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Saturday, May 03, 2008

माँ तुम……



माँ तुम……
बहुत याद आ रही हो
एक बात बताऊँ………
आजकल…..
तुम मुझमें समाती जा रही हो


आइने में अक्सर
तुम्हारा अक्स उभर आता है
और कानों में अतीत की
हर एक बात दोहराता है

तुम मुझमें हो या मैं तुममें
समझ नहीं पाती हूँ
पर स्वयं को आज
तुम्हारे स्थान पर खड़ा पाती हूँ

तुम्हारी जिस-जिस बात पर
घन्टों हँसा करती थी
कभी नाराज़ होती थी
झगड़ा भी किया करती थी

वही सब……
अब स्वयं करने लगी हूँ
अन्तर केवल इतना है कि
तब वक्ता थी और आज
श्रोता बन गई हूँ

हर पल हमारी राह देखती
तुम्हारी आँखें ……..
आज मेरी आँखों मे बदल गई हैं
तुम्हारे दर्द को
आज समझ पाती हूँ
जब तुम्हारी ही तरह
स्वयं को उपेक्षित सा पाती हूँ


मन करता है मेरा…
फिर से अतीत को लौटाऊँ
तुम्हारे पास आकर
तुमको खूब लाड़ लड़ाऊँ
आज तुम बेटी
और मैं माँ बन जाऊँ


तुम्हारी हर पीड़ा, हर टीस पर
मरहम मैं बन जाउँ
तुम कितनी अच्छी हो
कितनी प्यारी हो
ये सारी दुनिया को बताऊँ

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19 कविताप्रेमियों का कहना है :

Seema Sachdev का कहना है कि -

मन करता है मेरा…
फिर से अतीत को लौटाऊँ
तुम्हारे पास आकर
तुमको खूब लाड़ लड़ाऊँ
आज तुम बेटी
और मैं माँ बन जाऊँ


तुम्हारी हर पीड़ा, हर टीस पर
मरहम मैं बन जाउँ
तुम कितनी अच्छी हो
कितनी प्यारी हो
ये सारी दुनिया को बताऊँ
शोभा जी आपकी कविता ने टू मुझे भावुक कर दिया , माँ बहुत याद आ रही है

रंजू ranju का कहना है कि -

वही सब……
अब स्वयं करने लगी हूँ
अन्तर केवल इतना है कि
तब वक्ता थी और आज
श्रोता बन गई हूँ


माँ की याद हमेशा साथ ही रहती है चाहे वह कहीं भी भी रहे और यह भी सही है की हम सच में ख़ुद को कभी उन्ही की सिथ्ती में पाते हैं .एक अच्छी सच्ची रचना है शोभा जी

mehek का कहना है कि -

bahut bhavuk,marmik rachana,maa sach mein hum mein samayi hoti hai,bahut sundar badhai

pallavi trivedi का कहना है कि -

हर पल हमारी राह देखती
तुम्हारी आँखें ……..
आज मेरी आँखों मे बदल गई हैं
तुम्हारे दर्द को
आज समझ पाती हूँ
जब तुम्हारी ही तरह
स्वयं को उपेक्षित सा पाती हूँ

बहुत अच्छी कविता है....दिल को छू गई!

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

तुम्हारी जिस-जिस बात पर
घन्टों हँसा करती थी
कभी नाराज़ होती थी
झगड़ा भी किया करती थी

वही सब……
अब स्वयं करने लगी हूँ
अन्तर केवल इतना है कि
तब वक्ता थी और आज
श्रोता बन गई हूँ


ममत्व प्रधान, ममतामयी भावुक कविता..

sahil का कहना है कि -

वाह वाह वाह...........
आलोक सिंह "साहिल"

anuradha srivastav का कहना है कि -

उम्र के खास मोड पर मां बडी शिद्दत से याद आती है। जब-तब उन्हीं समझौतों को हम करते हैं। जिनके लिये उन पर खीझा करते थे तब तो और भी ज्यादा। कुछ इसी भावों को लेकर बहुत पहले मैंने भी लिखा था।

kmuskan का कहना है कि -

तुम्हारे पास आकर
तुमको खूब लाड़ लड़ाऊँ
आज तुम बेटी
और मैं माँ बन जाऊँ

bahut sunder or dil ko chune waali kavita likhi hai aapne

अभिषेक पाटनी का कहना है कि -

bahut maarmik....bahut achchhi rachana....seedhe seedhe dil tak mahsoos kar pa raha hoon main....

archana का कहना है कि -

बहुत बेहतरीन कविता लिखी है आपने शोभा जी ......माँ के बारे में .........जीतना कहें उतना ही कम है ..........और माँ को जीतना हम प्रेम दे पाए ........उनके प्रेम और उनके जीवन के अमूल्य क्षणों के सामने कुछ नही जो उन्होंने हमे दीये ......
आपकी कविता ने सच बचपन की और माँ की याद दिला दी ........और उनके प्रती प्रेम से भर दिया मुझे ..........आपको प्रेम और बधाई

EKLAVYA का कहना है कि -

शोभा जी अपने माँ के प्यार अऔर् उसकी व्यथा को कितने प्यारे ढंग से स्पष्ट एवं रेखांकित किया है सचमुच एक बहुत ही अची कविता आपने रच दी है जो की वाकई मे बड़ा ही अतुलनीय है

anju का कहना है कि -

बहुत खूब शोभा जी
सुच में माँ की ममता का बहुत अच्छे तरीके से वर्णन किया है
बधाई
मन करता है मेरा…
फिर से अतीत को लौटाऊँ
तुम्हारे पास आकर
तुमको खूब लाड़ लड़ाऊँ
आज तुम बेटी
और मैं माँ बन जाऊँ


तुम्हारी हर पीड़ा, हर टीस पर
मरहम मैं बन जाउँ
तुम कितनी अच्छी हो
कितनी प्यारी हो
ये सारी दुनिया को बताऊँ

विपुल का कहना है कि -

शोभा जी.. माँ विषय हमेशा से ही कवियों को प्रिय रहा है .. आपने भी एक उल्लेखनीय प्रयास किया .. कविता अच्छी लगी!
वैसे कविता में थोड़ी लाक्षणिकता होती तो अच्छा होता ! आपने बिल्कुल सपाट तरीके से अपनी बातों को कहा है| यही बात कविता के सौंदर्य में बाधक है !
आपके भाव काबिल-ए-तारीफ हैं पर प्रस्तुतिकरण और सुधारा जा सकता था ..

Kavi Kulwant का कहना है कि -

मैं खॊ गया...भावों के समंदर में..

tanha kavi का कहना है कि -

नि:शब्द हूँ मैं आज।

बहुत हीं खूबसूरत रचना है। बधाई स्वीकारें।

-विश्व दीपक ’तन्हा’

रेनू जैन का कहना है कि -

हर पल हमारी राह देखती
तुम्हारी आँखें ……..
आज मेरी आँखों मे बदल गई हैं
तुम्हारे दर्द को
आज समझ पाती हूँ
जब तुम्हारी ही तरह
स्वयं को उपेक्षित सा पाती हूँ

बहुत सही शोभा जी....जब बच्चे माँ-बाप बनते हैं, तभी अपने माँ-बाप का दर्द समझ पाते हैं. हम भी तभी समझे, हमारे बच्चे भी तब ही समझेंगे. काश की हमने ये पहले समझा होता.

सजीव सारथी का कहना है कि -

सरल है पर भाव सच्चे हैं.....माँ पर जितना भी लिखा जाए कम है.... बधाई

pooja anil का कहना है कि -

शोभा जी ,

सीधे सरल शब्दों में आपने ना सिर्फ़ माँ बल्कि बेटी की व्यथा भी कह डाली है, बहुत सही कहा है कि -

आइने में अक्सर
तुम्हारा अक्स उभर आता है
और कानों में अतीत की
हर एक बात दोहराता है

तुम मुझमें हो या मैं तुममें
समझ नहीं पाती हूँ
पर स्वयं को आज
तुम्हारे स्थान पर खड़ा पाती हूँ

यही समझ का परिवर्तन है जो हमें बड़ी देर से समझ आता है,और जब तक समझ आए हम स्वयं उसी स्थिति में पहुँच चुके होते हैं जिसे हम समझा नहीं सकते!!!!

बहुत ही भावपूर्ण कविता है और सच को बयां करती हुई भी , बहुत बहुत बधाई

^^पूजा अनिल

Nisha Jalori का कहना है कि -

very deep, thought provoking poem..........a girl realises the worth of her Mother when she herself becomes one

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