ढक लेते हो।
मेरे होने के एक कुहासे को..... बहुत सुन्दर प्रेम अभिव्यक्ति के साथ विरह की पीडा बहुत अच्छी लगी रचना आनन्द जी को बधाई

oshoganga-ओशो गंगा का कहना है कि -

इस भोर बुलाती रहती है,

हम करवटल ले सो जाते है,

वह कलरव गीत पपीपे है,

है मुक विलूप्‍त हो जाते है

दिन रात वो छलती आस हमें

कहीं चैन न लेने देती है

दामन में बिखरे कांटो को

क्‍यों टीस न होने देती है

जी चाहता है में उड जाऊं

पर पंख हमें छल जाते है.......

स्‍वामी आनंद प्रसाद मनसा

GK Khoj का कहना है कि -

GK in Hindi
Titanic Jahaj
CIBIL Score in Hindi
Bacteria In Hindi
Globalization in Hindi
Mumbai in Hindi
DP in Hindi
EMI in Hindi
ISO Full Form

GK Khoj का कहना है कि -

Leopard in Hindi
IRDA Full Form
NTPC Full Form
Mars in Hindi
Computer Ka Avishkar Kisne Kiya
Mobile Ka Aviskar Kisne Kiya
Tv Ka Avishkar Kisne Kiyai
Google Ki Khoj Kisne Ki
Google in Hindi
Bulb Ka Avishkar Kisne Kiya

GK Khoj का कहना है कि -

Proton Ki Khoj Kisne Ki
Lotus in Hindi
GDP in Hindi
Metabolism Means In Hindi
MICR in Hindi
Electron Ki Khoj Kisne Ki
Pigeon in Hindi
IMPS in Hindi
LPG Gas in Hindi
Apple in Hindi

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)