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मेरी मौत के दिन


मेरी मौत के दिन
तुम्हें हिचकियाँ नहीं आयेंगीं ,
और
तुम्हारी आँखों से लावे की नदियाँ सूख गयी होंग़ीं -
उस दिन मैं मुर्गियों की तरह
दूकानों में बिक रहा होऊँगा ,
मांस के टुकड़ों में , तोल तोल कर ,
ग्लानि से भरा हुआ , धूप में कपड़ों के साथ
सूखता मिलूँगा -
और मेरी घोर नास्तिक आस्थायें
ईश्वर के सामने नंगी खड़े होने से कतरा रही होंगीं

उस दिन मैं
खाई के मुहाने पर
अपने कंधे पर आसमान लिये खड़ा रहूँगा
और तुम
नीचे झील में खड़ी मुझे पुकारती होगी
हमारे बीच सिर्फ़ एक कदम की दूरी होगी,
और उस एक कदम पर टिका होगा
सारी दुनिया का भविष्य -

तुम जान जाओगी-
मेरे अंत की पहचान के कई तरीके हैं
जब नदी में बहती हुई
मेरी टोपी मिले , और तुम
न देख पाओ मुझे चलते हुए
पानी के भीतर -
जब तितलियों के पंखों पर
बिछा रंग मेरी राख लगे
और हवा में बहते हुए मुझे
फेफड़ों में भरने पर घुटने लगे दम -
यकीन मानो ,
उस समय जलाए जा रहे
सारे पुतले -
और पेड़ों की तरह गिर रहे सारे धड -
मेरे ही होंगें
पर तुम चिंता मत करना
मेरी मौत की भनक भी नहीं लगेगी किसी को
आज से कई सालों तक
नदी , तितलियाँ और फुटपाथ
खामोश रहेंगे -

तुम मु्झे जलाना या दफ़नाना मत,
मुझे गला देना-
और बहा देना उसी नदी में -
मैं चला जाऊँगा पाताल में
सशरीर-
जिस दिन गर्मी
हो जायेगी बर्दाश्त से बाहर,
फ़िर जन्म लूँगा मैं -
उस दिन मैं भाप बनकर
चीर डालूँगा धरती का सीना-

एक आदमी था


एक कवि था
या शायद कवि नहीं था-
लाख कोशिश करता
पर नहीं लिख पाता प्रेम कवितायें,
नहीं मान पाता था
घर के पास रहने वाली लड़की को चाँद
या फ़िर परी |

न उसे लड़कियों के परी
होने पर यकीन होता ,
न ही चांद के लड़की होने का |
लड़की उसके लिये व्रत रखती,
पर वो नहीं समझ पाता
उसके व्रत और अपनी उम्र के रिश्ते को
उसे कभी समझ न आया
कि सुन्दर को सुन्दर कहना
और प्यार को प्यार कहना
क्यों जरूरी है।
वह दिल से सोचती थी,
वह दिमाग पर यकीन करता |
फ़िर भी, उसके जिद करने पर
वह लिखता था कवितायें-
जिनमें सूरज
अपनी मर्जी से ढलता था,
उसकी पलकों के झुकने पर नहीं,
और नदियों में मटमैला पानी बहता था
रोमांटिक कहानियाँ नहीं ।
उसके लिखे को कभी
किसी ने कविता
और उस कवि को कवि नहीं माना |

एक संत था
या शायद संत नहीं था -
लाख कोशिश करता,
पर नहीं मान पाता
पत्थर को भगवान,
नहीं देख पाता कभी
आसमान में बसे हैवन और हेल को-
वह कभी नहीं समझ पाया
कि
भगवान को भगवान
होने की याद दिलाना क्यों जरूरी है
और आदर देने के लिये
सिर झुकाना क्यों जरूरी है
कभी उसके पल्ले नहीं पड़ा ,
उसके जीवन का कोई और
कैसे जिम्मेदार है
उसने कभी सिर नहीं झुकाया,
प्रार्थना नहीं की
और खुद को छोड़कर किसी और पर
यकीन न किया |
उसके किये को कभी भी इबादत
और उसे कभी भी संत नहीं माना गया |

एक आदमी था
या शायद आदमी नहीं था -



स्वप्न यूँ मरते नहीं हैं


हो गया इतिहास लोहित
यदि हमारे ही लहू से
है खड़ा विकराल अरि
द्रुत छीनता विश्रान्ति भू से
बादलों की हूक से
पर्वत-हृदय डरते नहीं हैं
स्वप्न यूँ मरते नहीं हैं


तीन रंगों से बनी जो
है वही तस्वीर प्यासी
भारती के चक्षु कोरों
पर उगी कोई उदासी
किंतु ये मोती पिघलकर
धीरता हरते नहीं हैं
स्वप्न यूँ मरते नहीं हैं


यह नहीं दावा कि
सोते पर्वतों से चल पड़ेंगें
या कि सदियों से सुषुप्त
ललाट पर कुछ बल पड़ेंगें
पर अवनि के पार्थ
यूँ गाँडीव को धरते नहीं हैं
स्वप्न यूँ मरते नहीं हैं


है कठिन चलना अगर
कठिनाइयों के पत्थरो पर
विश्व हेतु उठा हलाहल
को लगाना निज- अधर पर
शंकरो पर विषधरो के
विष असर करते नहीं हैं
स्वप्न यूँ मरते नहीं हैं

गणतंत्र दिवस,


छुट्टी का एक और दिन !
एक और दिन
कोसने का ,
समाज़ को
रिवाज़ को
व्यवस्था और व्यवस्थापकों को
गंदगी को , नालियों को
अमीरी - गरीबी की खाई को
भ्रष्ट नेताओं की कमाई को

एक और दिन
जब निकाल सको अपनी भड़ास
इतिहास पर
अन्धविश्वास पर
उसूलों की ज़ंजीर पर
सड़क के फ़कीर पर
बिगड़ते युवाओं पर
बेरहम हत्याओं पर

एक और दिन
जब यह हिसाब हो
कि देश ने क्या क्या न किया
जब यह तय हो
कि कितने बरस बीत गये
और हम कितने आज़ाद हैं
जब एक और भाषण हो
एक प्रतीक का ध्वज लहराये
और सब को याद दिलाना पड़े
कि हम कितने महान हैं,
हम एक राष्ट्र हैं ।

एक और दिन
जब मुझे यह सोचना पड़े
कि क्या इस जगह पर मैं सुरक्षित हूँ ?
जब मैं भाग लूँ फ़िर से एक
'सुरक्षित ' देश में
जहाँ पैसा और चैन मिले ।

एक और दिन
जब एक विस्फ़ोट हो
और उसकी धमक महीनों गूँज़े
और पुलिस , प्रशासन
जो कि नकारा है, इस सब के लिये
ज़िम्मेदार हो

एक दिन जब
हमें सब समझ में आ जाये
कि इस देश में क्या गलत हो रहा है
और कौन गलत कर रहा है
फ़िर हम चौपाल पर
यह निर्णय लें
कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता ।

एक और दिन
जब हम सोचें कि काश कोई नायक आये
और इन जुर्मों के सारे गुनहगारों को
एक लाइन में खड़ा करके खत्म कर दे ।
फ़िर बिजली के खंभे से
चोरी के कनेक्शन पर टीवी देखने
बैठ जायें
अपने घर में , जहाँ
वह सब कुछ है
जिससे चैन से जी सकें
सब कुछ है ,
बस,
एक आईना नहीं है ।
- आलोक शंकर