प्रतियोगिता की छठी कविता के कवि प्रवीण कुमार ’स्नेही’ हिंद-युग्म से पिछले कुछ समय से ही जुड़े हैं। इनकी एक कविता गुड्डा जून माह की यूनिप्रतियोगिता के अंतर्गत प्रकाशित हो चुकी है। यहाँ प्रस्तुत सारगर्भित कविता एक कवि के सामर्थ्य ही नही बल्कि उसके उद्धेश्यों के बारे मे भी बात करती है।
पुरस्कृत कविता: मेरा सामर्थ्य
जाने क्यों
मेरे पडोसी बनकर
तुम खुश नहीं हो
मेरी ताक-झांक
तुम्हें पसन्द नहीं।
अपने आँगन की दीवारें
ऊॅंची करवाकर
कुछ राहत की साँस
ली थी तुमने
पर मैं
तुम्हारे आँगन में
झाँकने का लालच
नहीं छोड पाया था।
सच में!
तुम्हारी बच्ची
जब क्यारियों में लगे
फूलों पर से
तितलियाँ पकडती है
तो मेरा मन भी
तितली बन जाने को करता है।
जब वह नंगे पैर
आँगन में खेलती है
तो मन करता है
मैं कोमल दूब बनकर
उसके पैंरों तले
बिछ जाऊॅं।
तुम्हें किसी को एक बार
कहते सुना था मैंने-
‘लाइनें चुराते-चुराते
इन कवियों की नज़रें
दूसरों के बच्चों पर हैं।’
पर मैंने बुरा नहीं माना,
जानते हो
ऊॅंची दीवार से
अब तुम्हारा आँगन नहीं दिखता
पर तुम्हारी बच्ची
आजकल मेरी कविताओं में
तितलियाँ पकडती है,
खेलती है,
और तुम्हारी असमर्थता देखो
तुम यहाँ
दीवार नहीं बना सकते।
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पुरस्कार: विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।




आज हम जून माह की प्रतियोगिता से आखिरी कविता (अठारहवीं) प्रकाशित कर रहे हैं। इसके रचनाकार प्रवीण कुमार 'स्नेही' हिन्द-युग्म पर पहली बार प्रकाशित हो रहे हैं। 14 जनवरी 1987 को जन्मे प्रवीण ने इसी वर्ष गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय, हिसार, हरियाणा, से जनसंचार एवं पत्रकारिता में मास्टर डिग्री ली है। मासिक पत्रिका 'शांतिधर्मी' में विज्ञापन प्रभारी हैं। पिछले दो वर्षो से ही कविता लेखन आरम्भ किया है। कहानी और व्यंग्य विधा में भी लेखन कार्य करते हैं। पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कविताएँ एवं कहानियाँ प्रकाशित हुई हैं। साहित्य पढ़ने में आरम्भ में इनकी रुचि थी, अब मजबूरी हो गई है। 

