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Friday, July 30, 2010

गुड्डा


आज हम जून माह की प्रतियोगिता से आखिरी कविता (अठारहवीं) प्रकाशित कर रहे हैं। इसके रचनाकार प्रवीण कुमार 'स्नेही' हिन्द-युग्म पर पहली बार प्रकाशित हो रहे हैं। 14 जनवरी 1987 को जन्मे प्रवीण ने इसी वर्ष गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय, हिसार, हरियाणा, से जनसंचार एवं पत्रकारिता में मास्टर डिग्री ली है। मासिक पत्रिका 'शांतिधर्मी' में विज्ञापन प्रभारी हैं। पिछले दो वर्षो से ही कविता लेखन आरम्भ किया है। कहानी और व्यंग्य विधा में भी लेखन कार्य करते हैं। पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कविताएँ एवं कहानियाँ प्रकाशित हुई हैं। साहित्य पढ़ने में आरम्भ में इनकी रुचि थी, अब मजबूरी हो गई है।
चलभाष - 09996320772
email - snehi.aryaparveen@gmail.com

पुरस्कृत कविता: गुड्डा

आटा गूँथते
कोहनी तक अटे हाथों से
माथे से
पसीने की बूँदें पोंछती
वह छोटी लड़की,
घर के एक कोने में रखे
गुड्डे को याद कर
हल्के-से
मुस्कुरा जाती है।

उस गुड्डे के मुँह की गोलाई
अपने हाथों की
पकी रोटियों से
कहीं अधिक
अच्छी लगती है उसे।

उसके हाथ
किसी कुशल गृहिणी जैसे
बिना थके चलते हैं
चूल्हे में लकड़ियाँ सरकाती
धुएँ में आँखे लाल करके
सबको खाना खिला
अपनी दो बची रोटियाँ
एक मैले कपड़े में लपेट
रख देती है एक ओर
और भागती है
उसी कोने की तरफ।

लेकिन उसका छोटा भाई
अलग कर चुका है
गुड्डे से उसका सिर।
तब अचानक
लड़की को
याद आटा है मैला कपड़ा
और याद आटा है उसे
ढेर सारा काम
क्योंकि
गुड्डा...
अब गुड्डा नहीं रहा।

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7 कविताप्रेमियों का कहना है :

M VERMA का कहना है कि -

और याद आटा है उसे
ढेर सारा काम
क्योंकि
गुड्डा...
अब गुड्डा नहीं रहा।
और वह गुड्डी शायद अब गुड्डी नहीं रही
सुन्दर

manu का कहना है कि -

कविता की बात नहीं करते ..
भाव की बात करते हैं.....

सच...हमें आपकी रचना के भाव बहुत अच्छे लगे...

manu का कहना है कि -

और हाँ,

हो सकता है कि आपको अठारहवें पायदान पर रखने वाले जज साहिब ऐसी कवितायें आये दिन पढ़ते हों...
हमने अक्सर ऐसी नहीं पढ़ी...

आपको इतना पीछे देख कर अफ़सोस हुआ....

Nisha का कहना है कि -

इस सुन्दर लेखन के लिए और इस बड़े मंच पर स्थान पाने के लिए बधाई!

स्वप्निल कुमार 'आतिश' का कहना है कि -

bahut umda nazm hai ... 2-3 baar padh chuka hun aap ki yah rachna... badi mushkil se samjha hun .. :)behtareen lagi .. :)

Mohan का कहना है कि -

aateko guthkar ladki guddese boli,
sukhse akdin bharegi meribhi zoli.
bhukha rahjayena tu mere janeke bad
uthadena pyarse akdin meribhi doli.

kavita samanya thi lekin dil ko chugai
mohan Bijewar (Chandrapur)maharastra
09420516978

Royashwani का कहना है कि -

“लेकिन उसका छोटा भाई
अलग कर चुका है
गुड्डे से उसका सिर।
तब अचानक
लड़की को
याद आटा है मैला कपड़ा
और याद आटा है उसे
ढेर सारा काम
क्योंकि
गुड्डा...
अब गुड्डा नहीं रहा।“ एक छोटी सी लड़की और ढेर सारी जिम्मेदारियां ...आपने इस लड़की के दर्द को अंतर्मन से अनुभव कर इतनी खूबसूरत कविता लिखी है जो तारीफ के काबिल है. हमारे देश में ऐसी ना जाने कितनी बेटियाँ हैं जिनका बचपन तो आता ही नहीं लेकिन बड़ों कि तरह दुःख और तकलीफ सहनी पड़ती है. ऐसे खूबसूरत शब्दों कि कारीगरी के लिए बहुत बहुत साधुवाद ! अश्विनी कुमार रॉय

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