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हम तूफानों में फंसी तकदीर हैं



जनवरी प्रतियोगिता की चौदहवीं रचना एक ग़ज़ल है जिसके रचनाकार विवेक कुमार पाठक ’अंजान’ हैं। वर्ष १९६८ में संस्कारधानी जबलपुर (म.प्र.) में जन्मे विवेक कुमार पाठक ने जबलपुर विश्वविद्यालय से वाणिज्य स्नातक एवं हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। वर्ष १९८५ से रक्षा मंत्रालय के एक विभाग आयुध निर्माणी खमरिया से अपनी कर्म यात्रा प्रारंभ की। विभागीय राजभाषा प्रतियोगिताओं से साहित्य यात्रा का आगाज़ हुआ और तब से आज तक अनवरत रूप से जारी है। कई राष्ट्रीय कवि सम्मलेन मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में आयुध निर्माणी भंडार में कार्यरत हैं एवं अंतरजाल के माध्यम से साहित्य आराधना का यह प्रथम प्रयास है। अपनी लेखनी से गीत, गज़ल, नई कविता एवं अकविता सभी विधाओं में सृजन का प्रयास किया है। इनकी हिंद-युग्म पर यह प्रथम प्रकाशित रचना है।

गज़ल

बेबसी की हम नई तस्वीर हैं ,
हम तूफानों में फंसी तकदीर हैं

गुलशनों को फूंकते हैं नौजवां,
मालियों के सूखते अब नीर हैं

बन गया मैं एक दिल टूटा हुआ,
लोग मुझको जोडते हर पीर हैं

एक था घर कई घरों में बंट गया,
बीबियाँ घर की गज़ब शमशीर हैं

रांझे को चीलें उठा के ले गईं ,
काफिरों संग घूमती अब हीर हैं

अब कहाँ मिलते फंसाने प्रीत के,
हर तरफ अब फत्ते ईर  बीर  हैं

भालू नाच




जनवरी प्रतियोगिता की तेरहवीं कविता के रचनाकार रमाशंकर सिंह हिंद-युग्म पे पहली बार प्रकाशित हो रहे हैं। रमाशंकर सिंह का जन्म 1 जुलाई 1981 को उत्तर प्रदेश के एक पिछड़े जिले गोण्डा के एक छोटे से गाँव सिसई में हुआ। इण्टरमीडिएट तक की शिक्षा पास ही के एक कस्बे में से हासिल की और 2004 में प्राचीन इतिहास में प्रथम श्रेणी में परास्नातक साकेत कालेज, अयोध्या से पूरा किया । 2005 से 2009 तक रचनात्मक कार्यों में लगे रहे हैं। रमा जी को 2009 में यू.जी.सी. की जूनियर रिसर्च फेलोशिप मिली है और वर्तमान में गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के प्रो.बद्री नारायण के निर्देशन में निम्न जातियों के सामुदायिक अधिकारों पर शोध कर रहे हैं। कालेज की वार्षिक पत्रिका का संपादन किया है एवं वाक के अंक 6 में दो कविताएँ छप चुकी हैं।

कविता: भालू नाच 

बचपन में गर्म लोहे की छड़ से
दागे गये तलुओं की
पीड़ा की स्मृति में
मदारी के डंडे के डर से
नाचता है भालू
डमरू की धुन पर
उसके नाच में नाच रही होती है
उसकी पीड़ा और भूख
एक पीड़ा और भूख
नाच रही होती है मदारी की आँख
और जमूरे के पेट में भी

मेरे बचपन के ये बिंब
मेरे साथ घट रहे हैं
पेट पालने की जिद
और ज्यादा इकट्ठा करने की हवा में
मैं नाचता हूँ साहबों और नेताओं के आगे
बिना डंडा दिखाये या डमरू बजाये ही

आदमी ऐसे ही बनता है भालू
और नाचता रहता है मजमे में ।



बेलें



सनी कुमार की प्रस्तुत कविता जनवरी मे बारहवें पायदान पर रही है। यूनिप्रतियोगिता के सक्रिय प्रतिभागियों मे से एक सनी की कविताएं हिंद-युग्म पर पहले भी प्रकाशित हो चुकी हैं। सनी की कविताओं मे अक्सर नगरीय जीवन की विसंगतियाँ प्रतीकात्मक माध्यम से व्यक्त होती हैं। उनकी एक कविता सितंबर माह मे प्रकाशित हुई थी।

कविता: बेलें

ठूंठ था  
नामालूम क्या नाम था उसका
खोखले से जिस्म से
अपनी उचटती हुई
सूखी छालें
टपकाया करता था
तेज़ हवाओं  में


उन गुलाबी फूलों वाली
बेलों को
पता ही न चला
बस लिपटती चली  आई
इस खोखले से जिस्म पे
लम्हा-लम्हा करके शरारती बेलें----
कभी छेडती उसके खुरदरे  से
बदन को गुदगुदा  के

और कभी ---
सुन लेती सारी  दस्तानें  उसकी
सहलाकर उसके जिस्म को
बड़ा खुश-खुश सा दिखता था
बेलों की बुनी
शॉल ओढ़कर वो

उस गली के कोठीवालों ने
कटवा दिया उसे

उस रोज़ बहुत रोया वो
ठूंठ पेड़
आखिर क्यूँ काटी जा रही हैं
गुलाबी फूलों वाली बेलें भी ??

शुभस्ते पंथान:



जनवरी माह की आठवीं कविता अरविंद कुमार पुरोहित की है। अरविंद की यह हिंद-युग्म पर पहली कविता है।

पुरस्कृत कविता: शुभस्ते पंथान:

उसने कहा विनम्र बनो
मैं डरपोक हो गया.
उसने कहा संतोष बड़ा धन है
मैं आलसी और गरीब हो गया.
उसने कहा निडर रहो
मैं असभ्य हो गया.
जब निर्भय होने को कहा
मैं आक्रामक हो गया.
उसने सदा अस्मिता की बात की
मैं अहंकारी हो गया.
उसने कहा चुप रहना अच्छी बात है
मैं गूंगा हो गया.
जब खुल कर बोलने को कहा
मैं अमर्यादित हो गया.
उसने कहा स्पष्टवादी बनो
मैं दिल दुखाने लगा.
उसने समझदार बनाने की सलाह दी
मैं चतुर और चालाक बन गया.
उसने कहा द्रढ़ रहो
मैं जिद्दी हो गया.
उसने कहा काम आराम से करना चाहिए
मैं पूरा सो गया.
उसने कहा विफलता इतनी बुरी नहीं होती
मैंने प्रयास छोड़ दिए, विफलता की आदत डाल ली.
उसने कहा सांप मत बनना
मैं केंचुआ बन गया.
उसने अहिंसा को बड़ा गुण बताया
मैं पत्ता-गोभी बन गया.
उसने कहा भगवान् है
मैं निट्ठल्ला हो गया.
उसने कहा सब कुछ भगवान् थोड़े ही देखता है
मैं चोर बन गया.
वह कुछ कहता रहा
मैं कुछ बनता गया
मैं समझाने लगा
वह माना नहीं.
फिर मुझे भी गुस्सा आ गया
मुझे आदमी ही रहने दो
देवता क्यों बनाते हो
ये दुनियां किताबी बातों से नहीं चलती.
वह रुका और कहा-मैं तो खुद आदमी बनने की राह का पथिक हूँ
आपको देवता क्या बनाऊंगा?
आपने कुछ पूछा जरूर होगा
लेकिन कहा मैंने खुद से है
आपने सुन लिया होगा,
पर अमल तो मुझे करना है
आप जैसे भी हो, प्यारे हो
अपने हिसाब से इंसानियत की राह पर हो.
लेकिन यहाँ से मेरी राह जुदा होती हैं
चाहो तो साथ चलो, क्योंकि मंजिल तो एक ही है
अलग चले तो फिर मिलेंगे
साथ रहे तो साथ हैं ही.
विदा दोस्त! आपके साथ सफ़र बहुत अच्छा रहा
शुभस्ते पंथान:
और वह गुनगुनाता हुआ मुड़ गया.
मुझे जीत की इतनी खुशी नहीं हुई
जितना उसके बिछुड़ने का गम.
सोचा भी चल पडूँ उसी के साथ
या फिर पुकार लूं अपनी ही राह पर.
सोचता खड़ा रहा फिर चल पड़ा अपनी ही डगर.
कानों में अब भी उसकी गुनगुनाहट गूंजती है
जो कोई भजन नहीं था
एक फ़िल्मी गाना था
(ज्योति कलश छलके !!...शायद!)
कभी कभी उसकी याद बड़ी शिद्दत से आती है
उसकी बातें आँखों के सामने मुस्कुरातीं हैं
कभी कभी वह हमराह चलता दिखाई भी देता हैं
पर वो भरम है.
में अपनी बात पे कायम हूँ
उसकी पता नहीं क्या जिद है?
मेरी बला से!!


क्रांति का सूर्य



जनवरी की सातवीं कविता अनिता निहलानी की है। अनिता की यह हिंद-युग्म पर प्रथम कविता है। उत्तर प्रदेश मे पली बढ़ी अनिता पिछले दो दशकों से असम मे निवास कर रही हैं। इन्होने गणित मे स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की है। कविताओं की तीन पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं और पिछले कुछ समय से इंटरनेट पर लिखने मे सक्रियता भी बढ़ी है।

पुरस्कृत कविता: क्रांति का सूर्य


मैं विद्रोहिणी हूँ  !
जो समाज के ढके छिपे व्यापारों को उजागर करना चाहती है
जिससे वह जी सकें, जो मौत की राह देख रहे हैं
मैं संस्कृति और सभ्यता के नाम पर ओढ़ी मानसिकता नहीं हूँ
बल्कि उन्हें कुरीतियाँ और अन्धविश्वास कहने का दुस्साहस !

मैं एक आवाज हूँ !
मानवता के (अमानवीय) ठेकेदारों के बंद कानों के लिये
एक आवाज कारखानों की, खदानों की, हलों-बैलों की
पत्थर तोड़ते मजदूरों की !

मैं मृत्यु हूँ !
तानाशाही दम्भ की, निर्दोषों के खून से सने हाथों की
मैंने सुखद और दुखद क्षण जिए हैं
एक गीत के जन्म और मृत्यु पर
ऐसी मृत्यु जो हजारों का जीवन है !

मेरे जीवित अस्तित्त्व का कोई प्रमाण हो न हो
पर मैं अमर हूँ,
घुमती हूँ बेरोकटोक
मृत्युदन्शी सन्नाटों में
जंगलों के बियाबानों में
क्योंकि मैं एक विश्वास हूँ,
लोलुप शासन के अंत होने का
मेहनतकश वर्ग के फलने फूलने का
जो स्पष्टीकरण चाहता है उनसे
जो सदा से उसके दावेदार रहे हैं
क्योंकि तभी एक नए सूर्य का उदय होगा
क्रांति का सूर्य !



सपना मकान का



जनवरी माह की ग्यारहवीं कविता अनवर सुहैल की है। अनवर सुहैल की ख्याति एक सक्षम कथाकार की है और उनके कथा संग्रह भी खासे चर्चित रहे हैं मगर उनकी कविताएं भी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मे प्रकाशित होती रहती हैं। हिंद-युग्म पर भी उनकी कविताएं प्रकाशित हुई हैं और उनकी पिछली कविता गत जुलाई माह मे आयी थी।

कविता: सपना मकान का 

सपना मकान का
अपने मकान का
कैसे हो पूरा
खाली पेट
लंगोटी बांधे
सोच रहा है घूरा
सोच रहा है घूरा कैसे
कटेगी ये बरसात
पैताने बैठा है कुत्ता
नहीं छोडता साथ
घरवालों की होती इज़्ज़त
चाहे हों आवारा
बेघर और बेदर को समझे
चोर ज़माना सारा
खाते पीते लोगों को ही
बैंकों से मिलता लोन
जिनका कोई नाथ न पगहा
उनके लिए सब मौन
काहे देखे घूरा सपना
काहे दांत निपोरे
कह दो उससे नंगा-बूचा
धोए क्या निचोडे......
सपना मकान का
देख रहा है घूरा!


बंधुआ मुक्त हुआ कोई



आरसी चौहान की कविताएं अक्सर औद्योगीकरण के सामाजिक प्रभावों और मानवीय पलायन जैसे विषयों को शब्दों मे व्यक्त करती नजर आती हैं। अपने पहले प्रयास मे ही सितंबर माह मे दूसरे स्थान पर रहने वाले आरसी जी की पिछली कविता अक्टूबर माह के अंतर्गत प्रकाशित हुई थी। जनवरी माह मे उनकी प्रस्तुत कविता दसवें स्थान पर रही है।

पुरस्कृत कविता: बंधुआ मुक्त हुआ कोई

किसान के जहन से
अब दफन हो चुकी है
अतीत की कब्र में
दो बैलों की जोड़ी
वह भोर ही उठता है
नांद में सानी-पानी की जगह
अपने ट्रैक्टर में नाप कर डालता है
तेल
धुल-पोंछ कर दिखाता है अगरबत्ती
ठोक-ठठाकर देखता है टायरों में
अपने बैलों के खुर
हैंडिल में सींग
व उसके हेडलाइट में
आँख गडा़कर झांकता
बहुत देर तक
जो धीरे-धीरे पूरे बैल की आकृति मे
बदल रहा है
समय-
खेत जोतते ट्रैक्टर के पीछे-पीछे
दौड़ रहा है
कठोर से कठोर परतें टूट रही हैं
सोंधी महक उठी है मिट्टी में
जैसे कहीं
एक बधुंआ मुक्त
हुआ हो कोई।
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पुरस्कार: हिंद-युग्म की ओर से पुस्तकें।

वसीयत




हिंद-युग्म के पाठकों के लिये सुधीर गुप्ता ’चक्र’ का नाम नया नही है। उनकी एक कविता पिछले माह ग्यारहवें पायदान पर रही थी। बदलती जरूरतों के बीच पुनर्परिभाषित होते मानवीय संबंधों पर तंज कसती उनकी प्रस्तुत कविता जनवरी माह मे नवें स्थान पर रही है।

पुरस्कृत कविता: वसीयत  

जिंदगी भर
पिता ने
कवच बनकर
बेटे को सहेजा
लेकिन पुत्र
बस यही सोचता रहा
कि कब लिखी जाएगी
वसीयत मेरे नाम
और कोसता रहा
जन्मदाता पिता को

पुत्र ने
युवावस्था में जिद की
और बालहठ को दोहरा कर
फैल गया धुँए सा
लेकिन
संयमी पिता ने
गौतम बुद्ध की तरह शांत रहकर
अस्वीकृति व्यक्त की
और
कुछ देर शांत रहने के बाद
हाथ से रेत की तरह फिसलते
बेटे को देखकर
पिता ने कहा
मेरी वसीयत के लिए
अभी तुम्हें करना होगा
अंतहीन इंतजार
कहते हुए
पिता की आँखों में था
भविष्य के प्रति डर
और
पुत्र की आँखों का मर चुका था पानी
भूल गया था वह
पिता द्वारा दिए गए
संस्कारों की लम्बी श्रृंखला
यह जानते हुए भी
कि यूरिया खाद और
परमाणु युगों की संतानों का भविष्य
अनिश्चित है
फिर भी
वसीयत का लालची पुत्र राजू
नहीं जानना चाहता
अच्छे आचार-विचार, व्यवहार
और संस्कारों को मर्यादा में रखना

राजू
क्यों नालायक हो गए हो तुम
भूल गए
पिता ने तुम्हारे आँसुओं को
हर बार ओक में लिया है
और जमीन पर नहीं गिरने दिया
अनमोल समझकर

पिता के भविष्य हो तुम
तुम्हारी वसीयती दृष्टि ने
पिता की सम्भावनाओं को
पंगु बना दिया है
तुमने
मर्यादित दीवार हटाकर
पिता को कोष्ठक में बंद कर दिया
तुम्हारी संकरी सोच से
कई-कई रात
आँसुओं से मुँह धोया है उसने
तुम्हारी वस्त्रहीन इच्छाओं के आगे
लाचार पिता
संख्याओं के बीच घिरे
दशमलव की तरह
घिर जाता है
और महसूस करता है स्वयं को
बंद आयताकार में
बिंदु सा अकेला
जहाँ बंद है रास्ता निकास का

चेहरे के भाव से
देखी जा सकती है पिता के अंदर
मीलों लम्बी उदासी
और आँखों में धुंधलापन
तुम्हारी हर अपेक्षा
उसके गले में कफ सी अटक चुकी है
तुम पिता के लिए
एक हसीन सपना थे
जिसकी उंगली पकड़कर
जिंदगी को
जीतना चाहता था वह
पर
तुम्हारी असमय ढे‌रों इच्छाओं से
छलनी हो चुका है वह
और रिस रहा है लगातार
नल के नीचे रखी
छेद वाली बाल्टी की तरह

आज तुम
बहुत खुश हो
मैं समझ गया
तुम्हारी इच्छाओं की बेडि‌यों से
जकड़ा पिता
आज हार गया तुमसे
और
लिख दी वसीयत तुम्हारे नाम
अब तुम
निश्चिंत होकर
देख सकते हो बेहिसाब हसीन सपने।
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पुरस्कार: हिंद-युग्म की ओर से पुस्तकें।


बसंत-बसंत




फ़ाल्गुन माह आरंभ हो चुका है। प्रतियोगिता की छठी कविता भी मौसम के बदलाव की ओर इशारा करती है और प्रतीक्षा के सकारात्मक पहलू पर जोर देते हुए जीवन के लिये आवश्यक आशावाद को शब्द देती है। वसंत का स्वागत करती इस कविता की रचनाकार डिम्पल मलहोत्रा की हिंद-युग्म पर यह दूसरी कविता है। इससे पहले उनकी एक कविता जुलाई माह मे दसवें स्थान पर प्रकाशित हुई थी।

पुरस्कृत कविता: बसंत-बसंत

सूना-सूना सा आकाश
बसा है मकानों की छतों पे अभी..
परदें हटाओ गर
तो खिड़कियों पे..
दिखती है खामोशी की परछाइयाँ..
लिपटी पड़ी है उदासी सी
सीखचों पे भी..
मगर कभी गुटका करेंगे
कांपते कबूतर रोशनदानों में..
सर्द कागज़ पर बर्फ से लफ्ज़
पिघल निकलेंगे..
हरी हवा उगने लगेगी
पतझड़ी समय में..
डार परिंदों की निकलेगी बतियाते हुए..
नज़र थिरकेगी हर शैय पे आते जाते हुए..
गुनगुनी धूप सहलाएगी सारी फ़िज़ा को..
जमा-रुका सा कुछ मन में
दस्तक देगा..
खुले दरीचों में से दिखने लगेगी
..बसंत-बसंत..
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पुरस्कार: हिंद-युग्म की ओर से पुस्तकें।


यूँ ही आँगन में बम नहीं आते



प्रतियोगिता की पाँचवीं रचना भी एक ग़ज़ल है। रचनाकार धर्मेंद्र कुमार सिंह प्रतियोगिता मे नियमित भाग लेते हैं और इनकी रचनाएं भी पाठकों का प्रतिसाद पाती रहती हैं। धर्मेंद्र जी इस बार के हमारे यूनिपाठक भी बने हैं। इनकी पिछली गज़ल दिसंबर माह मे सातवें स्थान पर रही थी।

पुरस्कृत रचना: गज़ल

जो तेरे दर पे हम नहीं आते
तो खुशी ले के गम नहीं आते

बात कुछ तो है तेरी आँखों में
मयकदे वरना कम नहीं आते

कोई बच्चा कहीं कटा होगा
गोश्त यूँ ही नरम नहीं आते

होगा इंसान सा कभी नेता
मुझको ऐसे भरम नहीं आते

आग दिल में नहीं लगी होती
अश्क इतने गरम नहीं आते

कोइ कहीं भूखा सो गया होगा
यूँ ही जलसों में रम नहीं आते

प्रेम में गर यकीं  हमें  होता
इस जहाँ में धरम नहीं आते

कोइ अपना ही बेवफ़ा होगा
यूँ ही आँगन में बम नहीं आते
________________________
पुरस्कार: हिंद-युग्म की ओर से पुस्तकें।

छुपाकर दिल-ओ-ज़ेहन के छाले रखिये



प्रतियोगिता की तीसरी रचना एक गज़ल है। इसकी रचनाकार वंदना सिंह की हिंद-युग्म पर प्रथम रचना है। अपना परिचय देते हुए खुद उनका कहना है कि ’समझ नहीं पा रही हूँ कि परिचय क्या दूं? फिलहाल इतना ही कहना चाहूंगी कि मैं उत्तरप्रदेश के मेरठ शहर से हूँ। .सितम्बर 1989 का मेरा जन्म है। स्कूल शिक्षा हासिल करने के पश्चात 2008 में भारत से अमेरिका आना हुआ और फिलहाल कॉलेज में हूँ। कविता से प्रेम स्कूल के समय कापी-किताबो के पीछे लिखते-लिखते कब डायरी तक आया पता ही नहीं चला। पर सही रूप से जुड़ने और समझने का मौका नेट की दुनिया ने दिया। इसलिए 2009 को अपनी शुरुवात मानती हूँ। " कागज़ मेरा मीत है ..कलम मेरी सहेली" नामक ब्लॉग पर निरंतर अपनी रचनाये प्रकाशित करती रहती हूँ।   कुछ करीबी कवि-मित्रो की सीख और सराहना हमेशा प्रेरित करती रही है। उन सबका दिल से धन्यवाद करना चाहती हूँ! ’बुजुर्ग लाये हैं दिलों के दरिया से मोहब्बत की कश्ती निकाल कर, हम भी मल्लाह बस उसी सिलसिले के हैं।’

पुरस्कृत रचना: गज़ल

लबो पे  हँसी, जुबाँ पर  ताले रखिये,
छुपाकर दिल-ओ-ज़ेहन के छाले रखिये

दुनिया में  रिश्तों का  सच  जो भी हो,
जिन्दा रहने के लिए कुछ भ्रम पाले रखिये

बेकाबू  न हो जाये ये अंतर्मन  का  शोर ,
खुद को यूँ भी न ख़ामोशी के हवाले रखिये

बंजारा हो चला दिल, तलब-ए-मुश्कबू में
लाख बेडियाँ चाहे इस पर  डाले रखिये

ये नजरिये का झूठ और दिल के वहम
इश्क सफ़र-ए-तीरगी है नजर के उजाले रखिये

मौसम आता होगा एक नयी तहरीर लिए,
समेटकर पतझर कि अब ये रिसाले रखिये

कभी समझो शहर के परिंदों की उदासी
घर के एक छीके में कुछ निवाले रखिये

 तुमने सीखा ही नहीं जीने का अदब शायद,
साथ अपने  वो बुजुर्गो कि  मिसालें रखिये

(मुश्कबू= कस्तूरी की गंध
रिसाले = पत्रिका)
______________________________________
पुरस्कार: हिंद-युग्म की ओर से पुस्तकें।

लोकतंत्र में लोक



प्रतियोगिता की दूसरी कविता वसीम अकरम की है। यूनिप्रतियोगिता के नियमित प्रतिभागी वसीम की कविताओं के केंद्र मे सामाजिक और आर्थिक विसंगतियाँ होती हैं, रूढियों और अन्याय के प्रतिरोध का स्वर हो्ता है और सामाजिक परिवर्तन का आह्वान भी होता है। नवंबर माह के यूनिकवि रह चुके वसीम अकरम की एक ग़ज़ल पिछले माह भी शीर्ष दस मे रही थी।

पुरस्कृत कविता: लोकतंत्र में लोक

तुम अनाज उगाओगे
तुम्हे रोटी नहीं मिलेगी,
तुम ईंट पत्थर जोड़ोगे
तुम्हें सड़क पर सोना होगा,
तुम कपड़े बुनोगे
और तुम नंगे रहोगे,
क्योंकि अब लोकतंत्र
अपनी परिभाषा बदल चुका है
लोकतंत्र में अब लोक
एक कोरी अवधारणा मात्र है,
सत्ता तुम्हारे नहीं
पूंजी के हाथ में है
और पूंजी
नीराओं, राजाओं
कलमाडियों और टाटाओं के हाथ में है,
तुम्हारी ज़बान, तुम्हारी मेहनत
तुम्हारी स्वतंत्रता, तुम्हारा अधिकार
सिर्फ संवैधानिक कागजों में है
हकीकत में नहीं,
तभी तो
तुम्हारी चंद रुपये की चोरी
तुम्हें जेल पहुंचा देती है
मगर
उनकी अरबों की हेराफेरी
महज एक
राजनितिक खेल बनकर रह जाती है।
____________________________________
पुरस्कार: हिंद-युग्म की ओर से पुस्तकें।

जनवरी 2011 की यूनिप्रतियोगिता के परिणाम



हिंद-युग्म की जनवरी 2011 की यूनिकवि प्रतियोगिता के परिणाम ले कर हम उपस्थित है। परिणामों की घोषणा मे विलम्ब के लिये क्षमा माँगते हुए हम प्रतियोगिता के सभी प्रतिभागियों और अपने पाठकों द्वारा धैर्य रखने के लिये आभारी हैं।
जनवरी माह की प्रतियोगिता यूनिप्रतियोगिता के उन्चासवीं कड़ी थी। इस बार कुल 40 प्रतिभागियों की कविताएं सम्मिलित की गयीं, जिन्हे दो चरणों मे परखा गया। प्रथम चरण के तीन निर्णायकों के दिये अंकों के आधार पर 20 कविताओं को द्वितीय चक्र मे स्थान मिला, जहाँ दो निर्णायकों ने कविताओं के शिल्प, कथ्य, सामयिकता आदि के विविध पक्षों के आधार पर उनको आँका। इस प्रतियोगिता की एक खास बात यह रही कि कई सारी ग़ज़लें प्रविष्टि के तौर पर शामिल हुई। इस बार की यूनिकविता का खिताब भी एक ग़ज़ल को गया है, जिसके रचनाकार होने का श्रेय नवीन चतुर्वेदी को जाता है। निर्णायकों ने उन्हे जनवरी माह का यूनिकवि चुना है।

यूनिकवि: नवीन चतुर्वेदी

हमारे नियमित पाठक नवीन जी की कलम से परिचित होंगे। नवीन जी प्रतियोगिता से कुछ समय पहले ही जुड़े हैं और इनकी पहली ही रचना नवंबर माह मे छठे स्थान पर रही थी। मुख्यतया गज़ल विधा मे महारथ रखने वाले नवीन जी रचनाकार के अलावा एक गंभीर पाठक के तौर पर भी हिंद-युग्म पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं। अंतर्जाल पर साहित्यिक अभिरुचि के प्रचार-प्रसार मे खासे सक्रिय नवीन जी का परिचय हम पहले भी अपने पाठकों से करा चुके हैं मगर अपने नये पाठकों के लिये एक बार पुनः उनका संक्षिप्त परिचय दे रहे हैं। नवीन सी चतुर्वेदी का जन्म अक्टूबर 1968 मे मथुरा मे हुआ। वाणिज्य से स्नातक नवीन जी ने वेदों मे भी आरंभिक शिक्षा ग्रहण की है। अभी मुम्बई मे रहते हैं और साहित्य के प्रति खासा रुझान रखते हैं। आकाशवाणी मुंबई पर कविता पाठ के अलावा अनेकों काव्यगोष्ठियों मे भी शिरकत की है और आँडियो कसेट्स के लिये भी लेखन किया है। ब्रजभाषा, हिंदी, अंग्रेजी और मराठी मे लेखन के साथ नवीन जी ब्लॉग पर तरही मुशायरों का संचालन भी करते हैं। ज्यादा से ज्यादा नयी पीढ़ी को साहित्य से जोड़ने का प्रयास है।

यूनिकविता: ग़ज़ल

गगनचरों को दे बुलावा चार दानों पर|
बहेलिए फिर ताक में बैठे मचानों पर |१|

बुजुर्ग लोगों से सुना है वो सुनाता हूँ|
हवाएँ भी हैं नाचती दिलकश तरानों पर |२|

हुनर हो कोई भी, बड़ी ही कोशिशें माँगे|
न खूँ में होता है, न मिलता ये दुकानों पर |३|

अवाम के पैसे पचाना जानते हैं जो|
हुजूम बैठा ही रहे उन के मकानों पर |४|

विकास की खातिर मदद के नाम पर यारो|
लुटा रहे लाखों करोड़ों कारखानों पर |५|

जिन्हें तरक्कियों से निस्बतें होतीं हरदम|
न ध्यान देते वो फ़िज़ूलन तंज़ - तानों पर |६|

पहाड़ की चोटी तलक वो ही पहुँचते हैं|
फिसल चुके हों जो कभी उन की ढलानों पर |७|
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पुरस्कार और सम्मान: हिंद-युग्म से सद्यप्रकाशित सुधीर गुप्ता ’चक्र’ के नये काव्य-संग्रह ’उम्मीदें क्यों’ की प्रति तथा प्रशस्तिपत्र। प्रशस्ति-पत्र वार्षिक समारोह में प्रतिष्ठित साहित्यकारों की उपस्थिति मे प्रदान किया जायेगा। समयांतर में कविता प्रकाशित होने की सम्भावना।

 इसके अतिरिक्त दिसंबर माह के शीर्ष 10 के अन्य कवि जिनकी कविताएं हम यहाँ प्रकाशित करेंगे और जिन्हे हिंद-युग्म की ओर से पुस्तकें दी जायेगी, उनका क्रम निम्नवत है-

वसीम अकरम
वंदना सिंह
सुवर्णा शेखर दीक्षित
धर्मेंद्र कुमार सिंह
डिम्पल मल्होत्रा
अनिता निहलानी
अरविंद कुमार पुरोहित
सुधीर गुप्ता चक्र
आरसी चौहान

शीर्ष दस के अतिरिक्त हम जिन चार अन्य कविताओं का प्रकाशन इस प्रतियोगिता के अंतर्गत करेंगे, उनके रचनाकारों के नाम हैं


अनवर सुहैल
सनी कुमार
रमा शंकर सिंह
विवेक कुमार पाठक अंजान

उपर्युक्त सभी कवियों से अनुरोध है कि कृपया वे अपनी रचनाएँ 10 मार्च 2011 तक अन्यत्र न तो प्रकाशित करें और न ही करवायें

  हम उन कवियों का भी धन्यवाद करना चाहेंगे, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर इसे सफल बनाया। और यह गुजारिश भी करेंगे कि परिणामों को सकारात्मक लेते हुए प्रतियोगिता में बारम्बार भाग लें। प्रतियोगिता मे भाग लेने वाले शेष कवियों के नाम निम्नांकित हैं

मनोज कुमार
पंकज भूषण पाठक प्रियम
रविंद्र कुमार श्रीवास्तव बेजुबान
बोधिसत्व कस्तुरिया
योगेश कुमार ध्यानी 
प्रदीप वर्मा
आलोक गौर
सुमित वत्स
शोभा रस्तोगी शोभा
अल्पना गिरि
नीलेश माथुर
ब्यूटी मालाकार
रवि शंकर पांडेय
विनोद वर्मा प्रेम अंजाना
रतन प्रसाद शर्मा
शील निगम
अनिरुद्ध सिंह चौहान
विभूति कुमार
दीपक कुमार
योगेंद्र शर्मा व्योम
प्रवेश सोनी
रिक्की पुरी
आशीष पंत
आलोक उपाध्याय
प्रवीण चंद्र राय
सीमा स्मृति मलहोत्रा

यूनिपाठक सम्मान

   पिछले कुछ माहों से हमने यूनिपाठक सम्मान की घोषणा नही की थी। विगत कुछ माहों मे प्रकाशित रचनाओं पर पाठकों द्वारा की गयी प्रतिक्रियाओं को आँकते हुए इस बार यूनिपाठक का खिताब धर्मेंद्र कुमार सिंह ’सज्जन’ को जाता है। एक पाठक के तौर पर अपनी निरंतरता और प्रतिक्रियाओं की गुणवत्ता और उससे झलकती पठनीयता के आधार पर सहज ही धर्मेंद्र जी प्रभावित करते हैं। यूनिप्रतियोगिता मे नियमित रूप से हिस्सा लेने वाले धर्मेंद्र जी ’एक अच्छा लेखक होने के लिये अच्छा पाठक बनना भी अपरिहार्य है’ की उक्ति को चरितार्थ करते हैं।
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पुरस्कार: हिंद-युग्म की ओर से पुस्तकें और वार्षिकोत्सव मे वरिष्ठ साहित्यका्र द्वारा प्रशस्ति पत्र

 इसके अतिरिक्त जिन चार अन्य पाठकों का हम उल्लेख करना चाहेंगे जिन्होने पिछले कुछ माहों मे अपनी रचनात्मक प्रतिक्रियाओं द्वारा कवियों का उत्साह बढाया है वे निम्नवत हैं

स्वप्निल कुमार आतिश
रंजना सिंह
एम वर्मा
जितेंद्र जौहर

जनवरी 2011 की युनिप्रतियोगिता मे भाग लीजिये


हिंद-युग्म की मासिक यूनिप्रतियोगिता एक और पड़ाव पार कर 2011 मे प्रवेश कर रही है । जनवरी 2007 से आरंभ हुए कविता के इस मासिक आयोजन का यह 49वाँ संस्करण है।  विगत माहो की तरह जनवरी 2011 माह के लिये  हम यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता के लिए प्रविष्टियाँ आमंत्रित करते हैं।सभी प्रतिभागियों और पाठकों का निरंतर सहयोग और प्रोत्साहन इस प्रतियोगिता की उपलब्धि है।

प्रतियोगिता के पुरस्कार मे इस बार परिवर्तन किया गया है। जनवरी माह के यूनिकवि को हिंद-युग्म से सद्यप्रकाशित सुधीर गुप्ता ’चक्र’ के नये काव्य-संग्रह ’उम्मीदें क्यों’ की प्रति तथा प्रशस्तिपत्र भेंट किया जायेगा। जबकि शीर्ष दस के अन्य कवियों को हिंद-युग्म प्रकाशन की पुस्तकें दी जायेंगी।  प्रतियोगिता द्वारा चयनित यूनिकवि को हिंद-युग्म के वार्षिकोत्सव मे विख्यात साहित्यकार के द्वारा सम्मानित भी किया जायेगा।


जनवरी 2011 का यूनिकवि बनने के लिए-

1) अपनी कोई मौलिक तथा अप्रकाशित कविता 17 जनवरी 2011 की मध्यरात्रि तक hindyugm@gmail.com पर भेजें।

(महत्वपूर्ण- मुद्रित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं के अतिरिक्त गूगल, याहू समूहों में प्रकाशित रचनाएँ, ऑरकुट की विभिन्न कम्न्यूटियों में प्रकाशित रचनाएँ, निजी या सामूहिक ब्लॉगों पर प्रकाशित रचनाएँ भी प्रकाशित रचनाओं की श्रेणी में आती हैं।)

2) कोशिश कीजिए कि आपकी रचना यूनिकोड में टंकित हो। यदि आप यूनिकोड-टाइपिंग में नये हैं तो आप हमारे निःशुल्क यूनिप्रशिक्षण का लाभ ले सकते हैं।

3) परेशान होने की आवश्यकता नहीं है, इतना होने पर भी आप यूनिकोड-टंकण नहीं समझ पा रहे हैं तो अपनी रचना को रोमन-हिन्दी ( अंग्रेजी या इंग्लिश की लिपि या स्क्रिप्ट 'रोमन' है, और जब हिन्दी के अक्षर रोमन में लिखे जाते हैं तो उन्हें रोमन-हिन्दी की संज्ञा दी जाती है) में लिखकर या अपनी डायरी के रचना-पृष्ठों को स्कैन करके हमें भेज दें। यूनिकवि बनने पर हिन्दी-टंकण सिखाने की जिम्मेदारी हमारे टीम की। आप किसी अन्य फॉन्ट में भी अपनी कविता टंकित करके भेज सकते हैं, लेकिन ध्यान रखें कि रचना word, wordpad या पेजमेकर में हो, पीडीएफ फाइल न भेजें, साथ में इस्तेमाल किये गये फॉन्ट को भी ज़रूर भेजें।

4) एक माह में एक कवि केवल एक ही प्रविष्टि भेजे।



यूनिपाठक बनने के लिए

चूँकि हमारा सारा प्रयास इंटरनेट पर हिन्दी लिखने-पढ़ने को बढ़ावा देना है, इसलिए पाठकों से हम यूनिकोड (हिन्दी टायपिंग) में टंकित टिप्पणियों की अपेक्षा रखते हैं। टाइपिंग संबंधी सभी मदद यहाँ हैं।

1) 1 जनवरी 2011 से 31 जनवरी 2011 के बीच की हिन्द-युग्म पर प्रकाशित अधिकाधिक प्रविष्टियों पर हिन्दी में टिप्पणी (कमेंट) करें।

2) टिप्पणियों से पठनीयता परिलक्षित हो।

3) हमेशा कमेंट (टिप्पणी) करते वक़्त एक समान नाम या यूज़रनेम का प्रयोग करें।

4) हिन्द-युग्म पर टिप्पणी कैसे की जाय, इस पर सम्पूर्ण ट्यूटोरियल यहाँ उपलब्ध है।


कवियों और पाठकों को निम्न प्रकार से पुरस्कृत और सम्मानित किया जायेगा-

1) यूनिकवि को सुधीर गुप्ता ’चक्र’ के नये काव्य-संग्रह ’उम्मीदें क्यों’ की प्रति। हिन्द-युग्म की ओर से प्रशस्ति-पत्र। यूनिकवि को हिन्द-युग्म के वर्ष 2011 के वार्षिकोत्सव में प्रतिष्ठित साहित्यकारों के हाथों सम्मानित किया जायेगा।

2) यूनिपाठक को हिंद-युग्म प्रकाशन से पुस्तकें और हिन्द-युग्म की ओर से प्रशस्ति-पत्र।

3) दूसरे से दसवें स्थान के कवियों हिंद-युग्म प्रकाशन से पुस्तकें।

प्रतिभागियों से यह भी अनुरोध है कि पिछले महीनों मे भेजी गयी अपनी किसी प्रविष्टि को दोबारा प्रतियोगिता के लिये न भेजें। कवि-लेखक प्रतिभागियों से भी निवेदन है कि वो समय निकालकर यदा-कदा या सदैव हिन्द-युग्म पर आयें और सक्रिय लेखकों की प्रविष्टियों को पढ़कर उन्हें सलाह दें, रास्ता दिखायें और प्रोत्साहित करें।

प्रतियोगिता में भाग लेने से पहले सभी 'नियमों और शर्तों' को पढ़ लें।