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अब तेरे शहर से कोई नामाबर नहीं आता


नवंबर माह की चौदहवीं और अंतिम रचना आशीष पंत की है। आशीष की पिछली कविता ने सितंबर माह मे तीसरा स्थान बनाया था।

 कविता

तू  उठे  तो उठ जाते हैं  कारवाँ
मेरे जनाजे में ऐसा काफिला नहीं आता,

तू थी  तो हर्फ़-हर्फ़  इबादत  था
तेरे बिना दुआओं में भी असर नहीं आता

कभी हर राह की मंजिल थी  तेरी गली
अब तेरे शहर से कोई नामाबर नहीं आता

एक आंसू नहीं  बहाने का  वादा  था
निभाया, अब लहू आता है अश्क नहीं आता

मेरे दिल के  दर्द  रूह  के  सुकूं
जान जाती है मेरी तू नज़र नहीं आता


आशीष पंत की कविता मे परजीवी


सितंबर माह की प्रतियोगिता मे आशीष पंत की कविता तीसरे पायदान पर रही है। पिछले कुछ माहों से प्रतियोगिता के नियमित प्रतिभागी रहे आशीष हिंद-युग्म पर पहले भी प्रकाशित हो चुके है। इससे पहले इनकी एक कविता ने जून माह मे सोलहवाँ स्थान बनाया था।

पुरस्कृत कविता:  परजीवी

अकेलापन ले जाता है
अपने ही आप से दूर
खुद से बाहर होकर
खुद में झाँकने की
ज़रूरत नहीं मालूम होती

दूर से ही दिखती हैं अपनी
खुशियाँ खेलती, रंजिश कांपती
ख़्वाब आँखें मलते,
उबासी लेता गम और
करवट लेती इच्छाएं

साफ़ दिखता है कि
मेरी ही सोच बढाती है उनको
जब वो चलती है उन में
रगों में खून के सतत
बहाव की तरह

हर विचार एक
ऊर्जा का संचार करता है
इनमें से किसी में
और वो और बढ़ते हैं

ताल में  पत्थर फैंकने से
निकली तरंगों की तरह

जब मैं बाहर हूँ इन सबके
तो ये सब मेरे नहीं हैं
कहीं और के हैं
जो मुझ में जी रहे हैं
एक परजीवी की तरह

और मैं इनका परिचारक
ता उम्र जीता रहा हूँ
इनके पोषण के लिए
इन्होने शनै: शनै:
मारा है मुझे

मेरी सोच को
नाभि रज्जू कि तरह
इस्तेमाल करके
इन्होने बूँद बूँद
चूसा है मुझे

पर ये सब मैं नहीं
तो मैं कौन हूँ
ये मुझसे नहीं
मैं इनसे नहीं
तो मैं किस से हूँ

यही विचार
तोड़ देता है
मेरा बुलबुले सा अकेलापन
और मैं 'जी' उठता हूँ
परजीवियों के जीने के लिए

नहीं, मैं मरने लगता हूँ
फिर से |

शायद मरने लगना ही
जीने भर का नाम है|

मैं जानता हूँ
पानी में बढती तरंगों की तरह ही
एक दिन ये परजीवी भी
इतने बढ़ेंगे
कि अपना अस्तित्व खो देंगे
संसृति के इसी ताल में

और फिर से कोई एक और पत्थर फ़ेंक देगा।
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प्रिये! तुम आना


आशीष पंत से हम सब परिचित हो चुके हैं। आज हम इन्हीं की एक कविता प्रकाशित कर रहे हैं, जिसने जून 2010 की प्रतियोगिता में सोलहवाँ स्थान बनाया है।

पुरस्कृत कविता: आज और कल

आज कल्पना के गुलशन में
चटकी हैं अगणित कलियाँ,
कल जब काल की गर्मी से
ये सूखा मरुस्थल हो जाएगा
तब तुम मदमस्त निर्झरणी-सी
मेरे ख्यालों के सभी उपवन
फिर खिलाने प्रिये आना

आज जग का आकाश भरा है
साधनों के असंख्य तारों से
कल मेरी इच्छा पूर्ति को
जब ये सारे तारे टूटेंगे
तब तुम उन टूटे तारों की
मेरी माँगी अर्जियाँ बनकर
साथ देने प्रिये आना

आज यौवन के सौष्ठव की
लपटों का चढ़ता सूरज
कल जब ढलती उम्र की
रजनी का तम छाएगा
तब साहस की किरण लिए
पूनम का सौम्य उजाला बन
तम हरने प्रिये आना

आज ध्वनियों का कोलाहल
फैला है जीवन के मेले में
कल मरघट के सन्नाटे में
जब मूक सभी हो जायेंगे
तब तुम कोयल की कूक-सी
मेरे अंतर के राग सभी
गुंजित करने प्रिये आना

आज आरोह जो जीवन के
सुरों को ऊँचा किये जाता है
कल इस कालचक्र का अंतिम
अवरोह प्रिये जो शुरू होगा
तब बैठ काल के पुष्पक पर
मुझे जीवन स्त्रोत के शून्य में
सम्पूर्ण करने प्रिये आना

ज़रा से वक़्त का हर दिन


प्रतियोगिता की सत्रहवीं कविता नवोदित रचनाकार की है। 24 वर्षीय, अभितान्त्रिकी में स्नातक आशीष पंत मूलतः नैनिताल से हैं और इन दिनों मेलबर्न (ऑस्ट्रेलिया) में हैं। सूचना प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में कार्यरत हैं और एक बैंक के लिए काम करते हैं। कविता लिखना हाल में ही शुरू किया है। इनका मानना है कि अपने बारे में गहराई से जानने की कोशिश बदस्तूर ज़ारी रहती है पर फिलहाल जानने को बहुत कुछ बाकी है। खुद को पूरा जान लें तो और बाकी रह क्या जायेगा। किताबें और लोगों को पढना, घूमना-फिरना, संगीत सुनना, विचाराधीन रहना और दोस्तों से बातें करना इन्हें अच्छा लगता है।

कविता: वो वक्त

किस्सों भरा प्रेम ग्रन्थ नहीं गढ़ा हमने
पर उस अल्प कथा का हर वरक था
मेरी हर कॉपी के आखरी पन्ने जैसा
सच्चा, मौलिक, - अपना

ना था पूरी उम्र का साथ अपने नसीब में
पर उस ज़रा से वक़्त का हर दिन था
गर्मियों की छुट्टियों के पहले दिन जैसा
उत्साहित, उतावला, - चंचल

कहने की बात नहीं कि कहा नहीं कुछ
पर अपनी खामोशियों का सबब था
एकांत हरे उपवन में कोयल की कूक सा
सुरमयी, मीठा, - गुंजित

चाहत, यारी, इश्क, मोहब्बत पता नहीं
पर वो रिश्ता कुछ तो ख़ास था
छन के आती धूप और सूरजमुखी सा
अतुल्य, अनकहा, - अंजान

अंजाम से तो सदा वाकिफ थे ही हम
पर अदभुत वो विदाई का क्षण था
अंतिम परीक्षा की आखरी घंटी जैसा
आज़ाद, निश्चिन्त, - अंतिम