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चरित्र और आवरणः लवली गोस्वामी


मई 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता की 14वीं कविता अत्यंत सक्रिय ब्लॉगर लवली गोस्वामी की है।

कविता: चरित्र और आवरण

रंगमंच में कलाकारों के चहरे हैं...
भाव पैदा करने की कोशिश करते
वो अपनी कला का सर्वोत्तम देना चाहते हैं
इन भाव भागिमाओं से
हर दर्शक को आश्चर्य चकित कर देना चाहते हैं
सफ़ेद रोशनी में भावों की कई तहों से लिपटे चेहरों में
मुझे कोई अभिनय नजर नही आता
यह सब सच-सा लगता है
जैसे वे लोग अपने अन्दर का कुछ उड़ेल कर सामने रख देना चाहते हैं
वे जी रहे हैं खुद को इन चरित्रों के आवरण में

अब खत्म हुआ नाटक
पहुँची मैं जनरव के मध्य
इस आशा के साथ की यहाँ भाव बनावटी नही होते
पर आश्चर्य है यहाँ के चरित्रों में सब कुछ अलग-सा दीखता है
निकाल लेना चाहते हैं ये अपने जीवन के अनुभवों से सर्वोत्तम
पर सब बनावटी-सा लगता है
जैसे लोग अपने अन्दर से पुरे वेग से फूटता कुछ
जबरन रोक लेना चाहते हैं, क्या है यह?
सकारात्मकता तो इतना विकृत नहीं करती चहरे को
सोंचती हूँ, लगता है यह भी जी रहे हैं आवरण में
पर इस बार आवरण खुद इनके चरित्रों पर है

ज़रा से वक़्त का हर दिन


प्रतियोगिता की सत्रहवीं कविता नवोदित रचनाकार की है। 24 वर्षीय, अभितान्त्रिकी में स्नातक आशीष पंत मूलतः नैनिताल से हैं और इन दिनों मेलबर्न (ऑस्ट्रेलिया) में हैं। सूचना प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में कार्यरत हैं और एक बैंक के लिए काम करते हैं। कविता लिखना हाल में ही शुरू किया है। इनका मानना है कि अपने बारे में गहराई से जानने की कोशिश बदस्तूर ज़ारी रहती है पर फिलहाल जानने को बहुत कुछ बाकी है। खुद को पूरा जान लें तो और बाकी रह क्या जायेगा। किताबें और लोगों को पढना, घूमना-फिरना, संगीत सुनना, विचाराधीन रहना और दोस्तों से बातें करना इन्हें अच्छा लगता है।

कविता: वो वक्त

किस्सों भरा प्रेम ग्रन्थ नहीं गढ़ा हमने
पर उस अल्प कथा का हर वरक था
मेरी हर कॉपी के आखरी पन्ने जैसा
सच्चा, मौलिक, - अपना

ना था पूरी उम्र का साथ अपने नसीब में
पर उस ज़रा से वक़्त का हर दिन था
गर्मियों की छुट्टियों के पहले दिन जैसा
उत्साहित, उतावला, - चंचल

कहने की बात नहीं कि कहा नहीं कुछ
पर अपनी खामोशियों का सबब था
एकांत हरे उपवन में कोयल की कूक सा
सुरमयी, मीठा, - गुंजित

चाहत, यारी, इश्क, मोहब्बत पता नहीं
पर वो रिश्ता कुछ तो ख़ास था
छन के आती धूप और सूरजमुखी सा
अतुल्य, अनकहा, - अंजान

अंजाम से तो सदा वाकिफ थे ही हम
पर अदभुत वो विदाई का क्षण था
अंतिम परीक्षा की आखरी घंटी जैसा
आज़ाद, निश्चिन्त, - अंतिम

तुन बन स्‍मृति ढक लेते हो


प्रतियोगिता की तेरहवीं कविता मनसा आनंद मानस की है। मानस लम्बे समय से हिन्द-युग्म पर सक्रिय हैं, मगर पहली बार यूनिकवि प्रतियोगिता के माध्यम से प्रकाशित हो रहे हैं। एक किसान घर में पेदा हुये, तो जाहिर है कहीं पेड़ पोधो से जुडाव तो होगा ही। फिर जीवन में ऊचे-नीचे, तल देखे, ओशो से जुडने के बाद ही सही मायने में पता चला की इनका होना क्‍या है। अब जीवन में कुछ माधुर्य कुछ सु्गंध ओर ताजगी का अहसास कर रहे हैं। दिल्ली में रहते हैं और अपना निजी व्यवसाय चलाते हैं।

कविता: तुम बन स्‍मृति ढक लेते हो,

तुम बन स्‍मृति ढक लेते हो,
मेरे होने के एक कुहासे को।

एक अपरिचित से अस्पृश्यता भी, रह-रह कर जब छू जाती है।
एक स्‍फटिक, प्रतिबिम्‍ब स्वेत पटल, दर्पण में आ कुछ कहता है।
हम ढूँढ़े तुम्‍हें उन चेहरों में, नित बनते रोज बिगड़ते है ।
धुँधली राहे अंजान डगर, क्‍यों मूक पथिक बन जीते है ।
फैले जीवन के रंगों को,
क्‍यों धुंधला करते जाते हो।
तुम बन स्‍मृति ढक लेते हो.....

न मेरा होना पास रहा, न अंहकार का साथ रहा।
सुरमई चाँदनी बैल में, कर अंधकार उपहास रहा।
जो अपना-अपना कहते थे, कोसों न उनका साथ रहा।
भय मुझको फिर क्‍यों लगता है, जब तेरा सर पर हाथ रहा।
तू छू कर एक रहस्‍य को,
फिर क्‍यों जीवित कर जाते हो।
तुम बन स्‍मृति ढक लेते हो........

थमता न साँसों का स्पन्दन, घुट-घुट कर हम जीते हे।
संकुचित दुर्गों की परिधि यों में, हम जड़वत हो कर मरते है।
जग कहता है जिसको अमृत, वो विष के प्‍याले पीते है।
टूटे-बिखरे टुकड़ो से भी हम,पैबन्‍द जीवन का क्‍यों सीते है।
था जीवन जो प्‍यालों भरा, अब वो भी रितते दिखते है।
पलकों पे सोते सपनों को,
तुम कब जीवत कर पाते हो।
तुम बन स्‍मृति ढक लेते हो.......

जब तुम होते हो पास मेरे, कोई आकर मुझे जगाता है।
कितने तारों की छाती पर यूँ चाँद दमकता पाता है।
इस आस पूछती रहती है, क्‍यों बैठ पपीहा गाता है।
उन्‍माद फैलता तृप्‍ति का, आलोकिक करता जाता है।
सुरमई चांदनी बेला में,
तुम मधुरस बन छा जाते हो।
तुन बन स्‍मृति ढक लेते हो।
मेरे होने के एक कुहासे को.....

कविता उतारती है कपड़े


प्रतियोगिता की सोलहवीं कविता हरकीरत कल्सी हकीर की है। कवयित्री बहुत लम्बे अर्से के बाद हिन्द-युग्म पर सक्रिय हुई हैं। हिन्द-युग्म पर कई बार प्रकाशित हो चुकी हैं।

कविता: कपड़े उतारती कविता

मानव मन की चेतना में
नित हो रहा है विस्फोट ...
आद्यांत राजनीती में धँसे
हिम शय्या पर लेटे
परम्पराओं के ....
नवाचारों के संघात से
क्षीण-विक्षीण संस्कृति में
लिपटी कविता
वेदना और आक्रोश में
उतारती है कपड़े .....

सत्ता पक्ष ने
खड़ी कर दी है इक
अमानवीय क्रूर बौद्धिकता ....
जहाँ सम्वेदनशील कविता
देश की अंतहीन दुर्दशा पर
बहाती है आँसू .....

इक खामोश डर
कहीं भीतर कुलबुलाता है
पता नहीं कब, कौन,कहां
हथियार लिए आये
और दाग दे गोली सीने पर
अभी पिछले ही दिनों वह
देश की सभी बड़ी ताकतों को
जेब में लिए घूमता था .....

कोई रहस्य नहीं है इसमें
न असमंजसता का है कोई कारण
मानवीय शक्तियों ने छीन ली है
मानव से उसकी मनुष्यता ....

अब वह नहीं लिखता
प्रेम-प्रसंग पर कवितायें
किसी भारी-भरकम पत्थर की तरह
अपने वाक्‌जाल से पटक देता है
कविता को सड़क पर ....

और कविता धराशाई हो
अपने रिसते ज़ख्मों से
धीरे-धीरे फ़ैलाने लगती है
शब्दों का संक्रमण ......!!

तेरी आवाज़ क्यूँ नहीं मिलती...


दीपाली आब हिन्द-युग्म के सक्रियतम पाठकों और लेखकों में से एक है। प्रस्तुत कविता जिसने मई माह की यूनिप्रतियोगिता में 15वाँ स्थान बनाया है, की रचयित्री आब ही हैं।

कविता: तेरी आवाज़ क्यूँ नहीं मिलती

तेरी आवाज़ क्यूँ नहीं मिलती

कहते हैं फ़ज़ाओं में
अल्फाज़ तैरते रहते हैं
जुबाँ से फिसल जाने के बाद

वही है रेशमी चाँदनी अब भी
वही है नर्म संदली सी हवा
गेसू-ए-शब अब भी
उतनी ही तारीक है
इसके ही किसी ख़म में जा उलझी होगी
तेरी आवाज़
मुझे देख कर छुपी होगी

है यकीं मुझको वो यहीं होगी
खामशी* ओढ़ कर के सोयी नहीं
तेरी आवाज़ अब भी जिन्दा है

वरना इक वक्फा ही तो गुज़रा है
अभी तो तुमको ठीक से मैंने
अलविदा भी नहीं कहा जानाँ

तेरी आवाज़ जो मिल जाये मुझे
बाँध के रख लूँ उसको दामन से

आखिरी लफ्ज़ हैं तेरे हमदम
ऐसे जाया न कहीं हो जाए

ढूँढ़ती फिरती हूँ हवाओं में
चाँद के, तारों के दालान में
तेरी आवाज़ पर नहीं मिलती
तेरी आवाज़ क्यूँ नहीं मिलती...!!

*खामोशी

मेरी नायिका शरतचन्द्र को केवल कहानियों में मिली थी


युवा कवि मुकुल उपाध्याय कभी-कभार ही लिखते हैं, लेकिन जब कभी भी कलम उठाते हैं कुछ बेहतर लिख जाते हैं। मुकुल की कविताएँ 38 यूनिकवियों की प्रतिनिधि कविताओं के संकलन 'सम्भावना डॉट कॉम' में भी संकलित हैं।

कविता: मेरी नायिका

शरतचन्द्र की कहानियों के गाँव में
अशोक के पेड़ों की लम्बी कतारों के बीचों-बीच
सूनसान पगडंडियों पर गुजरती ......

या गर्म दोपहर में आम के बागीचे से लौटती
लाल किनारे वाली सूती धोती पहने
साँवले चेहरे पर उजली धूप लिए
कभी मिली थी तुम एक सफ़े पर

देखा था तुमको मूसलाधार बारिश की किसी शाम
अमरूद के बाड़े की ओर खुलते वरांडे पर
बारिश के साथ रविन्द्रनाथ के प्रेम गीतों में भीगते हुए
किसी नॉवेल में
पर
बाद उसके ढूँढ़ा तुम को ज़िन्दगी में
स्कूल, कॉलेज
बाज़ार, हाट
गली, मोहल्ले
राहों-चौराहों
पोखर-धारे
गाँव-शहर-महानगर, द्वारे-द्वारे
पर तुम कहीं नहीं थी

मेले-ठेले
नाटक, नौटंकी
रामलीलाओं,जगराते
बाजे-घाजे
महफ़िल, सन्नाटे
सब जगह तुम्हारी टोह ली
पर तुम कही नहीं थी....

हिन्दू, मुस्लिम
सिख, इसाई
जैन, पादरी
ब्रह्मण, क्षत्रिय
वैश्य, शू ...
गोरे , काले
सारी जातों, नसलों सब जगह तुम्हें खोजा, खंगाला
तुम्हारी सम्भावना को स्वीकारा.

पर तुम कहीं भी नहीं थी
मेरी नायिका!

शरदचन्द्र को भी तुम बस
उनकी कहानियों में ही मिली हो शायद

मेरी नायिका!

ज़िंदगी और ख़्वाब


युवा कवयित्री ऋतु सरोहा की कविताएँ अक्सर ही निर्णायकों का ध्यान खींचती रही हैं। मई माह की यूनिप्रतियोगिता में इनकी कविता ने ग्याहरवाँ स्थान बनाया।

कविता: ख़्वाब

मेरा ही कोई
ख्वाब था शायद.,
"छत
किसी काई भरे
तालाब की तरह
पिघली-सी थी,
पंखा तैरता था
कभी डूबता था...

ख़्वाब टूटा तो
आँख
स्याह पानी से भरी थी,
मुस्कुराहट तैरती थी
तो कभी डूब जाती थी....

उफ़ ..!
ज़िन्दगी ख्वाबों में और
ख्वाब आँखों में घुल गए हैं.....

क्या मै सोचता रह जाऊँगा


मई महीने की प्रतियोगिता की तीसरी कविता के रचयिता हरदीप सिंह राणा पहली बार हिन्द-युग्म पधारे हैं। गाँव अराइंपुरा, जिला करनाल, हरियाणा निवासी हरदीप उर्फ कुँवर जी ने कक्षा दस तक की पढ़ाई अपने गाँव से ही की है। अनजाने में ही इंजिनयरिंग का डिप्लोमा कर लिया और उसके बाद से ही निजी क्षेत्र में नौकरी का आनंद उठा रहे हैं। पढ़ने की थोड़ी ओर इच्छा थी, सो नौकरी के साथ-साथ विश्वविद्यालय की पत्राचार वाली सुविधा का लाभ उठाते हुए स्नातक भी पूरा कर लिया। दर्शनशास्त्र विषय के साथ स्नात्कोत्तर के लिए आवेदन किया था पर नौकरी के साथ सामंजस्य बैठाने के चक्कर में परिक्षाए नहीं दे पाये। इन्हें अपने लिखने का तो ज्यादा नहीं पता लेकिन कई बार अपने लिखे को जब पढते हैं तो विश्वास नहीं होता कि ये सब इन्होंने लिख दिया। पर कुछ भी देख, सुन, पढ़ कर ये उस से प्रभावित हुए बिना नहीं रहते।

पुरस्कृत कविता: लेकिन क्या मै सोचता रह जाऊँगा

रात में सूरज को तरसता हूँ,
दिन में धूप से तड़पता हूँ
आखिर क्या होगा मेरा.....?
मै हूँ कहाँ इस यात्रा में....?
सोचता हूँ तो पाया


मुझे
ना मंजिल का पता है
ना पहचान है,
ना रास्ते में हूँ
ना सराय में,
मंजिल भी सोचती होगी
ये भी
अजीब नादान है!

खजूर की छाँव देख भी
ललचा जाता हूँ,
जबकि जानता हूँ मै
थोड़ा आगे ही तो
पीपल की घनी छाँव भी है!

राह छोड़
पगडंडियों
पर भटक जाता हूँ,
जबकि मै
देख चुका पहले भी
कि
इनका भी तो
ये राह ही
पड़ाव है!

ऐसा लगता है
जैसे नींद में हूँ,
अभी मै
सो रहा हूँ,
आँख भी खुलती है कई बार
खुली भी है,
अँधेरा देख
पता ही नहीं लगता कि
भोर है या रात
और मै फिर सो जाता हूँ!

मै सोचता हूँ
इस बार
वो मुझे बतायेगा नहीं
जगायेगा!
सही राह पर नहीं चलाएगा
बल्कि
अपनी गोदी में उठाएगा,
झूठी हँसी नहीं
सच्चे आँसू रुलाएगा.....

लेकिन क्या मै सोचता रह जाऊँगा....?

पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

एक चिड़िया मरी पड़ी थी


एम वर्मा हिन्द-युग्म के अत्यधिक सक्रिय पाठक-कवियों में से हैं। एकबार हिन्द-युग्म के यूनिकवि भी रह चुके हैं। मई 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता में भी इनकी एक कविता ने दसवाँ स्थान बनाया।

पुरस्कृत कविता: एक चिड़िया मरी पड़ी थी

बलखाती थी
वह हर सुबह
धूप से बतियाती थी
फिर कुमुदिनी-सी
खिल जाती थी
गुनगुनाती थी
वह षोडसी
अपनी उम्र से बेखबर थी
वह तो अनुनादित स्वर थी
सहेलियों संग प्रगाढ़ मेल था
लुका-छिपी उसका प्रिय खेल था
खेल-खेल में एक दिन
छुपी थी इसी खंडहर में
वह घंटों तक
वापस नहीं आई थी
हर ओर उदासी छाई थी
मसली हुई
अधखिली वह कली
घंटों बाद
शान से खड़े
एक बुर्ज के पास मिली
अपनी उघड़ी हुई देह से भी
वह तो बेखबर थी
अब कहाँ वह भला
अनुनादित स्वर थी
रंग बिखेरने को आतुर
अब वह मेहन्दी नहीं थी
अब वह कल-कल करती
पहाड़ी नदी नहीं थी
टूटी हुई चूड़ियाँ
सारी दास्तान कह रही थीं
ढहते हुए उस खंडहर-सा
वह खुद ढह रही थी
चश्मदीदों ने बताया
जहाँ वह खड़ी थी
कुछ ही दूरी पर
एक चिड़िया मरी पड़ी थी

पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

अपनी आँखों में सपने हैं उनकी में सुख सारे


हिन्द-युग्म के पाठक अवनीश सिंह चौहान की कविताओं से परिचित हो चुके हैं। मई 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता में प्रस्तुत कविता ने नवाँ स्थान बनाया है।

पुरस्कृत कविता: किसको कौन उबारे

बिना नाव के माझी मिलते
मुझको नदी किनारे
कितनी राह कटेगी चलकर
उनके संग सहारे

इनके-उनके ताने सुनना
दिन-भर देह गलाना
साठ रुपैया मजदूरी के
नौ की आग बुझाना
अपनी अपनी ढपली सबकी
सबके अलग शिकारे

बढ़ती जाती रोज उधारी
ले-दे काम चलाना
रोज-रोज झोपड़ पर अपने
नए तगादे आना
अपनी-अपनी घातों में सब
किसको कौन उबारे!

पानी-पानी भरा पड़ा है
प्यासा मन क्या बोले
किसकी प्यास मिटी है कितनी
केवल बातें घोले
अपनी आँखों में सपने हैं
उनकी में सुख सारे

पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

वो सच नहीं है जो कथा में लिखा जाता है गाँव


मई माह की यूनिकवि प्रतियोगिता की 8वीं कविता सुरेन्द्र अग्निहोत्री की है। सुरेन्द्र की एक कविता जनवरी महीने की यूनिकवि प्रतियोगिता के शीर्ष 11 में चुनी गई थी। शीर्ष 10 में आने का इनका पहला मौका है।

पुरस्कृत कविता

वो सच नहीं है जो कथा में लिखा जाता है गाँव
उसमें नही होती है हरिया की हूँक, महुआ की छाँव
नहीं होती है उसमें वहाँ लगातार दिलों में जल रही आग
नदी, नाले, खेत-खलिहान और पत्ते बाली साग
हाँ उसमें होता है वाक्-चार्तुय
और अधूरे आसान से पात्र
जो सिर्फ रचना को कालजयी बनाने रचे जाते
विश्वविद्यालयों और गोष्ठियों के लिए पहचाने जाते
सच में अगर उन जैसे गाँव में निकल आते
तो लिखने वाले उसे नहीं पहचान पाते
संदिग्ध विचार का सतही प्रोपेगण्डा
प्रसिद्धि का शॉर्टकट यही है फण्डा।
दुःस्वप्न
यह भी कोई जीना हुआ
जिंदगी दुःस्वप्न बन कर रह गई
बिना नींव की इमारत की तरह
उदासी की परछाईं बन गई
लोगों को आश्चर्य होता
उतार-चढ़ाव भरा यह सफर
चढ़ तीन कमान पर
बड़ा लिए कदम इधर-उधर
भूलने और याद करने को तज कर
चमत्कार को नमस्कार कर
यह भी कोई जीना हुआ
जिंदगी दुःस्वप्न बन कर रह गई
आधा घर इधर
आधा घर उधर
कोई काम नहीं आसान
राशन, थाना, बैंक, अस्पताल बदहाल
मजा लेने का नया शगल
मानवता हो रही बेहाल
कैसे तम्बू कैसे पाल
जिन्दगी से न रखे ख्याल
भूख से दम तोड़ते लोगो को,
लूट कर हो रह मालामाल
डर
चींटियाँ पेड़ों से
अंधेरी नम जगहों में जाने लगीं
हरिया यह देखकर
मन ही मन घबराने लगी
लगातार सूखा से सूख रहे तन की आस
इस वर्ष भी मुरझाने लगी
पिछले बरस भाई को भी खोकर
हिम्मत नहीं हारी थी हरिया
साहूकार, सरपंच और सिपाही की
नहीं पहुँची थी बखिया
लेकिन अब उसकी हिम्मत
तार-तार हो रही
आने वाले संकट से डर
अंधेरे कमरे में रो रही
वह जानती है ललचाती त्रयी
देह के लिए ठहाके लगा रही।
सूखा
गोयथे ने कहा था
जो व्यक्ति पिछले तीन हजार वर्ष के इतिहास को
नहीं जानता
वह अंधकार में जीता है।
सत्ता के सिंहासन पर बैठे लोग
अपने देश/प्रदेश में घट रहे हालात नहीं जानते
उन्हें क्या कहा जाये?
जिन्हें पता नहीं है
राजधानी के बाहर भी है देश/प्रदेश
लोक का तन्त्र गाँवों में रहता है
जो भूख, बेकारी, गर्मी, सर्दी सहता है
जिनके घर में आज भी जिन्दा ममता है
प्यार वहाँ वासना का खेल नहीं
पूजा वहाँ स्वार्थ का मेल नहीं
चेहरे ज्यादा साफ नहीं
लेकिन दिल पूरे साफ हैं
जो गिरगिट की तरह रंग बदलना नहीं जानते हैं
इसीलिए स्वार्थी उन्हें नहीं पहचानते हैं।

पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

हमें खिलाकर ताज़ा खाना माँ बासी रोटी खाती थी


देवेश पाण्डेय जनवरी 2010 से हिन्द-युग्म पर सक्रिय हैं। यह इनकी तीसरी रचना है जिसने मई 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता में सातवाँ स्थान बनाया है।

पुरस्कृत कविताः माँ

1-
माँ क्या है?
एक शब्द
एक भाव
एक खुश्बू
एक ध्वनि
एक दृश्य !
क्या है माँ .....?

जब पैदा हुआ तो
स्पर्श से पहचानता था
दो माह का हुआ तो
आहट से जानता था
पहले छः माह दूध जैसी लगती थी
बाद में उसे रोटी से जान लेता था
महक जो उठती थी रसोई से,घर के चौरे से,
उसे नथुनों में भर के पहचान लेता था
बस एक माँ ही है स्वर्ग दुनिया में
जब-जब आँख खोली मै जान लेता था

अलग-अलग समय पर ही सही
पर शायद एक माँ ही वो अहसास है
जिसका स्वाद हमारी पाँचो इन्द्रियाँ जानती है

2-
आँगन में सब बैठे थे
बच्चे बूढ़े और जवान
खेल कूदकर थककर आया
मै माँ की गोद में लेट गया
चढ़ी धूप तो छाँव की खातिर
माँ का आँचल खीच लिया
गैरो के आगे बेपर्दा माँ
वात्सल्य से ढक जाती है

3-
जून की चिलचिलाती धूप में
काम पे जा रही माँ के पीछे-पीछे
एक अबोध आँगन तक चला आया
बच्चे का पाँव झुलसकर रह गया
दोनों रो रहे थे
बच्चे की आँख और माँ का दिल!

4-
हम बेसुध खेला करते थे
माँ हमें खिलाने आती थी
“पापा से कह दूँगी “
“ना” कहने पर यूँ डराती थी
हमें खिलाकर ताज़ा खाना
माँ बासी रोटी खाती थी

5-
नदी की कलरव में तुम हो
पंछी की कोलाहल में तुम हो
बहती हुई हवा में तुम हो
पेडों की छाया में तुम हो
तुम्हे भूल जाऊँ मैं कैसे
माँ मेरी हर धडकन में तुम हो !!

पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

पुरानी दीवारें और नया कवि


हर माह यूनिप्रतियोगिता के माध्यम से हिंद-युग्म से कई नये कवि भी जुड़ते हैं। प्रतियोगिता की पाँचवी कविता भी एक नये कवि की है। रचनाकार प्रदीप शुक्ला की यह हिंद-युग्म पर प्रथम कविता ही है। 10 अगस्त 1978 को जन्मे प्रदीप जी मध्य प्रदेश के रहने वाले हैं। गणित से स्नातक करने के बाद प्रदीप ने एम बी ए भी किया है तथा सम्प्रति जबलपुर मे निवास कर रहे हैं।

पता: C/O वाई पी पाठक,
मकान सं.- 249, संजीवनी नगर,
जबलपुर (म.प्र.)

पुरस्कृत कविता

पुरानी दीवारो पर पुते हुए
नये पेंट के रंग उखड़ गये है
दीवार के पुराने दिन
कहीं इनसे झाँकते से लगते लगते हैं
तुम्हारी उंगलियों से उकेरे हुए फूल अब भी मुस्कुराते हैं
इन्हीं दीवारो पर
इन्हे वक्त का कोई निशाँ मुरझा ना सका
मेरे नाम की स्याही
पुराने दिनों की दीवार पर अब भी गहरी है ...
कोई सिलवट तक नही आई उन लम्हो पर,
जिन्हे तुमने अपने होंठो से छू लिया था
इन दीवारो को तुम्हारी खुश्बू भी याद है
इन्हे तुम्हारे पैरों की आहटें भी पता हैं …..
इन्हे यकीन है
तुम फिर इन पे टिक कर
देर तक मुझे देखोगी
 मुझसे बात करोगी
ये दीवारे किसी रिश्ते से कम नही लगती
ये दीवारे किसी कंधे से कम नही लगती
इन्ही से लिपट तुम्हारी याद के फूल बोते थे
  इन्ही से टिक के तुम्हारी उंगलिया छूते थे
इन्हे तुम्हारे खत के हर हरफ़ याद हैं
ये दीवारे नही मेरी रूह की किताब हैं
तुम आना कभी
और छू के इनको मेरे सारे गुज़रे दिन पढ़ लेना
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पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

खाप सरपंच


यूनिप्रतियोगिता की चौथे स्थान की कविता के द्वारा एक नये कवि हिंद-युग्म के मंच से जुड़ रहे हैं। कविता के रचनाकार वसीम अकरम की हिंद-युग्म पर यह पहली कविता है। उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद से तअल्लुक रखने वाले वसीम वर्तमान मे दिल्ली मे स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर रहे हैं। वसीम को कविता लिखने का शौक 15 वर्ष की आयु से ही है और इन्होने गज़ल, कविता, नज़्म जैसी तमाम विधाओं मे हाथ अजमाया है। इनकी कई कविताएं, ग़ज़लें और लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मे प्रकाशित हो चुके हैं।

प्रस्तुत सामयिक कविता हमारे समय के एक ज्वलंत विषय को उठाते हुए खाप पंचायत के पहरुओं से कुछ तीखे सवाल करती है।

पुरस्कृत कविता: खाप सरपंच

कानून और संविधान को
ठेंगे पर रखकर
फैसला सुनाते हो तुम
मानो किसी की जिंदगी 
तुम्हारे ही हाथ में हो जैसे।

नये हो तुम
मगर तुम्हारे लिबास
बर्बर परंपराओं के 
रूढ़ धागों से बने हैं,
तुम इन्हें नहीं उतारते
कहीं तुम आदमी न बन जाओ
तुम इन्हें नहीं फेंकते
कहीं तुम आधुनिक न हो जाओ
वो इसलिए कि फिर
पुरातनपंथी और रुढ़ियों की
बंजर हो रही तुम्हारी दुकान
कौन चलायेगा तुम्हारे बाद।

सगोत्र विवाह की सज़ा के नाम पर
उस लड़की के साथ
सामूहिक बलात्कार करते हो तुम
और ये भूल जाते हो
कि वो तुम्हारे ही गांव की
तुम्हारे ही गोत्र की 
तुम्हारी ही बहन है।

यह कैसी ठेकेदारी है
परंपरा की और धर्म की 
जहां किसी ग़लती की सज़ा 
सामूहिक बलात्कार के बाद 
सरे आम मौत है। 
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पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता। 
 
 

सपने टूटे: राजेंद्र स्वर्णकार की कविता


यूनिप्रतियोगिता की पाँचवीं कविता के रचनाकार राजेंद्र स्वर्णकार हैं। हिंद-युग्म से उनका जुड़ाव पिछले माह की प्रतियोगिता से ही हुआ है, जबकि उनकी कविता नवें पायदान पर रही थी। मूलत: छंदबद्ध कविताएं रचने वाले राजेंद्र जी अपने गीतों व ग़ज़लों को सुरबद्ध कर विभिन्न मंचों व आकाशवाणी पर सस्वर पाठ भी कर चुके हैं। अभी तक एक हजार से ऊपर गीत, ग़ज़ल, कविताएँ आदि का प्रकाशन हो चुका है व दो काव्य-संग्रह भी प्रकाशित हैं।

प्रस्तुत कविता कचरा बीनने वाले बच्चों के बहाने निर्धन बचपन की कठोर विषमताओं और उसके प्रति उपेक्षापूर्ण सामाजिक दृष्टिकोण की करुण कथा कहती है।

पुरस्कृत कविता: सपने टूटे

छूटे हमसे अपने छूटे !
मासूमों के सपने टूटे !!

भद्दी गाली, झापड़, घुड़की !
बचपन की क़िस्मत में झिड़की !
सब दरवाजे बंद; चिढ़ाए
हमको हर घर की हर ख़िड़की !
नज़र हमें आते हैं जब तब
हाथ-हाथ में पांच अंगूठे !!

किस-किस से की हाथापाई !
बीन के कचरा, रोटी खाई !
सिक्के चार हाथ में आए;
हाय! छीन ले पुलिस कसाई !
ऊपर से थाने ले जा कर
नंगा कर के बेंत से कूटे !!

बाबूजी कुछ काम दिला दें !
गाड़ी धो दूं, चाय पिला दें !
भले-भले लोगों की हरकत ?
हैवानों के हृदय हिला दें !
इज़्ज़त वाले अवसर पा'
बेबस बचपन की अस्मत लूटे !!

खूटे जग से सच्चे खूटे !
बाकी रह गए लम्पट झूठे !
हमसे ईश्वर-अल्ला रूठे !
भाग हमारे बिल्कुल फूटे !
गड़ते जाएंगे छाती में
इक-इक दिन में सौ-सौ खूँटे !!
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आँच चिढ़ाती है आतिश


मई माह की यूनिप्रतियोगिता मे दूसरा स्थान स्वप्निल कुमार ’आतिश’ की ग़ज़ल ने पाया है। आतिश पिछले कुछ समय से ही हिंद-युग्म से जुड़े हैं, मगर कवि और पाठक के तौर पर उनकी सक्रियता उदाहरण के योग्य रही है। इनकी पिछली गज़लें भी यूनिप्रतियोगिता मे ऊपर के पायदानों पर रही हैं और उन्हे पाठकों की भी काफ़ी सराहना मिली है। पिछले माह की प्रतियोगिता मे इनकी एक ग़ज़ल दसवें स्थान पर रही थी। आतिश की ग़ज़लों की सबसे खास बात उनका सरल और सहजग्राह्य होना है। विषय और भाषा की बोधगम्यता के कारण उनकी गज़लों को सामान्य पाठकों मे भी आसानी से पैठ बना पाती हैं। वहीं ग़ज़लों के प्रचिलित उपमानों का सर्वथा नवीन संदर्भों मे प्रयोग उनकी गज़लों को नया और सामयिक कलेवर भी देता है।

पुरस्कृत ग़ज़ल

तन्हाई को टा टा कर
कुछ तो सैर सपाटा कर

फटे पुराने चाँद को सी
अपनी रातें काटा कर

आवाज़ों में से चेहरे
अच्छे सुर के छाँटा कर

बेचैनी को चैन बना
दिल के ज्वार को भाटा कर

दिल की बातें सुननी हैं?
दिल में ही सन्नाटा कर

आवारा बन जा, नज़रें
खिड़की-खिड़की बाँटा कर

माना कर सारी बातें या
सारी बातें काटा कर

आँच चिढ़ाती है "आतिश "
तू लौ बन कर डाँटा कर
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पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

मई माह की यूनिप्रतियोगिता के परिणाम


कविता अपने समय से संवाद करने की महत्वपूर्ण कड़ी है, तो उसे आइना दिखाने और उसकी विद्रूपताओं को उजागर करने का माध्यम भी। हिंद-युग्म यूनिप्रतियोगिता के द्वारा समकालीन कविता मे हमारे समय के पदचाप खोजने का प्रयास करता है। इस बार हिंद-युग्म मई माह की यूनिप्रतियोगिता के परिणाम ले कर उपस्थित है। पिछले 41 महीनों से अनवरत जारी अंतर्जाल की इस कविता-यात्रा को पाठकों और प्रतिभागियों का अटूट स्नेह प्राप्त हुआ है। मई माह की प्रतियोगिता भी इसका कोई अपवाद नही है। हमें कुल मिला कर 67 प्रविष्टियाँ प्राप्त हुईं, जिनको प्रथम चरण मे तीन व द्वितीय चरण मे भी तीन निर्णायकों ने आँक कर अंक दिये। दोनो चरणों के निर्णायकों के द्वारा दिये गये औसत अंकों के आधार पर मई माह की प्रतियोगिता मे मृत्युंजय ’साधक’ की कविता को यूनिकविता चुना गया है।


यूनिकवि- मृत्युंजय साधक

मई माह के यूनिकवि मृत्युंजय साधक पिछले कुछ माह से हिंद-युग्म से जुड़े हैं, और इनकी कविताएं यूनिप्रतियोगिता के शीर्ष 10 में अपना स्थान बना चुकी हैं। इनकी पिछली कविता मार्च माह मे तीसरे स्थान पर रही थी। 3 मई 1976 में जन्मे मृत्युंजय साधक प्रसिद्ध भोजपुरी टीवी-चैनल 'हमार टीवी' में बतौर सहायक-निर्माता (असिस्टेंट प्रोड्यूसर) काम कर रहे हैं। पत्रकारिता (हिंदी) मे एम. ए. कर चुके मृत्युंजय को सरस्वती साहित्य वाटिका, खजनी, गोरखपुर द्वारा सरस्वती प्रतिभा सम्मान से सम्मानित किया गया था तथा इनकी की कविताएँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी होती रही हैं। इन्होंने आकाशवाणी-दूरदर्शन पर अपनी कविताओं का पाठ भी किया है।
पता- मृत्युंजय कुमार श्रीवास्तव ’साधक’
न्यूज सेक्शन ’हमार टीवी’
 ए-30, सेक्टर-4, नोएडा (उ. प्र.)
फोन संपर्क- 9711995584

यूनिकविता- विदाई

चौड़ी पगडंडी,
दोनो ओर जुते हुए खेत
झक सफेद
बूढ़ी चौधराईन काकी के बाल की तरह
बीच-बीच में
मैकू की बैलगाड़ी की छाप
दोपहर की तेज धूप,
सनसनाती हवा
और
रिक्शे पर बुझारत की विदा होती बेटी
गांव के पश्चिमी सन्नाटे को भेदती
उसकी आवाज,
हो जाते पके आम भी खट्टे
और झिनकू लुहार रख देता घन
सभी के हैं भरे नयन
टूसी की गाय रंभाती,
काफी देर से बछड़ा छुटा
भागा है पगहा,
कोई नहीं पकड़ता है उसे,
शामिल हैं सब बेटी की विदाई में
(देकर उसके आंचल में कुएं की दूब, हल्दी और अक्षत)
जो जा रही है खूँटे सहित
तुड़ाया नहीं उसने खूँटा
ना ही किसी को सींग दी.......
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पुरस्कार और सम्मान-   विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता तथा हिन्द-युग्म की ओर से प्रशस्ति-पत्र। प्रशस्ति-पत्र वार्षिक समारोह में प्रतिष्ठित साहित्यकारों की उपस्थिति मे प्रदान किया जायेगा। समयांतर में कविता प्रकाशित होने की सम्भावना।

इनके अतिरिक्त हम जिन अन्य 9 कवियों को समयांतर पत्रिका की वार्षिक सदस्यता देंगे तथा उनकी कविता यहाँ प्रकाशित की जायेगी उनके क्रमशः नाम हैं-

स्वप्निल तिवारी ’आतिश’
हरदीप राणा ’कुँअर जी’
वसीम अकरम
राजेंद्र स्वर्णकार
प्रदीप शुक्ल दीप
देवेश पांडे
सुरेंद्र अग्निहोत्री
अवनीश सिंह चौहान
एम वर्मा

हम शीर्ष 10 के अतिरिक्त भी बहुत सी उल्लेखनीय कविताओं का प्रकाशन करते हैं। इस बार हम निम्नलिखित 8 अन्य कवियों की कविताएँ भी एक-एक करके प्रकाशित करेंगे-

रितु सरोहा
मुकुल उपाध्याय
मनसा आनंद ’मानस’
लवली गोस्वामी
दीपाली ’आब’
हरकीरत कल्सी ’हकीर’
आशीष पंत
उम्मेद सिंह वैद


उपर्युक्त सभी कवियों से अनुरोध है कि कृपया वे अपनी रचनाएँ 4 जुलाई 2010 तक अन्यत्र न तो प्रकाशित करें और न ही करवायें।

हिन्द-युग्म दिसम्बर 2010 में वार्षिकोत्सव का आयोजन करेगा, जिसमें वर्ष भर के 12 यूनिकवियों के साथ-साथ 4 पाठकों को भी सम्मानित किया जायेगा। पाठकों के टिप्पणियों के अनियमित क्रम को देखते हुए हम सभी पाठकों से अनुरोध करेंगे कि वे हिन्द-युग्म पर प्रकाशित सभी रचनाओं पर समीक्षात्मक टिप्पणी करें और वार्षिक यूनिपाठक सम्मान के हकदार बनें।

हम उन कवियों का भी धन्यवाद करना चाहेंगे, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर इसे सफल बनाया। और यह गुजारिश भी करेंगे कि परिणामों को सकारात्मक लेते हुए प्रतियोगिता में बारम्बार भाग लें। इस बार शीर्ष 18 कविताओं के बाद की कविताओं का कोई क्रम नहीं बनाया गया है, इसलिए निम्नलिखित नाम कविताओं के प्राप्त होने से क्रम से सुनियोजित किये गये हैं।

डॉ महेंद्र प्रताप पांडेय ’नंद’
अशोक शर्मा
रितु वार्ष्णेय
शिव नंद द्विवेदी
पवन शर्मा समीर
अरुण राय
पारुल माहेश्वरी
अलका मेहता
वेदना उपाध्याय
अरविंद कुरील सागर
ओम राज पांडेय ओमी
शील निगम
उमेश्वर दत्त मिश्र निशीथ
जोमयिर जिनि
संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
खन्ना मुजफ़्फ़रनगरी
शिखा गुप्ता
बैजनाथ
कैलाश जोशी
सुधीर गुप्ता
नीलेश माथुर
संगीता सेठी
अनिल चड्ढा
रवीश रंजन
कामना राय
प्रदीप वर्मा
सुमन मीत
राजेश कश्यप
आँच ’आतिश’
रंजना डीन
हीरा लाल
संदेश दीक्षित
शारदा अरोरा
कविता रावत
गोपाल दत्त देवतल्ला
सुप्रेम द्विवेदी
नीरा त्यागी
भावना सक्सेना
अनामिका घटक
आलोक गौर
सीत मिश्र
राजलक्ष्मी शर्मा
मंजू महिमा भटनागर
श्याम गुप्ता
पीयूष दीप
के के यादव
आलोक उपाध्याय
ज्योत्सना पांडेय
स्नेह पीयूष