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बेलें



सनी कुमार की प्रस्तुत कविता जनवरी मे बारहवें पायदान पर रही है। यूनिप्रतियोगिता के सक्रिय प्रतिभागियों मे से एक सनी की कविताएं हिंद-युग्म पर पहले भी प्रकाशित हो चुकी हैं। सनी की कविताओं मे अक्सर नगरीय जीवन की विसंगतियाँ प्रतीकात्मक माध्यम से व्यक्त होती हैं। उनकी एक कविता सितंबर माह मे प्रकाशित हुई थी।

कविता: बेलें

ठूंठ था  
नामालूम क्या नाम था उसका
खोखले से जिस्म से
अपनी उचटती हुई
सूखी छालें
टपकाया करता था
तेज़ हवाओं  में


उन गुलाबी फूलों वाली
बेलों को
पता ही न चला
बस लिपटती चली  आई
इस खोखले से जिस्म पे
लम्हा-लम्हा करके शरारती बेलें----
कभी छेडती उसके खुरदरे  से
बदन को गुदगुदा  के

और कभी ---
सुन लेती सारी  दस्तानें  उसकी
सहलाकर उसके जिस्म को
बड़ा खुश-खुश सा दिखता था
बेलों की बुनी
शॉल ओढ़कर वो

उस गली के कोठीवालों ने
कटवा दिया उसे

उस रोज़ बहुत रोया वो
ठूंठ पेड़
आखिर क्यूँ काटी जा रही हैं
गुलाबी फूलों वाली बेलें भी ??

मुआवज़े


प्रतियोगिता मे 11वें स्थान की कविता सनी कुमार की है। इससे पहले इनकी एक कविता जून माह मे भी 11वें स्थान पर रही थी। प्रस्तुत कविता हमारे राजनैतिक-सामाजिक तंत्र मे मौजूद खतरनाक प्रवृत्ति की ओर इशारा करती है और उसके मूल की पड़ताल करने की कोशिश करती है।

कविता: मुआवज़े 

मुआवजा ...
हाँ ठीक सुना तुमने 
मुझे मुआवजा चाहिए 
मुझे मुआवजा दो...
म्में...म्में...
मैं चीख़ रहा हूँ 
चिल्ला रहा हूँ 
हाँ.. हाँ मैं चिल्ला रहा हूँ 
चीख़ रहा हूँ 
मेरे गले की नसें 
चटख कर 
ढीली पड़ने से पहले तक 
मैं चीखता रहूँगा 
मेरी आँखों में उतर आया 
ख़ून
बहने 
टपकने 
क्यों न लगे
मैं उसके बाद तलक चिल्लाता  रहूँगा ...
मुआवजा बांटने का 
बड़ा शौक़ है न तुम्हे 
अब देते क्यों नही मुझे मुआवजा...!  

रेल या बस दुर्घटना...
सड़क या कोई और दुर्घटना..
या किसी फर्जी मुठभेड़ में..
किसी जहरीले गैस काण्ड में...
नहीं...नहीं..शायद किसी
आतंकी या नक्सली हमले में..
या फिर किसी अंधी भीड़ ने ही..
पता नहीं ..? 
मुझे ठीक से याद भी नहीं
इसलिए कि वक़्त मुझे बूढ़ा करके गुज़र गया... 

लेकिन, अपनी लिजलिजी और झुर्रीदार 
छाती ठोक कर कहता हूँ ..
मेरे बेटे की मौत मुआवज़े लायक है   
इनमें से किसी एक में मेरा बेटा मर-खप गया..
दे दो हरामखोरों... 
जिससे अपनी बेटी की शादी करा सकूं..  


दिल्ली में धूल, धूप और दोपहर


जून 2010 की यूनिप्रतियोगिता की 11वीं कविता सनी कुमार हैं। सनी कुमार अपने बारे में बताते हुए कहते हैं कि नाम सनी है(जिससे आप लोगों का पहले ही तार्रुफ़ है)। पढ़ाई के नाम पे इग्नू से बी.ए का फॉर्म भर दिया है। ऐसा शायद इसलिए कहना पड़ रहा क्योंकि कॉलेज(रेगुलर) में फेल हुआ, तो कॉलेज छोड़ दिया था। उर्दू ज़ुबान के प्रति लगाव था, सो इसी साल उर्दू में डिप्लोमा(मज़ाक़-मज़ाक़ में) मुक्कमल कर लिया। बारिश में फुटबाल खेलना और भीगना पसंद है। ख़ाली वक़्त में कभी-कभार शतरंज(ग़लती से बचपन में एक दोस्त से सीख लिया था) खेल लेता हूँ। दिल्ली में ही पला-बढ़ा हूँ और पढ़ (हिंदी साहित्य पढने का शौक़ है मुझे) रहा हूँ। मालवीय नगर के एक मोहल्ले (जिसे लोग झुग्गी कहते है) में रहता हूँ। फिलहाल इस कमजात परिचय से ही काम चलाइये। फोटो (जिसमें मेरी शक्लोसूरत थोड़ी सी ठीकठाक हो) कभी आगे भेज दूँगा।
ईमेल- halfmoon_sunny@yahoo.in

पुरस्कृत कविता: धूल, धूप, दोपहर

जल रहीं हैं दोपहरें
तवे-सी तप रहीं हैं सड़कें भी
खौल रहें हैं बी.आर.टी. बस स्टैंड
दिल्ली सरकार के

हवा धूल चखाती चल रही है

इसी नंगी धूप वो में आदमी बेंचता है
धूप के चश्मे
पसीने में तर एक लड़का लग रहा है आवाजें---
"रुमाल ले लो... रुमाल"

यहीं पे बैठा है मोची भी
अपनी छतरी को सूरज की तरफ़ करके
मुँह में बीड़ी दबाए हुए
धुँए से ज़्यादा धूल फाँक रहा है

भगवान जाने सूरज बाबा से
क्या डील हुई है इनकी


गाड़ियों के इंजन आग उगलते चल रहे हैं
जितनी महँगी गाड़ी
उतनी गर्म हवा...

मंटो ने लिखा है कहीं
"बम्बई में इतनी शदीद बारिश पड़ती है कि
आप की हड्डियाँ तक भिगो दे"
दिल्ली की गर्मी आपकी हड्डियाँ तो नहीं पिघलाती
आपकी चमड़ी से धुँआ ज़रूर उठा देती है...

भंवे सिकुड़ आईं हैं
चेहरे चिलचिलाये हुए हैं
लड़कियों की बगलें
और औरतों के ब्लाउज पसीने से परेशान हैं

सूरज आसमान पर नहीं
सब के चेहरे पे उग आया है जैसे
हलक़ में काँटे भी चुभ रहे हैं या यूँ कहूँ कि जैसे
मधुमक्खी ने डंक मारा हो

ब्लू लाइन बस का कंडक्टर
खा के गुटखा
छोड़ रहा है भभका
वो लड़की मुँह बिचकाती है
और दूर जाके खड़ी हो जाती है
बस पीटते हुए कंडक्टर
कान पे चिल्ला रहा सबके---
"आई.टी.ओ...आई.टी.ओ...मटरो...दिल्ली गेट...ऐ बस अड्डा..बस अड्डा..
बैठो.. ऐ आओ..आओ..आओ बस अड्डे वाले...

बस आ रहीं है लाल वाली
ए.सी. वाली है
चढ़ रहे है वो
जिनकी थोड़ा पैसा है जेब में
उतर रहें है दुगनी तेज़ी से
क्यूँकि ए.सी. बस का
ए.सी. ख़राब है

इसी बीच गुज़र रहा
दिल्ली जल बोर्ड का टैंकर
जीभ चिढ़ता हुआ...
पानी बिखेरता हुआ...