फटाफट (25 नई पोस्ट):

कृपया निम्नलिखित लिंक देखें- Please see the following links

मेरी माँ आज भी मुझपे उतना ही गुमां करती है


प्रतियोगिता की आखिरी यानी सोलहवीं कविता आलोक उपाध्याय 'नज़र' की है। आलोक उपाध्याय हिन्द-युग्म के यूनिकवि रह चुके हैं।

पुरस्कृत कविता

साँसे ज़ाया करती है और वक़्त रायेगाँ करती है
पागल जिंदगी उम्र भर चंद क़िस्से जमा करती है

किताबों पे पड़ी धूल हो या फर्श की बेज़ार सिलवटें
मेरे घर की हर शय मेरी शख्सियत बयां करती है

बदनाम गलियाँ तुम्हारी ही वहशत का नतीजा हैं
मासूमियत खिड़की पे बैठ खुद को जवां करती है

बस तुम्हें ही दिखती होंगी मुझमें हजारों खामियां
मेरी माँ आज भी मुझपे उतना ही गुमां करती है

इसकी जद्दोजहद की इन्तहा है दो जून की रोटी
ये मुफलिसी मुस्तकबिल की फिक्र कहाँ करती है

रोते रहने से कभी कोई फायदा नहीं होता है "नज़र"
याद दिल से निकालो यही अश्कों को रवां करती है

मैं और वह


प्रतियोगिता की 11वीं कविता के रचयिता राजेश `पंकज´ हैं।
•शिक्षाः कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से कला स्नातक। पंजाब विश्वविद्यालय चण्डीगढ़ से हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि। इग्नू से अंग्रेज़ी में स्नातकोत्तर उपाधि। इग्नू से अंग्रेज़ी/हिन्दी अनुवाद में स्नातकोत्तर डिप्लोमा।
•लेखन कार्यः हिन्दी कहानी, कविता, निबन्ध, रिपोर्ट विधाओं में मौलिक लेखन, विभागीय नियमावलियों व अन्य सामग्री, पंजाबी गीतों, तीन पंजाबी बाल उपन्यासों तथा एक पंजाबी उपन्यास का हिन्दी अनुवाद।
•प्रकाशनः एक कहानी संग्रह `रामदई की आँखें´ वर्ष 2007 में प्रकाशित जिस पर लिखा लघु शोध कार्य कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय द्वारा एम.फिल. (हिन्दी) के लिए स्वीकृत। एक काव्य-संग्रह `कोयल नाराज है´ हरियाणा साहित्य अकादमी के सहायता अनुदान से प्रकाशित। कहानी, कविता, निबन्ध, रिपोर्ट विधाओं में रचनाएं प्रतिष्ठत पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित।
•पुरस्कार व सम्मानः हिन्दी निबन्ध लेखन, हिन्दी कविता लेखन, हिन्दी साहित्य प्रश्नोत्तरी, हिन्दी शब्द-ज्ञान, हिन्दी कविता पाठ की प्रतियोगिताओं में विभिन्न विभागों, संस्थाओं व समितियों द्वारा पंद्रह से अधिक बार पुरस्कृत। नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति द्वारा साहित्यकार सम्मान।

पुरस्कृत कविताः मैं और वह

वह पगला-सा,
वह खोये बच्चे-सा,
वह झुण्ड से बिछुड़े पशु-सा,
वह युद्ध में पथ से भटके सैनिक-सा,
वह शापित प्रेतात्मा-सा,
वह यौवनहीना गणिका-सा,
वह पगला-सा।
वह हर रास्ते को
आर्द्र नयनों से देखता जाता,
वह हर पथ की धूली में खुर गिनता जाता,
वह हर पर्वत पर विजय पताका ढूँढ़ता जाता,
हर गुहा में जैसे आश्रय को ललचाता,
हर गंध व स्वर से घबराता,
वह पगला-सा।
वह मेरा मित्र,
वह मेरा प्रिय, बन्धु, भ्राता,
वह मेरे एकाकीपन में आ जाता,
वह हँसता, रोता, गाता, टूटे स्वप्न सुनाता
वह मुझे डाँटता फिर मुझे मनाता,
नाम तुम्हारा ले ले चिढ़ाता,
वह पगला-सा।
वह मुझे कहता है,
मैं तुम, मैं-मैं हूँ,
क्यों? कैसे?
हँस कर समझाता,
मेरी कल्पना का आईना दिखा
मेरा मुँह दिखाता
वह-मैं, मैं-वह....
मैं समझ जाता हूँ,
मैं भी पगला हो जाता हूँ,
वह भी पगला है।
टिक टिक टिक टिक,
मेरी घड़ी में समय भागता है,
उसकी घड़ी का रूका हाथ,
बीता समय दिखाता है।
मेरे बीतते पल मुझे उस पल से
दूर लिए जाते हैं।
उसका समय सालों पीछे भटकता भटकाता है
मेरे पाँव उसके समय से बँधे हैं
वह पगला-सा।
मेरी घड़ी का समय,
जीवन के पाँवों से बँधा है,
जीवन समय के साथ भागता है, मुझे घसीटता है,
मैं उसके समय के बीच ईसा-सा,
यातना की सलीब से बँधा हूँ,
वह पगला-सा
मेरे जख्मी पैर, अपने
समय के बंधन से छोड़ता नहीं
क्यों?
अपने समय का निर्जीव हाथ तोडता नहीं
मुझे ईसा की तरह उससे प्यार है
क्षमा करता हूँ उसे,
पर वह
पाँव छोड़ता नहीं।

ताकि मेरा बगीचा महकता रहे


जुलाई 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता की 15 वीं कविता सुभाष राय की है। जन्म जनवरी 1957 में उत्तर प्रदेश में स्थित मऊ नाथ भंजन जनपद के गांव बड़ागांव में। शिक्षा काशी, प्रयाग और आगरा में। आगरा विश्वविद्यालय के ख्याति-प्राप्त संस्थान के. एम. आई. से हिंदी साहित्य और भाषा में स्रातकोत्तर की उपाधि। उत्तर भारत के प्रख्यात संत कवि दादू दयाल की कविताओं के मर्म पर शोध के लिए डाक्टरेट की उपाधि। कविता, कहानी, व्यंग्य और आलोचना में निरंतर सक्रियता। देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं, वर्तमान साहित्य, अभिनव कदम, अभिनव प्रसंगवश, लोकगंगा, आजकल, मधुमती, समन्वय, वसुधा, शोध-दिशा में रचनाओं का प्रकाशन। ई-पत्रिका अनुभूति, रचनाकार, कृत्या और सृजनगाथा में कविताएँ। कविताकोश और काव्यालय में भी कविताएं शामिल। अंजोरिया वेब पत्रिका पर भोजपुरी में रचनाएँ। फिलहाल पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय।
आवास-158, एमआईजी, शास्त्रीपुरम, आगरा ( उत्तर प्रदेश)।
फोन-09927500541

पुरस्कृत कविताः मेरा बगीचा

मेरे बगीचे में बहुत सारे पेड़ हैं
माँ के नाम पर मैंने रोपा है
आँगन में ढेरों गुलाब
वे खिलते हैं मुझे देखकर
और जब भी मैं निकलता हूँ
कहीं दूर, किसी सफर पर
मुरझा जाते हैं तत्काल
कभी-कभी जब मैं तोड़ लेता हूँ
उनमें से कोई फूल
कई दिन महकती रहती है मेरी हथेली
कभी-कभी उनकी पंखड़ियों पर
ठहरी बूँदें देखकर
माँ बहुत याद आती है
पिता के नाम लगाया है मैंने
दरवाजे पर अशोक
हरा-भरा, सीधा तना हुआ
आसमान छूने की ललक से
पूरी तरह सराबोर
खुश हूँ मैं कि उसके
घने पत्तों के बीच
एक चिड़िया ने बनाया है
अपना घर, एक घोंसला
वह पहचानती है मुझे
डरती नहीं कभी जब
बिल्कुल पास होता हूँ
जानती है कि मैं उसकी
सुरक्षा के लिए चिंतित रहता हूँ
मैं चाहता हूँ कि वह अंडे दे
मैं उसके बच्चों को बड़े होते
उड़ते देखना चाहता हूँ
ताकि पिता को याद रख सकूँ
आसमान के किसी भी कोने में
अपनी हर उड़ान के दौरान
भाइयों के नाम मैंने
लगाये हैं बाँस-वन
जो बाँसुरी बन बज सकते हैं
और लाठियों में भी
तबदील हो सकते हैं
मेरे सभी भाई हूबहू
मेरे जैसे नहीं हैं
पर हममें कुछ तो है
एक जैसा, मिलता-जुलता
रंग-रूप, स्वाद या
जमीन में उगने की ताकत
जब भी जरूरी होता है
वे लड़ते हैं, हक माँगते हैं
कभी उपेक्षा नहीं सहते
सोचते हैं सबके बारे में
इसीलिए स्वार्थी नहीं
हो सके हैं अभी तक
अन्याय नहीं देख पाते
बाहें चढ़ जाती हैं और
भौंहें तन जाती हैं
जब भी छला जाता है कोई
बांस की जड़ों से जब भी
नयी कोंपल फूटती है
भाइयों की सुधि आ जाती है
पत्नी मुझे जिंदा रखती है
मुझे ढोती है, रचती है बार-बार
ढालना चाहती है अपने आईने में
वह मुझे सिखाती है सुंदर होना
वह जितना चाहती है मुझसे
उसे देना चाहता हूँ, उससे ज्यादा
उसे भामती बना देना चाहता हूँ

मेरे बच्चे बहुत प्यारे हैं,
वे गाते हैं, हँसते हैं
गुस्सा होते हैं, रूठते हैं
पर वे बच्चे हैं अभी
भटक जाते हैं कभी-कभी
भूल जाते हैं याद रखने की बातें
उन्हें खिलौना दे दो या बंदूक
सभी पर हाथ आजमाते हैं
उन्हें खेलने की, पढ़ने की
और बहस करने की पूरी छूट है
पर वे कभी-कभी इससे
आगे जाना चाहते हैं
गोलियाँ चलाना चाहते हैं
आग से खेलना चाहते हैं
बच्चे हैं अभी, बिल्कुल बच्चे
उन्हें नहीं मालूम
क्या करना चाहिए, क्या नहीं
उनकी जरूरतें समझनी हैं मुझे
उनकी बातें सुननी हैं मुझे
ताकि मेरा बगीचा महकता रहे

स्मार्ट बच्चे


प्रतियोगिता की 14वीं कविता अनवर सुहैल की है। अनवर सुहैल की कविताएँ लगभग सभी बड़ी पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। हिन्द-युग्म में भी इनकी कविताएँ प्रकाशित हुई हैं।

पुरस्कृत कविताः स्मार्ट बच्चे

हमें कुंद बच्चे पसंद नहीं
हमें चाहिए स्मार्ट बच्चे
जो हों सिर्फ अपने घर में
बाकी सारे बच्चे हों भोंदू

बच्चों को बना दिया हमने
अंक जुटाने की मशीन
सौ में सौ पाने के लिए
जुटे रहते हैं बच्चे

माँ-बाप के अधूरे सपनों को
पूरा करने के चक्कर में
बच्चे कहाँ रह पाते हैं बच्चे!
वज़नदार किताबों के
दस प्वाइंट के अक्षरों से जूझते बच्चों को
इसीलिए लग जाता चश्मा
होता अक्सर सिर-दर्द!

बच्चे नहीं जानते
उन्हें क्या बनना है
माँ-बाप, रिश्तेदार और पड़ोसी
दो ही विकल्प तो देते हैं
इंजीनियर या डॉक्टर
बच्चा सोचता है
सभी बन जाएँगे इंजीनियर और डॉक्टर
तो फिर कौन बनेगा शिक्षक,
गायक, चित्रकार या वैज्ञानिक

बच्चे चाहते ऊधम मचाना
लस्त हो जाने तक खेलना
चाहते कार्टून देखना
या फिर सुबह देर तक सोना
बच्चे नहीं चाहते जाना स्कूल
नहीं चाहते पढ़ना ट्यूशन
नहीं चाहते होमवर्क करना

तथाकथित स्मार्ट बच्चों ने
नहाया नहीं कभी झरने के नीचे
( इसमें रिस्क जो है )
तालाब किनारे कीचड़ में
लोटे नहीं स्मार्ट बच्चे
अमरूद चोरी कर खाने का
इन्हें अनुभव नहीं

स्मार्ट बच्चे सिर्फ पढ़ा करते हैं
स्मार्ट बच्चे गली-मुहल्ले में नहीं दिखा करते
स्मार्ट बच्चे टीचरों के दुलारे होते हैं
स्मार्ट बच्चों पर सभी गर्व करते हैं
शिक्षक, माता-पिता और नगरवासी!

बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ती स्मार्ट बच्चों को
वही बच्चे जब बनते ओहदेदार
ओढ़ लेते लबादा देवत्व का
नहीं रह पाते आम आदमी

इस बाज़ारू-समाज में भला
कौन आम-आदमी बनने का विकल्प चुने?
कौन असुविधाओं को गले लगाए?

कैसा बचपन कैसी शिक्षा


प्रतियोगिता की 12वीं कविता दीपक कुमार की है| इनका जन्म उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में अगस्त १९७९ ई. में हुआ| पिता जी मज़दूरी करते थे लेकिन परिवार का बोझ अधिक था| प्राथमिक शिक्षा गाँव के प्राथमिक पाठशाला में हुई| बारहवीं कक्षा गाँव के इंटर कालेज से(१९९७), कला में स्नातक (हिंदी, अंग्रेजी ,अर्थशास्त्र ) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से(२०००), परास्नातक (हिंदी ) महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी (२००२) तथा शिक्षा में स्नातक- पं. दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय(२००४) से प्राप्त किया| राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट ) २००७ में उत्तीर्ण किया| आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण कक्षा छठवीं से पिता जी के साथ गर्मी की छुट्टियों में मज़दूरी करते और फिर पढ़ाई| २००५ ई. में लम्बी बिमारी से पिता जी का देहांत हो गया और फिर बेरोज़गारी, परिवाए का बोझ, तीन छोटे भाई-बहन उनकी पढ़ाई और परिवार का खर्च| इन्होंने भी पिता जी का व्यवसाय अपनाया और मकान बनाने का काम करने लगे लेकिन साथ-साथ पढ़ाई कभी रुकने नहीं दिया| २००५-०६ में मज़दूरी के साथ घर-घर जाकर टयूसन पढ़ाये| २००६-०७ में सेन्ट्रल हिन्दू स्कूल, वाराणसी में संविदा पर टी.जी.टी. हिंदी पद पर कार्य किया और अगस्त २००७ में केंद्रीय विद्यालय संगठन में स्नातकोत्तर हिंदी शिक्षक के पद पर नियुक्ति हुई| वर्तमान समय में केंद्रीय विद्यालय संख्या-१, ईटानगर में कार्यरत हैं| कविता ,गज़ल, कहानी, निबन्ध लिखने का शौक, धार्मिक एवं दार्शनिक पुस्तक अध्ययन का शौक। माहात्मा गांधी राष्ट्र भाषा प्रचार संस्था, पुणे, महाराष्ट्र की ओर से २०१० मेन राष्ट्रभाषा भूषण पुरस्कार से सम्मानित। विद्यालयीन पत्रिका का संपादन कार्य तीन वर्षो से कर रहे हैं।

पुरस्कृत कविताः कैसा बचपन कैसी शिक्षा

सुना था तीसरा नेत्र है आदमी का
शिक्षा ही,
आधार है देश की तरक्की का|
अनेक प्रयास किए गए
शिक्षा का स्तर बढ़ाने का,
अनिवार्य हुई शिक्षा
बच्चों के लिए...
शिक्षा का स्तर बढ़ा
बनाई गई तरह-तरह की योजनाएँ|
लेकिन आज भी, बच्चे पढ़ते हैं,
सरकारी कागजों पर|
विद्यालयों का रास्ता
नहीं देख पाते बहुत से बच्चे,
शिक्षा के ठेकेदार बैठते हैं
होटलों में,
बाते करते हैं अनिवार्य बाल शिक्षा की
और उन्हीं के जूते टेबल को
साफ़ करता दस वर्ष का बच्चा
निकल जाता है|
प्रदेश का पुस्तक मेला,
बहुत बड़ा पुस्तक मेला,
विविध भाषा की
रंग-बिरंगी पुस्तकें|
एक किशोरी बारह वर्ष की,
आँखों में कैशोर्य के सपने,
मैले-कुचैले कपड़े पहने,
हाथों में चिर-परिचित-
पीढ़ियों से चली आ रही विरासत
झाड़ू ....................
झाड़ू लगाते-लगाते पुस्तक देखती
ललचाई नज़रों से
फिर थोड़ा स्पर्श कराती
डरते-डरते चित्र देखती,
पढ़ने का प्रयास कराती शायद ...
शायद उसे पता नहीं था
अपने अधिकार का|
विद्यालय परिसर
कार्यशाला ज़ारी है,
नई शिक्षा पद्धति पर
प्रश्न था ........
कैसे हो बच्चों का मूल्यांकन?
बहुत से गुरुजन प्रस्तुत कर रहे थे
अपने-अपने कर्म|
लोग नाश्ता करते हैं और
नाश्ता कराता है लगभग आठ वर्ष का
एक मासूम ....
बरतन धोता है|
उसकी नज़र बरतन पर कम
मैदान में खेलते बच्चों पर ही टिकी है .......
सब चले गए, अब वह खाली है
दो बच्चे उसी के उम्र के,
खेल रहे थे बास्केट बाल
वह बच्चा दौड़ता है उन्हीं के साथ
और आनंदित होता है|
शायद छू लेना चाहता है,
बॉल केवल एक बार|
एक मासूम सा बच्चा
चाय देता है स्कूल में
खोया-खोया सा रहता है
शायद स्कूल में आकर
बैठ जाता है किसी कक्षा में|
क्या यही अधिकार है
शिक्षा का|
सारा देश भरा पडा है
बाल शिक्षा के अधिकार के
विज्ञापनों से पर
सब सारहीन .......!
यह कैसा बचपन और कैसी शिक्षा है?

क्रोध से बौरा गए होंगे नदी-नाले सभी


प्रतियोगिता की 13वीं कविता की बात करते हैं। इसके रचयिता महेन्द्र वर्मा का जन्म 30 जून 1955 को छत्तीसगढ़ के दुर्ग ज़िले के गांव बेरा में हुआ। महेन्द्र ने बी.एस-सी.,एम.ए. (दर्शनशास्त्र) तक की शिक्षा हासिल की है। जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान बेमेतरा, जिला दुर्ग, छत्तीसगढ़ में व्याख्याता के पद पर कार्यरत महेन्द्र वर्मा को बचपन से ही साहित्य पढ़ने-लिखने का शौक है। इनकी रचनाएँ विविध रूपों जैसे, आलेख, निबंध, गजलें, बाल कविताएं आदि के रूप में पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। नवभारत, अमृत संदेश, सापेक्ष, सुरति योग आदि पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। आकाशवाणी रायपुर से ग़ज़लें एवं वार्ताएं प्रसारित। अंतर्जाल की पत्रिका रचनाकार में ग़ज़लें प्रकाशित, सृजनगाथा एवं आखर कलश में ग़ज़लें प्रकाशनार्थ स्वीकृत। छत्तीसगढ़ की विद्यालयीन पाठ्य पुस्तक में एक गीत सम्मिलित। निष्ठा साहित्य समिति, बेमेतरा द्वारा प्रकाशित कविता संग्रह ‘‘निनाद‘‘ का संपादन। ‘सुरति योग‘ आध्यात्मिक पत्रिका के चार विशेषांकों का संपादन। विगत 25 वर्षों से वार्षिक स्मारिका शिक्षक दिवस का सम्पादन।

पुरस्कृत कविताः बरसात में

धरणि धारण कर रही चुनरी हरी बरसात में,
साजती शृंगार सोलह बावरी बरसात में।
रोक ली है राह काले बादलों ने किरण की,
पीत मुख वह झाँकती सहमी डरी बरसात में,
याद जो आई किसी की मन हुआ है तरबतर,
तन भिगो देती छलकती गागरी बरसात में।
एक तो बूँदें हृदय में सूचिका सी चुभ रहीं,
क्यों किसी ने छेड़ दी फिर बाँसुरी बरसात में।
क्रोध से बौरा गए होंगे नदी-नाले सभी,
सोचते ही आ रही है झुरझुरी बरसात में।
ऊपले गीले हुए जलता नहीं चूल्हा सखी,
किंतु तन-मन क्यों सुलगता इस मरी बरसात में।

तीरगी से कहाँ निजात मिली


प्रतियोगिता की 6वीं कविता एक ग़ज़ल है। यह ग़ज़ एक वरिष्ठ शायर खन्ना मुजफ्फरपुरी की है। इनके बारे में बहुत अधिक जानकारी हमारे पास उपलब्ध नहीं है।

पुरस्कृत कविताः ग़ज़ल

शहर में दिन न घर में रात मिली
तन्हा-तन्हा मुझे हयात मिली

घर में सूरज भी चाँद भी हैं मगर
तीरगी से कहाँ निजात मिली

बीज बोये थे अम्न के लेकिन
खेत में फ़स्ले-हादसात मिली

लोग कहते थे मेरे जैसा उसे
कोई लहजा मिला न बात मिली

अपना-अपना नसीब है 'खन्ना'
किसको कितनी ये कायनात मिली

पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

भीगे पन्नों पे गीली नज्में अभी साँस ले रही है..


प्रतियोगिता की 10वीं कविता डिम्पल मल्होत्रा की है। डिम्पल की स्कूल की पढ़ाई गाँव में हुई, हिंदी एवं पंजाबी में परास्नातक हैं। किताबें पढ़ना इनको हमेशा से अच्छा लगता रहा है, पर पाठ्यक्रम की किताबें पढ़ने से थोड़ा परहेज रहा है। लिखती वो हैं, जो मन करता है जो महसूस करती हैं। लिखने से ज्यादा पढ़ना अच्छा लगता है। कितना भी पढ़ लें, कम लगता है।

पुरस्कृत कविता

अब नहीं शुरू होती कहानियाँ..
"बहुत देर पहले की बात है से"
न ही खत्म होती है..
..ख़ुशी ख़ुशी रहने पे..

नहीं बचा बारिशों में
कोई भी संगीत अब नज्मों के लिए..
पाग़ल बादल
उड़ा ले जाते है सारे
गुलाबी पन्ने..

भयानक आवाज़ों से
डरा देते है
आस्माँ छूते
ऊँचे दरख्त
नन्हें-नन्हें परिंदों को..

सात जंगलों, सात समन्दरों
के पार से,
अब कोई नहीं आता..

स्याह पहाड़ों को काटकर,
कोई नहीं खोजता नये रास्ते..

भले ही,
कोई राजकुमार धरती की तहों में दबा
जादुई खज़ाना ढूँढ़नें नहीं निकलता..

पर परिकथाएँ अब भी अच्छी लगती है..

तस्वीर में
पीछे इंद्रधनुष चाहे नहीं दिखता
पर दूर कहीं
भीगे पन्नों पे गीली नज्में अभी साँस ले रही है..
नहीं क्या?

पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

तू है सूरज तुझे मालूम कहाँ रात के गम


प्रतियोगिता की नौवीं कविता मनोज वर्मा 'मनु' की है। मनोज पहली बार हिन्द-युग्म में शिरकत कर रहे हैं। मनोज वर्मा 'मनु' की रचनाएँ तमाम पत्र-पत्रिकाओं और कविता-संग्रहों में प्रकाशित होती रही हैं। बीएससी तक की पढ़ाई पूरी कर चुके मनु गीत, ग़ज़ल, मुक्तक, दोहे, कहानी, संस्मरण इत्यादि लिखते हैं।

पुरस्कृत कविता- ग़ज़ल

आपकी याद चली आई थी कल शाम के बाद।
और फिर हो गई एक ताज़ा ग़ज़ल शाम के बाद।।

मेरी बेख़्वाब निग़ाहों की अज़ीयत मत पूछ।
अपना पहलू मेरे पहलू से बदल शाम के बाद।।

मसअला मेज पे ये सोचके छोड़ आया हूँ।
अब न निकला तो निकल आयेगा हल शाम के बाद।।

तू है सूरज तुझे मालूम कहाँ रात के गम।
तू किसी रोज मेरे घर में निकल शाम के बाद।।

छोड़ उन ख़ानाबदोशों का तज़्करा कैसा
जो तेरा शह्र ही देते हैं बदल शाम के बाद।।

कोई कांटा भी तो हो सकता है इनमें पिन्हा।
अपने पैरों से न फूलों को मसल शाम के बाद।।

पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

लॉस्ट जनरेशन


प्रतियोगिता की पाँचवीं कविता अपर्णा भटनागर की है। 6 अगस्त 1964 को जयपुर (राजस्थान) में जन्मी अपर्णा ने अंग्रेजी तथा हिंदी में एम.ए. किया है। 2009 तक दिल्ली पब्लिक स्कूल में हिंदी विभाग के प्राध्यापक एवं कोऑर्डिनेटर पद पर कार्यरत रहीं। "मेरे क्षण" (कविता-संग्रह) प्रकाशित है।

पुरस्कृत कविता- लॉस्ट जनरेशन

लॉस्ट जनरेशन!
नहीं खोएँगे!
भाले, बर्छी, कुल्हाड़ियाँ, गुलेलें
इन्हें अजायबघर में रखने की युक्ति?
हम्मूराबी के कोड की इबारतें!
पिरामिडों में दफ़न
सिपहसलार, दास-दासियाँ!
न, न.. हुश!
इस ज़माने का तजुर्बा
जंगलों के जीवित अहसास
पहाड़ों के रोड़े
बरसाती नालों का उद्दाम
मुनि-चिड़ियों के श्लोक
बाँस सूखे-हरे
कछुआ मिट्टी की पीठ पर
जंगली उगी घास
अल्पनाएँ गुमटी की
अर्ध-नग्न सभ्यता
छी... धिक् !
तुम्हारी आँखों का विस्मय
फैला डर
अजनबीयत
काले-धूसर
अपनी परछाईं बुनते
सदियों से
खड़े
मानव-लौंदे!
थू...थू .. पिंड
अब भी नहीं पहचाना !
लॉस्ट जनरेशन !
विषय एन्थ्रोपोलोजी!
क्यों पहचानने की कोशिश है?
पहचानो
सामने तो खड़े हैं!

पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

कवि का दु:ख


प्रतियोगिता की आठवीं कविता सुधीर गुप्ता 'चक्र' की है। 20 जुलाई 1967 को ग्वालियर (म.प्र.) में जन्मे चक्र ने आईटीआई (इलेक्ट्रॉनिक्स) तथा एम कॉम की डिग्रियाँ प्राप्त की हैं। बचपन से ही मातृ भाषा हिंदी के प्रति विशेष लगाव और साहित्य में रूचि रही। बारह वर्ष की आयु और सन १९७८ में पहली कविता का सृजन किया। मित्रों ने सराहा और प्रगति का प्रतीक 'चक्रÓ उपनाम से संबोधित किया। बस! तब से ही लेखन दैनिक क्रिया का एक अंग बन गया और आज तक विविध प्रकार की नौ पुस्तकों का लेखन किया। पहली पुस्तक वर्ष 2009 में हास्य-व्यंग्य कविताओं का संग्रह 'अरे! हम तो फिसल गए' रवि पब्लिकेशन मेरठ द्वारा प्रकाशित हुई। इनकी दूसरी पुस्तक 'उम्मीदें क्यों?'(कविता-संग्रह) अभी हाल ही में हिन्द-युग्म प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुई है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन के साथ-साथ काव्य मंच, आकाशवाणी एवं टी वी के माध्यम से कविता पाठ। 'सृजन' पत्रिका का छ: वर्षों तक सफल संपादन करते हुए पत्रिका को नयी ऊँचाईयाँ प्रदान की।
ईमेल- sudhir.bhel@gmail.com
मोबाइल- +91-9451169407

पुरस्कृत कविता- कवि का दु:ख

अगर भूल जाऊँ
कविता लिखना
तो
शीत की तरह
उभर आएँगे
स्मृति पटल पर
तमाम दु:ख
शोक और
मानवीय संवेदनाओं के
मिले-जुले भाव और
तब
हवा के थपेड़ों से पिटती हुई
अनिश्चित गंतव्य की ओर
चलती हुई नाव
और
उसमें प्रथम बार यात्रा कर रहे
सहमे हुए यात्री की आँखों से
निकल आएँगे अश्रु
और
पेट में उठेगा
ज्वार-भाटे सा दर्द
माथे पर होंगे
मिश्रित भाव
तब
शर्म से
समा जाएगी धरती
आकाश में या
पुन: स्मरण हो आएगी
कवि को कविता।

पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

तो बेटा आँसुओं को भी पसीना मान लेता है


जुलाई माह की सातवीं कविता एक ग़ज़ल है। इसके रचयिता स्वप्निल तिवारी आतिश की ग़ज़लें लम्बे समय से हिन्द-युग्म पर प्रकाशित होती रही हैं।

पुरस्कृत कविता- ग़ज़ल

वो इक कागज़ के टुकड़े को सफीना* मान लेता है
फ़क़त हँसने-हँसाने को वो जीना मान लेता है

हवस इंसान के सर चढ़ के जिस पल बोलती है तब
वो इक बीमार कुतिया को हसीना मान लेता है

मई ओ जून में हम सब दुआएँ माँगते हैं जो
उन्हें झट से दिसम्बर का महीना मान लेता है

अगर दिल के ग़मों को मुहज़बानी ना बताये माँ
तो बेटा आँसुओं को भी पसीना मान लेता है

पढ़े गुलज़ार को कोई, उन्हीं पे जान देता है
वो उनके गाँव "दीना" को मदीना मान लेता है

फ़क़त इक आँच ही तारीफ कुछ उसकी अगर कर दे
तो आतिश खुद को इक महँगा नगीना मान लेता है

(सफीना- नाव)

पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

मी लार्ड! इसे सजा दीजिए


एम वर्मा पिछले एक वर्ष से लगातार प्रकाशित हो रहे हैं। जनवरी 2010 के यूनिकवि भी रह चुके हैं। जुलाई माह की प्रतियोगिता में इनकी कविता ने चौथा स्थान बनाया है।

पुरस्कृत कविता- यह गुनाहगार है

मी लार्ड!
यह जो आदमी खड़ा है
ताउम्र यह
खुद ही के खिलाफ लड़ा है;
यह कातिल है
अपनी ही भावनाओं का,
इसने अपने सपनों को
अनाहूत सा भगा दिया;
फिर भी यदि सपने आये तो
खुद ही को जगा दिया,
इसने कड़वे घूट पीने का
खुद को आदी बना दिया है
और आज देखिये स्वयं को
स्वयं के खिलाफ
प्रतिवादी बना दिया है
मी लार्ड!
मेरे पास गवाह भी हैं
जो यह साबित कर देंगे कि
यह लड़ा ही नहीं
उन तमाम सम्भावनाओं के लिये
जिसे यह हासिल कर सकता था
यह कतराता रहा
अपने इर्द-गिर्द;
अपने आस-पास देखने से
खुद को वंचित रखा
भोर की उजास देखने से,
यह गुनहगार है
स्वयंभू ताकतों के खिलाफ
न लड़ने के लिये
और फिर खुद के माथे पर
सलीब जड़ने के लिये
मी लार्ड!
अब जबकि
इसका जुर्म साबित चुका है
इसे सजा दीजिये
जीजिविषा और हक के साथ
ताउम्र जीने के लिये।

पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

कमाता है हमेशा नेकियाँ कुछ इस तरह से वो


हिन्द-युग्म के पाठक योगेन्द्र वर्मा 'व्योम' से परिचित हो चुके हैं। पिछले महीने इनकी एक कविता प्रकाशित हुई थी। जुलाई माह की प्रतियोगिता में इनकी एक कविता ने तीसरा स्थान बनाया है।

पुरस्कृत कविता- ग़ज़ल


बताता है हुनर हर शख़्स को वह दस्तकारी का
ज़रूरतमंद की इस शक्ल में इमदाद करता है

कमाता है हमेशा नेकियाँ कुछ इस तरह से वो
परिन्दों को कफ़स की क़ैद से आज़ाद करता है

कहा उसने कभी वो मतलबी हो ही नहीं सकता
मगर तकलीफ़ में ही क्यों ख़ुदा को याद करता है

कभी-भी कामयाबी ‘व्योम’ उसको मिल नहीं सकती
हक़ीकत जानकर भी वक़्त जो बरबाद करता है

पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

बचे हुए लोग नारों और लाठियों के बीच खप रहे हैं


जुलाई माह की प्रतियोगिता की दूसरी कविता शेखर मल्लिक की है। यूनिकवि अनिल कार्की की तरह शेखर भी इस प्रतियोगिता में पहली दफा हिस्सा ले रहे हैं। 18 सितम्बर 1978 को हाबड़ा (पं॰ बंगाल) में जन्मे शेखर चन्द्र मल्लिक मुख्यतः कथाकार हैं। ‘हंस’ में ‘प्रेमचंद कथा सम्मान’ में इनकी एक कहानी पहले स्थान पर चयनित। एक कहानी (कोख बनाम पेट) का तेलगू भाषा में अनुवाद हुआ। ‘गुलमोहर का पेड़’ नाम से एक कहानी संकलन प्रकाशित। इनकी एक कहानी 'मिट्टी का प्रेमी' कहानी-कलश पर प्रकाशित है। संप्रति- प्रलेसं की जमशेदपुर ईकाई से संबद्ध और स्वतंत्र लेखन।
संपर्क- बी डी एस एल महिला महाविद्यालय, काशिदा, घाटशिला, पूर्वी सिंहभूम- 832303, झारखण्ड
मोबाइल- 09852715924
ई-मेल- shekhar.mallick.18@gmail.com

पुरस्कृत कविता- बचा हुआ है कुछ


तिलमिलाए हुए
(जंतुओं जैसे)
मनुष्यों के पास
यदि बचा हुआ है कुछ,
तो कौड़ी भर वफ़ादारी,
हर सुबह असलियत की गर्मी में भाप
होने से पहले
उम्मीद की ओस
और
बेतरतीब टूटे हुए नाखून...

झड़ते हुए बालों से
उम्र गिनते हुए
बचे हैं धुँधले होते हुए
अभी, बाबूजी जैसे लोग...
और चौराहे पर रोज 'नगर-बस'
की प्रतीक्षा करती प्रेमिकाओं
के पास बची हुई है
सड़क के परले तरफ
खड़े प्रेमियों पर
एक नज़र उछाल देने की फुर्सत...
तमाम चीजें, दूसरी चीजों में
कुछ-कुछ बच जाने की उम्मीद में
बची हुई हैं...
और आदमी भी...इसी तरह...

लगातार एक ही जगह
खा-खाकर चोट
जो लोग तिलमिला रहे हैं...
उनके खुले जख्मों को
नमकीन हवा सहला रही है
और भूख, महँगाई, घोषणाएँ, वायदे,
तानें, उनींदी रातें... उन नासूरों में उँगली
घुसेड़ रही हैं
तो उनके पास बची हुई है,
बीस डेसिबल से कम हर्ट्ज की मातमी रुदालियाँ...

बदहवास आदमी का
बदरंग चित्र हवा में टंगा है
और बराबर पीछा करता है
राजपथ की चौड़ी सड़क के किनारे...
गुहार लगता हुआ, कि उसे बचा लिया जाय

शोर अब भी बचा हुआ है
सिर्फ़ संसद ही नहीं, साप्ताहिक हाटों में भी
अमूमन देश के सभी शहरों में...
बुद्धिजीवियों की कनफोडू-कलात्मक बहसें
प्रेक्षागृहों की दीवारें जज्ब कर रही हैं
इधर बचे हुए लोग
नारों और लाठियों के बीच खप रहे हैं...

पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

उत्तराखंड का पहला यूनिकवि (परिणाम)


हिन्द-युग्म पर आयोजित होने वाली यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता एक ग्लोबल प्रतियोगिता है, जिसमें दुनिया भर के हिन्दी-कवि और उनकी कविताओं के रसज्ञ भाग लेते हैं। जनवरी 2007 से यह हर महीने आयोजित हो रही है। आज हम इसके 43वें संस्करण के परिणाम लेकर उपस्थित हैं। 43वीं यूनिकवि प्रतियोगिता (जो कि जुलाई 2010 में आयोजित की गई थी) में कुल 46 कवियों ने भाग लिया।

निर्णय 2 चरणों में सम्पन्न हुआ। पहले चरण में 4 जज और दूसरे चरण में 2 जज शामिल थे। पहले चरण में सभी जजों को अपनी पसंद की 10 कविताओं को चुनने का कार्यभार सौंपा गया। पहले चरण के निर्णायकों ने अपनी पसंद की 10 कविताओं को 10 में से अंक भी दिये। इस प्रकार कुल 24 कविताएँ दूसरे चरण के निर्णय के लिए चुनी गयीं।

दूसरे चरण में 2 निर्णायक शामिल थे। इन दो निर्णायकों द्वारा 24 कविताओं को दिये गये अंकों और पहले चरण के जजों द्वारा दिये गये अंकों के औसत तथा पसंदों की संख्या के आधार पर शीर्ष 24 कविताओं के क्रम निर्धारित किये गये।

पहली बार हमें 43वें कवि के रूप में उत्तराखंड राज्य से यूनिकवि मिला है। पिछले 42 महीनों से ऐसा संयोग नहीं आया कि इस नये राज्य से हमें कोई यूनिकवि मिल सके, जबकि उत्तराखंड राज्य हिन्दी कवियो का गढ़ है।

यूनिकवि- अनिल कार्की

इनकी उम्र पच्चीस वर्ष है। उत्तराखण्ड के सीमान्त जनपद पिथौरागढ़ के मुवानी पीपलतड़ बरला से इन्होंने अपनी जीवन यात्रा आरंभ की, इनका परिवार पूरी तरह निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार है। दुनिया के यथार्थ में से जो इनकी दुनिया का छोटा सा यथार्थ था, इनका अपना जनपद और गाँव था, दुनिया के इस कोने में साहित्य के अपने माइने थे। वह इन्हें कभी विचारधारओं में जकड़े हुए नही मिले, ये सच्चाई हैं कि इन्होंने बहुत ज्यादा अध्ययन भी नही किया है। अब जाकर पिछले तीन सालों में मैने कुछ किताबों का अध्ययन अपने बड़े भाई रूपेश डिमरी जिन्होंने इन्हें किताबों की दुनिया से परिचय करवाया, किया उनमें - पाश, गोरख पाण्डे, नागार्जुन, मुक्तिवोध, त्रिलोचन, रघुवीर सहाय, शमशेर, मंगलेश डबराल, श्याम मनोहर जोशी, श्रीलाल शुक्ल, भीष्म सहानी, काशीनाथ सिंह, राजेन्द्र यादव, विष्णु सखाराम खांड़ेकर की ययाति, खुशवंत सिह, आदि थे। वर्तमान में पिथौरागढ़ से ही समकालीन कविता की पत्रिका का संपादन करते हुए कुमाँऊ विश्वविद्यालय डीएसबी परिसर नैनीताल से डॉ. शिरीष कुमार मौर्य के निर्देशन में हिन्दी शोधकार्य कर रहे हैं। ये अपने मित्र पंकज भट्ट का भी धन्यवाद करना चाहेंगे, जिन्होंने इन्हें हिन्द-युग्म में कविता भेजने के लिए प्रेरित किया।
फोन संपर्क- 9456757646
पता- ग्राम,पोस्ट- भदेलवाड़ा ऐंचौली
जिला -पिथौरागढ़
पिन-252630

यूनिकविता- मौन अपेक्षित है


जिला पुस्तकालय पिथौरागढ़ में दीवार पर टंगी तख्ती ‘मौन अपेक्षित है’ और सामने टेबल पर बैठी हमउम्र लड़की को देखकर-

किताबें,
कुछ-कुछ शोर,
गूँजता है-
एक नई किस्म की कम्पनी है।
एक पौधशाला।
व्यवस्था के नए चाकर यहीं पैदा होते हैं अब,
पूछो- सब आई.ए.एस., पी.सी.एस.,
मास्टरों, प्रोफेसरों की लम्बी कतार,
यहीं से निकलेगी कल,
ये वही जगह है- जहाँ दीवार पर टंगी है एक तख्ती,
जिस पर लिखा है- मौन अपेक्षित है।
कभी-कभार समाजशास्त्र, इतिहास, भूगोल पढ़ते हुए-
हल्के से निकल आती है,
लचर व्यवस्था की बात।
फिर दूसरे ही पल सावधान हो जाते हैं यह कहकर सब-
क्या लेना व्यवस्था से हमें, ये करियर की लड़ाई है।
इन टेबलों पर बैठ चाय पी लेने
या व्याख्यान दे देने से नहीं बचने वाली,
कविता, कहानी की अस्मिता।
वो बेच दी जायेगी
अलग-अलग फ्लेवरों में तुम्हारे ही सामने।
खुद को हिजड़ा कहने में भी तालियाँ नहीं बजेंगी।
कभी-कभी प्रतियोगिता परीक्षा की,
मोटी किताब के बीच हँसता है-
एक चेहरा कुछ देर के लिए,
तो लगता है, चालीस करोड़ भूखे नंगों का देश भी
हँसेगा, मुस्कुरायेगा।
हमने सोचा था कि धरती बहुत बड़ी है।
उसकी परिधि पर मानवता का महायज्ञ होगा।
और हम धीरे-धीरे अन्दर की ओर सिमटेंगे।
किसी केन्द्र बिन्दु पर।
कौन सा केन्द्र बिन्दु?
प्रेमिका की नाभि पर आधुनिकता देखने का निर्णय हमारा है।
उसके अधखुले जिस्म को चाट लेने का ख्वाब हमने ही सजाया है।
नहीं इस तरह नहीं!
बस घिन से थूक देने से काम नहीं चलेगा!
ये देश अकेले हमारा या अकेले उनका नहीं है।
ये चालीस करोड़ भूखे-नंगों का देश है, लूले और लंगड़ों का भी।
ये रिक्शा, टम्पो, इक्का, तांगा, बैलगाड़ी का देश है।
और कहाँ धरे के धरे रह गये तुम्हारे पोलियो के टीके!
चोरो! पुराने माल को हाईब्रिड बनाकर बेच रहे हो!
इस तरह कैमेस्ट्री, फिजिक्स, गणित का ट्यूशन पढ़ा लेना-
बुद्धिजीवी बन जाना नहीं होता।
किसी बार में बैठकर बियर की चुस्कियों के साथ,
शोषितों की बात करना अच्छा लगता है।
किसी अखबार का सम्पादक बन जाना भी अच्छा है।
और सुनो! क्यों पढ़ रही हो ये सब?
इसलिए न कि! अब लड़के पढ़ी-लिखी पत्नियाँ माँगते हैं।
ये मोटी किताबें दूल्हे पाने के लिए नहीं,
दूल्हे बने सत्ता के खिलाफ़ हथियार हैं।
आधुनिकता के मायने, फिगर मेन्टेन कर-
पतली कमर लचकाते हुए रैम्प पर उतरना नहीं होता है।
ये सब के सब वहशी चीर-फाड़ डालेंगे तुम्हें!
और तुम कानून की दुहाई देते रहना,
इस तरह नहीं-
कमीना होकर भी लड़ना अच्छा तो है-
दूध का धुला कोई नहीं होता।
पर मौन बिल्कुल अपेक्षित नहीं है!
ये तख्ती जो पुस्तकालय में टंगी है-
जिसपे लिखा है ‘मौन अपेक्षित है’
ये तख्तियाँ कल तुम्हारे घरों पे होंगी,
ये तख्तियाँ कल हमारे गले में डाल देंगी सरकारें।
मौन अपेक्षित नहीं है।
बस आज समझ लेना होगा-
मौन को अपेक्षित मान लेना ही-
मुखर हो जाने का सवाल है।
सवाल छोटा है पर-
बहुत बड़ा है मौन होना,
इस मौन के खिलाफ।
पुरस्कार और सम्मान-   विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता तथा हिन्द-युग्म की ओर से प्रशस्ति-पत्र। प्रशस्ति-पत्र वार्षिक समारोह में प्रतिष्ठित साहित्यकारों की उपस्थिति मे प्रदान किया जायेगा। समयांतर में कविता प्रकाशित होने की सम्भावना।

इनके अतिरिक्त हम जिन अन्य 9 कवियों को समयांतर पत्रिका की वार्षिक सदस्यता देंगे तथा उनकी कविता यहाँ प्रकाशित की जायेगी उनके क्रमशः नाम हैं-

शेखर मल्लिक
योगेंद्र वर्मा व्योम
एम वर्मा
अपर्णा भटनागर
खन्ना मुजफ़्फ़रपुरी
स्वप्निल तिवारी आतिश
सुधीर गुप्ता 'चक्र'
मनोज वर्मा मनु
डिम्पल मलहोत्रा


हम शीर्ष 10 के अतिरिक्त भी बहुत सी उल्लेखनीय कविताओं का प्रकाशन करते हैं। इस बार हम निम्नलिखित 6 अन्य कवियों की कविताएँ भी एक-एक करके प्रकाशित करेंगे-

राजेश पंकज
दीपक कुमार
महेंद्र वर्मा
अनवर सुहैल
सुभाष राय
आलोक उपाध्याय 'नज़र'

उपर्युक्त सभी कवियों से अनुरोध है कि कृपया वे अपनी रचनाएँ 31 अगस्त 2010 तक अन्यत्र न तो प्रकाशित करें और न ही करवायें।

हम उन कवियों का भी धन्यवाद करना चाहेंगे, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर इसे सफल बनाया। और यह गुजारिश भी करेंगे कि परिणामों को सकारात्मक लेते हुए प्रतियोगिता में बारम्बार भाग लें। शीर्ष 24 कवियों के नाम अलग रंग से लिखित है।

सुरेंद्र अग्निहोत्री
अनिता निहलानी
हरदीप राणा कुँअर जी
विवेक जैन
जोमयिर जिनी
ऋतु सरोहा 'आँच'
शामिख फ़राज
अश्विनी राय
मनसा आनंद मानस
लोकेश उपाध्याय
खान साब खान
सीमा सिंहल ’सदा’
सनी कुमार
हरप्रीत धंजल
अनिरुद्ध यादव
अशोक कुमार शर्मा
आलोक गौर
शील निगम
हरकीरत हकीर
उषा वर्मा
विभोर मिश्र खज़िल
आशीष पंत
अंजू गर्ग
विनय कृष्ण
संगीता सेठी
सुमिता केशवा
प्रदीप वर्मा
कमल किशोर सिंह
रश्मि सिंह
नरेंद्र कुमार तोमर

नोट- हम यूनिपाठक/यूनिपाठिका का सम्मान वार्षिक पाठक सम्मान के तौर पर सुरक्षित रख रहे हैं। वार्षिक सम्मानों की घोषणा दिसम्बर 2010 में की जायेगी और उसी महीने हिन्द-युग्म वार्षिकोत्सव 2010 में उन्हें सम्मानित किया जायेगा।

गुड्डा


आज हम जून माह की प्रतियोगिता से आखिरी कविता (अठारहवीं) प्रकाशित कर रहे हैं। इसके रचनाकार प्रवीण कुमार 'स्नेही' हिन्द-युग्म पर पहली बार प्रकाशित हो रहे हैं। 14 जनवरी 1987 को जन्मे प्रवीण ने इसी वर्ष गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय, हिसार, हरियाणा, से जनसंचार एवं पत्रकारिता में मास्टर डिग्री ली है। मासिक पत्रिका 'शांतिधर्मी' में विज्ञापन प्रभारी हैं। पिछले दो वर्षो से ही कविता लेखन आरम्भ किया है। कहानी और व्यंग्य विधा में भी लेखन कार्य करते हैं। पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कविताएँ एवं कहानियाँ प्रकाशित हुई हैं। साहित्य पढ़ने में आरम्भ में इनकी रुचि थी, अब मजबूरी हो गई है।
चलभाष - 09996320772
email - snehi.aryaparveen@gmail.com

पुरस्कृत कविता: गुड्डा

आटा गूँथते
कोहनी तक अटे हाथों से
माथे से
पसीने की बूँदें पोंछती
वह छोटी लड़की,
घर के एक कोने में रखे
गुड्डे को याद कर
हल्के-से
मुस्कुरा जाती है।

उस गुड्डे के मुँह की गोलाई
अपने हाथों की
पकी रोटियों से
कहीं अधिक
अच्छी लगती है उसे।

उसके हाथ
किसी कुशल गृहिणी जैसे
बिना थके चलते हैं
चूल्हे में लकड़ियाँ सरकाती
धुएँ में आँखे लाल करके
सबको खाना खिला
अपनी दो बची रोटियाँ
एक मैले कपड़े में लपेट
रख देती है एक ओर
और भागती है
उसी कोने की तरफ।

लेकिन उसका छोटा भाई
अलग कर चुका है
गुड्डे से उसका सिर।
तब अचानक
लड़की को
याद आटा है मैला कपड़ा
और याद आटा है उसे
ढेर सारा काम
क्योंकि
गुड्डा...
अब गुड्डा नहीं रहा।

दिल्ली में धूल, धूप और दोपहर


जून 2010 की यूनिप्रतियोगिता की 11वीं कविता सनी कुमार हैं। सनी कुमार अपने बारे में बताते हुए कहते हैं कि नाम सनी है(जिससे आप लोगों का पहले ही तार्रुफ़ है)। पढ़ाई के नाम पे इग्नू से बी.ए का फॉर्म भर दिया है। ऐसा शायद इसलिए कहना पड़ रहा क्योंकि कॉलेज(रेगुलर) में फेल हुआ, तो कॉलेज छोड़ दिया था। उर्दू ज़ुबान के प्रति लगाव था, सो इसी साल उर्दू में डिप्लोमा(मज़ाक़-मज़ाक़ में) मुक्कमल कर लिया। बारिश में फुटबाल खेलना और भीगना पसंद है। ख़ाली वक़्त में कभी-कभार शतरंज(ग़लती से बचपन में एक दोस्त से सीख लिया था) खेल लेता हूँ। दिल्ली में ही पला-बढ़ा हूँ और पढ़ (हिंदी साहित्य पढने का शौक़ है मुझे) रहा हूँ। मालवीय नगर के एक मोहल्ले (जिसे लोग झुग्गी कहते है) में रहता हूँ। फिलहाल इस कमजात परिचय से ही काम चलाइये। फोटो (जिसमें मेरी शक्लोसूरत थोड़ी सी ठीकठाक हो) कभी आगे भेज दूँगा।
ईमेल- halfmoon_sunny@yahoo.in

पुरस्कृत कविता: धूल, धूप, दोपहर

जल रहीं हैं दोपहरें
तवे-सी तप रहीं हैं सड़कें भी
खौल रहें हैं बी.आर.टी. बस स्टैंड
दिल्ली सरकार के

हवा धूल चखाती चल रही है

इसी नंगी धूप वो में आदमी बेंचता है
धूप के चश्मे
पसीने में तर एक लड़का लग रहा है आवाजें---
"रुमाल ले लो... रुमाल"

यहीं पे बैठा है मोची भी
अपनी छतरी को सूरज की तरफ़ करके
मुँह में बीड़ी दबाए हुए
धुँए से ज़्यादा धूल फाँक रहा है

भगवान जाने सूरज बाबा से
क्या डील हुई है इनकी


गाड़ियों के इंजन आग उगलते चल रहे हैं
जितनी महँगी गाड़ी
उतनी गर्म हवा...

मंटो ने लिखा है कहीं
"बम्बई में इतनी शदीद बारिश पड़ती है कि
आप की हड्डियाँ तक भिगो दे"
दिल्ली की गर्मी आपकी हड्डियाँ तो नहीं पिघलाती
आपकी चमड़ी से धुँआ ज़रूर उठा देती है...

भंवे सिकुड़ आईं हैं
चेहरे चिलचिलाये हुए हैं
लड़कियों की बगलें
और औरतों के ब्लाउज पसीने से परेशान हैं

सूरज आसमान पर नहीं
सब के चेहरे पे उग आया है जैसे
हलक़ में काँटे भी चुभ रहे हैं या यूँ कहूँ कि जैसे
मधुमक्खी ने डंक मारा हो

ब्लू लाइन बस का कंडक्टर
खा के गुटखा
छोड़ रहा है भभका
वो लड़की मुँह बिचकाती है
और दूर जाके खड़ी हो जाती है
बस पीटते हुए कंडक्टर
कान पे चिल्ला रहा सबके---
"आई.टी.ओ...आई.टी.ओ...मटरो...दिल्ली गेट...ऐ बस अड्डा..बस अड्डा..
बैठो.. ऐ आओ..आओ..आओ बस अड्डे वाले...

बस आ रहीं है लाल वाली
ए.सी. वाली है
चढ़ रहे है वो
जिनकी थोड़ा पैसा है जेब में
उतर रहें है दुगनी तेज़ी से
क्यूँकि ए.सी. बस का
ए.सी. ख़राब है

इसी बीच गुज़र रहा
दिल्ली जल बोर्ड का टैंकर
जीभ चिढ़ता हुआ...
पानी बिखेरता हुआ...

कोशिश भी कुछ नहीं दीखती किसी ख़बर के बीच


प्रतियोगिता की 17वीं कविता योगेन्द्र कुमार वर्मा ‘व्योम’ की है। व्योम पहली बार हिन्द-युग्म पर प्रकाशित हो रहे हैं। 9 सितम्बर 1970 को जन्मे व्योम ने बी.कॉम. तक की शिक्षा हासिल की है। गीत, ग़ज़ल, मुक्तक, दोहे, कहानी, संस्मरण आदि में सृजनरत योगेन्द्र का एक कविता-संग्रह 'इस कोलाहल में' प्रकाशित हो चुका है। प्रमुख राष्ट्रीय समाचार पत्रों, साहित्यिक पत्रिकाओं तथा अनेक काव्य-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित हैं तथा आकाशवाणी रामपुर से अनेक बार कविता-कार्यक्रम प्रसारित हुए हैं।
सम्प्रति : लेखाकार (कृषि विभाग, उ0प्र0)
विशेष : संयोजक - साहित्यिक संस्था ‘अक्षरा’ , मुरादाबाद
सम्मान : काव्य संग्रह ‘इस कोलाहल में’ के लिए भाऊराव देवरस सेवा न्यास, लखनऊ द्वारा ‘पं0 प्रताप नारायण मिश्र स्मृति सम्मान-2009’
ई-मेल : vyom70@yahoo.in
सम्पर्क चलभाष सं: 9412805981 , 9457038652, 9359711291

पुरस्कृत कविता: नवगीत

ढूँढ़ रहे हम पीतलनगरी
महानगर के बीच
यहाँ तरक्क़ी की परिभाषा
यातायात सघन
और अतिक्रमण, अख़बारों में
जैसे विज्ञापन
नहीं सुरक्षित कोई भी अब
यहाँ सफ़र के बीच
हर दिन दूना रात चैगुना
शहर हुआ बढ़कर
और प्रदूषण बनकर फैला
कॉलोनी कल्चर
कहीं खो गया लगता अपना
घर नम्बर के बीच
ख्याति यहाँ की दूर-दूर तक
बेशक फैली है
किन्तु रामगंगा भी अपनी
बेहद मैली है
कोशिश भी कुछ नहीं दीखती
किसी ख़बर के बीच

प्रिये! तुम आना


आशीष पंत से हम सब परिचित हो चुके हैं। आज हम इन्हीं की एक कविता प्रकाशित कर रहे हैं, जिसने जून 2010 की प्रतियोगिता में सोलहवाँ स्थान बनाया है।

पुरस्कृत कविता: आज और कल

आज कल्पना के गुलशन में
चटकी हैं अगणित कलियाँ,
कल जब काल की गर्मी से
ये सूखा मरुस्थल हो जाएगा
तब तुम मदमस्त निर्झरणी-सी
मेरे ख्यालों के सभी उपवन
फिर खिलाने प्रिये आना

आज जग का आकाश भरा है
साधनों के असंख्य तारों से
कल मेरी इच्छा पूर्ति को
जब ये सारे तारे टूटेंगे
तब तुम उन टूटे तारों की
मेरी माँगी अर्जियाँ बनकर
साथ देने प्रिये आना

आज यौवन के सौष्ठव की
लपटों का चढ़ता सूरज
कल जब ढलती उम्र की
रजनी का तम छाएगा
तब साहस की किरण लिए
पूनम का सौम्य उजाला बन
तम हरने प्रिये आना

आज ध्वनियों का कोलाहल
फैला है जीवन के मेले में
कल मरघट के सन्नाटे में
जब मूक सभी हो जायेंगे
तब तुम कोयल की कूक-सी
मेरे अंतर के राग सभी
गुंजित करने प्रिये आना

आज आरोह जो जीवन के
सुरों को ऊँचा किये जाता है
कल इस कालचक्र का अंतिम
अवरोह प्रिये जो शुरू होगा
तब बैठ काल के पुष्पक पर
मुझे जीवन स्त्रोत के शून्य में
सम्पूर्ण करने प्रिये आना